भाग्य से ज्यादा और समय से पहले किसी को न सफलता मिलती है और न ही सुख ! विवाह, विद्या ,मकान, दुकान ,व्यापार, परिवार, पद, प्रतिष्ठा,संतान आदि का सुख हर कोई अच्छा से अच्छा चाहता है किंतु मिलता उसे उतना ही है जितना उसके भाग्य में होता है और तभी मिलता है जब जो सुख मिलने का समय आता है अन्यथा कितना भी प्रयास करे सफलता नहीं मिलती है ! ऋतुएँ भी समय से ही फल देती हैं इसलिए अपने भाग्य और समय की सही जानकारी प्रत्येक व्यक्ति को रखनी चाहिए |एक बार अवश्य देखिए -http://www.drsnvajpayee.com/
Sunday, 11 January 2015
मोदी जी ! कई मामलों में U टर्न की खबरें क्यों आने लगी हैं !
नरेंद्र मोदी जी ! सब कुछ करना देशवासी यह समझकर सह जाएँगे कि अपने मोदी जी कर रहे हैं तो अच्छा ही होगा ! किन्तु इसकी इतनी सीमा जरूर बनाए रखना कि भारतीय जनता का आप पर बना विश्वास बचा रहे ! क्योंकि विश्वास टूटते ही आदमी केजरीवाल हो जाता है !यदि किसी मजबूरी से विश्वास बचते न दिखे तो देस वासियों को बता जरूर देना कि अब मैं विवश हूँ शायद तब भी आपके प्रिय देशवासी आपको क्षमा कर दें किन्तु विश्वास मत तोड़ देना जो आपके सारे जीवन की साधना है और देश वासियों की महान संपत्ति है !आपके प्रिय देशवासी कभी अगर यह सुनेंगे कि मोदी जी अपने मुद्दों से भटक गए हैं या बदल गए हैं या सत्ता लोलुप हो गए हैं तो सह नहीं पाएँगे !
इस विषय में " स्वामी अखंडानंद जी ने भक्ति सूत्र की टीका करते हुए लिखा है कि "किसी जंगल में एक पेड़ के नीचे एक व्यक्ति अपने मित्र की गोद में शिर रख कर सो रहा था इसी बीच एक सर्प उस सोते हुए व्यक्ति को काटने आया तो मित्र के मना करने पर सर्प ने कहा कि इसने पूर्व जन्म में मुझे मारा था इसलिए मैंने इसके गले का रक्त पीने की प्रतिज्ञा की है यदि आप इसके गले का रक्त हमें वैसे ही दे दें तो मैं इसे नहीं काटूँगा तो मित्र ने कहा कि ठीक है और उसने चाकू से हल्का सा कट मार कर सर्प को रक्त दे दिया सर्प चला गया किन्तु इससे वह सोता हुआ मित्र जाग गया देखा कि मित्र के हाथ में चाकू है और चाकू में खून लगा हुआ है उसने गले को काटा है उससे खून बह रहा है यह सब कुछ देख कर वह फिर सो गया तो जिसकी गोद में लेटा था उसे बड़ा आश्चर्य हुआ उसने पूछा तक नहीं कि क्या हुआ है !तो उसने अपने मित्र को फिर से जगाया और पूछा कि तुमने देखा कि तुम्हारा गला काटा गया है और मित्र के हाथ में चाकू है और चाकू में खून लगा हुआ है गले से खून बह रहा है यह सब कुछ देख कर भी तू सो गया क्यों ? तुझे कुछ पूछना नहीं चाहिए था क्या तो उसने हँसते हुए कहा कि मित्र यह सब कुछ तो डरावना था किन्तु चाकू मित्र के हाथ में था बस इसी विश्वास पर निश्चिन्त होकर दुबारा सो गया था कि मित्र से अनिष्ट नहीं हो सकता !"
मोदी जी !चुनावों के समय आपके मुख से जनता ने महँगाई को भगाने की बात सुनी है किन्तु अब रेल किराया बढ़ाने की बात !कुछ कीजिए और बचा लीजिए भाजपा पर किए गए जनता के भारी विश्वास को ,यही परीक्षा की घड़ी है जिसमें केजरीवाल जनता का विश्वास बचा पाने में असफल रहे जिसकी भरपाई वो आज तक नहीं कर सके हैं इसलिए दूसरे कई काम रोककर महँगाई पर शीघ्र नियंत्रण बहुत आवश्यक है ।
मोदी जी जरा सँभल के ! देश बड़ी आशा से आपकी ओर देख रहा है उस विश्वास को बचा कर रखना बहुत बहुत कठिन एवं बहुत जरूरी है !
आज विवादित बयान भाजपा के लोग दे रहे हैं जिन्हें शांतिपूर्ण ढंग से सरकार चलाने की जिम्मेदारी जनता ने सौंपी है इस समय जो भी विवाद बढ़ेगा माना कि पूर्ण बहुमत की सरकार है गिरेगी नहीं किन्तु हमें याद ये भी रखना चाहिए कि विवादित बयानों की तलाश में खाली बैठे विपक्ष को हर विवादित बयान अमृत जैसा लगता है जिसके सहारे वो सरकार का समय नष्ट करने में सफल हो जाता है !क्या भाजपा को भी इसकी चिंता नहीं होनी चाहिए !
मोदी सरकार बने 6 महीने बीत चुके हैं इस कार्यकाल के मात्र साढ़े चार वर्ष बचे हैं किंतु मेरी समझ में कोई काम अभी तक ऐसा नहीं हो पाया है जो सरकारी आंकड़ों से अलग जनता के जीवन को सरल कर सका हो ! डीजल तेल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय बाजार से गिरी हैं उसमें सरकार तटस्थ है किन्तु तेल की कीमतों के गिरने के साथ जिन अन्य वस्तुओं की कीमतें जिस तरह से गिरनी चाहिए वैसी नहीं गिर सकी हैं सरकार की भूमिका यहाँ ठीक नहीं है, सब्जियों का प्रमुख सीजन होने के कारण उनकी कीमतें घटनी स्वाभाविक ही हैं इससे मोदी सरकार को सँभलने का मौका मिल गया है यह है दूसरी बात जनता के मन में अभी भी U.P.A. के प्रति आक्रोश थमा नहीं है प्रदेशों में भाजपा की बढ़ती विजय का प्रमुख कारण वही है इसलिए अभी तक जनता भाजपा से हिसाब नहीं माँग रही है जब माँगेगी तो बाबा जी की सिक्योरिटी के आलावा ऐसा क्या बताया जाएगा जो जनता के जीवन से जुड़ा हो उसमे भी सिक्योरिटी केवल बाबा जी की ही क्यों ?उन्हें इनाम दिया गया है क्या जनता से वोट दिलाने का !आखिर भाजपा ऐसा क्यों समझ रही है कि बाबा जी की मोहर मारे बिना जनता उन पर भरोसा नहीं करती है !खैर,और अधिक क्या कहना किन्तु भाजपा को इतना तो सोचना ही होगा कि आम जनता को सरकारी आंकड़े समझ में नहीं आते हैं और न ही उसे अधिक दिनों तक भटकाया जा सकता है इसलिए भाजपा यदि सरकार महोत्सव मना चुकी हो तो अब उसे विजय खुमारी से बाहर निकल कर घुसना चाहिए सरकारी कार्यालयों में जहाँ कर्मचारियों की लापरवाही से त्रस्त जनता आज भी बाबुओं से गिड़गिड़ाकर अपना काम करने पर मजबूर है यही पहली सरकारों में हो रहा था तो बदल क्या है केवल बड़ी बड़ी बातें यही न ! भाजपा को ऐसी गलत फहमी क्यों है कि मनमोहन सिंह जी बोलते नहीं थे इसलिए जनता परेशान थी इसलिए हमें केवल बोलना ही चाहिए !यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि जनता जितना उनके न बोलने से परेशान थी कहीं उतना आपके अधिक बोलने से न हो जाए !अभी तक बोल बोलकर इतने वायदे किए गए हैं जिनका पूरा हो पाना कठिन ही नहीं असंभव भी है फिर भी यदि मान ही लिया जाए कि परिश्रम पूर्वक किए जा सकते हैं तो अच्छी बात है किंतु अभी तक सरकार के कार्यकाल का दशवाँ भाग बीत चुका है हालातों में कोई बदलाव नहीं है !आज भी सरकारी या निगम स्कूलों में बच्चों की भविष्य रचना पर किसी प्रकार की कोई हलचल नहीं है सरकारी चिकित्सा के क्षेत्र में भी पहले जैसी लापरवाही ही है ,डाक कर्मी उनके द्वारा हुए किसी नुक्सान की कम्प्लेन का जवाब तक देना जरूरी नहीं समझते क्यों जिम्मेदारी निभा रहे होंगे ये लोग!सरकारी फोन और इंटरनेट में जो हो जाए सो हो जाए किन्तु दूर संचार विभाग ही नहीं सरकार का हर विभाग पहले भी जिम्मेदारी मुक्त था आज भी है जिम्मेदारी किसी की नहीं है जो काम आराम आराम से हो जाए वो उसका भाग्य !बलात्कार पहले भी हो रहे थे आज भी हो रहे हैं !कुल मिलाकर देश की जनता को ये लगता ही नहीं है कि जिन सरकारी कर्मचारियों पर जनता का काम करने की जिम्मेदारी छोड़ी गई है उन्हें बेतन भी दिया जाता होगा क्योंकि काम करने का उनमें उत्साह नहीं होता है इसी उत्साह को भरने के लिए जनता धन दिखाती है जिसे देखते ही वो लहलहा उठते हैं किन्तु जिनके पास इन्हें देने को धन नहीं है वो क्या करें और इनसे कैसे कराएँ अपने जरूरी काम ?घुस का रिवाज सरकार की अकर्मण्यता से प्रारम्भ हुआ है !
मैंने सुना है कि विभिन्न आफिसों में यदि सरकार के जिम्मेदार लोग पहुंचते भी हैं तो केवल फोटो खिंचवा कर फेस बुक पर डालने के लिए उन्हें भय है कि यदि कोई काम करेंगे तो गलती होने की संभावना रहेगी ही इसलिए काम करना ही क्यों फोटो खिंचवा कर डालते रहो फेसबुक पर !
Thursday, 8 January 2015
जहाँ जहाँ सरकार है वहाँ वहाँ ढिलाई और जहाँ जहाँ प्राइवेट है वहाँ वहाँ चुस्ती आखिर कारण क्या है !
सरकारी कर्मचारियों पर प्राइवेट वाले भारी पड़ते हैं आखिर क्यों ?
सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं सरकारी अस्पतालों में दवाई नहीं, डाककर्मियों में सुनवाई नहीं ,सरकारी फोन या इंटरनेट की स्थिति डामाडोल है ! सरकारी अधिकारी एवं कर्मचारियों में काम करने के प्रति न तो निष्ठा होती है और न ही उत्साह ! न ही वो जनता की समस्याएँ सुनते हैं और यदि सुन लेते हैं तो बस सुन ही लेते हैं उस पर कार्यवाही भगवान भरोसे ही होती है !ऐसे लोग बस केवल जिए जा रहे हैं और जीने के कारण आफिस चले आ रहे हैं घर चले जा रहे हैं आफिस वाले कोई काम करवा पाते हैं तो करवा लेते हैं और न करवा पावें तो न सही आखिर उनका कोई कर क्या लेगा ! सरकारी नौकरी का मतलब एक जिंदगी के लिए सरकार के मत्थे मढ़ जाना !
सरकारी वालों का काम तो सैलरी लेना होता है !काम से उनका कोई ख़ास मतलब नहीं होता है इसलिए उनका नाम भी उतना नहीं होता है जितना प्राइवेट का होता है ,प्राइवेट स्कूल, अस्पताल आदि सेवाओं से अपना विश्वास जनता में जागते हैं अगर विश्वास टूटने लगता है तो जी जान लगा देते हैं पर विश्वास बचाकर रखते हैं किन्तु सरकारी वालों को इस बात का संकोच ही कहाँ होता है अपितु सरकारी शिक्षक भी अपने बच्चों को पढ़ने के लिए प्राइवेट स्कूलों में ही भेजने लगते हैं इतने स्वाभिमान विहीन होते हैं ये लोग !ये किस मुख से देंगे औरों को शिक्षा और जिसको देंगे उसके जीवन में क्या भर पाएँगे ईमानदारी के बहुमूल्य संस्कार !
यही स्थिति सरकार के अन्य विभागों की है !
पुलिस वाले सरकारी होते हैं और अपराधी प्राइवेट , नाम तो प्राइवेट का ही होता है !क्योंकि काम तो प्राइवेट वाले ही करते हैं ! नाम भी उन्हीं का होता है अपराध की खबरों से अखवार भरे पड़े होते हैं जबकि पुलिस का पराक्रम कहीं झलक जाता है किन्तु जिस दिन पुलिस का पराक्रम खबरों में छा जाएगा उसदिन अपराधों पर नकेल लग जाएगी !
जैसे वो लोग एक दिन किसी काम को करने के विषय में सोचते हैं विचार बनाते हैं कि कल से काम शुरू करेंगे किंतु कल काम करना चाहते हैं तब उन्हें एक नई बात समझ में आती है कि इस काम से पहले तो वो काम होना चाहिए चलो कल पहले वो काम करेंगे फिर ये करेंगे ये करते करते वो कभी कुछ कर ही नहीं पाते हैं और कुछ ट्राँसफर होते हैं और रिटायर्ड हो जाते हैं उनका काम प्राइवेट वाले लोग किया करते हैं सैलरी केवल वो लिया करते हैं जैसे -सरकारी स्कूल वाले सैलरी लेते हैं और प्राइवेट स्कूल वाले पढ़ाते हैं ! सरकारी डाक्टर सैलरी लेते हैं प्राइवेट वाले चिकित्सा करते हैं डाक वाले सैलरी लेते हैं कोरियर वाले काम करते हैं दूरसंचार वाले सैलरी लेते हैं प्राइवेट कम्पनियाँ काम सँभालती हैं !
पुलिस जैसे विभागों में जहाँ काम सँभालने वाले प्राइवेट लोगों की सुविधा नहीं होती है वहाँ सैलरी पुलिस वाले लेते हैं अपराधी लोग काम सँभालते हैं यही कारण है कि पुलिस का काम तो दिखाई पड़ता नहीं है किन्तु अपराधियों का काम दिखाई पड़ता है चूँकि वो प्राइवेट होते हैं और पुलिस के लोग सरकारी होते हैं और जो सरकारी कर्मचारी है वो काम क्यों करेगा ! पुलिस वाले सरकारी कर्मचारी होते हैं और सरकारी तो केवल सैलरी लेने के लिए होते हैं काम तो प्राइवेट लोग ही करते हैं जैसे अपराधी लोग प्राइवेट होते हैं ! जिसे इस बात पर भरोसा न हो वो किसी दिन अखवार उठाकर देख ले या टीवी समाचार ध्यान से सुन ले अपने आप पता लग जाएगा कि काम कर कौन रहा है पुलिस या अपराधी !जो काम करता है उसी का नाम होता है !
इसलिए सब कुछ होना चाहिए किन्तु शुरुअात कहीं से तो करनी पड़ेगी ! सरकारी कर्मचारियों को हर काम के लिए हर जगह टाँग फँसा कर खड़ा होना तो ठीक नहीं है !न कुछ काम की जाँच सालों साल चला करती है !सरकारी आफिसों में अक्सर लंच ,नास्ता ,चाय पानी विदाई पार्टी स्वागत पार्टी और फिर इन सबका एकाउण्ट कैसे मेनटेन किया जाएगा इसके लिए मीटिंग बस इतने से काम के लिए बड़े बड़े पद लेकर बैठे हैं लोग !काम केवल उसी का होता है जिसका तगड़ा सोर्स फिर मुख माँगी घूँस देने की ताकत !बाकी को तो इस आफिस से उस आफिस,इस बाबू से उस बाबू के पास केवल दौड़ाया जाता है कोई स्वीकार ही नहीं करता है कि ये काम हमारा है क्योंकि स्वीकार कर ले तो करना पड़ेगा !
Monday, 5 January 2015
P.K.फ़िल्म वालों की सोच सनातन हिन्दूधर्म की जो जितनी बेइज्जती करेगा उसे उतना पैसा मिलेगा !
P.K.फ़िल्म हो या साईंबाबा या निर्मल बाबा जैसे अनेकों स्वयंभू छद्म श्रद्धा केंद्र शास्त्र विरोधी पाखंडों में लिप्त हैं जो सनातन धर्म की मान्य शास्त्रीय मान्यताओं की बेइज्जती करके या मजाक उड़ाकर हो जाते हैं मालामाल ! धर्म का इतना बुरा हाल !
जो बाबा बैरागी पंडित पुजारी आदि जितने अधिक से अधिक पापों का समर्थन करते हैं वे उतने ही बड़े और धनी हो जाते हैं और ऐसे लोगों के ही अनुयायी उतनी अधिक संख्या में होते हैं, सनातन धर्म की शास्त्रीय मर्यादाओं की छीछालेदर करने में लोगों को आज बड़ा कारोबार दिखाई पड़ने लगा है , आज गुप्त पापों से समाज बहुत अधिक परेशान है, योग सिखाने वाले लोग भोग भोगने की दवाएँ बेचते रहे ! जो लोग योग के नारे लगाते रहे भोग की दवाएँ बेचते रहे वे तो मालामाल हो गए किंतु जो ईमानदारी पूर्वक योग सिखाते रहे और योग की ही दवाएँ बेचते रहे उन्हें कौन पूछ रहा है आज !
देश में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली मूवी P.K. में सनातन धर्म की बेइज्जती करने के अलावा और ऐसा क्या है जिससे उसकी लोकप्रियता बढ़ रही हो ! क्योंकि आजकल नास्तिकों को खुश करने वाले लोगों को नास्तिक लोग न केवल धन देते हैं अपितु और भी सभी प्रकार से सहयोग देते हैं वो दे रहे हैं इसीलिए बढ़ रही है कमाई !फ़िल्म में शंकर जी पर चढ़ाया जाने वाला दूध तो पापियों को खटकता है किन्तु फ़िल्म देखने के लिए लिया जाने वाला 100 -200 रूपए का टिकट उन्हें उचित जान पड़ता है इन मनहूसों को ये तो लगता है कि शंकर जी पर चढ़ाए जाने वाले दूध के 20 रूपए बचाकर गरीबों को दिए जाने चाहिए किंतु ऐसे पाखंडी फ़िल्म निर्माता लोग फ़िल्म की कमाई गरीबों में क्यों नहीं बाँट देते हैं !
ऐसे फ़िल्म निर्माताओं को क्यों नहीं दिखता है फिल्मीपाखंड!हिम्मत है तो आमिर टाइप के लोग उसकी भी बुराई करें !
जिन फिल्मों में सारा कारोबार मलमूत्रांगों पर ही केंद्रित होता जा रहा है बस उन्हें ही लुकाने छिपाने दिखाने में या वहीँ पर टैटू बनवाने में सीमित होते जा रहे हैं फिल्मी दृश्य !जो जितना नंगा हो सकता हो वो उतना बोल्ड,वही सेक्सी ,सुपर सेक्सी आदि बहुत कुछ !ऐसी फिल्मों के पाखंडों का पर्दाफाश करने के लिए क्यों नहीं बनती हैं PK टाइप की फिल्में !क्या वो पाखण्ड नहीं है !
बलात्कारों की विशाल बढ़वानल(आग) में भारतीय समाज को झोंका तो इन्हीं फ़िल्म वालों ने ही है पहले जब ऐसी फिल्में नहीं बनती थीं तब भारतीय संस्कारों में ऐसी दुर्गन्ध तो नहीं थी ,ये फिल्मी लोग ही प्यार की पद्धति सिखाने के नाम पर समाज को ब्यभिचारी बनाते रहे ,धर्म विरोधी बनाते रहे , इन्होंने समाज को केक काटना सिखाया है दीपक बुझाना सिखाया है जिसे हमारे सनातन धर्म में अशुभ मानते हैं ! कुल मिलाकर पाखण्ड मिटाने के नाम पर इन फिल्मी पाखंडियों ने हमारे धर्मावलम्बियों को हमारे धार्मिक रीति रिवाजों से घृणा करना सिखाया है आज हमसे दूर होते जा रहे हैं हमारे लोग और दूसरों को पकड़ते जा रहे हैं । हिन्दू धर्म के दोष दुर्गुण दिखाने की इन फ़िल्म वालों की आदत सी बन चुकी है । धर्मांतरण जैसी विकृतियाँ इसी कुत्सित सोच की परिणाम हैं ।
फिल्मों का पाखंड या अंध विश्वास इन PK वालों को क्यों नहीं दिखाई पड़ता है आज फिल्मों से कला साहित्य और गीत आदि बिलकुल गायब होता जा रहा है नृत्य के नाम पर केवल उछलकूद है फिल्मी लोगों को नाचते देखकर ऐसा लगता है कि जैसे इनके सर्वाधिक बहुमूल्य अंगों में ततैयाँ चिपटी हुई हैं उसी व्याकुलता में ये उछल कूद रहे हैं ! प्राचीन काल में जैसे लोग बिना वस्त्रों के रहते थे लगता है फ़िल्म वाले पुनः वहीँ पहुंचा देंगे समाज को !वो भी पेड़ों पर उछलते कूदते थे ये स्टेजों पर उछलते कूदते हैं जैसे बनवासी जातियाँ क्या गाती बजाती या ईशारा करती हैं किसी को समझ में नहीं आता है वैसी परिस्थिति आजकल की फिल्मों की है देखकर किसी को नहीं लगता है कि कोई नाच गाना हो रहा है अपितु भारी शोर शराबे के बीच कर्ण विस्फोटक हुड़दंग सुनाई पड़ता है बस !ऐसे हुड़दंगों के विरुद्ध आवाज क्यों नहीं उठाते हैं ये P.K.फ़िल्म वाले !
P.K.फ़िल्म वालों को केवल सनातन धर्म में तो पाखंड दिखते हैं किन्तु जो अन्य संप्रदायों में है वो इन्हें दिखाई क्यों नहीं पड़ते हैं ये लोग वहाँ अंधे क्यों बने रहते हैं जो बुराइयाँ इन्हें दिखनी चाहिए !वो नहीं दिखती हैं ।
जिन धर्मों में त्यौहार मनाने के नाम पर भी असंख्य निर्दोष पशुओं की हत्याएँ कर दी जाती हों जिनमें दूध देने वाले पशु भी सम्मिलित हों ,दूध अमृत है उससे न केवल बहुत सारी मिठाइयाँ पकवान आदि बनते हैं अपितु स्वास्थ्य रक्षा के लिए सर्वाधिक आवश्यक है वह दूध आज पचास रूपए लीटर बिक रहा है फिर भी जिन मानवता के शत्रुओं ने पशुओं को खाना बंद नहीं किया है ऐसे लोग त्यौहार मनाने के नाम पर पशुओं की हत्याएँ किया करते हैं इन समुदायों को सुधारने के लिए क्यों नहीं की जाती हैं टिप्पणियाँ !
हम हिन्दू हैं हम तो प्राण विहीन पत्थर की मूर्तियों को भी प्राण प्रतिष्ठा अर्थात जीवित करके उन्हें पूजते हैं फिर भी हम में सबको बुराई दिखती है किन्तु जो लोग जीवित लोगों को भी उनके मरने के बाद उनके शरीरों को सड़ाकर पूजते हैं उनमें किसी को न तो कोई पाखण्ड दिखाई पड़ता है और न ही अंध विश्वास क्यों नहीं देखते हैं ये P.K.फ़िल्म वाले !
साईं बुड्ढे का रौब -
हिन्दू मंदिरों में घुसे घूम रहे घुसपैठिए साईं बुड्ढे पर क्यों नहीं की जाती हैं टिप्पणियाँ जो हिन्दुओं के भगवान बनने के लिए बेचैन हैं किन्तु इधर किसी का ध्यान क्यों नहीं जाता है ये P.K.फ़िल्म वाले क्या डरते हैं !इस साईं बुड्ढे का सनातन धर्म से आखिर क्या सम्बन्ध है क्यों घुसा दिया गया है मंदिरों में !इधर किसी P.K.फ़िल्म वाले की दृष्टि क्यों नहीं जाती है !
फ़िल्म हों या बाबा या ज्योतिषी या कोई अन्य प्रकार के धार्मिक यदि चरित्र आदर्शों संस्कारों की बात करते हैं या शास्त्रीय स्वाध्याय की बात करते हैं यज्ञ यागादि व्रतउपवास जैसे कठिन धर्म कर्म की बात करते हैं तो लोग आपसे कम जुड़ना चाहेंगे जबकि ये सबकुछ घर परिवार एवं सामाजिक आदि संबंधों की सुरक्षा के लिए बहुत आवश्यक है किन्तु ये सभी नियम संयम आदि कठिन होने के कारण इनसे जुड़ने वाले लोग कम होते हैं !
यही कारण है कि पाखंडी लोग समाज की आस्था को कैस करने के लिए सरल धर्म कर्म गढ़ना शुरू कर देते हैं वैसे ही उनके यहाँ भीड़ बढ़ने लगती है और जब भीड़ बढ़ती है तो चढ़ावा भी बढ़ना ही होता है और जब चढ़ावा बढ़ता है तो उसे ये पाखंडी लोग आस्था और श्रद्धा जैसे नाम देते हैं !
आप स्वयं देखिए कि जो लोग जीव हत्या करते हैं,नशा करते हैं या बलात्कार जैसे अन्य बड़े बड़े अपराध करते हैं ऐसे लोग जब सनातन धर्म के मंदिरों में या महापुरुषों के पास जाते हैं तो वो इन सारे गलत कामों को छोड़कर धर्म कर्म से जुड़ने की सलाह देते हैं ,इससे आधी अधूरी श्रद्धा वाले लोग तो बेशक भाग जाते हैं जब छोड़ पाते हैं तब आते हैं किन्तु जो जुड़ते हैं वो पक्के होकर ही जुड़ते हैं जिससे अपना समाज हत्या बलात्कार नशा जैसे गलत कामों से बहुत हद तक बचा रहता था किन्तु यहीं साईंधर्मी जैसे पाखंडियों ने लगा लीं अपनी अपनी धार्मिक डिस्काउंट की दुकानें !
साईं वाले घुस पैठिए घुस गए मंदिरों में और नारा दिया कि कुछ भी करो किन्तु बाबा को चढ़ावा रूपी चंदा अर्थात पाप करने का कमीशन देते रहो बाबा सब सँभाल लेंगे क्योंकि 'बाबा बहुत दयालू हैं '! बाबा का कथन है कि मुझे पाप और पापी से परहेज नहीं हैं किन्तु मैं चंदे और चढ़ावे का भूखा हूँ !
बंधुओ ! क्या अपने श्री राम ,श्री कृष्ण ,आशुतोष भोलेबाबा भगवान शिव जी दयालू नहीं हैं क्या !फिर लोग साईं की ओर गए क्यों ? उनके मन में एक ही भय था कि यदि भगवानों की ओर गए तो पाप छोड़ना पड़ेगा और साईं के यहाँ ऐसा नहीं करना होगा इसलिए वो पापी वर्ग भगवान से विमुख होता चला गया और साईं की दुकानदारी में सम्मिलित हो गया इस प्रकार से पाप हत्या बलात्कार आदि बढ़ते चले गए !
निर्मल बाबा आया उसने देखा कि लोग जो कुछ करना चाहते हों उन्हें रोको मत वही करने को कहो जो वो करना चाहते हों वो कितना भी बड़ा पाप क्यों न हो ! इसलिए वह पापी धर्म एवं शक्तियों का नाम ले लेकर समाज को ज्योतिष, मन्त्र ,दुर्गा सप्तशती ,पुराणों ,वेदमंत्रों आदि से दूर करके स्वेच्छारी बनाता जा रहा है ऐसे भ्रष्ट लोग धर्म एवं धर्म शास्त्रों के सीधे दुश्मन हैं इसीलिए नास्तिक और विधर्मी लोग सनातन धर्म के मूल्यों को नष्ट करने के लिए इन्हें धन देते हैं !
ज्योतिष का नाम ले लेकर कुछ पाखंडियों ने कहना शुरू कर दिया है मैं भाग्य को बदल सकता हूँ ( Yes ,I can change )
बंधुओ ! यदि ऐसा होना संभव होता तो श्री राम बन न जाते और दशरथ जी की मृत्यु टाल दी जाती किन्तु ऐसा नहीं किया जा सका गुरु वशिष्ठ जी क्या योग्य नहीं थे और आज कल के ये पापी अधिक विद्वान हैं जो कहते हैं कि 'हाँ भाग्य को हम बदल सकते हैं !'
बंधुओ !ग्रह शांति नामक मन्त्रों की पुस्तक है जिसका प्रयोग ग्रहों का दोष कम करने के लिए किया जाता है किन्तु उसका पढ़ पाना अत्यंत कठिन होता है फिर उसके मन्त्रों का जप तो और कठिन होता है इसलिए धर्म विध्वंसक लोग कौवे कुत्ते तीतर बटेर उड़द मूँग कोयला कंकरों के उपाय बताते फिर रहे हैं ये सनातन धर्म को नष्ट करने का ही प्रयास है ! अन्यथा वेदमंत्रों के पाठ में क्या बुराई है !
बाबा राम रहीम जैसे लोग स्वयं तो निरंकुश आचरण करते ही हैं और समाज को भी इसीलिए प्रेरित करते हैं इसे धर्म कैसे कहा जाए !
कुछ बाबा लोग साप्ताहिक सत्संग शिविरों के नाम पर प्रेमी प्रेमिकाओं को मिलने मिलाने का उचित प्रबंध करते हैं इसीलिए ये लोग सत्संग शिविर लगाते हैं जहाँ एक सप्ताह पति पत्नी की तरह प्रेमी प्रेमिका लोग रह लेते हैं और कोई जान भी नहीं पाता है उनके घर वाले यह कहते हुए फूले नहीं समाते हैं कि हमारा लड़का या लड़की एवं पति या पत्नी केवल सत्संग शिविर में जाते हैं बस जबकि वो शिविर ही सभी पापों की जड़ होते हैं !
कुल मिलकर चाहें पाखंडी फ़िल्म या धार्मिक पाखंडी सनातन हिन्दू धर्म को चोट दोनों ही पहुँचा रहे हैं !बचाना दोनों से चाहिए किन्तु ये P.K.फ़िल्म वालों का बढ़ता चढ़ावा इस दृष्टि से चिंता का विषय है ।
Saturday, 3 January 2015
भारतरत्न जैसे सम्मान को जातीय संकीर्णता से अलग रखना होगा !
'भारतरत्न जिसे दिया जाए वो भारतरत्न हो भी '
वस्तुतः समस्त भारतीयों के गौरवपुरुष को ही भारत रत्न मिलना चाहिए ! वह ऐसा हो जो जाति क्षेत्र समुदाय संप्रदायवाद की भावना से ऊपर उठकर समस्त भारतीय लोगों के प्रति अपनेपन की भावना से काम करता हो !इसके अलावा जिसकी सोच इतनी उदात्त न हो उसे उसकी सोच,योग्यता और जन सेवा कार्यों के आधार पर 'रत्न' बनाया जा सकता है जैसे जिसने साहित्य के लिए काम किया वो साहित्य रत्न ,जिसने धर्म के लिए काम किया वो धर्मरत्न ,जिसने हिंदुओं के लिए काम किया वो हिन्दूरत्न जिसने मुस्लिमों के लिए काम किया हो वो इस्लामरत्न जिसने दलितों के लिए किया वो दलित रत्न जिसने महिलाओं के लिए किया वो महिला रत्न जिसने क्षत्रियों के लिए किया वो क्षत्रिय रत्न अादि आदि और जिसने समूचे भारत वासियों के लिए काम किया हो या उदात्त सोच रखी हो अपनापन रखा हो वो भारतरत्न है और हो भी क्यों न !किन्तु जिसने काम केवल ब्राह्मणों के लिए किया हो तो उसे मिलना तो चाहिए ब्राह्मण रत्न किन्तु वो माँग करे भारत रत्न की ये कहाँ तक उचित है !
जहाँ तक अटल जी या मालवीय जी की बात है इन्होंने सारे भारतवासियों के विकास के लिए अपनेपन से कार्य किए हैं इसमें किसी को शंका नहीं होनी चाहिए और न ही किसी को अंगुली उठानी चाहिए !हाँ ,और भी जो महापुरुष हुए हैं उन्हें भी उसी श्रेणी में रखा जाना चाहिए !
जातियों सम्प्रदायों के नाम पर ऐसे पुरस्कारों की परिकल्पना ही नहीं की जानी चाहिए ! अपने गुण ,विद्या और परिश्रम
से स्वाभिमानपूर्वक प्राप्त की गई सफलता बहुमूल्य होती है सम्मान का आधार भी उसी को माना जाना चाहिए ।
जो लोग आरक्षण के बिना घर की रसोई नहीं चला पाते वे देश न चला पाने के लिए सवर्णों को दोषी ठहरावें ये कहाँ तक उचित है और इन बातों पर भरोसा कैसे किया जाए क्योंकि वहाँ तो आरक्षण की सुविधा भी नहीं होगी ,ऐसी परिस्थितियों में किसी का विकास न होने के लिए सवर्णों को दोषी ठहराना न्यायोचित नहीं है आखिर कौन कहता है कि आप आरक्षण लें आप चाहें तो उन जातियों की बराबरी कर सकते हैं जो गरीब होकर भी बिना आरक्षण के भी अपने संघर्ष के द्वारा परिश्रम पूर्वक अपनी तरक्की करना चाहे तो कर के अपना परिचय दे सकते हैं ।जातिगत सुविधा भोगने के समर्थक लोगों को आदर्श कैसे माना जा सकता है ।
जो जातिगत आधार पर मिलने वाले आरक्षण के समर्थक हैं उन्हें ये भी तो सोचना होगा कि यदि जातियाँ न होतीं तो आरक्षण भी नहीं होता और मनुस्मृति न होती तो जातियाँ न होतीं ! इसलिए जातिगत आरक्षण का आधार ही है मनुस्मृति ! फिर मनुवाद का विरोध या मनुस्मृति को जलाने का नाटक क्यों ? अक्सर क्यों दी जाती हैं महान जाति वैज्ञानिक महर्षि मनु को गालियाँ !जिन्होंने लाखों वर्ष पहले जिनके विषय में लिखकर रख दिया था कि इन इन जातियों के लोग त्याग, संयम,स्वाभिमान एवं पवित्रता आदि भावों से विमुख होने के कारण आत्मग्लानि से हमेंशा ग्रसित रहेंगे !इसी कारण अत्यंत परिश्रमी होने के बाद भी ये अपना उत्थान अपने बल पर नहीं कर सकेंगे !ये दिल और दिमाग से काम न लेकर काम में केवल अपना शरीर ही लगाते रहेंगे इसलिए राजा को चाहिए कि इन्हें सेवा कार्य सौंपे ! चूँकि अज्ञान के कारण इनकी संतानें भी इसी भावना से भावित होती रहेंगी और वो भी हमेंशा अपने विकास से बंचित बनी रहेंगी । महर्षि मनु ने उस युग में इस बात का पता लगा लिया था कि इन जातियों के लोग अपने पिछड़ेपन के लिए कभी अपने को जिम्मेदार नहीं मानेंगे हमेंशा दूसरों को ही दोषी ठहराते रहेंगे !चूँकि इनके उत्थान न होने का दोषी कोई दूसरा होगा ही नहीं ये आदतन हीन भावना से ग्रस्त रहेंगे इसलिए ये अपने पिछड़ेपन के लिए अपने को एवं अपनी जीवन शैली को जिम्मेदार कभी नहीं मानेंगे किन्तु इन जातियों के भी जो लोग ऐसा मानकर प्रयास करेंगे उनके असीमित उत्थान को कोई दूसरा कैसे रोक सकता है ।
जो लोग अपने पिछड़ेपन के लिए जाति अन्वेषक महान वैज्ञानिक महर्षि मनु एवं मनुस्मृति को दोषी मानते हैं उनकी स्थिति ठीक उसीप्रकार के विद्यार्थी की तरह होती है जिसकी अपनी लापरवाही देखकर शिक्षक पठनशील लड़कों से कहे कि इसका साथ करोगे तो तुम भी फेल हो जाओगे इसका मतलब है कि वो परिश्रम पूर्वक पढ़ाई करके अपनी स्थिति में सुधार करे और यदि न करे तो पठनशील अन्य विद्यार्थियों को उससे दूर रहना चाहिए ! किन्तु ये बात सुन और सोच कर उस विद्यार्थी के पास दो ही विकल्प होते हैं उत्तम पक्ष तो यह है कि वो अधिक परिश्रमपूर्वक पढ़ाई करके अपने सहपाठियों की अपेक्षा अपने को और अधिक योग्य बनावे दूसरा विकल्प होता है कि वो अपने शिक्षक एवं सहपाठियों से घृणा करने लगे !
किन्तु यहाँ विचार करने वाली बात ये है कि वे शिक्षक और सहपाठी यदि न भी रहें तो संभव है कि उसे मूर्ख कहने वाला कोई न रहे किन्तु इतने भर से वो योग्य तो नहीं ही हो जाएगा और बिना अपनी योग्यता के उसे सामाजिक प्रतिष्ठा या आर्थिक तरक्की नहीं प्राप्त होगी इसलिए उसे अपने शिक्षक और सहपाठियों से घृणा करने की अपेक्षा अपने उत्थान के लिए अपना प्रयास करना चाहिए यही उसके काम आएगा !
इसी प्रकार से जो लोग जातिवैज्ञानिक महर्षि मनु से घृणा करते और मनुस्मृति को जलाते हैं उन कुंद बुद्धियों को अब समझ लेना चाहिए कि अब तो साठ पैंसठ वर्ष आरक्षण भी ले और पचा चुके यदि विकास होना होता तो इतने में ही हो जाता किन्तु यदि अभी तक नहीं हुआ तो अब इससे सबक लेते हुए समझ लेना चाहिए कि आरक्षण रूपी भिक्षा के भरोसे जीवन जीने की आशा छोड़कर अपनी प्रतिभा विकास पर विशेष ध्यान देना चाहिए जो आरक्षण से संभव ही नहीं है !
देखिए इसी विषय में हमारे कुछ अन्य लेख भी -
आरक्षण देश के विकास को रोकने वाला एवं भ्रष्टाचार को बढ़ाने वाला होता है !आरक्षण के दुष्प्रभाव से बाहरी लोग अपने सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत को कहीं भिखारी भारत न कहने लगें !see more ....http://bharatjagrana.blogspot.in/2014/05/dalit-plus.html
दलित नाम की कोई जाति कभी नहीं हुई ,हो सकता है यह दिमागी बीमारी हो ! तो इसकी जाँच हो चिकित्सा हो किन्तु आरक्षण नहीं !दलित कौन हैं उनमें किस तरह की कमी होती है और आरक्षण से उसकी पूर्ति कैसे हो पाती है ?http://bharatjagrana.blogspot.in/2014/05/blog-post_21.html
Friday, 2 January 2015
सरकारी कर्मचारियों के काम करने का कोई लक्ष्य नहीं होता और बिना लक्ष्य के उत्साह नहीं होता ,ऐसे तो जो हो जाए वही बहुत है !
कामचोर घूसखोर जिन सरकारी कर्मचारियों ने तोड़ा है जन विश्वास उनसे कैसे निपटोगे मोदी जी !
बहुत कर्मचारी हैं जो सारे जीवन कुछ नहीं करते कई तो ऐसे होते हैं कि जिस काम में उनकी ड्यूटी लगाई गई होती है वो उन्हें पता ही नहीं होता है कई विभाग या आफिसें जिस काम के लिए खोली गई हॉट हैं उनकी प्रासंगिकता समाप्त होने पर भी वे चलाई जा रही होती हैं में शक्ति नहीं है इच्छा नहीं है उत्साह नहीं है हैं का अभ्यास नहीं है
सरकारी कर्मचारियों का एक वर्ग जो भारी भ्रष्टाचार में संलिप्त है वो काम ही इतना करता है ये वर्ग लोगों से काम करने के लिए सुविधा शुल्क बड़ी निर्लज्जता पूर्वक माँगता है घूस के इसी धन से वो अपने आसपास वाले सीनियर जूनियर लोगों का मुख बंद रखता है सरकारी प्रतिनिधियों को भी प्रसन्न रख लेता है काम नहीं करता है या कम करता है केवल संगठन यूनियन बैठकें और फिर हड़ताल बस इतने में ही अपना सारा समय और जीवन बिताया करता है यही सब कुछ करने की भारी भरकम सैलरी उठाता है इतने पर भी सरकार को संतोष नहीं होता है तो सरकार महँगाई भत्ता टाईप के हथकंडे अपनाकर इन बेचारों को इधर उधर से बहुत कुछ दिया करती है । इन सब बताओं पर बहुत लोगों को शक होता है कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि भ्रष्टाचार से अर्जित धन जो ये कर्मचारी सरकारी नुमाइंदों तक पहुँचाते हैं उसी का दशांश सरकार प्रकारांतर से इन्हें लौटा देती है !
सरकार का निगरानी तंत्र इतना अधिक नाकाम है कि किसी आफिस में कोई सरकारी प्रतिनिधि घुसकर देखने नहीं जाता है कि जनता को कैसे जूझना पड़ता है इन सरकारी कर्मचारियों से !लोगों का काम आखिर क्यों नहीं हो रहा है सरकारी कर्मचारियों की आफिसों में क्यों लगी रहती हैं जनता की लाइनें ! जनता न केवल सब कुछ देखती है अपितु सहती भी रहती है फिर भी जब काम नहीं होता है तब मजबूरी में उन्हीं लोगों को घूस देकर जनता करवाती है अपने काम !जिनके पास घूस देने की सामर्थ्य नहीं होती है वे चुप मारकर बैठते हैं अपने घर में ।
सीधा सा नियम है जो धन देता है उसका काम करने में मन लगता है और उसी से भय लगता है इसलिए उसी को खुश रखना होता है किन्तु सरकारी कर्मचारियों को सैलरी सरकार देती है किन्तु काम जनता को लेना होता है चूँकि जनता धन नहीं देती है तो उसका काम करने में मन कैसे लगे !इसके लिए सरकारी तंत्र को ही सतर्क पड़ेगा !
सरकारी किसी आफिस में चले जाओ कामचोर अधिकारी और कर्मचारियों ने काम न करने के लिए कोई न कोई बहाना पहले से ही तैयार कर रखा होता है , कोई कंप्यूटर बिगाड़ कर रखते तो कोई पेंटर बिगाड़ कर रखते हैं ! तो किसी को संबंधित फाइल नहीं मिल रही होती है इसी प्रकार से सबका कुछ न कुछ खोया या बिगड़ा होता है वो
सरकारी आफिसों में कानून का इस प्रकार से मजाक उड़ाया जाता है जिम्मेदारी से भागने और अपनी पदगरिमा को कलंकित करने वाले लोग भी बिना काम के सैलरी उठाया करते हैं ।अपराध रोकने के लिए बनाए गए कानून चंद रुपयों में बेंच दिया करते हैं
सरकार एवं सरकारी कर्मचारियों में काम करने का न तो उत्साह है और न इच्छा और न सरकार का भय ही केवल किसी एक दो को कोसने से क्या लाभ होगा !जबकि इन सबकी लापरवाही ने बिगाड़ा है सारा खेल ! अब समय आ गया है जब बहुत सारे सरकारी कर्मचारी लोग अपने लापरवाही पूर्ण आचरण से धीरे धीरे अपनी उपयोगिता स्वयं समाप्त करते चले जा रहे हैं| आज सरकारी आफिसों संस्थाओं में काम काज का स्तर इतना गिर चुका है कि समाज इन पर क्रोधित तो नहीं है इनसे निराश जरुर है और हो भी क्यों न !
एक ओर तो गरीब भारत है जिसे दिनरात परिश्रम करने पर भी भरपेट खाना नहीं
मिल पा रहा है तो दूसरा वह वर्ग है जो परिश्रम पूर्वक अपना जीवन संचालित कर
रहा है तीसरा वर्ग सरकारी कर्मचारियों का है जो जिस काम के लिए नियुक्त
किया गया है वह काम या तो करता नहीं है या भारी मन से अर्थात क्रोधित होकर
करता है या फिर आधा अधूरा करता है या फिर घूस लेकर करता है| इन सबके बाबजूद
भी उनका बेतन आम देशवासियों के स्तर एवं देश की वर्तमान परिस्थितियों के
अनुशार बहुत अधिक है उस पर भी सरकार अकारण और बढ़ाए जा रही है|हर समय
पैसे पैसे का रोना रोने वाली सरकारों के पास सरकारी कर्मचारियों का बेतन
बढ़ाते समय न जाने पैसा कहाँ से आ जाता है या सरकार का अपना भी कोई कमजोर
बिंदु है जिसकी पोल सरकारी कर्मचारियों के पास होती है जो कहीं खुल न जाए
इस भय से उनकी सैलरी बढ़ाना कहीं सरकार की मज़बूरी तो नहीं है!
यही अंधी आमदनी देखकर सरकारी नौकरियां पाने के लिए चारों तरफ मारामारी
मची रहती है कोई आरक्षण मांग रहा है कोई घूस देकर घुसना चाह रहा है क्योंकि
एक बात सबको पता है की बिना तनाव एवं बिना परिश्रम के भी यहाँ जीवन आराम
से काटा जा सकता है|
कुछ विभागों के सरकारी कर्मचारियों में कितनी
काम चोरी घूस खोरी लूट मार आदि मची हुई है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया
जा सकता है कि जो काम जितने अच्छे ढंग से संतोष पूर्वक प्राइवेट संस्थाएं
पाँच दस हजार रूपए मासिक पारिश्रमिक देकर करवा ले रही हैं वो काम उससे दस
दस गुना अधिक बेतन देकर भी उतने अच्छे ढंग से तो छोडिए बुरे ढंग से भी
सही सरकार अपने कर्मचारियों से नहीं करवा पा रही है आखिर क्यों ? फिर भी
सरकार पता नहीं इनके किस आचरण से खुश होकर इनकी सैलरी समय समय पर बढाया
करती है| प्राइवेट संस्थाएं जिन कर्मचारियों को बिना बेतन के भी नहीं
ढो सकती हैं उन्हें अकारण ढोते रहने में सरकार कि न जाने क्या मज़बूरी है!
केवल यही न कि प्राइवेट संस्थाएँ कमा कर अपने पैसे से सैलरी बाँटती हैं
इसलिए उन्हें पैसे कि बर्बादी होने से कष्ट होता है जबकि सरकार को कमा
कमाया बिना किसी परिश्रम के जनता का पैसा टैक्स रूप में मिलता है यही कारन
है कि पराई कमाई अर्थात जनता के धन से किसी को क्यों लगाव हो ?बर्बाद हो
तो होने दो !
इस प्रकार सरकारी कर्मचारियों की इन्हीं गैर
जिम्मेदार प्रवृत्तियों ने सरकारी संस्थाओं को उपहास का पात्र बना दिया
है! क्या भारतीय लोकतंत्र को बचाए रखने कि सारी जिम्मेदारी केवल आम जनता
एवं गरीब वर्ग की ही है बाकी लोग ऐश करें! सरकारी कार्यक्रमों में होने
वाला खर्च देखिए,नेताओं एवं सरकारी कर्मचारियों का खर्च देखिए बहाया जा
रहा होता है पैसा? इनके भाषणों के लिए करोड़ों के मंच तैयार किए जाते हैं
आम आदमी अपनी कन्या के विवाह के लिए बेचैन घूम रहा होता है उसके पास कन्या
के हाथ पीले करने के लिए धन नहीं होता है क्या करे बेचारा गरीब आम आदमी!
कुछ उदाहरण आपके सामने भी रखता हूँ आप भी सोचिए कि लोकतंत्र कि रक्षा के
नाम पर आखिर यह अंधेर कब तक चलेगी!
कई बार तब बहुत आश्चर्य होता है जब ये पता लगता है कि जो कानून पालन करने के लिए बने थे वो पालन करने के बजाए केवल बनाए और बेचे जा रहे हैं तो बड़ा कष्ट होता है!
एक बार किसी ने गुंडई के स्वभाव
से हमारे निजी लोगों को मारा उनके शिर में काफी चोट लगी थी मैं उन्हें
लेकर थाने गया उनका खून बहता रहा किंतु दूसरा पक्ष तीन घंटे बाद थाने में
आया तब तक उन्हें इलाज भी नहीं उपलब्ध कराया गया जब वो किसी नेता को लेकर
आए तो दरोगा जी ने उनसे हाथ मिलाया बात की इसके बाद हमें बुलाकर समझौते का
दबाव डाला जब हम नहीं माने तो दरोगा जी ने हमारे सामने तीन आप्सन रखे कि
यदि मैं उन्हें थाने में बंद कराना चाहता हूँ तो हमें कितने पैसे देने
पड़ेंगे,यदि मैं किसी उचित धारा में बंद कराना चाहता हूँ तो क्या देना
पडे़गा,अन्यथा दोनों पक्षों को बंद कर देंगे। हमने कहा मैं पैसे तो नहीं
दूँगा जो उचित हो सो कीजिए हमें कानून पर भरोसा है तो उन्होंने कहा कानून
क्या करेगा और क्या कर लेगा जज?देखना उसे भी हमारी आँखों से ही है वो लोग
तो कहने के अधिकारी होते हैं बाकी होते तो सब हमारी कलम के गुलाम ही हैं
जैसा हम लिखकर भेजेंगे वैसा ही केस चलेगा और हम वही लिखकर भेजेंगे जैसे
हमें पैसे मिलेंगे! उसी के अनुशार केस चलेगा जज तुम्हारे शिर का घाव थोड़ा
देखने आएगा!और देखे भी तो क्या कर लेगा जब हम लिखेंगे ही नहीं!वैसे भी घाव
कब तक सॅभाल कर रख लोगे? हमारे यहॉं जितने दिन मुकदमें चलते हैं उतने में
समुद्र सूख जाते हैं घाव क्या चीज है!
इसी प्रकार दूसरे पक्ष से भी
क्या कुछ बात की गई पता नहीं अंत में दोनों पक्षों को थाने में बंद कर दिया
गया।एक कोठरी में ही बंद होने के कारण दोनों पक्षों की आपस में बात चीत होने
लगी तो पता लगा कि दरोगा ने उन्हें भी इसी प्रकार धमकाया था कि इसमें कौन
कौन सी दफाएँ लग सकती हैं जिन्हें हटाने के लिए कितना कितना देना
पड़ेगा!उन्होंने भी देने को मना कर दिया तो दोनों पक्ष बंद कर दिए गए!
इसी प्रकार दिल्ली जैसी राजधानी में कागज, हेलमेट आदि की जॉंच के नाम पर किससे कितने पैसे लेकर छोड़ना है रेट खुले होते हैं!रोड के किनारे सब्जी बेचते रेड़ी वाले से पैसे लेकर बीट वाला उसे वहॉं खड़ा होने देता है।पार्कों में अश्लील हरकतें करने वाले जोड़ों को भी पैसे के बल पर कुछ भी करने की छूट मिल जाती है। किसी भी खाली जगह पर खड़ी गाड़ी के बीट वाला कब पैसे मॉंगने लगेगा उसका मन!कानून के रखवाले इमान धरम के साथ साथ सब कुछ बेच रहे हैं खरीदने वाला चाहिए!देश की राजधानी का जब यह हाल है तो देश के अन्य शहरों के लोग क्या कुछ नहीं सह रहे होंगे!ये धोखा धड़ी क्या अपनों के साथ ! आश्चर्य है !!!
पचासों हजार सैलरी पाने वाले सरकारी डाक्टरों का एक वर्ग जनता पर बोझ बनकर जी रहा है जबकि प्राइवेट डाक्टरों ने अपनी सेवाओं से जनता का विश्वास जीता है इसलिए वे स्वाभिमान पूर्वक जी रहे हैं !
यही स्थिति सरकारी शिक्षकों के एक बहुत बड़े वर्ग की है लगता है कि उनके भाग्य में नहीं लिखा है स्वाभिमान पूर्वक जीना ! ऐसे लोग अपने बच्चे भी सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाते हैं जहाँ से मोटी मोटी सैलरी उठाते हैं! यही स्थिति पोस्ट मास्टर की है जिनके लेटर कोरिअर वाला ले जाता है इसीप्रकार से फोन मोबाइल आदि सभी सरकारी विभागों को अपने अपने क्षेत्र के प्राइवेट विभागों से पिटते देख रहा हूँ फिर भी बेशर्मी का आलम यह है कि काम हो या न हो सरकारी कर्मचारियों की सैलरी समय से बढ़ा दी जाती है।इसका कारण कहीं यह तो नहीं है कि भ्रष्टाचार के द्वारा कमाकर सरकारी कर्मचारियों ने जो कुछ सरकार को दिया होता है उसका कुछ अंश सैलरी बढ़ाकर न दिया जाए तो पोल खुलने का भय होता है!
ऐसे सभी प्रकार के
अपराधों एवं अपराधियों के लिए सभी पार्टियों की सरकारें जिम्मेदार हैं जो
दल जितने ज्यादा दिन सत्ता में रहा है वह उतना ही अधिक जिम्मेदार है जो दल
सबसे अधिक सरकार में रहा उसने सभी प्रकार के अपराधों को सबसे अधिक पल्लवित
किया है उसका कारण सरकारी निकम्मापन एवं अनुभवहीनता से लेकर आर्थिक
भ्रष्टाचार आदि कुछ भी हो सकता है।
अपराधियों का बोलबाला राजनीति
में भी है हर अपराधी की सॉंठ गॉंठ लगभग हर दल में होती है क्योंकि वे इस
सच्चाई को भली भॉंति जानते हैं कि अपराध करके बचना है तो अपना आका राजनीति
में जरूर बनाकर रखना होगा या राजनीति में सीधे कूदना होगा और वो ऐसा कर भी रहे
हैं, इसमें सभी दल उनकी मदद भी कर रहे हैं!यही कारण है कि आजकल सामान्य अपराधियों के साथ साथ अपराधी
बाबा लोग भी अपनी संपत्ति की सुरक्षा आदि को लेकर घबडाए हुए हैं, उनके
द्वारा किए जा रहे बलात्कार आदि गलत कार्यों में कहीं उनकी पोल न खुल जाए
कहीं कानून का शिकंजा उन पर न कसने लगे इसलिए जिताऊ कंडीडेट के समर्थन में
चीखते चिल्लाते घूमने लगते हैं दिखाते हैं कि जैसे सबसे बड़े देश भक्त एवं उस नेता के प्रति समर्पित वही हैं।
बलात्कार और भ्रष्टाचार रोकने के लिए अभी तक कितने भी कठोर कानून बनाए गए हों किन्तु उनका भय आम अपराधियों में बिलकुल नहीं रहा क्योंकि वे किसी नेता या प्रभावी बाबा से जुड़े होते थे जिनसे उन्हें अभय दान मिला करता था किन्तु अब जबसे बड़े बड़े बाबा और बड़े बड़े नेता लोग भी जेल भेजे जाने लगे तब से अपराधियों में हडकंप मच हुआ है कि अब क्या होगा! मेरा अनुमान है कि भ्रष्ट नेताओं एवं भ्रष्ट बाबाओं की दूसरी किश्त जैसे ही जेल पहुंचेगी तैसे ही अपराध का ग्राफ बहुत तेजी से घटेगा और फिर एक बार जनता में सरकार एवं प्रशासन के प्रति विश्वास जागना शुरू हो जाएगा!
सरकारी प्राथमिक स्कूलों को ही लें उनकी पचासों हजार सैलरी होती है किंतु वहाँ के सरकार दुलारे शिक्षक या तो स्कूल नहीं जाते हैं यदि गए भी तो जब मन आया या घर बालों की याद सताई तो बच्चों की तरह स्कूल से भाग आते हैं पढ़ने पढ़ाने की चर्चा वहाँ कहाँ और कौन करता है और कोई करे भी तो क्यों? इनकी इसी लापरवाही से बच्चों के भोजन में गंदगी की ख़बरें तो हमेंशा से मिलती रहीं किन्तु इस बीच तो जहर तक भोजन में निकला बच्चों की मौतें तक हुई हैं किंतु बच्चे तो आम जनता के थे कर्मचारी अपने हैं इसलिए थोड़ा बहुतशोर शराबा मचाकर ये प्रकरण ही बंद कर दिया जाएगा ! आगे आ रही है दिवाली पर फिर बढ़ेगी सैलरी महँगाई भत्ता आदि आदि!
अपने शिक्षकों को दो चार दस हजार की सैलरी देने वाले प्राइवेट स्कूल अपने बच्चों को शिक्षकों से अच्छे ढंग से पढ़वा लेते हैं और लोग भी बहुत सारा धन देकर वहाँ अपने बच्चों का एडमीशन करवाने के लिए ललचा रहे होते हैं किंतु वही लोग फ्री में पढ़ाने वाले सरकारी स्कूलों को घृणा की नजर से देख रहे होते हैं! यदि सोच कर देखा जाए तो लगता है कि यदि प्राइवेट स्कूल न होते तो क्या होता? सरकारी शिक्षकों,स्कूलों के भरोसे कैसा होता देश की शिक्षा का हाल?
सरकार एवं सरकारी कर्मचारियों के एक बड़े वर्ग ने जिस प्रकार से जनता के विश्वास को तोड़ा है वह किसी से छिपा नहीं है आज लोग सरकारी अस्पतालों पर नहीं प्राइवेट नर्शिंग होमों पर भरोसा करते हैं,सरकारी डाक पर नहीं कोरियर पर भरोसा करते हैं,सरकारी फ़ोनों की जगह प्राइवेट कंपनियों ने विश्वास जमाया है! सरकार के हर विभाग का यही बुरा हाल है! जनता का विश्वास सरकारी कर्मचारी किसी क्षेत्र में नहीं जीत पा रहे हैं सच्चाई यह है कि सरकारी कर्मचारी जनता की परवाह किए बिना फैसले लेते हैं वो जनता का विश्वास जीतने की जरूरत ही नहीं समझते इसके दुष्परिणाम पुलिस के क्षेत्र में साफ दिखाई पड़ते हैं चूँकि पुलिस विभाग में प्राइवेट का विकल्प नहीं है इसलिए वहाँ उन्हीं से काम चलाना है चूँकि वहाँ काम प्रापर ढंग से चल नहीं पा रहा है जनता हर सरकारी विभाग की तरह ही पुलिस विभाग से भी असंतुष्ट है इसीलिए पुलिस और जनता के बीच हिंसक झड़पें तक होने लगी हैं जो अत्यंत गंभीर चिंता का विषय है उससे भी ज्यादा चिंता का विषय यह है कि कोई अपराधी तो किसी वारदात के बाद भाग जाता है किन्तु वहाँ पहुँची पुलिस के साथ जनता अपराधियों जैसा वर्ताव करती है उसे यह विश्वास ही नहीं होता है कि पुलिस वाले हमारी सुरक्षा के लिए आए हैं !!!
इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए ही मैं सरकार एवं सरकारी कर्मचारियों के सामने एक प्रश्न छोड़ता हूँ कि जनता का विश्वास जीतने की जिम्मेदारी आपकी आखिर क्यों नहीं है?
मेरा मानना है कि यदि पुलिस विभाग की तरह ही अन्य क्षेत्रों में भी प्राइवेट का विकल्प न होता तो वहाँ भी हो रही होतीं हिंसक झड़पें!
'नमस्ते' शब्द का अर्थ क्या होता है ?
'नमस्ते' शब्द का अर्थ क्या होता है ? see more... http://bharatjagrana.blogspot.in/2014/12/blog-post_28.html
'नमस्कार' शब्द का प्रयोग किसके लिए किया जाता है ? see more... http://bharatjagrana.blogspot.in/2014/12/blog-post_28.html
किसी के लिए किए गए 'नमस्ते' या 'नमस्कार' शब्द का संकेत किस ओर होता है ?see more... http://bharatjagrana.blogspot.in/2014/12/blog-post_28.html
जिसके लिए 'नमस्ते' या 'नमस्कार' शब्द का प्रयोग किया जाए उसका फल उसे न मिलकर भगवान को कैसे मिल जाता है जानिए !see more... http://bharatjagrana.blogspot.in/2014/12/blog-post_28.html
किसी के लिए किए गए 'नमस्ते' या 'नमस्कार' का उत्तर न देने वालों को दोष क्यों लगता है ?see more... http://bharatjagrana.blogspot.in/2014/12/blog-post_28.html
'नमस्कार' शब्द का प्रयोग किसके लिए किया जाता है ? see more... http://bharatjagrana.blogspot.in/2014/12/blog-post_28.html
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जिसके लिए 'नमस्ते' या 'नमस्कार' शब्द का प्रयोग किया जाए उसका फल उसे न मिलकर भगवान को कैसे मिल जाता है जानिए !see more... http://bharatjagrana.blogspot.in/2014/12/blog-post_28.html
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