भाग्य से ज्यादा और समय से पहले किसी को न सफलता मिलती है और न ही सुख ! विवाह, विद्या ,मकान, दुकान ,व्यापार, परिवार, पद, प्रतिष्ठा,संतान आदि का सुख हर कोई अच्छा से अच्छा चाहता है किंतु मिलता उसे उतना ही है जितना उसके भाग्य में होता है और तभी मिलता है जब जो सुख मिलने का समय आता है अन्यथा कितना भी प्रयास करे सफलता नहीं मिलती है ! ऋतुएँ भी समय से ही फल देती हैं इसलिए अपने भाग्य और समय की सही जानकारी प्रत्येक व्यक्ति को रखनी चाहिए |एक बार अवश्य देखिए -http://www.drsnvajpayee.com/
Tuesday, 28 October 2014
Sunday, 26 October 2014
मंत्री ,महात्मा और मीडिया तीनों कानून से ऊपर हैं और सरकारी कर्मचारी तो हैं ही सबसे ऊपर !
बेचारी जनता इन सबको ढोने के लिए बनी है ये अच्छा करें या बुरा किन्तु इनकी सुख सुविधाओं या भोग विलास पर जो भी खर्च आएगा वो आम जनता को ही बहन करना होगा किन्तु इनसे ये पूछने वाला कोई नहीं है कि आप करते क्या हैं !क्योंकि ये लोग सभी प्रकार के कानूनों से ऊपर होते हैं अपने लिए कानून अपनी सुविधानुशार ये स्वयं बनाते हैं और पालन करें या न करें इसके लिए ये स्वतन्त्र होते हैं !जनता इनके आधीन होती है इसलिए ये जैसा नाच नचाते हैं जनता को वैसा ही नाचना होता है ! जो कानून ये बनाते हैं उनका पालन ये करें न करें किन्तु जनता को करना होता है ।
यहाँ एक बात और विशेष है कि ये तीनों एक दूसरे का हौसला बढ़ाया करते हैं ! नेता महात्मा एक साथ फोटो खिंचवाते हैं और मीडिया खींचता है और मीडिया ही समाज के सामने परोसता है इसका मतलब ये होता है कि यदि नेता लोग यदि भ्रष्टाचार में पकड़े जाएँ तो वो महात्माओं के साथ वाली अपनी फोटो मीडिया से दिखवाते हैं जिससे पता लगे कि वो कितने बड़े धार्मिक हैं इसी प्रकार से बाबा जी पकड़े जाएँ तो नेताओं के साथ वाली अपनी फोटो मीडिया से दिखवाते हैं ताकि लोग उन्हें सोर्सफुल समझें !ऐसी फोटो दिखाने के लिए मीडिया लेता होगा कुछ दान दक्षिणा जिसे पेडन्यूज या और कुछ कहते होंगे !किसी महात्मा को अपने कर्मों के आधार पर सोर्स की यदि बार बार जरूरत पड़े तो उसका काम केवल सोर्सफुल होने से नहीं चलता है अपितु उसे सीधे राजनीति में स्वयं उतरना होता है उस समय उसकी वो नदियों ,झरनों ,पहाड़ों के पास खड़े होकर खिंचवाई गई फोटो मीडिया को दिखाने के लिए दी जाती हैं ये छवि बनाने के बहुत काम आता है वैसे भी उस समय उनके साथ मीडिया तो होता नहीं है ये सब कुछ पूर्वनियोजित सा होता है ! अक्सर नेताओं को आपने कहते सुना होगा कि यदि हमारे ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध हुए तो वो संन्यास ले लेंगे !चूँकि उन्हें पता होता है कि संन्यास लेकर भी स्वदेशी के नाम पर दवा दारू का उद्योग तो वो लगा ही सकते हैं इससे उन्हें कैसे रोक जा सकता है !इस प्रकार से इस युग में ऐसे लोगों के हिसाब से संन्यास और राजनीति एक दूसरे की पूरक होती जा रही है ! मीडिया का काम इनसे चिपक कर चलना होता है पूरे देश से इनका कहाँ बहुत मतलब होता है कोई बहुत बड़ी घटना घटित हो जाए तो बात और है अन्यथा जनता के बच्चे गायब कर दिए जाएँ तो वो खबर बने न बने किन्तु नेता जी की भैंसें गायब हों तो ये लोग उसमें खबर बना लेते हैं !आम जनता की उपेक्षा राजनेता ही नहीं मीडिया भी करता है !जहाँ धन मिलता है वहीँ मीडिया का मन लगता है पिछले कुछ महीने पहले निर्मल बाबा टाईप के किसी धर्म व्यवसायी में मीडिया को अचानक बहुत सारे दुर्गुण दिखाई देने लगे और सभी चैनलों ने उसका बहिष्कार कर दिया किन्तु इसी बीच मीडिया और निर्मल बाबा के बीच ऐसा कुछ पका कि वो आज फिर पवित्र हैं और चैनलों ने उन्हें शिर आँखों पर बैठा रखा है !
कुल मिलाकर वर्तमान लोकतंत्र में मीडिया इतना अधिक सक्षम है कि किसी को कुछ भी बना सकता है जैसे किसी की जेब में मीडिया को देने के लिए पैसे हों तो वो बिना कुछ पढ़े लिखे भी ज्योतिषाचार्य बना सकता है और वो राशिफल से लेकर कहीं भी कुछ भी कितना भी झूठ बोले किन्तु मीडिया की कृपा से वो निश्चिन्त बना रहता है !
बंधुओ ! आपको पता ही होगा कि सरकारी संस्कृत विश्वद्यालयों से ज्योतिष को विषय के रूप में लेकर एम.ए.करने पर उसे ज्योतिषाचार्य नामक डिग्री मिलती है किन्तु जिसने ऐसी कोई पढ़ाई नहीं की है उसके नाम के साथ ज्योतिषाचार्य की डिग्री लगाना या ज्योतिष की प्रेक्टिस कानूनन अनुचित होता होगा किन्तु मीडिया है कि जिसको जब जहाँ चाहे चढ़ा दे और जिसको जब जहाँ से चाहे गिरा दे !
खैर, अब बारी सरकारी कर्मचारियों की इनकी सैलरी से लेकर सुख सुविधाओं के लिए सभी चिंतित रहते हैं । सरकारी स्कूलों में शिक्षक की कुर्सी यदि पुरानी हो जाए और देखने में अच्छी न लगे तो मीडिया का कैमरा उस कुर्सी को बार बार दिखाएगा किन्तु उस कुर्सी पर बैठकर वो करते क्या हैं इसपर मीडिया का ध्यान ही कहाँ जाता है ! इसीप्रकार से जिस विभाग में दसों लाख रूपए की सैलरी वहाँ के कर्मचारी ले जाते हैं किन्तु पाँच दस हजार का प्रिंटर ठीक न होने से महीनों तक वहाँ काम नहीं होता है जनता बिचारी पूछ पूछ कर लौट जाती है किन्तु मीडिया में कहाँ आती हैं ऐसी खबरें !
अर्थात चरित्रवान संतों को अपने समुदाय पर उठने वाली अँगुलियों के इशारों को यूँ ही नजरंदाज नहीं कर देना चाहिए । भिक्षावृत्ति के पवित्रव्रतियों जैसी वेषभूषा बनाकर रहने वाले कुछ साधूसंत यदि सांसारिक प्रपंचों में फँसने लगें न केवल चूरन चटनी मिर्च मशाले बेचते फिरते हों अपितु अरबों रुपयों के उद्योग चलने लगें इसी प्रकार से अन्य भी विविध प्रकार के प्रपंच फाँसते फिरते हों फिर भी अपने को संन्यासी सिद्ध करने पर तुले हों तो ये संन्यास का मजाक नहीं तो क्या है !
इसीप्रकार से आधुनिक राजनेता लोग राजनीति में घुसते तो देश और देशवासियों की सेवा करने के लिए हैं किन्तु वहाँ निकलते मेवा लेकर हैं वो भी अपने एवं अपनों के लिए राजनीति में घुसते वक्त जिनकी औकात हजारों लाखों की होती है वो बिना कोई ख़ास व्यापार किए जीवन में बिना कोई कंजूसी किए सारी सुख सुविधाएँ भोगते हुए भी खरबों में खेलने लगते हैं अपने को दलित राजनेता कहने वाले भी करोड़ों के घाँघरे पहनने लगते हैं !
मजे की बात ये है कि एक से एक ईमानदार राजनेताओं के हाथों में सत्ता पहुँचती है किन्तु ऐसे नेताओं का वह भ्रष्टाचारार्जित धन और उन नेताओं को कटघरे में खड़ा करके उनसे जनता की गाढ़ीकमाई उन नेताओं से छीन कर जनता को सौंपने की जेहमत कोई उस तरह से नहीं उठाता है जैसा उठाया जाना चाहिए । आखिर क्यों ?क्या वो नेता भी ईमानदार नहीं होते हैं ईमानदारी का केवल दिखावा करते रहते हैं अथवा वो इस बात से डरते हैं कि कल इनकी पार्टी सत्ता में आई तो मेरे साथ भी ऐसा ही होगा !यदि ये बात ऐसी ही सच है तो देश वासियों को ईमानदार एवं कर्मठ प्रशासक खोजने की यात्रा अपनी जारी रखनी चाहिए क्योंकि यह सपना अभी तक अधूरा है ।
तीसरा पक्ष है मीडिया का मीडिया आज नैतिक नहीं रहा है उस अपने काम पर उस तरह की निष्ठा भी नहीं दिखती जैसी होनी चाहिए इधर कुछ वर्षों से मीडिया सत्ता एवं संपत्ति के सामने केवल दुम हिलाते दिखते रहना चाहता है कई प्रकरणों में देखा जाता है कि सत्ता के शीर्ष पुरुषों की चाटुकारिता में अपनी कलम का इस्तेमाल झाड़ू की तरह करता है वो सत्ता शीर्ष पर छाई हुई पार्टी और राजनेताओं की उनके कपड़ों की उनकी चाल ढाल रहन सहन वेष भूषा आदि की केवल प्रशंसा ही किया करता है यह चाटुकारिता यहाँ तक बढ़ चुकी है कि कई बड़े वैश्विक मंचों पर अपने नेताओं के प्रवचनों को सारगर्भित भाषणों की तरह महिमामंडित करती रहती है वैश्विक मंचों पर दिए गए हमारे भाषणों का मूल्यांकन हर देश अपने अपने व्यक्तिगत लाभ हानि की दृष्टि से करता है इसलिए हमारा भी दायित्व बन जाता है कि हम अपने भाषणों में अधिक से अधिक देशों के हृदय छूने होंगे तब वो देश भी हमारी भावनाओं से भावित होकर हमारे एवं हमारे पड़ोसियों के साथ हमारे बनाते बिगड़ते संबंधों में हमारे साथ खड़े होंगे किन्तु ऐसी उमींद कैसे की जा सकती है कि विश्व के कुछ देश या समूह या स्त्री पुरुष किन्हीं लोगों के अत्याचार के शिकार हो रहे हों वो भी हमसे अपेक्षा करते हैं कि हम उनके लिए भी कुछ सोचें किन्तु हम अपनी अपनी बातें एवं मधुरिम कल्पनाएँ परोसकर यह सोचकर चले आएँ कि अब विश्व हमारी ओर लालायित होगा किन्तु आखिर किसलिए !यदि हमारी उन बातों में उनका कोई स्वार्थ नहीं होगा, ऐसे प्रवचनों को भी मीडिया महिमा मंडित करे यह बात समझ से परे है !कई बार ऐसा होते देखा जाता है ।
Friday, 24 October 2014
दीपावली के विषय में कई टी.वी. चैनलों ने जनता को दी गलत जानकारी !
धर्म ,ज्योतिष एवं शास्त्रीय विषयों में भारतीय मीडिया न जाने क्यों दिनोंदिन भोंदू बनता जा रहा है !
मीडिया को खुद ही नहीं पता है कि दीवाली का पर्व मनाया क्यों जाता है ! मीडिया से जुड़े टी.वी. चैनलीय लोग जनता को दिन भर मूर्ख बनाते रहे कि दीपावली श्री राम के बन से वापस आने की खुशी के उपलक्ष्य में मनाई जाती है जबकि सच्चाई ये है कि राजा बलि ने भगवान विष्णु से वरदान के रूप में वर्ष में एक दिन के लिए इस पृथ्वी पर अपने राज्य का महोत्सव मनाने का बचन लिया था जिसमें उसकी इच्छा थी कि इस समस्त पृथ्वी को प्रकाश से नहला दिया जाए ! इसीलिए दीपावली त्यौहार को प्रकाश पर्व के रूप में मनाते हैं एवं इसे "कौमुदी महोत्सव" भी कहते हैं ! इस विषय में अधिक जानकारी के पढ़ें हमारा यह लेख लिंक -
दीपावली का त्योहार मनाते आखिर क्यों हैं और कब से चली आ रही है दिवाली मनाने की परंपरा ! see more...http://snvajpayee.blogspot.in/2014/10/blog-post.html
बंधुओं ! धर्म एवं धर्मशास्त्रों ,ज्योतिष तथा वास्तु आदि विषयों में टीवी चैनलों से परोसी जा रही सामग्री विश्वसनीय नहीं होती है !आप स्वयं देखिए -
मीडिया के टी.वी. चैनलों के विषय में लगता है कि उन्हें पढ़े लिखे ज्योतिषी या धर्मवेत्ता शास्त्रीय विद्वान मिलते ही नहीं हैं और यदि मिले भी तो बहुत थोड़े समय के लिए मिलते हैं , अन्यथा धर्म ज्योतिष वास्तु एवं उनके उपायों के विषय में निराधार बातें बकने के लिए तरह तरह के मुखौटे लगाए लोगों को न जाने कहाँ से पकड़ लाता है मीडिया और धर्म एवं धर्म शास्त्रों के नाम पर या ज्योतिष,वास्तु एवं उनके उपायों के नाम पर उन शास्त्रीय निरक्षरों की कल्पित बकवास परोसा करता है मीडिया !शास्त्रों के नाम पर उनके द्वारा जो भी बातें बताई जाती हैं उपाय करवाए जाते हैं उनका प्रायः शास्त्रों या आर्ष ग्रंथों से कोई सम्बन्ध ही नहीं होता है वो सब लगभग कोरा झूठ होता है ।
आप स्वयं सोचिए कि राशिफल नामक झूठ बोलने के लिए विभिन्न टीवी चैनलों ने विभिन्न प्रकार के लोग बैठा रखे होते हैं ये लोग एक ही राशि वालों के लिए एक ही दिन के विषय में अलग अलग या कई बार परस्पर विरोधी राशिफल नामक झूठ बोल रहे होते हैं आखिर क्यों ? ऐसा करवाने में मीडिया की मजबूरी आखिर क्या है!
आप स्वयं ही सोचिए कि जब एक दिन में कोई ग्रह नहीं बदलता है तो ऐसा कैसे संभव है !कोई ग्रह महीने में बदलता है, कोई वर्ष में कोई वर्षों में राशि बदलता है एक मात्र चन्द्रमा ऐसा ग्रह है जो सबसे कम अर्थात सवा दो दिनों में राशि बदलता है फिर इन झुट्ठों का राशि फल रोज आखिर कैसे बदलता है और उसका शास्त्रीय आधार आखिर क्या होता है !इसी प्रकार से टीवीचैनलों पर चलने वाले ज्योतिष,वास्तु एवं धर्म सम्बन्धी लगभग हर कार्यक्रम को कल्पित ही समझना चाहिए जिनके विषय में शास्त्रीय प्रमाण नहीं दिए जाते हैं ।
टीवीचैनलों पर ऐसे कार्यक्रम दिखाने के शौकीन लोगों को क्या यह पता होना चाहिए कि सरकार के द्वारा चलाए जाने वाले संस्कृत विश्वविद्यालयों में ज्योतिष वास्तु एवं अन्य धार्मिक विषय सब्जेक्ट के रूप में पढ़ाए जाते हैं इन्हीं विषयों में एम.ए.पीएच. डी. आदि भी करवाया जाता है ऐसे संस्कृत विश्वविद्यालयों ,महाविद्यालयों या विद्यालयों में पढ़ाने वाले लोग उन उन विषयों के अधिकृत विद्वान होते हैं!धर्म के नाम पर बड़ी बड़ी बहसें करवाने वाला मीडिया उन विद्वानों तक पहुँचने की आवश्यकता ही नहीं समझता है जो किसी विषय के शास्त्रीय पक्ष को रख सकने में सक्षम हों !इसका कारण है कि उनका चेहरा टीवी पर दिखाने के लिए मीडिया को जो धन चाहिए वो विद्वान लोग ईमानदारी पूर्वक कमाकर मीडिया को कैसे दे सकते हैं !इसलिए मीडिया उनकी उपेक्षा हमेंशा करता रहता है कभी कोई बात बहुत आगे बढ़ जाए और उन बातों को समेटना इनके बूते का न रह जाए तब मीडिया भागता है शास्त्रीय विद्वानों एवं शास्त्रीय साधू संतों के पास ! बाकी तो उन्हीं अपने रोज वाले कल्पित लोगों को माला वाला पहनाकर,चंदन वंदन लगवाकर बैठा लेता है मीडिया ,यह जानते हुए भी कि इन लोगों ने संस्कृत विश्वविद्यालयों ,महाविद्यालयों या विद्यालयों से सम्बंधित विषयों में कभी कोई शिक्षा नहीं ली है !आखिर धार्मिक एवं शास्त्रीय विषयों की छीछालेदर करवाने में मीडिया की ऐसी मजबूरी क्या है ?
इन मीडिया वालों को ऐसा कोई साधू संत क्यों नहीं मिलता है जिसके माध्यम से ये मीडियायी लोग धर्म एवं शास्त्रों की सही सही जानकारी जनता को परोस पाते जो इनका नैतिक कर्तव्य भी है किन्तु दुनियाँ को नैतिकता का पाठ पढ़ाने की कसम खाने वाला मीडिया , किसी को भी कभी भी कटघरे में खड़ा कर देने वाले मीडिया के मल्ल वीर धर्म एवं शास्त्रों के बारे में हमेंशा भ्रामक जानकारी न जाने क्यों देते रहते हैं !
Monday, 13 October 2014
कहाँ श्री राम जी और कहाँ साईं !
साईं पत्थरों को देवता बनाने की साजिश एक बार फिर हुई नाकाम !
वहाँ से भी खदेड़े गए साईं जहाँ से आशा थी कि शायद उन्हीं के सहयोग से पुजवाने की शौक पूरी हो जाए !
चमत्कारी साईं के कहाँ गए चमत्कार ! ये तो धीरे धीरे निर्मल बाबा बनते जा रहे हैं अब तो कोई चालाकी काम नहीं आ रही है !
साईं को जयंत से सबक लेना चाहिए था !
साईं की दुर्दशा रामचरित मानस के जयंत की तरह होती चली जा रही है जहाँ जाएँ वहीँ धक्के मिल रहे हैं श्री राम प्रभु के द्रोही की रक्षा कौन कर सकता है अर्थात कोई नहीं -
काहू राखन कहा न ओही ।
राखि को सकहि राम कर द्रोही ॥
-रामचरित मानस
साईंवादियों को रावण की दुर्दशा नहीं भूलनी चाहिए -
राम विमुख अस हाल तुम्हारा ।
रहा न कुल को रोवनि हारा ॥
श्री राम के सामने बड़ों बड़ों की तो चली नहीं साईं किस खेत की मूली हैं -
कहाँ श्री राम जी और कहाँ साईं !
श्री राम जी जो करना चाहते हैं होता वही है जिस जीवन को श्री राम जी खाली खाली रखना चाहते हैं उसे भर कौन सकता है और जब श्री राम जी भरेंगे तो खाली कौन कर सकता है जिसे राम जी सामाजिक पद प्रतिष्ठा आदि समस्त सुख सुविधाएँ प्रदान करना चाहेंगे उसकी छीन कौन सकता है और जिसकी छीनना चाहेंगे उसे दे कौन सकता है ! कुल मिलाकर करना जब सबकुछ श्री राम जी को ही है साईं भी उन्हीं के आधीन है फिर साईं वाले ये क्यों नहीं सोचते हैं कि श्री राम जी में ऐसी क्या कमी है जो साईं बुढ़ऊ पूरी करेंगे ! गोस्वामी तुलसी दास जी महाराज जी कहते हैं कि -
को भरिहै है के रितए रितवै पुनि को हरि जौं भरिहै ।
उथपै तेहि को जेहि राम थपै थपिहै तेहि को हरि जौं टरिहै ।
-कवितावली
जो समझ नहीं सकते पढ़ नहीं सकते ऐसे गूँगे बहरे लोग कुछ भी कहें तो उसका जवाब कैसे दिया जा सकता है हाँ कोई प्रमाणित बात बोले उसका जवाब होता ही है किन्तु जब साईं प्रमाणित नहीं हैं तो उनके चेला चेलियों से शास्त्र प्रमाणों की आशा ही क्यों करनी !
वहाँ से भी खदेड़े गए साईं जहाँ से आशा थी कि शायद उन्हीं के सहयोग से पुजवाने की शौक पूरी हो जाए !
चमत्कारी साईं के कहाँ गए चमत्कार ! ये तो धीरे धीरे निर्मल बाबा बनते जा रहे हैं अब तो कोई चालाकी काम नहीं आ रही है !
साईं को जयंत से सबक लेना चाहिए था !
साईं की दुर्दशा रामचरित मानस के जयंत की तरह होती चली जा रही है जहाँ जाएँ वहीँ धक्के मिल रहे हैं श्री राम प्रभु के द्रोही की रक्षा कौन कर सकता है अर्थात कोई नहीं -
काहू राखन कहा न ओही ।
राखि को सकहि राम कर द्रोही ॥
-रामचरित मानस
साईंवादियों को रावण की दुर्दशा नहीं भूलनी चाहिए -
राम विमुख अस हाल तुम्हारा ।
रहा न कुल को रोवनि हारा ॥
श्री राम के सामने बड़ों बड़ों की तो चली नहीं साईं किस खेत की मूली हैं -
कहाँ श्री राम जी और कहाँ साईं !
श्री राम जी जो करना चाहते हैं होता वही है जिस जीवन को श्री राम जी खाली खाली रखना चाहते हैं उसे भर कौन सकता है और जब श्री राम जी भरेंगे तो खाली कौन कर सकता है जिसे राम जी सामाजिक पद प्रतिष्ठा आदि समस्त सुख सुविधाएँ प्रदान करना चाहेंगे उसकी छीन कौन सकता है और जिसकी छीनना चाहेंगे उसे दे कौन सकता है ! कुल मिलाकर करना जब सबकुछ श्री राम जी को ही है साईं भी उन्हीं के आधीन है फिर साईं वाले ये क्यों नहीं सोचते हैं कि श्री राम जी में ऐसी क्या कमी है जो साईं बुढ़ऊ पूरी करेंगे ! गोस्वामी तुलसी दास जी महाराज जी कहते हैं कि -
को भरिहै है के रितए रितवै पुनि को हरि जौं भरिहै ।
उथपै तेहि को जेहि राम थपै थपिहै तेहि को हरि जौं टरिहै ।
-कवितावली
जो समझ नहीं सकते पढ़ नहीं सकते ऐसे गूँगे बहरे लोग कुछ भी कहें तो उसका जवाब कैसे दिया जा सकता है हाँ कोई प्रमाणित बात बोले उसका जवाब होता ही है किन्तु जब साईं प्रमाणित नहीं हैं तो उनके चेला चेलियों से शास्त्र प्रमाणों की आशा ही क्यों करनी !