Saturday, 17 December 2016

कालेधन की सरकारी परिभाषा ! जो धन जनता अपने पास रखे वो काला किंतु वही धन नेताओं को सौंप दे तो सफेद !

नेताओं को चंदा देने के लिए जनता को मजबूर क्यों कर रही है सरकार !
      जनता की मेहनत से कमाई हुई संपत्ति भी काली और नेताओं की हराम में हथियाई हुई संपत्ति भी  सफेद !जब तक नेताओं के इस भ्रष्टाचार और अत्याचार को जनता सहती है तभी तक बचा हुआ है लोकतंत्र ! राजनैतिकदलों को टैक्स में छूट और जनता के पैसों की लूट ? जनता का पैसा हराम का है क्या ?भ्रष्टाचार का साक्षात समुद्र हैं राजनैतिक पार्टियाँ !फिर उन पर कृपा क्यों ? राजनैतिक पार्टियों का फंड जुटाने के लिए ही क्या गढ़ी गई थी नोटबंदी की कहानी ?राजनैतिक भ्रष्टाचार ही वास्तव में असली भ्रष्टाचार है भ्रष्टाचार के इस समुद्र को सुखाए बिना न घट सकते हैं अपराध और न हो सकती है ईमानदार राजनीति !
         प्रायः सरकारी अधिकारी कर्मचारी अपना कर्तव्य भूलकर नेताओं की आज्ञा का पालन ही तो कर रहे हैं इसीलिए नेता लोग इनकी सैलरी अनाप शनाप बढ़ाए जा रहे हैं सरकारों में सम्मिलित नेताओं को उनकी तुलना में आम आदमी की आमदनी की कोई परवाह ही नहीं रहती है किंतु वो नेताओं के भ्रष्टाचार की अधिकारी कर्मचारी कहीं पोल न खोल दें इसीलिए नेता लोग लगे रहते हैं उनकी सेवा में !
          देश वासियों के बीच मजाक बनकर रह गई है राजनीति ! जनता को नोटबंदी अभियान के जाल में चारों ओर से फँसाकर फिर यह कह देना कि राजनैतिक पार्टियों को दिया जा सकता है कितना भी धन वो टैक्स मुक्त है इसका सीधा सा मतलब है नेताओं को सुख सुविधाएँ भोगने के लिए पैसे दो !राहुलगाँधी मिलने क्या गए सरकार का मूड ही बादल गया और राजनैतिक पार्टियों की टैक्स मुक्त बता दिया गया क्यों ?
      संसद चलाना  जिन नेताओं के बश का है नहीं ,जनता के किसी काम के नहीं हैं नेता लोग !फिर भी जनता इन्हें खाने के लिए पैसे दे रहने घूमने के लिए सुख सुविधाएँ दे !दिनोंदिन जनता पर बोझ होती जा रही है राजनीति ! सच्चाई तो यह है कि लोकतंत्र के नाम पर जनता की कमाई भोगने वाले नेताओं को बोझ और उनकी बातों को गाली एवं उनके कर्मों को सबसे बड़े दुष्कर्म एवं उनकी बेशर्मी को सबसे बड़ी नीचता मानने लगी है जनता !हिजड़े भी कमाकर खाते हैं भले ही वो घर घर जाकर तालियाँ ही क्यों न बजाते हों वो गर्व से कह तो सकते हैं कि हमने कहाँ से कितने रूपए कमाए हैं किंतु हमारे नेता नहीं बता सकते हैं अपनी संपत्तियों  के स्रोत !
      नेता लोग अक्सर गरीब परिवारों से आते हैं वे अक्सर अल्पशिक्षित कलाशून्य अकर्मण्य और आलसी होते हैं पैसे पैदा करने लायक उनमें प्रायः कोई गुण नहीं होता है !नौकरी मिलने लायक शिक्षा नहीं होती समय नहीं होता है मेहनत करके खाने की भावना नहीं होती है व्यापार करने के लिए न पैसे होते हैं और न ही समय !धन कमाने के लिए ये कुछ करते देखे भी नहीं जाते हैं फिर भी चुनाव जीतने के बाद करोड़ो अरबोंपति अचानक हो जाते हैं ये लोग !उसके लिए इन्हें कोई प्रयास भी नहीं करना पड़ता है ।  
     राहुलगाँधी जी यदि प्रधानमंत्री जी  से राजनैतिक पार्टियों को टैक्स मुक्त रखने के लिए मिल सकते थे तो   संसद चलाने के लिए पहले मुलाक़ात क्यों नहीं की !उनके लिए संसद चलाना जरूरी काम नहीं था क्या ?संसद चलाने के लिए नेताओं में आपसी सहमति नहीं बनी किंतु राजनैतिकदलों को दी गई टैक्स में छूट के प्रकरण में सभी करिया बरजतिया नेता लोग एक जैसी भाषा बोल रहे हैं !सभी नेताओं के नोट ऐसे होंगें सफेद इसीलिए अभी तक कोई नेता नहीं गया लाइनों में लगने !सारे काम आपसी मिली भगत से हो रहे हैं केवल संसद में जनता का काम न करने के लिए नेता लोग लड़ाई का नाटक करते हैं  !
     जनता के धन को काला बताकर उसे सुरक्षित रखने के सभी दरवाजे बंद करके अचानक यह घोषणा कर दी जाए कि राजनैतिक पार्टियों को दिया गया चंदा टैक्स मुक्त होगा इशारा साफ था अपना पैसा नेताओं को दो !राहुलगाँधी जी और प्रधानमंत्री जी की एकदिन पहले हुई मुलाक़ात के बाद यह घोषणा वो भी तब जब आपसी मतभेदों के कारण संसद न चलने दी जाती रही हो फिर अचानक मुलाक़ात क्यों ?
       देशवासियों में जिनके संबंध किसी नेता से नहीं होते हैं उन्हें तंग करने के लिए छोड़ दिए जाते हैं भ्रष्टाचारी अधिकारी कर्मचारी उनसे जो कुछ भी नोच कर लाते हैं वो मिलबाँट कर रख लेते हैं सरकारी नेता और अधिकारी कर्मचारी लोग ! इसीलिए घूस लेने वाला हर कर्मचारी कहता है कि ये पैसा ऊपर तक जाता है !ऊपर बैठे अधिकारी हों या सरकारों में सम्मिलित नेता लोग इन दोनों के सम्मिलित हुए बिना भ्रष्टाचार किया ही नहीं जा सकता !अधिकारियों को जब से नौकरी मिली है और नेता जब से चुनाव जीते हैं दोनों की तब से अब तक की संपत्तियों और संपत्ति स्रोतों का मिलान करके ईमानदारी पूर्वक देख लिया जाए तो इसी साँठ गाँठ से पैदा हुए हैं सभी प्रकार के भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार के अपराध ! इनके सहयोग के बिना अपराध हो ही नहीं सकते हैं !
    राजनीति पर कृपा का मतलब है कि भ्रष्टाचार से लड़ने में सरकार की नियत साफ नहीं है !भ्रष्टाचार  की जड़ पर कृपा क्यों ?
     सारे पाप और अपराधों  का केंद्र तो राजनैतिक पार्टियाँ और नेता लोग ही हैं हमारी राजनीति एवं नेताओं की कार्यशैली से ही अपराधियों को ऊर्जा मिलती है । नेताओं के कृपाबल  के बिना किसी भी अपराध को अंजाम देना आसान है क्या ?किसी अपराधी के संपर्कों का अनुसन्धान किया जाए तो उसके निजी संबंध किसी न किसी नेता से प्रायः निकलेंगे !वो जितना बड़ा अपराधी होगा उतने बड़े नेता से संपर्क निकलेंगे!इसी सिद्धांत के तहत बड़े बड़े अपराधियों के संपर्क बड़े बड़े नेताओं से हो जाते हैं ! अपने कर्तव्य पालन में कोई नेता भले फेल हो जाए किंतु ऐसे लोगों के काम टाइम से ही कर के देने होते हैं ! नेता लोग राजनीति के माध्यम से जनता की सेवा कितनी कर पाते हैं कितने लोग कर पाते हैं ये बात दूसरी है ।
       आम आदमी का अपराध करना तो दूर आप थोड़ा सा कोई ऐसा काम कर भर लें जो कानून सम्मत न हो  यहाँ तक कि आप थोड़ा चबूतरा या छज्जा तक तय सीमा से आगे बढ़ा लें या और कुछ कर लें या आपकी गाड़ी के कोई कागज कम हों जिसे गैर क़ानूनी माना जा सकता हो सरकारी भिखारी आपके दरवाजे तब तक हाथ फैलाए खड़े रहेंगे जब तक आप ऊन्हें कुछ दे नहीं देते !किंतु आपकी थोड़ी भी जान पहचान राजनीति में हो तो वही सरकारी भिखारी आपके बड़े बड़े अपराधों को भी नजरंदाज करते रहेंगे !
        यही सब  कारण हैं कि नेता प्रायः सामान्य घरों से आते हैं किंतु चुनाव जीतते ही करोड़ों अरबोंपति बन जाते हैं दूसरी ओर गाँवों गरीबों ग्रामीणों की हमदर्दी और विकास के लिए बड़ी बड़ी बातें करने एवं भारी भरकम फंड पास करवाने वाले नेता खा जाते हैं जो बचता है वो सरकारी भ्रष्टाचारी अधिकारी कर्मचारी खा जाते हैं जनता तक केवल ख़बरें ही पहुँच पाती हैं वो भी सरकारी भ्रष्टाचार में मीडिया को उसका हिस्सा नहीं मिला तो मीडिया शोर मचाता है यदि उसे भी मिल गया तो भ्रष्टाचार की खबरें भी उस जनता को नहीं मिल पाती हैं जिसका भला करने के लिए के नाम पर संसाधनों की लूट की जा रही होती है । 

Friday, 16 December 2016

संसद की कार्यवाही अक्सर रोक दी जाती है क्यों ?जनता के धन का ये सदुपयोग है क्या ?

   लोकसभा के 91 घंटे 59 मिनट बर्बाद हुए ! इसके लिए दोषी कौन ? नेता क्या इतने स्वतंत्र होते हैं संसद चर्चा का मंच है तो चर्चा होनी ही चाहिए किंतु हो कैसे! 
        राजनैतिकदलों में चर्चा करने समझने तथा अपनी बात कहने और दूसरों के विचार सहने योग्य विचारवान कई लोग राजनैतिक दलों में किन्नरों जैसा उपेक्षित जीवन जीने के लिए मजबूर कर दिए गए हैं हैं वे शिक्षित समझदार अनुभवी एवं जीवंत नेता लोग हैं !किंतु वे अपने इमानधर्म को भी महत्त्व देना चाहते हैं वे अपनी आत्मा की आवाज भी सुनना चाहते हैं इसलिए उनकी उपेक्षा करके राजनैतिक दलों के मालिकों की पहली पसंद होते हैं नेताओं की बीबी बहन बेटियाँ बच्चे एवं नाते रिस्तेदार आदि दूसरी पसंद होते हैं पैसे वाले वे लोग जो पार्टी के मालिक की जेब भर सकते हैं तीसरी पसंद होते हैं पार्टी मालिकों के इशारे पर सदनों में हुल्लड़ मचाने वाले लोग !चर्चा करने की योग्यता रखने वाले लोगों को पसंद कौन करता है उन्हें चुनावी टिकट या पार्टी का पदाधिकार देना कौन चाहता है पार्टी के पदों और चुनावी प्रत्याशियों के रूप में तो अपने और अपनों को ही देखना चाहते हैं नेता लोग !
     संसद चर्चा का मंच है किंतु अशिक्षा अल्पशिक्षा  अयोग्यता या अनुभव हीनता के कारण जो सदस्य लोग उस चर्चा में चाह कर भी भाग न ले पा रहे हों वे सदन में शांत कब तक बैठे रहें वे  कुर्सी छोड़कर समय पास करने बाहर निकल जाएँ ! या कुर्सी पर बैठे बैठे सोवें या मोबाईल फोन में वीडियो देखें या अपनी पार्टी के मालिक का इशारा पाकर तब तक हुल्लड़ मचाते रहें जब तक मालिक चुप रहने को न कहे आखिर वे क्या करें !सदन की सार गर्भित चर्चाओं में जो बोलने और समझने की योग्यता न रखते हों सदनों की कार्यवाही न चलने के लिए वे कितने दोषी माने जाएँ उनमें जितनी योग्यता है उससे अधिक अपेक्षा उनसे कैसे की जा सकती है और चाह कर भी उस पर वे खरे कैसे उतरें !
     
अयोग्य लोग सदनों में जाकर वहाँ की कार्यवाही रोक ही सकते हैं चलाना तो उनके बश का होता नहीं है कार्यवाही चलाने अर्थात चर्चा के लिए जो शिक्षा समझ अनुभव चाहिए वो उनके पास होता नहीं है और दूसरों के अच्छे विचारों को मानने एवं अपने विचारों को विनम्रता पूर्वक औरों को मना लेने की प्रतिभा नहीं होती है वो बेचारे ज्ञानदुर्बल लोग चर्चा कैसे करें !सदनों में चर्चा करना आसान होता है क्या ?
       जिस राजनीति में शिक्षा की अनिवार्यता न हो समझ सदाचरण एवं अनुभव का महत्त्व ही न हो केवल अपनों को या पैसे वालों को या प्रसिद्ध लोगों को पद प्रतिष्ठा एवं चुनावी टिकट बाँटे जाने लगे हों वो संसद में आवें या न आवें ! चर्चा करने और समझने की योग्यता रखते हों या न रखते हों वो कुर्सियों पर बैठ के सोवें या समय पास करने के लिए बाहर चले जाएँ या संसद की कार्यवाही के समय ही अपने मोबाईल पर वीडियो देखने लगें या अपने पार्टी मालिकों का आदेश पाकर हुल्लड़ मचाने लगें !किंतु संसद में चर्चा करने और समझने की योग्यता यदि उनमें नहीं है तो वो संसद कीsee more.... http://samayvigyan.blogspot.in/2016/12/blog-post.html

Monday, 12 December 2016

बाबाओं का धन 'काला' होता है या 'गोरा' ? बाबाओं की छलाँग लगाती संपत्तियों के स्रोत भी तो सार्वजनिक किए जाएँ !

    प्रायः बाबा लोग भी सामान्य परिवारों में ही पले बढ़े होते हैं  दस बीस वर्षों में सैकड़ों करोड़ की संपत्तियाँ ईमानदारी पूर्वक बना लेना आम आदमी के बश की बात नहीं होती है फिर बाबा लोग ईमानदारी पूर्वक ऐसा कैसे कर लेते हैं उनके आयस्रोत खोजे और सार्वजनिक किए जाएँ जनता भी उनसे सीखेगी धन इकठ्ठा करने का चमत्कार !जनता भी बनेगी बाबा और वो भी जाएगी हरिद्वार !
      चोर लोग  शोर मचाते ही हैं 'चोर चोर 'कह कर उन्हें चिल्लाते हुए अक्सर लोगों ने सुना ही होगा ! वही यहाँ होता है जब कोई बाबा कालाधन बहुत अधिक मात्रा में इकठ्ठा कर लेता है तब वो भी कालाधन कालाधन चिल्लाने और राजनीति की ओर भागने लगता है नेताओं से संपर्क साधने लगता है सरकार से सिक्योरिटी माँगने लगता है !ये सब उसके कालाधन की घबराहट के ही प्रतीक होते हैं ।

     जो चरित्रवान साधक विरक्त साधूसंत होते हैं वे सरकारी सिक्योरिटी के भरोसे सुरक्षित रहने से अच्छा मरना पसंद करेंगे वो केवल भगवान् पर भरोसा करते हैं !ऐसे लोग नेताओं के यहाँ दुम हिलाने क्यों जाएँगे यहाँ नेता लोग खुद चिरौरी करने आया करते हैं !संत लोग झूठ क्यों बोलेंगे !संत लोग दवाएँ क्यों बेचेंगे वे तो  आशीर्वाद से ही दूर कर देते हैं बड़े बड़े रोग !
      ऐसे शास्त्रीय साधू संतों एवं धार्मिक क्षेत्र से जुड़े लोगों का अपमान कराते हैं ऊटपटाँग साधनों से कालाधन इकठ्ठा करने वाले बाबा लोग !क्योंकि वास्तविक साधूसंतों जैसे विरक्त लोग धन संपत्तियों का मोह छोड़ कर ही तो व्यापार परिवार एवं नातेरिस्तेदारों आदि सारे प्रपंचों से दूर भगवान की भक्ति में समाई होती है उनकी दुनियाँ ! पर पहुँच चुके लोग फिर सांसारिक प्रपंचों में क्यों फँसना चाहेंगे !जीवनचर्या के लिए वर्तमान युग में धन की आवश्यकता उन्हें  भी होनी स्वाभाविक है जो पूर्ति उनके भक्त लोग किया करते हैं !इससे अधिक वो प्रपंच पालते ही नहीं हैं ।
    दूसरी ओर बाबागिरी की आड़ लेकर धार्मिक कार्यों या सेवाकार्यों का प्रपंच फैलाकर अपनी सुख सुविधाएँ संपत्तियाँ जुटाने वाले लालची लोग हैं जिनका धर्म कर्म से कोई संबंध ही नहीं होता दिन भर झूठ बोल बोल कर धन इकठ्ठा करने के प्रति समर्पित होते हैं ये करोड़ों अरबों का अंबार लगा लेते हैं जो धर्म के माध्यम से ईमानदारी पूर्वक इकठ्ठा कर पाना किसी के लिए भी संभव नहीं होता है ये लोग ऐसे तपस्वी भी नहीं होते हैं कि लोग आस्था पूर्वक इन्हें दे जाते हों !दस बीस वर्षों में सैकड़ों करोड़ की संपत्तियाँ बनने के स्रोत सार्वजनिक क्यों न किए जाएँ !क्योंकि प्रायः बाबा लोग भी  परिवारों में ही पले बढ़े होते हैं ।
   बड़े बड़े राजनैतिक संपर्कों से बाबा बनकर भी कई काले कारनामों से इकठ्ठा किया जा रहा है उनके काले कारनामें भी खोले जाएँ ! भ्रष्ट बाबाओं ,नेताओं ,कर्मचारियों एवं भूमाफियाओं के कालेधन पर कब होगी कार्यवाही ?

  1000 -500 के 'नोट' की 'चोट' से  सारे देश में मचा है हाहाकार !अब तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध युद्ध  लड़ने लगी है मोदी सरकार !  
     गंगानदी  भगवान के चरणों से निकलती है और भ्रष्टाचार की नदी भ्रष्टनेताओं, भ्रष्टअधिकारियों एवं भ्रष्टबाबाओं तथा भ्रष्टसरकारी कर्मचारियों के आचरणों से निकलती है !इसीलिए इनकी संपत्तियों एवं आयस्रोतों की जाँच के बिना भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए की गई सारी कसरतें बेकार हैं ।                                           हे प्रधानमंत्रीजी!सरकार केलिए सबसे बड़ीचुनौती !                                        
अब नेताओं बाबाओं अधिकारी कर्मचारियों की निजी संपत्तियों की करवाई  जाए जाँच !काले धन का बहुत बड़ा भंडारण मिलेगा इनके पास ! क्योंकि ऐसे सफेदपोश लोग देश की सरकारी जमीनों का अपने को स्वयंभू मालिक समझते हैं उन्हें कब्ज़ा करके बेच लेते हैं धंधा व्यापार फैला देते हैं सरकारी जमीनों पर कब्ज़ा करने के लिए ही ये लोग डाढ़ा झोटा बढ़ाकर बाबा बन जाते  हैं  आश्रम, मंदिर, योगपीठ, स्कूल, गोशाला या चैरिटेबल ट्रस्ट बनाकर  जनसेवा का नाटक करने लगते हैं !
     देश की खाली सरकारी जमीनों पर कब्ज़ा करने वाले अधिकाँश बाबा या नेता लोग हैं या फिर सरकारी अधिकारी कर्मचारी होते हैं इन्हीं लोगों की मल्कियत चलती है सरकारी जमीनों पर !सरकारी जमीनों को बेच बेचकर पहले तो बस्तियाँ बसा देते हैं और फिर यही सफेद पोश लोग इन बस्तियों का नियमिती करण करने के लिए आंदोलन करते हैं जैसे ही उनकी पार्टी की सरकार आती है तो उस जमीन का नियमितीकरण करवा लेते हैं फिर नई जगह कब्ज़ा करते हैं । 
    कुलमिलाकर बाबाओं  नेताओं  या सरकारी अधिकारियों कर्मचारियों की कृपा के बिना न कोई गुंडा बन सकता है न माफिया और न ही अपराधी !क्योंकि इन लोगों से सरकारी मशीनरी भी डरती है इनकी पहुँच सीधे प्रधानमंत्री तक होती है !इसीलिए ये सफेदपोश लोग कई बड़े बड़े अपराध अपनी बाबागिरी और नेतागिरी में छिपाए घूम रहे हैं । 
     कालेधन के इन सफेदपोश रईसों को पकड़ने  की हिम्मत करना  बड़ी बड़ी सरकारों के लिए भी होता है हिम्मत का काम !बाबाओं ,नेताओं एवं सरकारी अधिकारी कर्मचारियों से हर सरकार डरती है क्योंकि इनकी चोरी पकड़ने के लिए जो सरकार खड़ी होती है ये उसी की पोल खोलने लग जाते हैं भ्रष्टाचारी सरकारें अक्सर डरकर अपने कदम वापस खीँच लेती हैं इसीलिए सत्ता किसी की हो सरकार किसी की भी बने किंतु बाबाओं ,नेताओं एवं सरकारी अधिकारी कर्मचारियों का बोल बाला हर सरकार में रहता है !
       इसलिए हे प्रधानमंत्री जी !यदि भ्रष्टाचार के विरुद्ध युद्ध छेड़ा ही है तो भ्रष्टबाबाओं  भ्रष्टनेताओं एवं भ्रष्ट अधिकारियों कर्मचारियों की चल अचल संपत्तियों एवं उनके आयस्रोतों को भी  सार्वजानिक करे सरकार !
       सभी प्रकार के अपराधों को बढ़ावा देने में सबसे बड़ी भूमिका प्रमुख रूप से इन तीन लोगों की ही मानी  जाती है हजार पाँच सौ के नोट बंद करने का असर इन तीनों लोगों पर बिलकुल न के बराबर होगा !क्योंकि ऐसे लोग अपना सारा कालाधन जगह जमीनों में लगा चुके होंगे !
         अधिकांश काला धन घूस लेने वाले राजनेताओं-नौकरशाहों, टैक्स चोरी करने बड़े व्यापारियों और अवैध धंधा करने माफियाओं के पास जमा होता है। इनमें से कोई भी अपनी  काली कमाई को नोटों के रूप में वर्षों तक रखेगा इसकी कल्पना भी नहीं करनी चाहिए !यदि कुछ 1000 -500 के नोटों के रूप में उनके पास होगा भी तो इनमें से अधिकाँश लोग रसूखदार होते हैं वो अब तक सब इधर उधर कर चुके होंगे !
     हे प्रधानमंत्री जी ! बहुत लोगों में तो यहाँ तक  भ्रम फैलाया जा चुका है कि कालेधन से धनी नेताओं, नौकरशाहों, मीडियामालिकों,माफियाओं एवं कारोबारी और धनवान बाबाओं को विश्वास में लेने के लिए मोदी सरकार ने अपने नोट बदलने के निर्णय को महीनों पहले ही गुप्त रूप से इन लोगों को सूचित कर दिया था और उन्हें किसी भी प्रकार से नुक्सान नहीं होने दिया सौ सौ रूपए के नोट मार्किट से आज इसीलिए गायब हैं !ऐसे ही लोग मोदीसरकार  के इस निर्णय के उस समय गुण गाते घूम रहे हैं जब छोटे छोटे कारोबारी या आम घर गृहस्थी वाले लोग अपना सब कामकाज छोड़ कर बैंकों डाकघरों के सामने लाइनों में लगे हैं किंतु उन लाइनों में न तो कारोबारी बाबा हैं न नेता हैं न माफिया हैं  एवं सरकारी अधिकारी कर्मचारी भी नहीं हैं उन लाइनों में !आखिर क्यों ? क्या वो लोग इतने बड़े ईमानदार हैं और बाक़ी सारा देश बेईमान और भ्रष्टाचारी है या उन्हें पैसों की जरूरत नहीं पड़ रही होगी या उनके खर्चे आम जनता से कम हैं जो उनका काम बिना पैसे के ही चल जा रहा होगा !आखिर वे शांत क्यों और कैसे बैठे हैं और आम जनता परेशान है क्यों ? इसके कारण भी स्पष्ट किए जाने चाहिए !
        वर्तमान केंद्र सरकार यदि वास्तव में गंभीर है और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना ही चाहती है तो बहुत आवश्यक है कि पारदर्शिता बनाए रखी जाए और ईमानदारी पूर्वक न केवल आचरण किया जाए अपितु उस ईमानदारी पर शंका करने वालों का विश्वसनीयता इन आत्मीयता पूर्वक समाधान भी किया जाए !सरकार की या जिम्मेदारी है कि होम करते हाथ न जलने दिए जाएँ !
      हे प्रधानमंत्री जी ! सरकार ने यदि भ्रष्टाचार के विरुद्ध युद्ध छेड़ा ही है तो ध्यान यह भी रखा जाना चाहिए कि सफाया हो तो सबका हो !चाहें वो सरकार के कितने भी करीबी नेता अधिकारी या  धनवान साधू संन्यासी और बाबा लोग ही क्यों न हों ?अब यदि इन्हें बचाए रखने का थोड़ा भी लालच किया गया तो सारे किए कराए पर पानी फिर जाएगा और बदनाम हो जाएगी सरकार !नोटों को बदलने की घोषणा से अभी तो सारे देश में हाहाकार मचा हुआ है सोचने बिचारने का लोगों के पास समय ही नहीं है किंतु जिस दिन लोग सोचने बैठेंगे तब एक एक कमी काउंट करेंगे और उनका रुख देखकर ये विरोधी पार्टियों के नेता भी उस समय उगल रहे होंगे आग !
      अतएव हे प्रधानमंत्री जी !लगभग पिछले तीस पैंतीस वर्षों से भ्रष्टाचार बहुत बढ़ा है इस बीच खरीदी बेची गई चल अचल सभी संदिग्ध संपत्तियों की जाँच कराई जाए और उनमें लगाई गई अकूत धनराशि के आयस्रोत इंटरनेट पर सार्वजनिक कर दिए जाएँ ताकि किसी के बिषय में उसे जानने वाले को कोई शंका समाधान करना हो या कुछ और जानकारी देनी हो तो वो बात भी जाँच के दायरे में आ सके !जो आयस्रोत स्पष्ट न हों या गैरकानूनी हों या जिनमें नियमों का पालन न किया गया हो वो सारी  संपत्तियाँ एवं उनके द्वारा कमाई गई संपत्तियों से बनाई गई संपत्तियाँ पारदर्शिता पूर्वक जप्त करके उन्हें सार्वजानिक संपत्तियाँ घोषित करे सरकार !
     महोदय ! संन्यासी बनने की घोषणा के बाद साधू संतों के द्वारा इकट्ठी की गई सारी संपत्तियाँ कालाधन मानकर उन्हें जप्त करके सार्वजानिक संपत्तियाँ घोषित करे सरकार!ऐसे बाबा लोगों के सेवाकार्य एवं चैरिटी संबंधी सभी लोकप्रिय और जनहितकारी  कार्यों को यथावत उन्हीं की देख रेख में चलने भले दिया जाए किंतु उसका स्वामित्व सरकार अपने हाथों में लें!यदि वे वास्तव  में संन्यासी और सेवाकार्य करने वाले हैं और इसमें उनका कोई निजी लोभ नहीं है तो उन्हें यह व्यवस्था स्वीकार करने में कोई आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए !विगत कुछ वर्षों में कुछ आश्रमों एवं बाबाओं की सेवा गतिविधियों में कई प्रकार के अपराध होते पाए गए जिन आरोपों में वे लोग अभी भी जेलों में हैं या कानूनी लड़ाईयाँ लड़ रहे हैं उसके बाद ऐसे सभी लोगों पर शंका होना स्वाभाविक है । वैसे भी संन्यास लेने के बाद समाज से चंदा इकठ्ठा करके बनाई गई संपत्तियाँ समाज की हैं न कि उन बाबाओं की ,इसलिए समाज की संपत्तियाँ समाज को सौंपने में बुराई भी क्या है !
      चुनाव जीतने के बाद नेताओं के द्वारा बनाई गई अकूत संपत्तियों में भरा पड़ा है भ्रष्टाचार !साहस हो तो उन्हें पकड़े सरकार !  
     ऐसे नेताओं की संपत्तियों की जाँच क्यों न करवाई जाए चुनाव जीतते ही उनके यहाँ लग जाते हैं संपत्तियों के अंबार !खोजे जाएँ उनकी आय के स्रोत !आखिर ऐसा क्या है कि चुनाव जीत जाने के बाद अधिकाँश नेताओं को कुछ करने की जरूरत ही नहीं रह जाती है और प्रायः वे कुछ करते भी नहीं हैं और न ही उनके पास कुछ करने का समय ही होता है !ऐसे नेताओं ने सेवा कार्यों के लिए पहचानी जाने वाली राजनीति को ही न केवल अपना व्यवसाय मान लिया है अपितु उसी राजनैतिक धमक से  संपत्तियों के बड़े बड़े अंबार लगा लिए हैं जिनकी खनक से उनकी सैकड़ों पीढ़ियाँ राजसी ठाटबाट भोगती रहेंगी और आज भी वो बड़ी बड़ी कोठियों में न केवल रहते हैं अपितु कई कई तो खाली भी पड़ी होती हैं जहाज से नीचे पैर नहीं रखते !शादी काम  काज में करोड़ों अरबों रुपये पानी की तरह बहा देते हैं वे !आखिर कहाँ कमाने जाते हैं ? क्या धंधा व्यापार करते हैं और कब काम करते हैं बकवास करने हुल्लड़ मचाने से इन्हें फुरसत ही कहाँ होती है जो काम धंधा फैलाएँगे !भ्रष्टाचार की कमाई से ऐसे लोगों के खजाने भरे पड़े हैं हिम्मत हो तो जाँच करे सरकार अन्यथा 1000 -500 के नोट बंद करने से कैसे बंद हो जाएगा भ्रष्टाचार ?
सरकारी अधिकारियों कर्मचारियों को नौकरी मिलने के बाद खरीदी गई जमीनों मकानों की जाँच करे सरकार !
        सरकारी अधिकारियों कर्मचारियों ने नौकरी लगने के बाद जितनी भी संपत्तियाँ बढ़ाई और बनाई हैं उनकी जाँच क्यों नहीं करती है सरकार !उनमें से जो लोग  घूस लेते हैं उससे भ्रष्टाचार पूर्वक बनाई गई संपत्तियाँ और फिर उन संपत्तियों के द्वारा इकठ्ठा की गई जो संपत्तियाँ वे सब काला धन नहीं हैं तो क्या हैं ?सरकार को आखिर क्यों नहीं दिखाई पड़ता है ये भ्रष्टाचार ? केवल 1000 -500 के नोट बंद करने से कैसे बंद हो जाएगा भ्रष्टाचार ?काले धन से खरीदी गई संपत्तियों के अलावा उनकी सैलरी या नैतिक स्रोतों से संचित धन की सीमा में नहीं आती हैं तो वे संपत्तियाँ गैरकानूनी हैं ब्लैकमनी हैं उन्हें सरकार सार्वजनिक करे !
      बाबाओं के द्वारा सबकुछ छोड़ने अर्थात संन्यास लेने की घोषणा करने के बाद जोड़ा गया सारा धन ही कालाधन  होता है चुनाव जीतने के बाद नेताओं के द्वारा अनैतिक रूप से इकठ्ठा की गई सारी संपत्ति भी ब्लैकमनी है ।घूसखोर अधिकारियों कर्मचारियों की सैलरी के अलावा भ्रष्टाचार पूर्वक अर्जित की गई सारी  संपत्तियाँ ही काला धन हैं  क्या सरकार इन तीनों के विरुद्ध भी कठोर कार्यवाही करने की हिम्मत जुटा पाएगी !
     देश की आम धारणा है कि साधू संत लोग विरक्त होते हैं संन्यास का मतलब ही सबकुछ छोड़ना होता है और सब कुछ त्यागने की दुहाई देने वाले बाबाओं का वो धन जो बाबा बनने के बाद इकठ्ठा किया गया होता है वो सारा ब्लैकमनी अर्थात काला धन ही माना जाना चाहिए और उसे राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करे सरकार !
   ऐसी संपत्तियों की जाँच करवाकर जो संपत्तियाँ  इनके खून पसीने की कमाई की नहीं हैं उन्हें जब्त करके सार्वजानिक संपत्ति घोषित करे सरकार !
         सैद्धांतिक रूप से बाबाओं का सारा धन ही ब्लैकमनी होता है चुनाव जीतने के बाद नेताओं के द्वारा अनैतिक रूप से इकठ्ठा की गई सारी संपत्ति ब्लैकमनी है । इसी प्रकार से सरकारी अधिकारियों कर्मचारियों की नौकरी लगने के बाद इकठ्ठा की गई गैरकानूनी संपत्तियाँ ब्लैकमनी हैं क्या सरकार इन तीनों के विरुद्ध भी कठोर कार्यवाही करने की हिम्मत जुटा पाएगी !
     देश की आम धारणा है कि साधू संत लोग विरक्त होते हैं संन्यास का मतलब ही सबकुछ छोड़ना ही होता है और सब कुछ त्यागने की दुहाई देने वाले बाबाओं का वो धन जो बाबा बनने के बाद इकठ्ठा किया गया है वो सारा ब्लैकमनी ही माना जाना चाहिए और उसे राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किया जाए !
        महोदय !भ्रष्टाचारियों का तब तक बाल भी बाँका नहीं होगा जब तक भ्रष्टनेताओं ,भ्रष्टअधिकारियों और भ्रष्टसरकारी कर्मचारियों की संचित संपत्तियों की जाँच नहीं की जाती !चुनाव जीतने के बाद जिस नेता के पास जितनी संपत्ति बढ़ी या बनी है इसी प्रकार से नौकरी लगने के बाद जिस अधिकारी कर्मचारी के पास जो संपत्ति बढ़ी और बनी है वो सारी जाँच के दायरे में लाई जाए !राजनीति में जब वे आए थे तब उनके पास चल अचल संपत्ति कितनी थी और आज कितनी है संपत्ति !इसकी जाँच तो होनी चाहिए ।
    

Thursday, 8 December 2016

नोटबंदी यदि मोदी सरकार में न हुई होती तो ब्राह्मणों सवर्णों को सबसे बाद में दिए जाते दो हजार के नए नोट !

     काली पट्टियाँ बाँधने वालों को नोटबंदी से इसीलिए तो लग रही हैं टट्टियाँ !कि उन्हें नोटबंदी जैसे बड़े अभियान को अल्पसंख्यकों दलितों पिछड़ों आदि की चासनी में डुबोने का मौका नहीं मिला !आज वो जनता की हमदर्दी के लिए नोटबंदी का विरोध कर रहे हैं या अपने काले बोरे  सफेद करने के लिए ? 
  ब्राह्मणों सवर्णों के विषय में कोई पूछता तो ये लोग लोग कह देते कि तुमने अल्पसंख्यकों और दलितों का शोषण किया था इसलिए भोगो ! 
    इन बेशर्मों ने हिंदुओं ब्राह्मणों सवर्णों पर शोषण के झूठे आरोप लगा लगाकर हमेंशा सताया है अपमानित किया है और सजा दी है !यहाँ तक कि सफाई देने का भी मौका नहीं दिया और सजा सुना दी !हिंदुओं और सवर्णों के साथ हमेंशा सौतेला व्यवहार करते रहे हैं वो !जो आज काली पट्टियाँ बाँधे घूम रहे हैं उन्हें आखिर आज क्यों लग रही हैं लग रही हैं टट्टियाँ !केवल इसीलिए न कि उन्हें नोटबंदी जैसे बड़े अभियान को अल्पसंख्यकों दलितों पिछड़ों आदि की चासनी में डुबोने का मौका नहीं दिया गया !आज वो जनता की हमदर्दी के लिए नोटबंदी का विरोध कर रहे हैं या अपने काले बोरे  सफेद करने के लिए ? जनता से यदि इतनी ही हमदर्दी थी तो नसबंदी और आपात काल जैसे अपने दुष्कर्मों को भूल गए क्या ?
    मोदी सरकार ने स्वतन्त्र भारत के इतिहास में ब्राह्मण आदि सवर्णों को पहली बार दिया है बराबरी का हक़ !नोटबंदी अभियान में सभी जातियों और सभी सम्प्रदायों के साथ किया है बराबरी का व्यवहार !
     देश वासियों ने ऐसे ऐसे खूसट प्रधानमन्त्री देखे  हैं जो कहा करते थे कि देश के संसाधनों पर पहला अधिकार अमुक जाति या अमुक संप्रदाय वालों का है !देश के शासकों की जबान से ऐसे गंदे शब्द भी सुने और सहे हैं देश वासियों ने दूसरी जाति और सम्प्रदाय वाले लोग अपना मन मसोस कर रह जाते थे!"एक खाए दूसरा देखे"कुछ जातियों और कुछ सम्प्रदायों के साथ इतना घटिहा व्यवहार किया करते थे पापी !मोदी सरकार में सबसे बड़ा संतोष इस बात का है कि जो होगा वो सबके साथ होगा !अन्यथा राजनैतिक राक्षसों ने सभी सुविधाओं और सभी कानूनों में जातियाँ सम्प्रदाय घुसा रखे थे ! 
   नोटबंदी की कमान भी यदि उन  पापियों के हाथ होती तो उन्होंने यहाँ भी ब्राह्मण आदि सवर्णों को सबसे पीछे धकेल रखा होता !सवर्णों को अभी तक देखने को न मिला होता दो हजार का नोट !
     ये ऐसे लागू करते कि सबसे पहले कैस अल्प  संख्यकों को मिलेगा !दूसरा कहता कि दलितों को मिलेगा तीसरा बोलता कि पिछड़ों को मिलेगा चौथा कहता कि महिलाओं को मिलेगा किंतु ब्राह्मणों और सवर्णों को कब मिलेगा !ये पूछने की कोई हिम्मत भी नहीं करता !तब तक अपने कालेधन के बोरे बदल लेते ये नेता लोग ! बेचारों को आज काली पट्टियाँ बाँधे नहीं  घूमना पड़ता आज !मोदी सरकार के विरुद्ध हाहाकार इसीलिए मचाते फिर रहे हैं ये बेरोजगार नेता  लोग क्योंकि इस सरकार ने इस अभियान में सवर्णों को बराबरी का हक़ दे कैसे दिया ! 
      आजकल संसद रोकने वालों के बीत रहे हैं कालेदिन !काले को सफेद करवाने की जुगत भिड़ा रहे हैं विपक्षी नेतालोग !कालेधन पर की गई कार्यवाही कसक रही है कालेधन वाले नेताओं को !
     यही योजना यदि भ्रष्टाचारी नेताओं की सरकारों में बनाई गई होती तो इन्होंने इसे जाती और धर्म   अधिक उलझा  दिया होता कि जनता उसी में भ्रमित हो जाती और उसी गैप में काले नेताओं ने अपने अपने काले बोरे सफेद कर लिए होते !    
    ये सरकार ईमानदार है तो काले धन वाले नेताओं पर भी की जाए कठोर कार्यवाही !ये बात सबको पता है कि अपना अपना कालाधन सफेद करवाने के लिए काली पट्टियाँ बाँधे घूम रहे हैं कालेधन को पसंद करने वाले नेता लोग!इसमें जनता की हमदर्दी नहीं अपितु सबके अपने अपने स्वार्थ हैं !
     सरकार पर दबाव केवल इसलिए बनाया जा रहा है ताकि उनका कालाधन बचा लिया जाए यदि सरकार झुकी तो सरकार पक्षपाती और नेताओं की भी चल अचल संपत्तियों की जाँच करवाकर ब्यौरा जनता के सामने रखा गया तो ईमानदार सरकार !
        काले धन का समर्थन करने वाले नेताओं की संचित संपत्तियों की जाँच करावे सरकार कि जब  नेता जी राजनीति में आए थे तब उन लोगों के पास क्या था अर्थात कितने मकान दूकान खेत खलिहान फैक्ट्री बैंक बैलेंस आदि तब थे और आज कितने हैं ये तो सारा विवरण सरकारी कागजों में उपलब्ध होगा !फिर सार्वजनिक क्यों न किया जाए !साथ ही ये भी पता लगाया जाए कि राजनीति में आने के बाद इन नेताओं के आय के स्रोत क्या क्या थे इन्होंने नौकरी की या व्यापार किया यदि किया तो कब किया इनके पास इतना समय और इतना धन कहाँ था !प्रायः सामान्य परिवारों में अवतरित होने वाले नेताओं के पास अचानक करोड़ों अरबों के अम्बार कैसे लग जाते हैं इन सभी बातों की न केवल जाँच हो अपितु सबकुछ सार्वजनिक भी किया जाए !    
    भ्रष्टाचार पर प्रहार करने में पक्षपात न करे सरकार !
 भ्रष्ट बाबाओं और भ्रष्ट नेताओं का पैसा गरीबों में बाँट दिया जाए वो सारा कालाधन ही तो है !
       भ्रष्ट बाबाओं  और भ्रष्ट नेताओं के काले धन पर भी हो कार्यवाही ये कुछ वर्षों में ही हजारों करोड़ के मालिक कैसे बन जाते हैं जनता को बरगलाकर या झूठे सपने दिखाकर या झूठे विज्ञापन दिखा दिखाकर  समाज से ऐंठा गया पैसा होता है जो अपने परिश्रम से कमाया हुआ न होकर अपितु छल प्रपंच पूर्वक संग्रह किए जाने के कारण ये संपूर्ण पैसा ही कालेधन की श्रेणी में आता है !,सरकारी कर्मचारियों एवं भूमाफियाओं के कालेधन पर भी की जाए कार्यवाही ?   
     गंगानदी  भगवान के चरणों से निकलती है और भ्रष्टाचार की नदी भ्रष्टनेताओं, भ्रष्टअधिकारियों एवं भ्रष्टबाबाओं तथा भ्रष्टसरकारी कर्मचारियों के आचरणों से निकलती है !इसीलिए इनकी संपत्तियों एवं आयस्रोतों की जाँच के बिना भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए की गई सारी कसरतें बेकार हैं ।see more....http://sahjchintan.blogspot.in/2016/11/1000-500.html
 भ्रष्ट सरकारी कुकर्मचारियों ने ऐसे लूटा है देश !
   इनकी भी संपत्तियों की जाँच की जाए और मांगे जाएँ इनसे भी सम्पतियों के स्रोतों के प्रमाण !सरकारी कर्मचारियों को जिस दिन नौकरी मिली थी तब से आज तक की उनकी चल अचल संपत्तियों की जाँच की जाए उनका मिलान उनकी सैलरी से किया जाए जिनका मिलान न हो सके उनसे पूछे जाएँ आय स्रोत बता पावें तो ठीक न बता पावें तो उनकी संपत्तियों को भी घोषित किया जाए सरकारी संपत्ति !कार्यवाही हो तो सब पर हो ! 
मध्य प्रदेश के लोकायुक्त पुलिस की छापेमारी में पीडब्ल्यूडी अफसर की बेहिसाब संपत्ति का खुलासा !
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बैंककर्मियों के भ्रष्टाचार को भी पकड़े  सरकार !जाँच हो तो सबकी हो !  बैंककर्मियों के भ्रष्टाचार को पकड़ने का ऐसा मौका दोबारा फिर कभी नहीं मिलेगा जितना अभी है सरकार यदि वास्तव में भ्रष्टाचार मिटाना ही चाहती है तो नोटबंदी के समय के बैंकों के अंदर के वीडियो खँगाले जाएँ और लापरवाह एवं भ्रष्ट लोगों पर लिया जाए शक्त निर्णय !इधर सरकार काले धन वालों के विरुद्ध भाषण देती रही उधर बैंक कर्मी काले धन वालों को उपलब्ध करते रहे सफेद करने की सुविधाएं -जनता बेचारी लाइनों में खड़ी भोगती रही सरकार की बातों पर भरोसा करने का फल !seemore.... http://sahjchintan.blogspot.in/2016/12/blog-post.html

 बाबाओं की संपत्तियों का सच भी तो जनता के सामने लाया जाए !
      बंधुओ ! दस पंद्रह बीस वर्षों में न्याय और नैतिकता पूर्वक हजारों करोड़ कैसे कमाए जा सकते हैं वो भी कोई निर्धन बाबा ऐसा कैसे कर सकता है और यदि उसके लिए ऐसा कर पाना वास्तव में संभव है तो गरीबों को भी ऐसी ही बाबा गिरी की ट्रेनिंग क्यों न दिलाई जाए और बिना पैसे लगाए ही हजारों करोड़ का व्यापारी उन्हें भी बना दिया जाए !जिसे व्यापार करना हो वो व्यापार करे किंतु व्यापार करने हेतु फंड जुटाने के लिए साधू संतों जैसी वेषभूषा बनाकर धार्मिक भावुक लोगों से पहले फंड जुटाया जाए और खुद पूंजीपति बन जाए ये धोखा धड़ी नहीं तो क्या है !जिनसे कालाधन माँग माँग कर खुद को तो पवित्र पूँजीपति सिद्ध कर लिया जाए और उन्हें कालाधन वाला बताकर उनके विरुद्ध आंदोलन चलाया जाए ये "चोर मचावे शोर" नहीं तो और क्या है !वैसे भी जो एक गिलास गाय का दूध पीकर रह लेता होगा वह सरकारी नेताओं के यहाँ चमचागिरी करता क्यों घूमेंगा !दूसरी बात जो स्वदेशी सामानों का इतना ही बड़ा समर्थक होगा वो खुद विदेशी मशीनों से दवाइयाँ क्यों बनाएगा !तीसरी बात जिसे भारत पर इतना ही स्वाभिमान होगा वो  विदेशों में मारा  मारा  क्यों फिरेगा !चौही बात संन्यास लेने का मतलब सब कुछ छोड़ना होता है सबकुछ छोड़ने की घोषणा करने वाले पर लोग भरोसा करने लगते हैं और उसे बहुत कुछ दे देते हैं किंतु उसे वो यदि गृहस्थों की तरह भोगने लगता है जैसे कोई ब्रह्मचर्य की घोषणा करके लड़कियों के हॉस्टल में रहने लगे और अपनी घोषणा के विरुद्ध आचरण करने लगे इसे धोखाधड़ी नहीं तो क्या कहेंगे !ऐसे अविश्वसनीय लोगों की भारी भरकम संपत्तियों के स्रोतों पर संशय होना स्वाभाविक है आखिर उनकी पवित्रता की जाँच क्यों नहीं कराई जानी चाहिए !see more ....http://samayvigyan.blogspot.in/2016/11/blog-post_28.html
टैक्स लेती है सरकार !भ्रष्टाचार के लिए भी वही जिम्मेदार ! "जो सैलरी लें वही घूस माँगें" ये हिम्मत !  ये सरकारी लापरवाहियों के कारण ही तो हो पाता है तभी तो  सरकार और सरकारी कर्मचारियों ने फैला रखा है भ्रष्टाचार !इसमें आम जनता का क्या दोष !सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती  अस्पतालों में दवाई नहीं होती डाक खाने में सुनवाई नहीं होती टेलीफोन विभाग में समय से ध्यान नहीं दिया जाता तभी तो जनता प्राइवेट स्कूलों अस्पतालों कैरियरों और टेलीफ़ोन कंपनियों में चक्कर लगाया करती है सरकारी लोग भी सैलरी सरकारी और सेवाएँ प्राइवेट की ही लेना पसंद करे हैं क्यों ?सरकारी सेवाएँ विश्वास करने लायक हैं  ही नहीं फिर भी ग़रीबों ग्रामीणों मजदूरों को सरकारी सेवाएँ प्रदान करने के लिए फार्मिलिटी अदा करती जा रही है सरकार !इसे धोखा धड़ी नहीं तो क्या कहा जाए !सरकार को चाहिए कि नोटबंदी की तरह ही एक एक विभाग के कर्मचारियों को एक रात में सेवा मुक्त कर दे और दो दिन बाद  नवयुक्तियों के लिए खुली परीक्षा करा दे जिसमें शिक्षित हर कोई बैठ सकता हो और परीक्षाएँ जो पास कर ले सो सेवाएँ दे जो फेल हो सो घर बैठे !सोर्स और भ्रष्टाचार के बलपर हुई नियुक्तियों के गलत निर्णयों को सुधारा आखिर कैसे जाए ! सरकारी विभागों से जनता को निराश कर रखा है इस भरोसे को वापस लाने में दशकों लग जाएँगे !see more.... http://sahjchintan.blogspot.in/2016/12/blog-post_3.html

Wednesday, 7 December 2016

संसद की कारवाही रोकना इतना जरूरी होता है क्या ? आखिर चर्चा से क्यों नहीं निकाले जा सकते हैं समाधान !

    नेताओं के मन में जनता की और जनता के धन की औकात ही क्या होती है ये परखिए उनके आचार विचार और व्यवहार से !
      नेता लोग आम जनता को यदि अपनी पार्टी का कोई बड़ा पद देने या चुनावी टिकट देने लायक ही नहीं समझते हैं  तो जनता उन्हें वोट देने लायक क्यों समझे !आखिर जनता की ही मजबूरी है क्या कि वो ऐसे नेताओं को वोट दे और चुनाव जितवावे !
        नेता लोग प्रायः राजनैतिक पार्टियों के पद अपने बेटा बेटी बहू बहन भांजे भतीजे भाई आदि को दे देते हैं फिर भी कुछ पद या टिकट आदि अगर बच जाते हैं तो पैसे वालों से पैसे लेकर उन्हें बेच देते हैं कुछ बचा कर रख लेते हैं उन लोगों को देने के लिए जो प्रसिद्ध अभिनेता खिलाड़ी या देखने में अच्छे लगने वाली सुंदरी स्त्रियाँ और सुंदर पुरुषों को देते हैं जिनके सदन में उपस्थित रहने की उम्मीदें ही प्रायः बहुत कम होती हैं तो वो जनता के मुद्दे क्या उठाएँगे और चर्चा क्या करेंगे !
 नेताओं को अपने चेहरों से उनके चेहरे अच्छे लगते हैं इसलिए उन्हें देनी पड़ती है टिकट !वो भी केवल चेहरा ही दिखाने कभी  कभी  चले आया करते हैं बस !बाकी  राजनैतिक पार्टियों के मालिकों के पास आम आदमी के लिए आश्वासन देने या झूठे वायदे करने के अलावा और बचता  ही क्या है ! 
    संसद की कार्यवाही चलाने में जनता की गाढ़ी कमाई की भारी भरकम धनराशि खर्च होती है ये सबको पता है यदि उसके प्रति राजनैतिक पार्टियों के मालिक नेता लोग थोड़ी भी जिम्मेदारी समझते हों तो ऐसे लोगों को चुनावी टिकटें ही न दें जो संसद में चर्चा करने और  समझने की योग्यता न रखते हों !जो शिक्षित शालीन योग्य अनुभवी आदि न हों !बोलने ,समझने और समझाने की योग्यता न रखते हों !
     जिन्हें सदन की चर्चा छोड़ छोड़ कर समय पास करने के लिए बार बार बाहर जाना पड़ता हो !घंटों कुर्सियाँ खाली पड़ी रहती हों,या सदन में ही बैठकर मोबाईल पर वीडियो देख देखकर समय पास किया करते हों या केवल हुल्लड़ मचाते समय या उपद्रव करने के लिए ही सदन में उपस्थित होते हों !ऐसे चर्चा में भाग न ले सकने योग्य लोगों को चुनावी टिकट देती ही क्यों हैं राजनैतिक पार्टियाँ !  
   नेता लोग  लोग कितनी गिरी नज़रों से देखते हैं आम आदमी को !
  आम जनता का कोई व्यक्ति शिक्षित समझदार कर्मठ योग्य ईमानदार आदि कैसा भी क्यों न हो किंतु उसकी उपेक्षा करके अपने बेटा बेटी बहन भांजा भतीजा भाई आदि अपने ही घर खानदान वालों या नाते रिस्तेदारों को देते हैं पार्टी के पद और चुनाव लड़ने की टिकट !जो जनता को इतनी गिरी नजर से देखते हैं उन्हें आम आदमी वोट क्यों दे !             
    राजनैतिक पार्टियों के मालिक नेता लोग अपने कार्यकर्ताओं को उन दिहाड़ी मजदूरों की तरह पार्टियों में रखते हैं जिनमें योग्यता न हो अनुभव न हो निर्णय लेने की क्षमता न हो ऐसे राजनैतिक दीन हीन बेचारगी भरे लोग जब तक अपनी पार्टी के मालिक के इशारे पर सदनों में शोर मचाया करते हैं पार्टी मालिकों की इच्छानुसार संसद की कारवाही रोकने में हुल्लड़ मचा  मचा कर मदद करते हैं और समाज में घूम घूम कर पार्टियों के मालिकों के गुण  गाया करते हैं तब तक तो ठीक हैं और जैसे ही ऐसा करना बंद कर देते हैं वैसे ही उन्हें कभी भी निकाल बाहर किया जा सकता है तो वो पार्टी मालिकों के लिए कभी कोई खतरा नहीं बनने  पाते हैं !क्योंकि उनका अपना कोई जनाधार ही नहीं होता है ।
    संसद जैसे सदनों की कार्यवाही चलाने में जनता के खून पसीने की गाढ़ी कमाई से भारी भरकम धन राशि खर्च की जाती है किंतु चर्चा केवल इसलिए नहीं हो पाती कि शिक्षा योग्यता अनुभव सहनशीलता एवं दूसरे सदस्यों की बात समझ पाने एवं अपनी बात समझा  पाने की क्षमता के अभाव के कारण सत्ता पक्ष के निर्णयों का विपक्ष हमेंशा विरोध ही करता रहता है !केवल सांसदों की सैलरी एवं सुख सुविधा बढ़ाने में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेता है विपक्ष !उस दिन सदनों में ऐसी शांति पूर्ण कार्यवाही चल रही होती है जैसे कोई पूजा पाठ आदि चल रहा हो !किंतु जब जनहित के निर्णय लेने होते हैं तब लड़ झगड़ कर काम नहीं होने देते हैं ये लोग !जनता की कमाई से चलने वाली कार्यवाही में जनता के ही कामों में रोड़ा लगाया करते हैं ये लोग !ये कहाँ तक न्यायोचित है !
   नेताओं की गतिविधियाँ देखकर लगता है कि संसद की कार्यवाही केवल इसलिए है कि जनता को अपने विपक्षी होने का एहसास करवा सकें और सत्ता पक्ष अपने सत्ता स्वामी होने का एहसास करवा सके !बस !!
    

Tuesday, 6 December 2016

नेताओं के मरने पर जनता कितना भी रोवे किंतु लोगों के मरने पर तो नेताओं के दो आँसू भी नहीं निकलते !

      जनता मरे तो नेता सोचते हैं कि चलो कुछ वोट ही तो कम हुए हैं ! ऐसे निष्ठुर नेताओं के भरोसे जी रहे हैं हम लोग !न जाने क्यों आधुनिक नेताओं में जनता के  प्रति संवेदनाएँ नहीं होती हैं क्या इनके हृदय नहीं होते हैं !आखिर क्यों इतने कठोर होते चले जा रहे हैं हमारे नेता लोग !
    अपने चाहने वालों के प्रति तो हिंसक जीव जंतु भी बहुत  प्रेम पूर्वक वर्ताव करते देखे जाते हैं किंतु नेताओं के मन में आम जनता के प्रति वैसी भी भावनाएँ नहीं होती हैं क्यों ? वो जनता को मात्र एक वोट समझते हैं जनता के प्रति इतनी गिरी सोच !सच ही कहा गया है कि नेताओं के साथ कोई कितना भी अच्छा व्यवहार क्यों न करले किंतु नेता कभी किसी के सगे नहीं हो सकते !
     अभी नोटबंदी को ही लें कितने लोग मरे हैं किंतु किसी नेता ने किसी की सुध ली क्या ? उनके घर जाना तो दूर किसी ने फोन करके भी पूछा है क्या उन परिवारों का हाल जिनके परिजन नोटबंदी के महान संग्राम में शहीद हुए हैं !
       सत्ता पक्ष ही नहीं जनता की परेशानियों पर हमदर्दी दिखाने के लिए संसद में उपद्रव उठाने वाला विपक्ष या उसके नेता  ही गए हैं क्या किसी नोटबंदी संग्राम में शहीद हुए व्यक्ति के घर !हमदर्दी होती तब तो जाते !केवल संसद नहीं चलने देते हैं बस किंतु इसमें जनता की हमदर्दी क्या है !ये तो विपक्ष की कमजोरी है उसे अपने विचार रखने नहीं आते वो गूँगे लोग सरकार को अपनी बात नहीं समझा पाते क्योंकि चर्चा करने के लिए शिक्षा समझ अनुभव आदि बहुत कुछ चाहिए होता है किंतु जिसके पास कोई भी योग्यता न हो वो हुड़दंग करके संसद को रोक लेते हैं यही उनकी प्रतिभा का प्रदर्शन है ! संसद रोकने के आलावा उन्हें कुछ आता ही नहीं है वो तो  केवल सरकार की बुराई करना और सुनना चाहते हैं बस ! इसके लिए वो JNU ,दादरी या हैदर बाद कहाँ कहाँ नहीं मारे मारे फिरते हैं !बाकी जनता के दुःख दर्द से विपक्ष का क्या लेना देना !वो तो जनता को हमदर्दी दिखाने के लिए करता है  सारे उपद्रव !जो सरकार  को गाली दे उसके साथ खड़ा हो जाता है विपक्ष !बारे लोकतंत्र !बारी  स्वस्थ लोकतंत्र की खूबसूरती !
        जनता के दरवाजे कोई नेता नहीं जाएगा यह पूछने कि आपने खाया है या नहीं किन्तु उस व्यक्ति की मौत का राजनैतिक लाभ लेने के लिए कैसे कैसे हथकंडे अपनाते हैं निष्ठुर नेता लोग !इनके हृदय में जनता के प्रति दया भावना होती ही नहीं है बिलकुल इसीलिए करते हैं जनता के साथ इतना घटिहा  व्यवहार !तभी तो नेताओं की मृत्यु पर भारी भरकम शोक और तमाम शोक संदेश किन्तु आम जनता मरे तो... !गूँगे बहरे हो जाते हैं यही नेता लोग !मानो !आम जनता मरे तो मरे कोई नेता क्या करे किंतु नेताओं की मृत्यु पर भारी भरकम शोक !
         इतना ही नहीं वैसे भी नेताओं के मन में जनता की औकात क्या होती है ये उनके हर आचार व्यवहार में झलक ही जाती है । 
       बंधुओ !नेता लोग जब जनता को अपनी पार्टी का कोई पद या चुनावी टिकट देने लायक नहीं समझते तो जनता उन्हें वोट देने लायक क्यों समझे !आखिर जनता की ही मजबूरी क्या है कि वो ऐसे नेताओं को वोट दे और चुनाव जितवावे !
        नेता लोग राजनैतिक पार्टियों के पद अपने बेटा बेटी बहू बहन भांजे भतीजे भाई आदि को दे देते हैं फिर भी कुछ पद या टिकट आदि अगर बच जाते हैं तो पैसे वालों से पैसे लेकर उन्हें बेच देते हैं कुछ बचा कर रख लेते हैं उन लोगों को देने के लिए जो प्रसिद्ध अभिनेता खिलाड़ी या देखने में अच्छे लगने वाली सुंदरी स्त्रियाँ और सुंदर पुरुषों हों !उनको दे देते हैं है फिर आम आदमी को आश्वासन देने या झूठे वायदे करने के अलावा उनके पास बचत ही क्या है !ये लोग कितनी गिरी नज़रों से देखते हैं आम आदमी को !इसका अंदाज आप इसी  लगाइए कि शिक्षित समझदार कर्मठ योग्य ईमानदार लोगों की उपेक्षा करके केवल अपने बेटा बेटी बहन भांजा भतीजा भाई आदि अपने ही घर खानदान वालों या नाते रिस्तेदारों को देते हैं पार्टी के पद और चुनाव लड़ने की टिकट !जो जनता को इतनी गिरी नजर से देखते हैं उन्हें आम आदमी वोट क्यों दे !


Monday, 5 December 2016

संसद की कार्यवाही अक्सर रोक दी जाती है क्यों ? संसद चर्चा का मंच है तो चर्चा कीजिए !

    राजनैतिकदलों में किन्नरों जैसा उपेक्षित जीवन बिता रहे हैं कई शिक्षित,समझदार अनुभवी एवं जीवंत नेता लोग !
    अयोग्य लोग सदनों में जाकर वहाँ की कार्यवाही रोक ही सकते हैं चलाना तो उनके बश का होता नहीं है कार्यवाही चलाने अर्थात चर्चा के लिए जो शिक्षा समझ अनुभव चाहिए वो उनके पास होता नहीं है और दूसरों के अच्छे विचारों को मानने एवं अपने विचारों को विनम्रता पूर्वक औरों को मना लेने की प्रतिभा नहीं होती है वो बेचारे ज्ञानदुर्बल लोग चर्चा कैसे करें !सदनों में चर्चा करना आसान होता है क्या ?
       जिस राजनीति में शिक्षा की अनिवार्यता न हो समझ सदाचरण एवं अनुभव का महत्त्व ही न हो केवल अपनों को या पैसे वालों को या प्रसिद्ध लोगों को पद प्रतिष्ठा एवं चुनावी टिकट बाँटे जाने लगे हों वो संसद में आवें या न आवें ! चर्चा करने और समझने की योग्यता रखते हों या न रखते हों वो कुर्सियों पर बैठ के सोवें या समय पास करने के लिए बाहर चले जाएँ या संसद की कार्यवाही के समय ही अपने मोबाईल पर वीडियो देखने लगें या अपने पार्टी मालिकों का आदेश पाकर हुल्लड़ मचाने लगें !किंतु संसद में चर्चा करने और समझने की योग्यता यदि उनमें नहीं है तो वो संसद की चर्चा में सहभागी कैसे बनें !ऐसे लोगों को पद - प्रतिष्ठा एवं चुनावी टिकट प्रदान करने वालों को ही दोषी क्यों न माना जाए !
      संसद चलने का मतलब होता ही है विचारों का आदान प्रदान ! किंतु विचारशून्य लोग संसद चलने क्यों दें  इसके लिए शिक्षा जरूरी है । आजकल तो नेता बनने के लिए प्रसिद्ध होना जरूरी है भले ही वह प्रसिद्धि कितने भी कुकर्मों से ही क्यों न मिली हो ! नेता लोग अपने घर ख़ानदान वालों नाते रिस्तेदारों के अलावा पद प्रतिष्ठा एवं चुनावी टिकटों का हकदार केवल उन्हें मानते हैं जो चुनावी टिकट खरीद सकते हों या अच्छे बुरे कैसे भी कामों से प्रसिद्ध हो चुके हों भले वो बदनाम ही क्यों न हों !
             लोकतंत्र की टाँगें सहलाने का दंभ भरने वाले राजनैतिक पार्टियों के मालिक निर्लज्ज नेतालोग उन योग्य और समाज साधकों की उपेक्षा करके या यूँ कहें कि उनका हक़ मार कर अपने उन बेटा बेटी बहू बहन भांजों  भतीजों आदि को पद प्रतिष्ठा एवं चुनावी टिकट देते हैं जिन्हें राजनीति का कुछ भी पता ही नहीं होता है !तालियाँ बजवाने नारे लगाने रैलियाँ निकालने के लिए होते हैं कार्यकर्ता किंतु पद प्रतिष्ठा पाने और चुनावी टिकट पाने के लिए होते हैं  वे स्पेशल लोग जिनपर पार्टी मालिकों की कृपा होती है या वो पैसे देते हैं या फिर प्रसिद्ध होते हैं या फिर पार्टी मालिकों के अपने बेटा बेटी बहू भांजे भतीजे आदि पार्टी मालिकों के बिलकुल अपने लोग !
     दूसरी ओर  समाज को बदलने की क्षमता रखने वाले कई बहुमूल्य राजनेतालोग राजनैतिक पार्टियों में केवल तालियाँ बजाने बधाइयाँ गाने एवं नेग न्योछावर माँगने के लिए रखे गए हैं !ऐसे लोगों से पार्टियों के अंदर न कोई कुछ पूछता है न बताता है न कहीं बुलाता है किंतु ये राजनैतिक बेरोजगार लोग पार्टी कार्यक्रमों में स्वयं ही जाया आया पूछा बताया करते हैं !ये ऐसे ऐसे दो दो कौड़ी के भ्रष्टाचारियों की चाटुकारिता करते देखे जाते हैं जिनमें न शिक्षा न सदाचरण और न ही समाज सेवा की भावना ही होती है जिन्हें जीवन भर पढ़ा सिखा  समझा सकते हैं वो समझदार लोग !
भ्रष्टनेताओं के हिसाब से देखा जाए तो संसद में हुल्लड़ मचाने के लिए शिक्षा एवं समझदारी की जरूरत पड़ती ही कहाँ है !इसलिए सदाचारी नेता बेरोजगार हैं और भ्रष्टाचारियों के आँगन की बहार हैं !ये राजनीतिक का पतन नहीं तो क्या कहा जाएगा !
    संसद चर्चा का मंच है किंतु जो अशिक्षित लोग न समझ सकते हों न समझा सकते हों वे हुल्लड़ न मचावें तो करें क्या ?वे गूँगेनेता बेचारे खुद कुछ बोल नहीं सकते और जो बोल रहे होते हैं उनकी समझ नहीं सकते वो तो दिहाड़ी मजदूरों की तरह अपने अपने पार्टी मालिकों का मुख ताका करते हैं उनका इशारा मिलते ही अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने लगते हैं पार्टियों में सबके काम अलग अलग बँटे होते हैं कि किसको कौन कैसी गालियाँ देगा कौन कितनी देर चीखे चिल्लाएगा !कौन बंदरों की तरह उछलकूद करके  गैलरी में आ जाएगा या कौन कागज फाड़ कर किसी सम्मानित पदाधिकारी पर फ़ेंक देगा कौन किसे कैसे अपमानित करेगा आदि आदि !    
      ईमानदार लोग पार्टी अनुशासन के कैद खाने में पड़े पड़े बेचारे बुढ़ापे की प्रतीक्षा में अपने बहुमूल्य जीवन को घुट घुट कर बिताने के लिए मजबूर होते हैं !दूसरी ओर अशिक्षित अयोग्य अनुभव विहीन असंस्कारित लोगों को पार्टियों के पद प्रतिष्ठा एवं चुनावी टिकट दिए जा रहे होते हैं । वे जीत कर जब सदनों में पहुँचते हैं तब चीखते चिल्लाते हुल्लड़ मचाते अपशब्द बकते कागज फाड़ फाड़ कर फेंकते हैं !पार्टी मालिकों के बँधुआ मजदूरों की तरह उनका इशारा पाते ही बंदरों की तरह उछल कूद शुरूकर देते हैं सदनों के योग्य से योग्य लोगों का अपमान करने में उन्हें कोई हिचक नहीं होती यहाँ तक कि पीठासीन अधिकारियों के अनुशासन आदेश आदि की भी वेपरवाह नहीं करते हैं वो लोग !अपनी पार्टी के सर्वोच्च ठेकेदार का इशारा मिले बिना वे शांत होते ही नहीं हैं !
     बंधुओ !किसी राजनैतिक पार्टी में किन्नर बनकर रहने से अच्छा है कि आप जनसेवा व्रती बनें और अपनी जीवंतता सिद्ध करें ! 
            बंधुओ ! सभी भाई बहनों से निवेदन है कि यदि आप राजनैतिक पार्टियों जुड़कर देश सेवा करना चाहते हैं उसके लिए आप किसी राजनैतिक पार्टी से जुड़े भी हैं किंतु वो पार्टी और उसके नेता आपको इतनी गिरी निगाह से देखते हैं कि  वो पार्टी संगठन के सभी पद और सरकार बनने के बाद सरकार के सभी पद वो खुद ले लेते हैं या अपने घर खानदान वाले या नाते रिश्तेदारों ,परिचितों या पैसे वालों को दे देते हैं या फिर पैसे लेकर बेच देते हैं !और आपको केवलवोट और वोटमाँगने वाला मात्र बनाकर रखना चाहते हैं और आपको पार्टी से केवल इसलिए जोड़े रखना चाहते हैं ताकि आप जैसे लोग उनका आदेश पाते ही उनके लिए भौंकने लगें जिससे उनका रूतबा कायम हो,उनकी प्रतिष्ठा बढ़े वो चुनाव जीतें  उन्हें महत्व मिले वो पद पावें और वो सब कुछ बनते रहें और आप उनके बनने खुशियाँ मनाते एवं जगह जगह उनका स्वागत करते घूमते रहें !क्या आप भी अपने को इतनी गिरी हुई निगाहों से देखते हैं यदि हम तो क्यों उनके पीछे पीछे घूमें ?
     ऐसे राजनैतिक पार्टियों के मालिक या नेता लोग आम समाज को यदि इतनी गिरी निगाह से देखते हैं कि उन्हें कोई पद प्रतिष्ठा देने लायक ही नहीं समझते हैं तो आम समाज को भी चाहिए कि वो उसी शैली में ऐसे घमंडी नेताओं और राजनैतिक पार्टियों को अपना भी परिचय दें !

    आप भी ऐसे नेताओं और पार्टियों का बहिष्कार करें  जो आप से कम पढ़े लिखे ,आपसे कम प्रतिभा संपन्न, आप से कम काम करने वाले ,आप से कम चरित्रवान, आप से कम अच्छा बोल लेने वाले ,नशा करने वाले, गाली गलौच करने वाले,गुंडा गर्दी करने वाले लोगों को पद प्रतिष्ठा और महत्त्व देने वाली पार्टियों से आप केवल बेइज्जती सहने के लिए जुड़े हैं क्या ?
     जहाँ आपका कोई मान सम्मान इज्जत प्रतिष्ठा ही न हो तो ऐसी पार्टी को आप तुरंत छोड़ कर शुरू कीजिए अपने निजी सामाजिक कार्य जीवंतता का परिचय दीजिए !यदि आपके अंदर वास्तव में क्षमता है तो आपके कामों से जनता खुश होगी अपने आप !ऐसे में आप किसी पार्टी के टिकट से चुनाव लड़ें या फिर निर्दलीय जनता आपको विजय अवश्य दिलवाएगी क्योंकि हार जीत जनता के वोटों से होती है न कि पार्टियों और नेताओं से !इसलिए आप अपनी प्रतिभा पहचानिए  पहचान बनाइए !