Thursday, 13 March 2014

शिक्षा क्या राजनीति के लिए शत्रु है?



                                      पढ़े लिखे ईमानदार लोगों की जरूरत किसी को नहीं है!  

  काश  मैं भी नेता  होता !

  हर पार्टी के लोगों को मैंने यह कहते  सुना है कि वो राजनैतिक शुद्धि के लिए पढ़े लिखे ईमानदार लोगों को अपने साथ जोड़ना चाहते हैं।जिससे देश में ईमानदार राजनीति का वातावरण बनाया जा सके। यह सुनकर मैंने सोचा कि मैंने भी तीन विषय से आचार्य (एम.ए.)  दो विषय से अलग से एम.ए. एवं बी.एच.यू. से पीएच.डी की है।करीब150 किताबें लिखी हैं यद्यपि सारी प्रकाशित नहीं हैं,कई काव्य ग्रंथ भी हैं।प्रवचन भाषण आदि करने ही होते हैं।आरक्षण आंदोलन से आहत होकर मैंने आजीवन सरकार से नौकरी न मॉंगने का व्रत लिया हुआ है। वैसे भी ईमानदारीपूर्वक जीवन यापन करने का प्रयास करता रहा  हूँ। फिलहाल अभी तक निष्कलंक जीवन है यह कहने में हमें कोई संकोच नहीं हैं।           
      इस प्रकार से अपनी शैक्षणिक सामर्थ्य  का राजनैतिक दृष्टि से देशहित में सदुपयोग करना चाहता था, इसी दृष्टि से मैंने लगभग हर पार्टी से संपर्क करने के लिए सबको पत्र लिखे अपनी पुस्तकें भेजीं अपने डिग्री प्रमाणपत्र भेजे फोन पर भी संपर्क करने का प्रयास किया,किंतु कहीं किसी ने हमसे मिलने के लिए रुचि नहीं ली।किसी ने हमें पत्रोत्तर देना भी ठीक नहीं समझा।कई जगह तो दो दो बार पत्र डाले किंतु कहीं कोई चर्चा न हो सकी किसी ने मुझे पत्र लिखने लायक या फोन करने लायक नहीं समझा मिलने की बात तो बहुत दूर की है।
      हमारे राष्ट्रपति जी दुर्गा जी के भक्त हैं यह सुनकर उन्हें अपनी दोहा चौपाई में लिखी दुर्गा सप्तशती की पुस्तकें  भेंट करके अपनी कुछ बात निवेदन करने का मन बनाया किंतु वहॉं पुस्तकें एवं पत्र भेजने के बाद भी उसके उत्तर में कोई पत्र नहीं मिला।
       इसके बाद कुछ हिंदू संगठनों से  इसलिए संपर्क किया कि मेरी धार्मिक शिक्षा विशेष रूप से है शायद  वहीं हमारा या हमारी शिक्षा का जनहित में शैक्षणिक सदुपयोग हो सके तो अच्छा होगा तो वहॉं के बड़े बड़े लोगों ने हमसे मिलना ठीक नहीं समझा,उनसे छोटे लोगों को हमारी शिक्षा में कोई प्रत्यक्ष रुचि नहीं हुई, यद्यपि वहॉ मुझे इसलिए उन्होंने संपर्क में रहने को कहा ताकि हमारी समाज में जो गुडबिल है उसे संगठन के हित में आर्थिक रूप से कैस किया जा सके ऐसा उन्होंने कहा भी!यहॉं से इसी प्रकार के यदा कदा फोन भी आये जिनमें मैंने पैसे के कारण रुचि नहीं ली।
      इसके बाद निष्कलंक जीवन बेदाग चारि़त्र का नारा देने वाले एक सामाजिक संगठन से जुड़ने के लिए वहॉं के मुखिया को अपना साहित्य भेजा और मिलने के लिए पत्र के माध्यम से समय मॉंगा किंतु वहॉं भी मुझे घास नहीं डाली गई।इसके बाद ब्लाग पर बैठ कर चुपचाप मैं अपने बिचार लिखने लगा।

     बी.पी.सिंह जी की सरकार के समय में राजनेताओं के आधारहीन अदूरदर्शी फैसलों से सारा समाज आहत था आरक्षण से लेकर श्री राम मंदिर आन्दोलन तक उसी समय की उपज थे और दोनों में निरपराध लोग मारे गए!उस समय के बाद राज नीति धीरे धीरे प्रदूषित होती चली जा रही है।बहुत दिन बाद जब अटल जी की सरकार आई उसमें तो देश वासियों के प्रति अपनापन दिखा जिसमें जनता को सुख सुविधाएँ मिलती दिखीं भी जनता की जरूरत की चीजें जनता की आर्थिक क्षमता के अनुशार उपलब्ध कराने का प्रयास हुआ।इसके अलावा तो आँकड़ों और आश्वासनों का खेल चलता रहता है जनता मरे मरती रहे,महँगाई बढ़े बढ़ती रहे अपराध बढ़ें बढ़ते रहें, सरकारें बड़ी बेशर्मी से पूरे देश में सुख चैन के आँकड़े लेकर प्रेस कांफ्रेंस करती रहती हैं ये जनता की पीड़ा से अपरिचित सरकारें या यूँ कह लें कि जनता से दूर रहकर केवल चुनावी खेल खेलने वाली सरकारें कभी भी समाज एवं देश हित में नहीं हो सकती हैं इन्हें अपने काम पर भरोसा ही नहीं होता है इसलिए हर चुनाव केवल उन्माद फैलाकर जी तना चाहती हैं!इन राजनैतिक दलों का उद्देश्य ही जन सेवा न होकर कैसे भी सत्ता में बने रहना होता है सत्ता  से हटते ही चेहरे की चमक चली जाती है। ये भावना ठीक नहीं है हर राजनेता के मनमें समाज के लिए स्थाई सेवा भाव तो चाहिए ही जो अधिकांश नेताओं में नहीं दिखता ऐसे में उन्माद फैलाकर चुनाव जीतने के अलावा और दूसरा कोई विकल्प दिखता भी नहीं है जातिगत आरक्षण के रूप में बी.पी.सिंह जी ने भी उसी शार्टकट का ही सहारा लिया जो समाज के लिए दुखद साबित हुआ!

    इसी राजनैतिक कुचाल से आहत होकर बेरोजगारी के भय से युवा वर्ग न केवल घबड़ा गया अपितु आरक्षण के समर्थन और विरोध में संघर्ष पूर्ण आन्दोलनों में कूद पड़ा !जिस प्रकार से एक साथ एक कक्षा में पढ़ने वाले छात्रों के समूह भी एक दूसरे से लड़ रहे थे जाति व्यूहों में बँट चुका था सारा देश !कितना दारुण दृश्य था वह! जब बड़ी संख्या में छात्र आत्म दाह करने पर मजबूर हो रहे थे! उसी समय में पटना में आरक्षण विरोधी छात्रों पर सरकारी मशीनरी ने गोली चलाई जिसमें कई छात्र घायल हुए थे इसी में एक छात्र श्री शैलेन्द्र सिंह जी मारे गए थे जिनका दाह संस्कार वाराणसी के हरिश्चंद घाट पर किया गया था उस समय वहाँ बहुत भीड़ उमड़ी थी जिसमे बहुत सारे लोग रो रहे थे बड़ा भावुक वातावरण था मैं भी उसी भीड़ में खड़े रो रहा था !वह विद्यार्थी जीवन था मैंने उसी भावुकता  वश अपने मन में ही एक व्रत ले लिया कि अब मैं कभी सरकार से नौकरी नहीं मागूँगा !!!उसके बाद ईश्वर की कृपा से इतना पढ़ने के बाद भी आज तक सरकारी नौकरी के लिए किसी प्रपत्र पर कभी साइन तक भी नहीं किए हैं ये बात हमारे सैकड़ों मित्रों को पता है। मुझे लगा कि मैं भी तो उसी सवर्ण जाति से हूँ जिस पर दबाने कुचलने एवं शोषण करने के आरोप लगाए जा रहे हैं! हम सवर्णों के अधिकारों के लिए ही तो शैलेन्द्र सिंह जी का बलिदान हुआ है!

    इसके बाद आर्थिक तंगी और धनाभाव से होने वाली बहुत   सारी समस्याओं का सामना तो करना ही था जो  सपरिवार मैं आज तक कर भी रहा हूँ !बचपन में पिता जी का देहांत हो गया था संघर्ष पूर्ण जीवन जीते जीते माता जी भी असमय में ही चल बसीं ! कुल मिलाकर परिस्थियाँ अच्छी नहीं थीं।केवल विद्या का साथ था।शैक्षणिक शोषण भी समाज के अर्थ संपन्न लोगों ने करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी परिस्थियों का लाभ तो चालाक या सक्षम  लोग उठा ही लेते हैं!

     मुझे लगा कि जब अब नौकरी करनी नहीं है तो शिक्षा का समाज हित में ही सदुपयोग किया जाए और जन जागरण किया जाए कि किसी जाति के पीछे रह जाने में सवर्णों का कोई हाथ नहीं है ये राजनेताओं के द्वारा गढ़े गए किस्से हैं। इस प्रकार आपसी भाईचारे की भावना भरना हमारा लक्ष्य था जिसके लिए कुछ प्राइवेट   संगठनों से जुड़ा तो देखा वो समाज सेवा तो कहाँ वो लोग समाज से केवल धन इकट्ठा करने की बात किया करते और सोचते भी यही थे!मुझे लगा कि यही करना है तो किसी राजनैतिक दल से जुड़ जाता हूँ सभी दलों और यथासंभव यथा सुलभ नेताओं से संपर्क किया किन्तु किसी ने मुझमें समाज सेवा के वो गुण नहीं पाए जो एक राजनेता में होने चाहिए!मेरे व्रती,शिक्षित ,सदाचारी,त्याग पूर्ण समाजसेवी जीवन की बातें कहाँ पसंद की जाती हैं राजनीति में? वहाँ तो ऐसी बातें लिखकर भाषणों में पढ़ने के काम आती हैं। 

     इस प्रकार से सब जगह एवं सभी दलों से निराश अंततः अब मैं राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान नामक संस्थान के तत्वावधान में यथा संभव जन हित के कार्य करने का प्रयत्न करता रहता हूँ।
    यहॉं यह अपनी निजी कहानी लिखने का अभिप्राय केवल यह है कि इन राजनेताओं को अपने दलों में अपने साथ जोड़ने में न जाने किस शैक्षणिक या और प्रकार की योग्यता की आवश्यकता होती है जिन ईमानदार कार्यकर्ताओं के नाम पर वे जिनकी तलाश किया करते हैं न जाने वे कौन से भाग्यशाली लोग होते हैं,और वे अपनी किस योग्यता से अपनी ओर राजनैतिक समाज को प्रभावित किया करते हैं?मुझे तो केवल इतना पता है कि  हमारे जैसा शिक्षा से जुड़ा हुआ व्यक्ति इन राजनैतिक लोगों के किसी काम का नहीं है तो आम ग्रामीण या सामान्य आदमी इन राजनैतिक या सामाजिक संगठनों से क्या आशा  रखे?अगर उसे अपनी कोई समस्या कहनी ही हो तो किससे कहे ?और यदि राजनैतिक क्षेत्र में जुड़कर कोई काम करना ही हो तो कैसे करे ?

     मेरा उद्देश्य समाज को आत्म निर्भर  बनाना है, जिससे समाज अपनी हर जरूरत के लिए सरकार की कृपा पर ही आश्रित न रहे!आखिर पुराने समय में भी तो लोग आपसी भाई चारे से रह लेते थे!आज साधन बहुत हो गए हैं किन्तु उनका उपयोग बिलकुल नहीं के बराबर है मोबाईल हर किसी की जेब में पड़ा है किन्तु बात किससे करें! कारें दरवाजे पर खड़ी हैं किंतु जाएँ किसके घर? सबसे तो संबंध बिगाड़ रखे हैं! न जानें क्यों ? सरकारी कानून बल,सरकारी सोर्स सिफारिस बल धनबल कहाँ किसी के काम आ पा रहे हैं जो इनके सहारे रहा सो मरा !

     आज आधे अधूरे कपड़े पहनने वाली फैशनेबल लड़कियों की हिम्मत तो सरकार खूब बँधा  रही है कि आप जैसे चाहो वैसे रहो हम तुम्हारे साथ हैं तुम्हें कोई रोक नहीं सकता किन्तु खाली हिम्मत बँधाने से क्या होता है लड़कियों की मदद कितनी कर पा रही है सरकार?पुराने ढंग से रहने में हमें पिछड़ा दकियानूसी रूढ़िवादी आदि कहलाने का खतरा है किन्तु सरकारी सुरक्षा के भरोसे तो खतरा ही खतरा है!अब ये हमें सोचना है कि सरकारी सुरक्षा बल के भरोसे अपनी छीछालेदर कराने के बाद भारतीय संस्कृति की छाँव में सुरक्षित रहना है या बिना छीछालेदर कराए ही भारतीय संस्कृति की छाँव में सुरक्षित रहने  में भलाई है!चारों ओर आधुनिक फैशन में रहने पर खतरा ही खतरा है!

   सरकारों में जनसेवा की सोच ही आज कहाँ है किस घमंड में जी रहे हम लोग ? सरकारें पति पत्नी का तलाक कराने का कानून तो बना सकती हैं किन्तु पति पत्नी में प्रेम नहीं पैदा कर सकती हैं!जबकि प्रेम सबसे अधिक जरूरी है वो हमें ही करना है इसीप्रकार से पड़ोसी से लेकर सभी सम्पर्कियों से मुकदमा लड़ो तो सरकारें एवं कानून तुम्हारा साथ देंगे किन्तु यदि इनसे प्रेम करना चाहो तो इसके सूत्र न तो कानून में हैं और न ही  सरकारों के पास !किन्तु जो स्त्री पुरुष इस सच्चाई को नहीं समझ पा रहे हैं उन्होंने सरकारी कानूनी सुरक्षा बल के घमंड में  अपने सारे सम्पर्कियों सम्बन्धियों से तलाक कर लिया है किन्तु सरकार कब कहाँ किसके काम आई है? राजनीति,राजनेता एवं सरकारें तो हर विषय में आश्वासन देकर धोखा देती रहती हैं!ये हर विषय में इनकी आदत में है!सरकार के खून में पाया जाने वाला यह गद्दारी दोष अब तो सरकारी कर्मचारियों में भी आने लगा है! अब तो इनके मन में भी समाज के प्रति अपनापन खतम सा होता जा रहा है घूस दो तो काम होगा  अन्यथा नहीं होगा आप कानूनी अधिकारों की पर्चियाँ पकड़े घूमते रहो !लोगों का मानना है चूँकि घूँस आदि भ्रष्टाचार के माध्यम से लिया धन का हिस्सा जब सरकारी दुलारे राजापूत सरकार तक पहुँचा देते हैं तब अपने नौनिहालों पर खुश होकर सरकारें उन्हें महँगाई भत्ता बढ़ा चढ़ा कर देने लगती हैं सैलरी ड्योढ़ी दोगुनी आदि कुछ भी कर देती हैं वो कुछ काम करें न करें किन्तु सैलरी तो बढ़ानी ही होती है!अपनों को तो सरकार एक दम बरदान की तरह बाँटती रहती है दुश्मन तो केवल आम जनता है सरकार एवं सरकारी कर्मचारी दोनों ही आम जनता को पराया समझने लगते हैं! 

    सरकारी प्राथमिक  स्कूलों को ही लें उनकी पचासों हजार सैलरी होती है किंतु वो सरकारी दुलारे या तो स्कूल नहीं जाते हैं यदि गए  भी तो जब मन आया  या घर बालों की याद आई तो  बच्चों की तरह स्कूल से भाग आते हैं पढ़ने पढ़ाने की चर्चा वहाँ  कहाँ कौन  करता है और कोई करे भी तो क्यों? इनकी इसी लापरवाही से बच्चों के भोजन में  गंदगी  की ख़बरें तो हमेंशा से मिलती रहीं किन्तु इस बीच तो जहर तक  भोजन में निकला बच्चों की मौतें तक हुई हैं किंतु बच्चे तो आम जनता के थे कर्मचारी  अपने हैं इसलिए थोड़ा बहुतशोर शराबा मचाकर ये प्रकरण ही बंद कर दिया जाएगा ! आगे आ रही है दिवाली पर फिर बढ़ेगी सैलरी महँगाई भत्ता आदि आदि!

    अपने शिक्षकों को दो  चार दस हजार की  सैलरी देने वाले प्राइवेट स्कूल अपने बच्चों को शिक्षकों से अच्छे ढंग से पढ़वा  लेते हैं और लोग भी बहुत सारा धन देकर वहाँ अपने बच्चों का एडमीशन करवाने के लिए ललचा रहे होते हैं किंतु वही लोग फ्री में पढ़ाने वाले सरकारी स्कूलों को घृणा की नजर से देख रहे होते हैं! यदि सोच कर  देखा जाए तो लगता  है कि यदि प्राइवेट स्कूल न होते तो क्या होता? सरकारी शिक्षकों,स्कूलों के भरोसे कैसा होता देश की शिक्षा का हाल?

    सरकार एवं सरकारी कर्मचारियों  के एक बड़े वर्ग ने जिस प्रकार से जनता के विश्वास को तोड़ा है वह किसी से छिपा  नहीं है आज लोग सरकारी अस्पतालों पर नहीं प्राइवेट नर्शिंग होमों पर भरोसा करते हैं,सरकारी डाक पर नहीं कोरियर पर भरोसा करते हैं,सरकारी फ़ोनों की जगह प्राइवेट कंपनियों ने विश्वास जमाया है! सरकार के हर विभाग का यही  हाल है! जनता का विश्वास  सरकारी कर्मचारी किसी क्षेत्र में नहीं जीत पा रहे हैं सच्चाई यह है कि सरकारी कर्मचारी जनता की परवाह किए बिना फैसले लेते हैं वो जनता का विश्वास जीतने की जरूरत ही नहीं समझते इसके दुष्परिणाम पुलिस के क्षेत्र में साफ दिखाई पड़ते हैं चूँकि पुलिस विभाग में प्राइवेट का विकल्प नहीं है इसलिए वहाँ उन्हीं से काम चलाना है चूँकि वहाँ काम प्रापर ढंग से चल नहीं पा रहा है जनता हर सरकारी विभाग की तरह ही पुलिस विभाग से भी असंतुष्ट है इसीलिए पुलिस और जनता के  बीच हिंसक झड़पें तक होने लगी हैं जो अत्यंत गंभीर चिंता का विषय है उससे  भी ज्यादा चिंता  का विषय यह है कि कोई अपराधी तो किसी वारदात के बाद भाग जाता है किन्तु वहाँ पहुँची पुलिस के साथ जनता अपराधियों जैसा वर्ताव करती है उसे यह विश्वास ही नहीं होता है कि पुलिस वाले हमारी सुरक्षा के लिए आए हैं !!! 

     इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए ही मैं सरकार एवं सरकारी कर्मचारियों  के सामने एक प्रश्न छोड़ता हूँ कि जनता का विश्वास जीतने की जिम्मेदारी  आपकी आखिर  क्यों नहीं है?

     मेरा मानना है कि यदि पुलिस विभाग की तरह ही  अन्य क्षेत्रों में भी प्राइवेट का विकल्प न होता तो वहाँ भी हो रही होतीं हिंसक झड़पें!मुझे अंदेशा है कि आरक्षण लीला की राजनैतिक सच्चाई जिस दिन जनता समझेगी उस दिन सरकार एवं सरकारी कर्मचारियों  के विरुद्ध जो जनाक्रोश जनता में जागेगा वह भारतीय समृद्ध लोकतंत्र के लिए भयावह सुनामी की तरह होगा! इसलिए अभी भी समय है कि सरकार एवं सरकारी कर्मचारियों को  सारे छल कपट छोड़ कर जनता का विश्वास जीतने का प्रयास करना चाहिए !

      आज भ्रष्टाचार के आरोप हर विभाग पर लगाए जा रहे हैं इस देश की भोली भाली सीधी साधी जनता के साथ यह खुली गद्दारी है  जिसे छिपाने केलिए जनता को जाति संप्रदाय के नाम पर आरक्षण  की भीख बाँटते रहते हैं!वो भी लोगों के मस्तक पर केवल भिखारी होने का ठप्पा लगा देते हैं किसी को कुछ  देना ही होता तो आजादी के इतने दिन बीत गए लोगों की स्थिति अब तक सुधर गई होती और आरक्षण समाप्त भी हो गया होता, लोग आपस में भाईचारे से रहने भी  लगते किन्तु लाख टके का सवाल है कि फिर राजनीति कैसे होती ?अब तक आम जनता के हिस्से में केवल  आश्वासन  और उन्माद आते हैं!कि तुम्हारा शोषण किसने किया ! हिन्दू-मुश्लिमों को , आदमी-औरतों को ,  हरिजन -सवर्णों को अलग अलग ढंग से  भड़काकर  लड़ाने का काम नेताओं ने संभाल रखा है केवल भाषण अमन चैन के देते हैं इनके इरादों में ही खोट है कैसे होगी समाज में शांति?      वर्तमान समय में समाज  अपनी हर प्रकार की समस्याओं का समाधान राजनीति में ही खोजने लगा  है उसका अपना मन मरता चला जा रहा है ! यही कारण है कि राजनेताओं के मनोबल इतने अधिक बढ़ गए हैं कि  वो हमेशा कुछ कुछ देने की बातें करने लगे हैं भीख में वोट मँगाकर  जनसेवा का अधिकार पाने वाले राजनैतिक भिखारी आज जनता को भिखारी सिद्ध कर देने में लगे हैं! यह देश का दुर्भाग्य ही है!अब लोगों  स्वयं जाग  कर इन कुचालों का पर्दाफास करना होगा और जीतना होगा एक दूसरे का बहुमूल्य विश्वास यही हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोधसंस्थान  का उद्देश्य समाज को आत्म निर्भर  बनाना है, जिससे समाज अपनी हर जरूरत के लिए सरकार की कृपा पर ही आश्रित न रहे!आखिर पुराने समय में भी तो लोग आपसी भाई चारे से रह लेते थे! धन्यवाद!!!

 

 

राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान से जुड़ने के लिए मैं आप सभी का आह्वान करता हूँ आप सबके  सहयोग एवं इस संस्थान के माध्यम से मैं भी इसी दिशा में निरंतर प्रयासरत हूँ-

 आचार्य डॉ. शेष नारायण वाजपेयी    संस्थापकःराजेश्वरीप्राच्यविद्याशोधसंस्थान                


                                    तथा
दुर्गापूजाप्रचारपरिवार एवं ज्योतिष जनजागरण मंच 
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             
व्याकरणाचार्य (एम.ए.)
संपूर्णानंदसंस्कृतविश्वविद्यालय वाराणसी   ज्योतिषाचार्य(एम.ए.ज्योतिष)
 संपूर्णानंदसंस्कृतविश्वविद्यालय वाराणसी  
   एम.ए.      हिन्दी    
  कानपुर   विश्व  विद्यालय पी.जी.डिप्लोमा पत्रकारिता 
उदय प्रताप कॉलेज वाराणसी 
 पी.एच.डी. हिन्दी (ज्योतिष)   
  बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी बी. एच. यू.  वाराणसी
  विशेषयोग्यताः-वेद, पुराण, ज्योतिष, रामायणों तथा समस्त प्राचीनवाङ्मयएवं राष्ट्र भावना से जुड़े साहित्य का लेखन और स्वाध्याय 
 प्रकाशितः-पाठ्यक्रम की अत्यंत प्रचारित प्रारंभिक कक्षाओं की हिन्दी की किताबें
कारगिल विजय      (काव्य )     

श्री राम रावण संवाद  (काव्य )
श्री दुर्गा सप्तशती     (काव्य अनुवाद ) 

श्री नवदुर्गा पाठ      (काव्य)                               
श्री नव दुर्गा स्तुति (काव्य ) 

 श्री परशुराम(एक झलक)
 श्री राम एवं रामसेतु  
 (21 लाख 15 हजार 108 वर्षप्राचीन
कुछमैग्जीनोंमेंसंपादन,सहसंपादनस्तंभलेखनआदि। 
अप्रकाशितसाहित्यः-श्रीशिवसुंदरकांड,श्रीहनुमतसुंदरकांड,
संक्षिप्तनिर्णयसिंधु,   
ज्योतिषायुर्वेद,श्रीरुद्राष्टाध्यायी,

वीरांगनाद्रोपदी,दुलारीराधिका,
ऊधौगोपीसंवाद,    
श्रीमद्भगवद्गीता‘काव्यानुवाद’
रुचिकर विषयः- प्रवचन, भाषण, मंचसंचालन, काव्य लेखन, काव्य पाठ एवं शास्त्रीय विषयों पर नित्य नवीन खोजपूर्ण लेखन तथा राष्ट्रीय भावना के विभिन्न संगठनों से जुड़कर कार्य करना।
जन्मतिथिः9.10.1965                                                    
जन्म स्थानः- पैतृक गाँव-इंदलपुर, पो.संभलपुर, जि.कानपुर,उत्तरप्रदेश                                       वर्तमान पता  के -71, छाछी बिल्डिंग चौक , कृष्णानगर,दिल्ली51                                                        01122002689,01122096548,मो.09811226973,09968657732






 
                                            



                पांचजन्य में प्रकाशित अंश 


                                                                                                                                                                                                                                                                                    

Arogya Mela

Posted By:

Anon

Mon Feb 11, 2002 8:16 am  |

Friends,

Appended below is a news item on the "Arogya Mela" carried in the Hindustan

Times of 10th Feb.. The Mela is being organised by the Swadeshi Jagaran

Manch in New Delhi and is reportedly drawing huge crowds. It is reported to

have received funds drom the Ministries of Health, Chemicals and S&T! I feel

that the JSA should react to this. Please send your views.

Amit

------------------------------------

Banish the spirit, cure the ‘disease’ at Arogya mela

Sutirtho Patranobis

(New Delhi, February 9)

--------------------------------------------------------------------------------

If you have a stomach problem or a throbbing headache, look behind.

According to Dr Shesh Narayan Vajpayee, an astrologer who looks up to the

planets to treat patients, ‘spirits’ often follow people around and are

responsible for prolonged illnesses.

These ‘spirits’ are mischievous as well, Vajpayee says. “They are aware when

the person is going for a check-up. So, they disappear and the test results

come out normal. Step out of the clinic, the spirit is back,” he says,

rather seriously. The only way you can get rid of them is to perform ‘puja

and havan’ and appease the planets.

Vajpayee is busy these days at the Swadeshi Arogya Mela at the Jawaharlal

Nehru Stadium, catering to people waiting to get their hands and bodies

checked. The Mela has been organised by the Centre for Bharatiya Marketing

Development (CBMD)—a unit of Swadeshi Jagran Foundation—and National Medicos

Organisation, an NGO.

The Government, according to a CBMD official has just provided logistical

support. The official, however, declines to comment on the financial

aspects, saying the details would be available after the fair concludes on

February 12.

Besides Vajpayee, numerous doctors and medical companies, dabbling in Indian

systems of medicine, have put up stalls at the Mela, which was inaugurated

on Thursday by Union Human Resources Development Minister Dr Murli Manohar

Joshi. Some are selling ayurvedic herbs to treat baldness and some others

are selling clothes made with ‘vastra vigyan’, designed to make the buyer

feel happy about life.

The fair is an attempt to spread awareness about the Indian systems of

medicine, says Delhi's former Health Minister Dr Harsh Vardhan. “Even if

‘health for all’ has not been achieved so far, we want to show that Indian

systems of medicine have the potential to cure many diseases,” he says.

Vajpayee, meanwhile, says the premise of his treatment is that diseases are

related to planetary movement.




       
 
                                            

 



No comments:


Post a Comment





Tuesday, 4 March 2014

लेपटॉप बाँटने से नहीं हारी है सपा अपितु इस हार का मुख्य कारण है गैर जिम्मेदारी ?

     केवल सपा के नेताओं एवं उनके नाते रिश्तेदारों के काम करने के लिए ही बनी है क्या सपा सरकार ?आखिर आम जनता किससे कहे अपने काम काज कोई सुनता तो है नहीं ! 

   मुलायम सिंह जी   या  अखिलेश जी आपको आखिर क्यों नहीं पता है कि यू.पी. में क्या हो रहा है!और यदि है तो नेता जी बार बार कह तो  देते हैं किन्तु उनकी मानता कौन है मानता तो सुधार क्यों नहीं हो रहा है यदि सुधार ही हो रहा होता या उत्तर प्रदेश की सरकार लोक जीवन से जुड़े कार्य कर ही रही होती तो  लोक सभा चुनावों में क्यों होती इतनी गंभीर दुर्दशा ? इसके लिए जिम्मेदार भी तो उ.प्र. सरकार ही है!ऐसे ही क्या मुलायम सिंह जी के पी.एम. बनने से हो सकता था देशवासियों का भला ?

   यू. पी. में लोकतंत्र तो नाम भर है या यूँ कह लें कि लोकतंत्र की तो खिल्ली उड़ाई जा रही है! वहाँ केवल आप हैं आप का प्रिय परिवार है आपके पुरबासी हैं आपकी पार्टी के लोग हैं एवं आपकी जाति बिरादरी के लोग हैं और आपकी पार्टी की प्रिय भैंसें हैं इसके अलावा उत्तर प्रदेश में और है ही कौन! जिसके विषय में सोचे आपकी पार्टी और सरकार ?

    आप एवं आप के कुनबे के जैसा कोई दूसरा नेता तो हो ही कैसे सकता है! आपकी जाति  के जैसी कोई दूसरी जाति भी नहीं हो सकती है आपके जैसा कोई परिवार तो हो ही नहीं सकता है आपका गाँव गाँव है बाक़ी तो सब यों ही हैं आपके गाँव में महोत्सव हो सकता है बाक़ी और किसी की भावनाएँ ही कहाँ होती  हैं और आपकी पार्टी की जैसी दुर्लभ प्रजाति की आजमी भैंसों की खोज में सरकार एवं प्रशासन का जो समर्पण दिखा शायद किसी का बच्चा खोया होता तो नहीं होती ऐसी तत्परता !किन्तु पार्टी आपकी सरकार आपकी भैंसें भी आपकी पुलिस  प्रशासन भी आपका !मुख्य बात तो यही ध्यान देने की है कि इससे जो सन्देश समाज तक गया वो ठीक नहीं था क्योंकि इससे साफ तौर पर यही दिखाने की कोशिश की गई कि सारा विश्व देख ले कि समाजवादियों की सरकार के समय समाजवादियों का रौब किस कदर शिर चढ़कर बोलता है !सपा की भैंसें भी खो जाएँ तो बड़े बड़े दमदार अधिकारियों  की जान भी पूँछ हिलाने से ही बचती है देखते घबड़ाहट !जहाँ से पावें वहाँ से कूद जाएँ अधिकारी !

       माननीय नेता जी! मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि यह सरकार  चलाने की कोई स्वस्थ प्रक्रिया बनाइए जिससे देश वासियों को भी लगे कि आप एवं आपकी पार्टी को अपनों के अलावा उन परायों की भी चिंता है जिनसे लोक लुभावन वायदे करके आप चुनाव के समय जनता के सुषुप्त मनों में जिजीविषा पैदा किया करते  हैं। केवल कहने से बात नहीं बनेगी !

   आज आप लोगों की कार्यशैली से निस्तब्ध लोग आपस में चर्चा करने लगे हैं कि क्या मुलायम सिंह को बनना चाहिए देश का अगला प्रधानमंत्री ? जबकि वो सभी के विषय में सोचते नहीं हैं तो सारे लोग उन्हें अपना नेता कैसे मान लें !जब उन पर प्रदेश की जनता ने भरोसा किया और वे  उसके नहीं हो सके तो देश उन  पर भरोसा  कैसे करे ?  

    सरकारों में बैठे लोगों को क्या जनता के प्रति  इतना भी जवाबदेय  नहीं होना चाहिए ! आखिर क्यों उन्हें इस बात का संकोच नहीं  होना चाहिए कि वो  जो कर रहे हैं उसका असर उस जनता पर क्या पड़ेगा जिसने उन्हें सत्ता सौंपी है !केवल सैफई वालों के वोट से तो वे मुख्यमंत्री बन नहीं गए! ऐसा भी नहीं है कि केवल आजम खान को खुश करना ही सरकार का केवल लक्ष्य हो !

    मुलायम सिंह जी को समझना चाहिए कि अगर आप वास्तव में समाजवादी हैं तो आपका समाजवाद इतना संकीर्ण क्यों है जो आपको परिवारवादी ,जातिवादी ,सैफईवादी बना देता है और कभी कदाचित मुश्किल से आप यदि इन दीवारों से बाहर  निकले भी तो आपको पार्टीवादी बना देता है।आखिर क्या कारण है कि आप प्रदेश और देशवादी नहीं बन पाए !मान्यवर !क्या यही आपका समाजवाद है क्या मुख्यमंत्री बनने की आपकी यही योग्यता है इसी के बल पर बनना चाहते हैं प्रधानमंत्री !

       काँग्रेस की कमजोरी ,भाजपा की कलह,बसपा की संकीर्णता से ऊभ चुकी प्रदेश की जनता ने अपना समझ कर आपको सत्ता सौंपी थी किन्तु आप उस जनता के अपने नहीं हो सके मात्र कुछ लोगों के होकर रह गए !कितना बुरा तब लगता है जब उत्तर प्रदेश की सरकारी मशीनरी कोई काम न करके अपितु किसी परेशान व्यक्ति की मदद नहीं कर रही होती है और वह निराश हताश आदमी उस जिले के डी.एम.को लिखित अप्लिकेशन देता है महीनों बीत जाने पर भी जब कोई सुनवाई नहीं होती है तो दुबारा वो जब डी.एम. के यहाँ जाता है तो उनका पी.ए. उस प्रार्थी के कान में कहता है कि इस समय साहब किसी और का कोई काम नहीं सुन रहे हैं केवल मुलायम सिंह जी के घर और पार्टी वालों की ही बात सुनते हैं और उन्हीं का काम करते हैं बाक़ी किसी का नहीं! वो कहते हैं कि जब चलनी ही सपा की और उनके लोगों की है तो पंगा लेकर अपनी बेइज्जती क्यों करवाना !यह सुनकर निराश हताश प्रार्थी वहाँ से वापस लौट आता है। ये कोई  कल्पना नहीं अपितु वास्तविक घटना है। 

      ऐसे ही अन्य प्रश्न भी हैं धन तो पूरे प्रदेश की जनता का खर्च हो किन्तु महोत्सव सैफई में हो आखिर क्यों ?क्योंकि सैफई नेता जी की है तो बाकी प्रदेश किसका है और वहाँ का मुख्यमंत्री क्या कोई दूसरा है ?

    इसीप्रकार से किसी का बेटा बेटी अपहृत हो जाता या और कोई नुक्सान हो जाता तो भी प्रशासन इतना ही मुस्तैद होता क्या?जितना भैंसें खोजने में था उन भैंसों को खोजने के लिए क्या कुछ नहीं किया गया फिर भी बेचारे पुलिस वाले …!

      आजम की  भैंसों की तलाश के लिए पुलिस की चार टीमों का गठन किया गया.खोजी कुत्ते, क्राइम ब्रांच और पुलिसकर्मियों ने कई बूचड़खानों और मांस की दुकानों पर छापेमारी की.  पड़ोस के कई जिलों में सर्च ऑपरेशन चलाया गया.और भैंसें मिल गईं । 

       इससे सिद्ध भी यही होता है कि ये सरकार सपा और केवल सपा के लोगों के लिए ही है उसके अलावा सारा प्रदेश जाए जहन्नुम में !इससे एक बात और सिद्ध होती है कि यदि प्रयास पूर्वक भैंसे खोजी जा सकती हैं तो और अपराधी क्यों नहीं !इसका सीधा सा अर्थ है कि जो अपराध सपा के छोटे बड़े सभी कार्यकर्ताओं के विरुद्ध होगा वो तो अपराध माना जाएगा और उसी को रोकने का भी प्रयास होगा बाकी लोग परेशान रहें तो रहें ये सरकार तो सपाइयों की है सपाइयों की ही रहेगी, प्रदेश वा देश की जनता का इससे क्या लेना देना !

 

 

      लालू जी ! घबड़ाकर फैसले मत लीजिए आप !अपने धुर विरोधी नितिशवा की पार्टी को घबड़ाहट में आखिर क्यों दे रहे हैं समर्थनवाँ ? लालू जी! आप घबड़ाते काहें  हैं जब आपको किसी के पीछे पीछे दुम ही हिलानी है तो सोनियाँ   न  सही मोदी जी सही ! अन्यथा आप जानते ही हैं ...........!  

     लालू जी सावधान ! आ गया अब आडवाणी जी का चेला ! अब घबड़ा क्यों रहे हो लालू जी ! सोनियां जी कोई मदद नहीं कर पाएंगी !
    लालू जी -बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाए ?
     काँग्रेस को खुश करने के लिए लालू जी ! बहुत दिन तुमने भाजपा के शीर्ष नेताओं का उपहास उड़ाया है अब क्यों घबड़ा रहे हो ? आपका अडवाणी जी को कैद करने का बदला  भी तो अब चुकाना है ,क्योंकि जबतक वो उधार रहेगा तब तक see more...http://bharatjagrana.blogspot.in/2014/05/blog-post_15.html

Tuesday, 25 February 2014

भाजपा को आत्म मंथन करना चाहिए कि कि जीत के जोश में कहीं कुछ भूल तो नहीं हो रही है !

    क्या भाजपा का लक्ष्य भी केवल चुनाव जीतना ही तो नहीं है क्योंकि जनता तो भाजपा के दृढ़ सिद्धांतों की समर्थक है !

     भाजपा में इस समय अति उत्साह का वातावरण है और होना भी चाहिए क्योंकि काफी दिनों बाद राष्ट्रीय चुनावी चर्चा के केंद्र में भाजपा पहुँच पाई है ये हम सब लोगों के लिए अत्यंत उत्साही अवसर है इसमें कोई संदेह की बात भी नहीं है,किन्तु मुझे आशंका है कि भाजपा हमेंशा से चुनावी उत्सवों (रैलियों)में भरोसा करती रही है उसका कारण है इतने अच्छे उत्सव किसी और पार्टी में होते भी नहीं हैं और इतिहास भूगोल से सम्मिश्रित इतने हृदयाकर्षक वीर रस से ओतप्रोत भाषण भी कहीं और नहीं होते हैं, हों भी कैसे ! भाषणों के नाम पर कुछ लोग गाली गलौच करते हैं और कुछ  नकलची लोग अपना भाषण लिखाकर ले जाते हैं और पढ़कर चले आते हैं किन्तु ऐसे लोग भी बिना कुछ किए धरे भी पिछले दस वर्षों से देश में शासन कर रहे हैं!केवल इतना ही नहीं देश में सबसे अधिक वर्षों तक शासन करने का गौरव भी उन्हें ही प्राप्त है आखिर ऐसा कौन सा गुण है उनमें जो भाजपा के पास नहीं है मंथन इस पर हो तो अच्छा है देखना यह है कि अपने सिद्धांतों की रक्षा करते हुए ऐसा क्या कुछ सुधार किया जा सकता है जिससे कि लोक सभा के चुनावों का परिणाम अपने पक्ष में किया जा सके । यद्यपि इस विषय में भाजपा की शालीनता सराहनीय है!

      अभी तक यह देखा जाता रहा है कि जिन उत्सवों में जितनी अधिक संख्या में लोग बड़े धूम धाम से भाजपा के साथ  सम्मिलित होते रहे हैं उतने वोट नहीं मिलते रहे हैं यही कारण है कि चुनावों से पूर्व की भाजपा की रैलियों में उमड़ती भीड़ हमेंशा से भाजपा को भ्रमित करती रही है  आखिर क्या हस्र हुआ था सन 2004 के फीलगुड का ! 

     कुछ सिद्धांत हीन लोगों के साथ सैद्धांतिक जीवन जीने वाली भाजपा ने चुनावी गठबंधन किए हैं उन पार्टियों के मुखिया वो लोग हैं जो भाजपा के सैद्धांतिक समर्थकों की निंदा आलोचना किया करते हैं या उनसे जातिगत द्वेष रखते हैं उन्हें भाजपा की गोद में बैठा देखकर कैसे पचा पाएगा उसका सैद्धांतिक वोटर !इसलिए उसकी भावनाओं का ध्यान रखकर ही कोई समझौता करना ठीक रहेगा अन्यथा वो वोटर भी स्वतन्त्र है !वैसे भी ऐसे लोग कब दगा दे जाएँ  कैसे विश्वास किया जा सकता है ?मेरी चिंता बस यही है कि मुश्किल से मिला यह मौका कहीं भाजपा के हाथ से निकल न जाए !

    एक और बात है कि मोदी जी के व्यवहार में  गुजरात वाद का जिक्र सबसे अधिक होता है ऐसा क्यों ?जब बात प्रदेशों की करनी हो तब गुजरात की चर्चा में क्या बुराई है किन्तु समता बनाए रखने के लिए गुजरात के साथ साथ उन प्रदेशों की भी चर्चा वैसे ही खुले मन से की जानी चाहिए जैसे गुजरात  की चर्चा  की जाती  है !

      दूसरी बात मोदी जी जब प्रधान मंत्री हैं  तो अपने पूर्व पुरुष श्री अटल जी की सरकार की खूबियाँ भी गिनावें ! 

   वैसे भी अपनी बारी की प्रतीक्षा करते करते पिछले कई चुनावों से जनता की अदालत में अनुपस्थित सी होती रही दिल्ली  भाजपा चुनाव लड़ने की केवल खाना पूर्ति मात्र करती रही है,इसीलिए पार्टी की छवि दिनोंदिन धूमिल होती चली गई किन्तु  अब जनता की अदालत में सेवा भावना से भाजपा को भी  अपनी  हाजिरी लगानी ही होगी!अब भाजपा को किसी की शर्त के सामने घुटने नहीं टेकने चाहिए!केवलअपने कार्यकर्ताओं के समर्पण बल पर चुनाव लड़ना चाहिए।बाबा बैरागी या फिल्मी अभिनेताओं की गुड़बिल के पीछे खड़े होकर  चुनावों में जीत जाने पर भी पार्टी के स्वाभिमान या आत्म सम्मान के तौर पर न जाने क्यों भाजपा हार ही जाती है इसीलिए उसकी अपनी छवि में निखार नहीं आ पाता है। इससे पार्टी पर वो लोग हमेंशा अपनी धौंस चलाना चाहते हैं जिन्होंने भाजपा को जिताने का मिथ्या बहम पाल रखा होता है।वैसे भी पार्टी अपने कार्यकर्ताओं के कठोर परिश्रम से ही जीतती है किन्तु जब पार्टी से असम्बद्ध लोग भाजपा की नीतियों को  हाइजेक करके भाजपा के ही माथे पर उसी की नीतियाँ अपने नाम से मढ़ने लगते हैं जिसे  सुन कर भी मौन रह जाता है पार्टी का शीर्ष नेतृत्व !

    ऐसी गतिविधियों से पार्टी के प्रति दशकों से समर्पित कार्यकर्ता अपने को अपमानित महसूस करने लगते हैं इसलिए किसी आगन्तुक सैलिब्रेटी का सहयोग लेने में कोई बुराई नहीं है किन्तु उसके समर्थक थोड़े से वोटों के लालच में उसी के हवाले पार्टी करने की अपेक्षा उचित होगा कि बड़े मुद्दों पर भाजपा के अपने कार्यकर्ताओं की भी रायसुमारी हो !इस प्रकार की विनम्र भाजपा यदि समाज में जाएगी तो आम आदमी पार्टी का औचित्य ही क्या रह जाएगा !

      कुछ हो न हो किन्तु भाजपा को एक बात तो समाज के सामने स्पष्ट कर ही देनी  चाहिए कि उसे आम समाज के सहारे चलना है या साधू या सैलिब्रेटी समाज के ? जो चरित्रवान विरक्त तपस्वी एवं शास्त्रीय स्वाध्यायी संत हैं उनके धर्म एवं वैदुष्य में सेवा भावना से सहायक होकर विनम्रता से साधुओं का आशीर्वाद लेना एवं उनकी समाज सुधार की शास्त्रीय बातों विचारों के समर्थन में सहयोग देना ये और बात है! सच्चे साधू संत भी अपने धर्म कर्म में सहयोगी दलों नेताओं व्यक्तियों कार्यक्रमों में साथ देते ही  हैं किन्तु उसके लिए कोई शर्त रखे और वो मानी जाए ये परंपरा किसी भी राजनैतिक दल के लिए  ठीक नहीं है ! 

        विदेश से कालाधन लाने जैसी भ्रष्टाचार निरोधक लोकप्रिय योजनाओं के लिए भाजपा को स्वयं अपने कार्यक्रम न केवल बनाने अपितु घोषित भी करने चाहिए ताकि ऐसी योजनाओं का श्रेय केवल भाजपा और उसके लिए दिन रात कार्य करने वाले उसके परिश्रमी कार्यकर्ताओं को मिले।वो भाजपा की पहचान में सम्मिलित हो जिन्हें लेकर दुबारा समाज में जाने लायक  कार्यकर्ता बनें उनका मनोबल बढ़े !अन्यथा कुछ योजनाओं का श्रेय नाम देव ले जाएँगे कुछ का कामदेव और कुछ का वामदेव! भाजपा के पास अपने लिए एवं अपने कार्यकर्ताओं के लिए बचेगा क्या ? ऐसे तो दस लोग और मिल जाएँगे वो भी अपने अपने दो दो मुद्दे भाजपा को पकड़ा कर चले जाएँगे भाजपा उन्हें ढोती फिरे श्रेय वो लोग लेते रहें ।

      इसलिए भाजपा को मुद्दे अपने बनाने चाहिए उनके आधार पर समर्थन माँगना चाहिए । अब यह समाज ढुलममुल भाजपा का साथ छोड़कर अपितु सशक्त भाजपा का  ही साथ देना चाहता है। 

        इसके अलावा जो ऐसी शर्तें रखते हैं ऐसे लोगों के अपने समर्थक कितने हैं और वो उनका कितना साथ देते हैं यह उनके आन्दोलनों  में देखा जा चुका है किसी ने पुलिस के विरोध में एक दिन धरना प्रदर्शन भी नहीं किया था सब भाग गए थे । 

        दूसरी बात संदिग्ध साधुओं की विरक्तता पर अब सवाल उठने लगे हैं अब  लोग किसी बाबा की अविरक्तता  सहने को तैयार नहीं हैं किसी भी व्यापारी या ब्याभिचारी बाबा से अधिक संपर्क इस समय लोग नहीं बना  रहे  हैं सम्भवतः इसीलिए कथा कीर्तन भी दिनोदिन घटते जा रहे हैं ।

       इसलिए भाजपा समर्थकों का भाजपा से निवेदन है कि वो अपने मुद्दों पर ही समाज से समर्थन माँगे तो बेहतर होगा !

      



Friday, 21 February 2014

आखिर नेताओं के पैर क्यों  छूते  हैं अफसर ?see  more....http://snvajpayee.blogspot.in/2014/02/blog-post_19.html

संसद और विधान सभाओं में क्यों बढ़ने लगीं हैं अमर्यादित घटनाएँ ?see  more....http://snvajpayee.blogspot.in/2014/02/blog-post_19.html

पढ़े लिखे अफसरों की राय कुछ  अशिक्षित नेताओं से कैसे मेल खा सकती है ?see  more....http://snvajpayee.blogspot.in/2014/02/blog-post_19.html

 राजनीति में कोई पद पाने के लिए शिक्षा अनिवार्य क्यों नहीं होनी चाहिए ?see  more....http://snvajpayee.blogspot.in/2014/02/blog-post_19.html

सुशिक्षित अफसरों की आत्मा अशिक्षित नेताओं के अनुशासन को सह नहीं पा रही है इसीलिए सारे काम ठप्प पड़ते जा रहे हैं आखिर राजनीति के लिए शिक्षा आवश्यक क्यों नहीं होनी चाहिए ?see  more....http://snvajpayee.blogspot.in/2014/02/blog-post_19.html

क्या अपनी बेइज्जती से बचने के लिए नेताओं के पैर छूते  हैं अफसर !see  more....http://snvajpayee.blogspot.in/2014/02/blog-post_19.html

अधिकाँश शिक्षित लोग राजनीति में फिट क्यों नहीं बैठते हैं see  more....http://snvajpayee.blogspot.in/2014/02/blog-post_19.html

Monday, 17 February 2014

बेलेन्टाइन डे !आधुनिकता के नाम पर इतना गिर गए हैं हम !क्या प्रेम की परंपरा हमारे यहाँ पहले नहीं थी !

     बेलेन्टाइन लाइफ मनाने वाले बलात्कारी क्यों ?

    बेलेन्टाइन के नाम पर सार्वजनिक जगहों पर चूमना चाटना कुत्ते बिल्लियों की तरह नंगपन और बेशर्मी ओढ़ लेना कहाँ तक ठीक !ऐसे संबंधों में सम्मिलित जोड़ों की सुरक्षा कैसे करे पुलिस जो सम्बन्ध ही धोखाधड़ी पर आधारित होते हैं उन्हें कैसे और कब तक रखावे पुलिस !

    समाज  बेलेन्टाइन डे मनावे और पुलिस लट्ठ लिए इन्हें रखाते घूमे ! अब  देश में पुलिस के लिए बस इतना  ही काम   रह गया है क्या ? ये लैला मजनूँ ऐय्याशी करते घूमें पुलिस इनके पीछे पीछे फिरै !आतंकी उपद्रव करें तो करते रहें !

    जिस देश में कन्याओं का पूजन बड़ी श्रद्धा पूर्वक किया जाता रहा हो एवं जिसकी  परंपरा में महिलाओं के सम्मान प्रतिष्ठा मान मर्यादा की रक्षा के लिए  कई बड़े बड़े युद्ध लड़े गए हैं  वही देश कन्याओं एवं महिलाओं की सुरक्षा पुलिस के सहारे छोड़कर खुद बेलेंटाइन डे मनावे और पुलिस से कहे हमें रखाइए और हमसे  बचा लीजिए देश की बहू बेटियाँ बच्चियाँ एवं महिलाएँ !कितना आश्चर्य है !!! उनसे कौन पूछे कि आखिर पुलिस ही क्यों बचा ले ?क्या आपका इन बहू बेटियों  बच्चियों एवं महिलाओं से  अपना कोई सम्बन्ध नहीं है आखिर आप क्यों मौन हैं आपकी इस कायरता का राज क्या है ?

     क्या आपने पहले भी कभी सुना था कि श्रद्धा पूर्वक कन्याओं का पूजन करने वाला अपना सैद्धांतिक समाज अपनी ही बच्चियों को कालगर्ल कहे और वो सुनें सहें कुछ न कहें! समाज का बलात्कारी वर्ग  जैसी वेष भूषा में उन्हें रखना चाहता  हो वैसे ही रहें ! इतना ही नहीं उन्हीं कन्याओं को और  भी ऐसे ही नामों से पुकारा जाए  जैसे कालगर्ल, अकालगर्ल, मेट्रोगर्ल, पार्कगर्ल, पार्किंगगर्ल, झाड़ीगर्ल, जंगलगर्ल आदि और भी जो गर्ल हो सकती हैं वे सब !ये सब वही कन्याएँ हैं क्या जिन्हें भारत कभी पूजा करता था इन्हीं के पीछे क्या ऐसे ही नामों वाले ब्वायज पड़े हुए हैं क्या ?उन्हें रोकने का हमारे पास कोई उपाय नहीं है क्या ?

     इस कन्या पूजन वाले देश में यह क्या हो रहा है?कईबार डांस बार,या और तरीके की जगहों पर छापा पड़ते टी.वी.चैनलों पर देखा जाता है।जब इतनी छोटी छोटी सँकरी,अँधेरी, गंदी जगहों से लड़कियाँ  निकाली जाती हैं जहाँ कुत्ते बिल्ली भी नहीं रह सकते।यह माना जा सकता है कि कुछ जगहों पर वो बलपूर्वक ले जाई गई हों जहाँ उनका दोष न होता हो किन्तु उन जगहों की भी कमी नहीं है जहाँ इसे धंधा मानकर  व्यापारिक दृष्टि से आपसी सहमति पूर्वक चलाया जा रहा होता है।उसमें सम्मिलित सभी को सैलरी मिलती है।ऐसे ब्यभिचारिक अड्डों को भी फैक्ट्री और ऑफिस जैसे नामों से संबोधित किया जाता है।ऐसे अड्डों से या इसी प्रकार के और भी घिनौने कार्यों से किसी भी रूप में किसी भी उम्र में सम्मिलित रह चुके लोग हर उम्र में ऐसे ब्यभिचारों का समर्थन करते दिखते हैं एवं इसमें सम्मिलित लोगों की बातों ब्यवहारों का समर्थन करते करते उसी में सम्मिलित हो लेते हैं। बहुत ऐसे सफेदपोश लोग ऐसे ही कुकृत्यों से पोल खुलने पर पूरे पूरे  मटुक नाथ बनकर निकलते हैं।

     ऐसे भटके हुए मटुक  नाथ लोग बार बार विदेशों के उदाहरण देते हैं आखिर क्यों?विदेश तो विदेश है और स्वदेश स्वदेश! वहाँ उनको वैसा अच्छा लगता है वो उनकी संस्कृति है यहाँ वैसा नहीं अच्छा लगता है ये अपनी संस्कृति है।यहाँ के सारे लोगों को विदेशों में घुमाया नहीं जा सकता है वहाँ के सारे लोगों को यहाँ लाया नहीं जा सकता है।अगर वहाँ घूमकर आए लोग यहाँ वालों पर अपना अनुभव ऐसे ही थोपेंगे तो ये सब्जी या नमक में चीनी मिलाना भारत के आम आदमियों के साथ कहाँ का न्याय है?

       कुछ लोगों को छोड़कर यहाँ का  गरीब या रईस आम आदमी किसी भी जाति,समुदाय, संप्रदाय से जुड़ा हो वह अपने प्राचीन संस्कारों पर आज भी गर्व करता है।उन्हें ही उसने देखा है और उसी में वह जिया भी है। बात अलग है कि कुछ लोग जैसे विदेशों की दुर्गन्ध स्वदेश में फैला रहे हैं उसी प्रकार से कुछ शहरों में घूम चुके लोग अपनी दुर्गन्ध वहाँ गाँवों में भी  फैला रहे हैं।गाँवों में भी शहरों के ही कुछ लोगों की तरह ही ऐसे बिना पेंदी के लोटे तैयार होने लगे हैं किन्तु गाँवों में लोगों के पास समय है वो आपसी बात ब्यवहार से ऐसे बदबूदार लोगों का बहिष्कार कर लेते हैं और खुश हो जाते हैं।वहाँ लोग बेशर्मी करके नहीं जी सकते क्योंकि  उनके घर और खेत आदि इतनी आसानी से बदले नहीं जा सकते।उन्हें कई कई पीढ़ियाँ एक एक जगह ही बितानी पड़ती हैं जिसकी बेटी-बहन ने प्रेम या प्रेम विवाह कर लिया होता है उसके दूसरे बेटा बेटियों के विवाह आदि काम काज होने मुश्किल हो जाते हैं।समाज के कितने ताने सुनने  सहने होते हैं उन्हें? कितनी सभा सोसायटियों से किया जा चुका होता है उनका बहिष्कार ?उनकी पीड़ा वही जानते हैं और जितना वो जानते हैं उसी में वो जी भी लेते हैं।

      जिसकी बेटी-बहन ने प्रेम या प्रेम विवाह कर लिया होता है उनका गाँवों में रह पाना बहुत कठिन हो जाता है वो मजबूरी में शहरों की ओर भाग खड़े होते हैं शहर वाले बढ़ती जनसंख्या के लिए उन्हें दोषी ठहरावें तो ठहरावें।आखिर कहाँ जाएँ वे?जिनके युवा होते  बच्चों ने  गाँवों में आधे अधूरे कपड़े पहन कर लड़कियों या महिलाओं  को रहते नहीं देखा है वो शहरों में ऐसा सब कुछ देख कर पागल हो उठते हैं फिर वो डायरेक्ट बेलेंटाइन डे मनाने लगते हैं।बड़ी बड़ी बसों ट्रेनों कारों में घुस घुस कर  जबर्दश्ती  बड़ी बुरी तरह से मनाते हैं बेलेंटाइन डे।चोट जिसके लगे घावों का एहसास उसे हो उनकी गंभीरता उसे पता  हो जिसे इलाज करना हो।उनकी पीड़ा का अनुभव वह करेगा जिसके  हृदय हो किन्तु जो गया ही बेलेंटाइन डे मनाने हो उसे क्या लेना देना इन दकियानूसी बातों से? कोई मरे तो मरे उसको तो अपने बेलेंटाइन डे से मतलब!क्या कहा जाए किसी को? सबको अपनी अपनी पड़ी है।

      जिनका विदेशों में जाना आना है वो वहाँ जो देखकर  आते हैं उसे बताने की उन्हें भी ऐसी खुजली उठती है कि वो यहाँ बताए या जताए बिना रहते नहीं आखिर विदेश घूम कर जो आए हैं। केवल बेलेंटाइन डे मना लेने से यह देश अमेरिका की तरह समृद्ध हो जाएगा क्या ?या आधे चौथाई कपड़े पहनकर क्या सम्पन्नता लौट आएगी और लोग शिक्षित और आधुनिक समझे जाएँगे?क्या इससे महिला पुरुषों के अधिकारों की रक्षा हो जाएगी? और यदि यही है तो सभी लोग पहले बिना कपड़े पहने रहें फिर पुलिस उन्हें रखाती घूमे इतने पर भी पुलिस को दोषी ठहराया जाए।ऐसे तो पुलिस बस यही कर पाएगी बाकी सारे अपराधियों से कौन निपटेगा ?हाँ,बेलेंटाइन डे जरूर ऐसा हो जाएगा कि लोग देखते रह जाएँगे।

  यदि विदेश घुमक्कणों  को  इतनी ही शौक थी कि हमारे देश में भी बेलेंटाइन डे धूम धाम से मनाया जाए तो वहाँ से कोई ऐसा रास्ता खोज कर लाते ताकि भारत के आम आदमी की आर्थिक स्थिति भी सुधरती उससे गरीबों के बच्चों का बौद्धिक, शैक्षणिक,सामाजिक आदि स्तर भी सुधरता सोच उन्नत होती,महँगे कपड़ों में क्रीम पाउडर आदि लगाकर ये भी महँगी कारों में दन दनाते घूमते तो बसों ट्रेनों पर क्यों झपटते? इन्हें देखकर   भी  आधुनिक लड़के लड़कियाँ  लव लवाते इनके साथ भी   बेलेंटाइन डे मनाते।ऐसा तो किया नहीं विदेश घुमक्कणों ने जो धन कमाकर लाए वो तो अपने और अपने बच्चों के लिए और जो वहाँ के कुसंस्कारों की सड़ांध लाए वो सारे देश में फैला दी।बिना शिर पैर की

फोकट की बकवास तो कोई भी कर सकता है बिना पैसों के  उसे हकीकत में  बदल पाना  कितना कठिन होता है ये उन्हें ही पता होता है जिन पर बीतती है।जिन्हें दो टाइम का भोजन मुश्किल हो वो कैसे कहाँ और किससे  मनाएँ  बेलेंटाइन डे? ऐसे जिन गरीबों  को  बेलेंटाइन डे की बहुत जल्दी है वो कहीं किसी पर भी झपट रहे हैं और डायरेक्ट मना रहे हैं बेलेंटाइन डे।जिनको थोड़ी समाई है वो चोरी,चकारी, चैनचोरी, अपहरण फिरौती आदि से धन इकट्ठा करके नियमानुशार  मनाते हैं बेलेंटाइन डे।आखिर गरीब आदमी मेहनत से तो दाल रोटी ही कमा ले वही बहुत बड़ी बात है।बाकी  बेलेंटाइन डे के लिए तो ऊपरी पैसा  तो चाहिए ही ।

     जहाँ तक प्रेम या प्रेम विवाहों की बात है शहरों की तरह उनके पास पैसे नहीं होते कि वो किसी भी प्रकार की बदनामी होने पर अपना मकान दुकान बेंचकर किसी नई या अपरिचित जगह चले जाएँ और  हाथ में रिमोट लेकर टी.वी.चैनल बदल बदल कर अंधे बहरों की तरह जीना शुरू कर दें सुबह शाम कथा कीर्तन में सहभागी बनकर धार्मिकता का लबादा ओढ़े रहें।तथाकथित सत्संगों में बढ़ रही भीड़ इसी भावना से इकट्ठी हो रही है अन्यथा यदि इतने लोग धार्मिक होते तो देश और समाज की दशा ही कुछ और होती!जो माता पिता संघर्ष पूर्वक, समर्पण पूर्वक, स्नेह पूर्वक पाल पोष  कर  अपने बच्चों को बड़ा करते हैं उनके हर उत्सव,उन्नति,सुख, दुःख आदि में अपने को सीमित कर लेते हैं विवाह आदि के लिए के लिए भी तमाम  तरह के सपने सजाए होते हैं।ऐसे नित्य नमन करने योग्य उन समर्पित माता पिता को अपने माता पिता पद से सस्पेंड करके जो नवजवान अपनी सेक्सी समझदारी के भरोसे अपने को संतान पद से पदच्युत करके पुरुष या पति -पत्नी ,प्रेमी-प्रेमिका आदि पद पर प्रतिष्ठित  करते हैं।काश,उन्हें भी माता पिता की पीड़ा का हो पाता अहसास !जिसकी घुटन में उन्हें बितानी होती है सारी जिंदगी।    

  अगर किसी कूड़े दान के पास लड़के बुलाते हैं तो लड़कियाँ पहुँचती भी हैं वहाँ आखिर क्यों? झाड़ी, जंगल, पार्क ,पार्किंग आदि किसी भी स्थल पर लड़के बुला लेते हैं लड़कियाँ आसानी से चली जाती हैं।वो लिपटा रहे होते हैं वो लिपट रही होती हैं।जिन लड़कों की ईच्छा का वे इतना सम्मान करती हैं यदि उन लड़कों की शादी हो जाती है या उन दोनों में किसी एक को  कोई और उससे अच्छा मिल जाता है तो वो उसके हो जाते हैं किन्तु इनमें जिसके साथ छल हुआ होता है उसे कितनी तकलीफ होती है ये उसी की आत्मा जानती है ।ऐसे लड़के लड़कियों को न जाने क्या क्या सुनना सहना पड़ता है कितना अपमानित होना पड़ता है अपने आप से घृणा होने लगती है।

       प्रेम कभी भी इतना दुःखदाई  नहीं हो सकता है यह तो बासना है जो हमेशा ही दुःख देती है।विदेश का एक समाचार नेट पर पढ़ रहा था कि किसी ऐसे ही तथाकथित प्रेमी ने अपनी प्रेमिका को बुलाया था किन्तु किसी कारण से वह नहीं आ सकी तो उसने घोड़ी के साथ सेक्स किया। 

जब गर्लफ्रेंड नहीं आई तो घोड़ी को बनाया हवस का शिकार  

इस हेडिंग को अभी भी नेट पर देखा जा सकता है।

यह लिखने का हमारा उद्देश्य मात्र इतना है कि प्रेमिका न आने का कोई अफसोस नहीं हुआ उसका काम घोड़ी से चल गया।यह कैसा प्रेम ?प्रेम तो वह होता है कि उसकी प्रेमिका से कितनी भी अधिक सुंदरी स्त्री  के समर्पण को भी वो स्वीकार न करता तो कुछ प्रेम कहा जा सकता था । आप स्वयं सोचिए कि किसी का अपना लड़का कम सुन्दर भी तो वह प्रेम उसी से करता है किसी और के लड़के से नहीं ।

      जिस प्रेमी के मन में  प्रेमिका और घोड़ी की आवश्यकता लगभग एक समान हो धिक्कार है ऐसे प्रेमी प्रेमिकाओं को जो केवल सेक्स के लिए जुड़ते हैं और उसे प्रेम या प्यार कहते हैं।

    लड़कियों के समर्पण का यह कितना बड़ा अपमान है फिर  भी बेलेंटाइन डे !यह घोर आश्चर्य का विषय है।यह तो विशुद्ध रूप से बासना अर्थात सेक्स ही है उसे अपने संतोष के लिए कह कुछ भी लिया जाए!

     शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि एक कुत्ते के शिर में चोट लगने से घाव हो गया है जिसमें कीड़े पड़ने से खुजली होती थी जिसे एक छोटे घड़े में शिर रगड़ कर खुजलाते  समय अचानक उसका शिर उस छोटे घड़े में जाकर फँस जाता है जो निकलता नहीं है इतनी पीड़ा सहकर भी वह कुत्ता इस गलत फहमी में  कुतिया का पीछा करना नहीं छोड़ता है कि वह अपनी प्रेमिका के  प्रेम  में समर्पित है।जबकि सच यही है कि वह प्रेम नहीं अपितु सेक्स की भूख मिटाने के लिए पागल है । घोड़ी और प्रेमिका की समानता भी इस युग का उसी तरह का उदहारण है।  

   जो पटने पटाने में सफल हो गए उनका तो  बेलेंटाइन  डे, जो नहीं सफल हुए उनका  बैलेंटाइन डे वही घोड़ी वाली परंपरा अर्थात बैलों की तरह जोड़े की तलाश में जोर जबर्जस्ती करते घूमना फिर चाहे वह बस का कुकृत्य ही क्यों न हो ? आखिर कहाँ है पवित्र प्रेम ! 

  जब से इस तथाकथित बेलेंटाइन  डे प्रेम या प्रेम विवाह का प्रचलन बढ़ा तब से महिलाओं का सम्मान भाषणों चर्चाओं में बढ़ रहा है किन्तु वास्तविकता में घटता जा रहा है उन्हें पटने पटाने का प्रचार चल रहा है।भारतवर्ष में हमेंशा से सम्मानित रही नारी का वजूद अब इतना रह गया है मात्र ?क्या उनका अपना कोई सम्मान जनक स्थान नहीं होना चाहिए? उनकी सुरक्षा की तैयारियाँ चल रही हैं।आखिर क्या दिक्कत है उन्हें?जब देश में सुरक्षा का वातावरण बनेगा तो महिलाएँ भी सुरक्षित हो जाएँगी आखिर उन्हें समाज से अलग क्यों समझा जा रहा है?  आज प्रेम और प्रेम विवाहों के नाम पर  सारी वर्जनाएँ टूटती जा रही हैं।अब किसी भी रिश्ते की लड़की को पटाने के प्रयास होने लगते हैं जब मटुक नाथ ने अपनी शिष्या को पटा लिया तब किस पर भरोसा किया जाए?कोई किसी को पटा ले!एक विवाहिता स्त्री किसी के प्रेम जाल में फँसकर अपने पति एवं बच्चों को छोड़ देती है।इसीप्रकार कोई विवाहित व्यक्ति किसी अन्य लड़की के चक्कर में पड़कर अपनी शादी शुदा जिंदगी को तवाह कर लेता है बच्चे भटकते फिरने लगते हैं ।इसीप्रकार रास्तों में  पार्कों, होटलों, आफिसों,स्कूलों आदि  में प्यार का खेल केवल इसी बल पर चल रहा होता है कि यदि बात आगे बढ़ जाएगी तो कोर्ट में विवाह कर लेगें। बेशक वे लोग एक दूसरे को लव मैरिज के नाम पर धोखा ही दे रहे हों किन्तु उस समय उन युवक युवतियों को एक दूसरे पर विश्वास करने के अलावा कोई चारा नहीं होता है।लव और लव मैरिजों के नाम पर सबसे अपमान उन दोनों के माता पिता का होता है जिन्होंने संस्कार सुधारने के नाम पर कि कहीं बच्चे भटक न जाएँ इस लिए उन्हें प्यार व्यार के चक्कर में न पड़ने की सलाह दी थी, जब वही लड़की  बहू और दामाद बनकर उसी माता पिता के अपने ही घर में खातिरदारी करा रहे होते हैं,और उन बूढ़ों का अपमान कर रहे होते हैं तो क्या बीतती है उन पर ?

     उस समय यदि युवकों को रोका न गया होता तो बस के बलात्कार कांड जैसे किसी अपराध में फँसते तो वही सामाजिक खुले पन का समर्थक समाज उनके लिए फाँसी की सजा माँगता! ऐसे युवकों के माता पिता आखिर क्या करें, उनका दोष आखिर क्या है?जिन्हें आधुनिकता के नाम पर ये जलालत झेलने पर मजबूर होना पड़ता  है ? 

      कई बार ऐसा भी देखा गया है कि किसी एक व्यक्ति के प्रेम जाल में फँसे  किसी युवती या युवक का सम्बन्ध किसी अन्य युवक या युवती  से होने पर सम्बंधित सभी युवक युवतियों  का जीवन धार पर लगा होता है। अर्थात इसमें कौन किसकी कब हत्या कर दे या किस पर तेजाब फेंक दे कहना बड़ा कठिन होता है। कई बार ऐसे युवक युवतियों के परिवारजन  भी ऐसे संबंधों के पक्ष या विरोध में हिंसक रूप से उतर जाते हैं जिसमें वो संबधित लड़के के साथ साथ अपनी लड़की के भी जीवन से खेल जाते हैं अर्थात उसे भी मार देते हैं।

     महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर अब  बड़ी बड़ी बातें की जाने लगी हैं किन्तु सुरक्षा किससे करनी है?जब इस बात पर विचार करना होता है तो सोचना पड़ता है कि जो नपुंसक नहीं है ऐसे किसी भी व्यक्ति के हृदय समुद्र में कब किस लड़की या स्त्री को देख कर तरंगे उठने लगें कब किस सुंदरी को देखकर संयम के तट बंध टूट जाएँ और तरंगें ज्वार भाटा का रूप ले लें किसी को क्या पता ?इन विषयों में किसी और पर कैसे विश्वास किया जाए?जब अपने मन का ही विश्वास नहीं है।इसीलिए ऋषियों के द्वारा हजारों वर्ष तक ब्रह्मचर्य का अभ्यास करने के बाद भी थोड़ी सी चूक में कब किसका  मन किस पर आकृष्ट हो जाए कहना बहुत कठिन है।कई बार किसी महिला का शील भंग करने वाले व्यक्ति को निजी तौर बहुत आत्म ग्लानि होती है किन्तु अब वह अपने हृदय का भरोसा किसी को कैसे कराए ?

     महिलाओं का सम्मान एवं विश्वास सुरक्षित रखने के लिए ही शास्त्रकारों ने अपने मनों पर लगाम लगाने का प्रयास किया और कहा कि युवा पुरुषों के लिए आवश्यक है कि  माता मौसी बहन तथा बेटी रूपी स्त्री के साथ भी एकांत में न बैठे।

                 माता स्वस्रा दुहित्रा वा  

भगवान शंकराचार्य ने कहा है इस दुनियाँ में वीरों में सबसे बड़ा वीर वही है जो स्त्रियों के चंचल नेत्रों को देखकर भी जिसका  मन मोहित न हो ।

           प्राप्तो न मोहं ललना कटाक्षैः 

इसी प्रकार महिलाओं के विषय में लिखा गया कि कोई स्त्री यदि किसी की सुन्दरता पर मोहित हो जाए तो वह भाई ,पिता, पुत्र भी क्यों न हो यह सब भूलकर स्त्रियाँ केवल सुन्दरता पर समर्पित हो जाती हैं---

                  भ्राता   पिता   पुत्र   उरगारी ।

                  पुरुष मनोहर  निरखत नारी।। 

     और भी इसीप्रकार की बातें योगवाशिष्ठ  रामायण में भी लिखी गई हैं । 

      महिलाओं के विषय में कहा गया है कि महिलाओं में पुरुषों की अपेक्षा बासना अर्थात  सेक्स आठ गुणा अधिक होता है किंतु उस बासना को सहने के लिए ईश्वर ने महिलाओं में धैर्य भी बहुत अधिक मात्रा में दिया है। लिखा गया है कि 

        तत्रा शक्या निवर्तन्ते नराः धैर्येण योषितः।। 

     बात अलग है कि जहाँ  ये धैर्य के तटबंध टूटते हैं वहाँ  अक्सर बड़ी बड़ी दुर्घटनाएँ  घटते देखी जाती हैं। 

इसी प्रकार पुराने ऋषियों ने ही अपनी खोज में बताया कि  पुरुष  जब तक  अतिवृद्ध नहीं होता है तब तक बासना कि दृष्टि से उसका मन कभी भी  किसी भी स्त्री पर आकृष्ट हो सकता है इसलिए किसी स्त्री के लिए वह पुरुष मन  विश्वसनीय नहीं  हो सकता ।

      चूँकि बासना अर्थात सेक्स का सारा खेल इसलिए मन के आधीन होता है -

                   मनो हि मूलं हर दग्ध मूर्तेः 

   इसलिए ध्यान रखना चाहिए कि जिसका मन जब जितना अधिक प्रसन्न होता है उस समय उसके मन में  बासना उतनी अधिक होती है इसीलिए राजा, महाराजा, धनी,मंत्री आदि सफल संपन्न लोग अक्सर औरों की अपेक्षा सुरा सुंदरी के अधिक शौकीन होते हैं।

 जब बासना घटती है तो लोग उदास हो जाते हैं  घूमने टहलने आदि कार्यों से बासना को बढ़ाकर मन को प्रसन्न करते  हैं अर्थात मनोरंजन करने के लिए या यूँ कह लें कि बासना बढ़ाने या मन को रिचार्ज करने जाते हैं । जो लोग मनोरंजन के लिए जाते समय किसी लड़की या लड़कियाँ किसी लड़के को साथ लेकर घूमने टहलने  जाते हैं ।वह भी कई तो आधे अधूरे कपड़े पहनकर कर जाते हैं। कई तो फ़िल्म आदि देखने जाते हैं ऐसे समय वहाँ सब कुछ होना संभव होता है ।ऐसी परिस्थितियों से बचा जाना चाहिए।लव मैरिज प्रतिबंधित होते ही युवक युवतियों

में प्रेम विवाह सम्बंधित आशा ही नहीं रहेगी। जिससे पटने पटाने का चक्कर समाप्त होगा और महिलाओं का अपना सम्मान पुनः प्रतिष्ठित होगा । 

   पुराने समय में मान्यता थी कि सुंदरी स्त्री पति के प्राणों पर कभी भी भारी पड़ सकती है अर्थात या तो वो किसी पर मोहित होकर उस  प्रेमी के साथ मिलकर पति को नष्ट करती हैं या फिर वो प्रेमी स्वयं ही अपने प्रेम में  बाधक समझकर उस सुंदरी स्त्री के पति को नष्ट कर देते हैं ।इसीलिए महर्षि चाणक्य ने लिखा है कि      भार्या रूपवती शत्रुः    !!!

      प्रेम विवाह के सन्दर्भ में ज्योतिष शास्त्र का मानना है कि जीवन में जो सुख किसी को नहीं मिलने होते हैं उनके प्रति बचपन से ही उसके मन में असुरक्षा की भावना बनी रहती है।इसी लिए उस व्यक्ति का ध्यान उधर ही अधिक होता है और वो उस दिशा  में बचपन से ही प्रयास रत होता है।
          सामान्य जीवन में ऐसा माना जाता  है कि जीवन में आपको जिस चीज की आवश्यकता हो वह इच्छा होते ही जैसा चाहते हो वैसा या उससे भी अच्छा मिल जाए। इसका मतलब होता है कि यह सुख आपके भाग्य में बहुत है अर्थात यह उस विषय का उत्तम सुख योग है, किंतु जिस चीज की इच्छा होने पर किसी से कहना या मॉंगना पड़े तब मिले  ये मध्यम सुख योग है, और यदि तब भी न मिले तो ये उस बिषय का अधम या निम्न सुख योग मानना चाहिए।और यदि वह सुख पाने के लिए पागलों की तरह गली गली भटकना पड़े  लोगों के गाली गलौच या मारपीट या और प्रकार के अपमान या तनाव का सामना करना पड़े तब मिले या तब भी न मिले तो इसे  संबंधित विषय का सबसे निकृष्ट  सुख योग  समझना चाहिए।
       अब बात विवाह की सच्चाई यह है कि शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों का वर्णन है,जिसमें आज प्रचलन विवाह या प्रेम विवाह दो ही हैं।विवाह चाहें जितने प्रकार के जो भी हों किन्तु विवाह का अभिप्राय पत्नी या पति से मिलने वाला सुख है। यह सुख जिसे जितनी आसानी से जैसा चाहता है  वैसा या उससे भी अच्छा मिल जाता है तो वह विवाह के विषय में  उतना  अधिक भाग्यशाली होता है, किंतु जो  समय से पहले विवाह  की इच्छा होने से परेशान रहने लगे पढ़ाई छोड़कर  या काम छोड़ कर माता पिता आदि स्वजनों की ईच्छा के विरुद्ध  लुक छिप कर वैवाहिक सुख के लिए किसी से कहना या माँगना पड़े तब मिले  ये मध्यम सुख योग है, और यदि तब भी न मिले तो ये उस बिषय का अधम या निम्न सुख योग मानना चाहिए।और यदि वह सुख पाने के लिए पागलों की तरह गली गली भटकना पड़े  लोगों के गाली गलौच या मारपीट या और प्रकार के अपमान या तनाव का सामना करना पड़े तब मिले या तब भी न मिले तो इसे  संबंधित विषय का सबसे निकृष्ट विवाह योग  समझना चाहिए।इस प्रकार जिसमें सब तरफ से तनाव,अपमान,परेशानियाँ,या हानि ही हानि हो  वह प्रेम विवाह कैसे हो सकता है क्योंकि पवित्र प्रेम तो परमात्मा का स्वरूप होता है और जो परमात्मा का स्वरूप  है उससे तनाव कैसा ?सच यह है कि ज्योतिष की दृष्टि से यह   बीमार विवाह योग है विवाह पूर्व इसका पता लगा लगने पर इसकी शांति कर लेनी चाहिए जिससे सारा जीवन बर्बाद होने से बच जाता है।ऐसे विषयों में सही जाँच एवं जानकारी करके बिना  किसी बहम के सही मार्गनिर्देशन के लिए हमारे संस्थान की ओर से भी विशेष व्यवस्था की गई है। 

       उत्तम विवाह योग में प्रायः ऐसा देखा जाता है कि लड़का अभी कह रहा होता है  कि अभी हमें शादी नहीं करनी है अभी पढ़ना या अपने पैरों पर खड़ा होना है  किंतु माता पिता अपनी जिम्मेदारी समझकर विवाह कर रहे होते हैं ऐसे विवाह में यदि उनका पति पत्नी में आपसी स्नेह भी उत्तम हो जाए, तो ये सर्वोत्तम विवाह योग होता है। इसमें उस लड़के को अपनी बासना अर्थात सेक्स की इच्छा प्रकट नहीं करनी पड़ी, इसलिए माता पिता के लिए वो हमेंशा शिष्ट,शालीन,सदाचारी आदि बना रहता है। ऐसे माता पिता अपने बच्चे का नाम बड़े गर्व से हमेंशा  लिया करते हैं कि उसने कभी किसी की ओर आँख उठाकर देखा भी नहीं है। ऐसा उत्तम विवाह योग किसी किसी लड़के या लड़की को बड़े भाग्य से मिलता है। बाकी जितना जिसे तड़प कर,बदनाम होकर या जलालत सहकर पति या पत्नी का सुख मिलता या नहीं भी मिलता है उतना उसे इस बिषय में भाग्यहीन या अभागा समझना चाहिए।
   ऐसे ही वैवाहिक भाग्यहीन लोग प्रेम का धंधा करना शुरू कर देते हैं एक को छोड़ते दूसरे को पकड़ते दूसरे से तीसरा आदि ।ऐसे लोग इस विषय में कई बार हिंसक हो जाते हैं।बलात्कार,छेड़छाड़,हत्याएँ ऐसे ही बीमार विवाह योगों के लक्षण हैं।जिनके भाग्य में कम बीमार विवाह योग होता है उनका नुकसान कम होते देखा जाता है।ऐसे समझदार लोग संयम और शालीनता  पूर्वक ये सब करते हैं, कुछ ऐसा  नहीं भी करते हैं सहनशीलता के साथ संयमपूर्वक अच्छा बुरा कैसा भी हो एक जीवन साथी चुन लेते हैं और उसी के साथ अपना भाग्य समझ कर निर्वाह भी करते हैं  ।

    सामान्य रूप से असहन शील असंयमी  बीमार विवाह योग वाले लोग ऐसा करते करते थक कर  कहीं संतोष  करके मन या बेमन किसी के साथ जीवन बिताने लगते हैं जिसे देखकर लोग कहते हैं कि उनकी तो बहुत अच्छी निभ रही है।सच्चाई तो उन्हें ही पता होती है।ऐसे ही निराश  हताश लोग कई बार अपनी जिंदगी को तमाशा ही बना लेते हैं कई बार हत्या या आत्महत्या तक गुजर जाते हैं वो ऐसा समझते हैं कि वे प्रेम पथ पर मर रहे हैं जब सामने वाला या वाली को उससे अच्छा कोई और दूसरा मिल गया होता है तो वो पहले वाले से पीछा छुड़ाने के लिए उसे कैसे भी छोड़ना या मार देना चाहता है।ऐसे लोगों का एक दूसरे के प्रति कोई समर्पण नहीं होता है जबकि प्रेम तो पूर्ण समर्पण पर चलता है कोई भी प्रेमी अपने प्रेमास्पद को कभी दुखी नहीं देखना चाहता।
  कई ने तो एक साथ कई कई पाल रखे होते हैं।ऐसे लोग कई बार सार्वजनिक जगहों पर एक दूसरे के साथ शिथिल आसनों में बैठे होते हैं या एक दूसरे के मुख में चम्मच घुसेड़ घुसेड़  कर खा खिला रहे होते हैं। इसी बीच तीसरी या तीसरा आ गया उसने ज्योंही किसी और के साथ देखा तो पागल हो गया या हो गई जब पोल खुल गई तो लड़ाई हुई कोई कहीं झूल गया कोई कहीं झूल गई।भाई ये कैसा प्रेम? ये तो बीमार विवाह योग है।यहॉ विशेष  बात ये है कि इस पथ पर बढ़ने वाले हर किसी लड़के या लड़की की जिंदगी बीमार विवाह योग से पीड़ित होती है।इसी लिए ऐसे लोग अपने जैसे बीमार विवाह वाले साथी ढूँढ़ ढूँढ़कर उन्हें ही धोखा दे देकर अपनी और अपने जैसे अपने साथियों की जिंदगी बरबाद किया करते हैं।जैसे आतंकवादियों को लगता है कि वे धर्म के लिए मर रहे हैं इसीप्रकार ऐसे तथाकथित प्रेमी भी अपनी गलत फहमी में प्राण गॅंवाया करते हैं।
ऐसे लोगों की जन्मपत्रियॉं यदि बचपन में ही किसी सुयोग्य ज्योतिष विद्वान से दिखा ली जाएँ तो ऐसे योग पड़े होने पर भी ऐसे लोगों को  अच्छे ढंग से प्रेरित करके जीवन की इस त्रासदी से बचाया जा सकता है। 

राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान की सेवाएँ 


     यदि आप ऐसे किसी बनावटी आत्मज्ञानी, बनावटी ब्रह्मज्ञानी, ढोंगी,बनावटी तान्त्रिक,बनावटी ज्योतिषी, योगी उपदेशक या तथाकथित साधक आदि के बुने जाल में फँसाए जा  चुके हैं तो आप हमारे यहाँ कर सकते हैं संपर्क और ले सकते हैं उचित परामर्श ।

       कई बार तो ऐसा होता है कि एक से छूटने के चक्कर में दूसरे के पास जाते हैं वहाँ और अधिक फँसा लिए जाते हैं। आप अपनी बात किसी से कहना नहीं चाहते। इन्हें छोड़ने में आपको डर लगता है या उन्होंने तमाम दिव्य शक्तियों का भय देकर आपको डरा रखा है।जिससे आपको  बहम हो रहा है। ऐसे में आप हमारे संस्थान में फोन करके उचित परामर्श ले सकते हैं। जिसके लिए आपको सामान्य शुल्क संस्थान संचालन के लिए देनी पड़ती है। जो आजीवन सदस्यता, वार्षिक सदस्यता या तात्कालिक शुल्क  के रूप में  देनी होगी, जो शास्त्र  से संबंधित किसी भी प्रकार के प्रश्नोत्तर करने का अधिकार प्रदान करेगी। आप चाहें तो आपके प्रश्न गुप्त रखे जा सकते हैं। हमारे संस्थान का प्रमुख लक्ष्य है आपको अपनेपन के अनुभव के साथ आपका दुख घटाना,बाँटना  और सही जानकारी देना।