संत यदि साईं भक्त को बोलवाना न चाहते तो उसे मंच और माइक देते ही क्यों ?
चूँकि साईं नशा करते थे कहीं ये साईं समर्थक नशे में ही तो नहीं थे !क्योंकि वो भाषण में अपने विषय से भटक गए थे सुना जाता है कि वो इतने भी होश में नहीं थे!
पहले भी धन बल से कई नकली बाबा प्रभावित करके साईं के पक्ष में किए जा चुके हैं कहीं ये भी उसी तरह का षड्यंत्र तो नहीं था !
संजय कसाई नाथ जिस ढंग से अक्सर श्री शंकराचार्य जी को अपशब्द बका करते थे कहीं ये उसी उपद्रवी का स्वरचित षडयंत्र तो नहीं था !
मित्रो ! सुना जा रहा है कि कोई व्यक्ति अपने को साईं समर्थक बताकर धर्म संसद में गया था जो साईं ट्रस्ट की ओर से अधिकृत नहीं था फिर भी उसे विचार रखने का अवसर दिया गया यदि संतों के मन में साईं समर्थकों के प्रति कोई पूर्वाग्रह होता तो उसे मंच पर पहुँच कर माइक में बोलने का सौभाग्य ही कैसे मिल सकता था फिर भी वहाँ बवाल हो गया ! इसमें धर्म संसद का क्या दोष ?
देखिए बवाल तो होना ही था कुछ लोगों का अनुमान है कि उन्हें कुछ उपद्रवियों ने भाँग वाँग खिलाकर शायद भगदड़ मचाने के लिए ही भेजा हो वैसे भी यदि वो महानुभाव वास्तव में साईं समर्थक थे तो स्वाभाविक है कि साईं बाबा के आचार विचार खान पान से वो सहमत रहे होंगे और यदि साईं मांस आदि का सेवन करते थे चिलम आदि पीकर नशा करते थे तो उनके अनुयायी इन दुर्गुणों से घृणा क्यों करेंगे इसकी तो आशा ही नहीं की जानी चाहिए और साईं के समर्पित अनुयायी तो ऐसा करते ही होंगे अन्यथा समर्पण कैसा ! नशा पत्ती करने वाले लोग किसी सभा में जाने लायक कहाँ होते हैं और यदि जाएँगे तो भगदड़ मचेगी ही !
हमें किसी से सूचना मिली कि अपने को साईं भक्त कहने वाले वे लोग इतने भी होश में नहीं थे कि यह धर्म संसद आयोजित किस मुद्दे पर की गई है और हम बोल क्या रहे हैं और जो कुछ उनके मन में आया सो बकने बोलने लगे !यह किसी के लिए भी शोभा नहीं देता है साईं ट्रस्ट को यदि सम्मिलित होना ही था तो सीधे तौर पर होते अन्यथा ये सब करना ठीक नहीं कहा जा सकता है वैसे भी कई नकली बाबाओं का आर्थिक पूजन करके साईं वालों ने प्रभावित कर रखा है आज वो सनातन धर्मियों की भाषा न बोलकर साईंयों की भाषा ही बोलते हैं मुझे आशंका है की ये भगदड़ी भी कहीं नकली बाबाओं की तरह ही अर्थलोभ के ही शिकार न हों !
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