भाग्य से ज्यादा और समय से पहले किसी को न सफलता मिलती है और न ही सुख ! विवाह, विद्या ,मकान, दुकान ,व्यापार, परिवार, पद, प्रतिष्ठा,संतान आदि का सुख हर कोई अच्छा से अच्छा चाहता है किंतु मिलता उसे उतना ही है जितना उसके भाग्य में होता है और तभी मिलता है जब जो सुख मिलने का समय आता है अन्यथा कितना भी प्रयास करे सफलता नहीं मिलती है ! ऋतुएँ भी समय से ही फल देती हैं इसलिए अपने भाग्य और समय की सही जानकारी प्रत्येक व्यक्ति को रखनी चाहिए |एक बार अवश्य देखिए -http://www.drsnvajpayee.com/
Tuesday, 20 January 2015
Sunday, 18 January 2015
प्रधानमंत्री की लहर पर दिल्लीभाजपा लड़ेगी चुनाव ! कहाँ गया दिल्लीभाजपा का अपना प्रभाव !
दिल्ली भाजपा का अपना खुद का वजूद क्या है ?और नहीं है तो क्यों नहीं है !जिसका वजूद चुनाव लड़ने लायक ही नहीं होगा वो सरकार चला लेगा इस पर भरोसा कैसे किया जाए !
मोदी जी की रैली और अमितशाह जी की संगठन शैली से जीता जाएगा दिल्ली का चुनाव !
"अमित शाह ने कहा कि अगली बार जब चुनावी रैली में मिलूँगा तो केजरीवाल का कच्चा चिट्ठा खोलूँगा! "
इस प्रकार से अमितशाह जी सँभालेंगेपार्टी के दिल्ली चुनावों की कमान ! किरन वेदी के नेतृत्व में लड़ा जा सकता है चुनाव ! साजिया इल्मी,जयाप्रदा एवं बिन्नी जैसे लोगों के भरोसे भाजपा जीतेगी दिल्ली का चुनाव आखिर क्यों ? और यदि यही सच है तो दिल्ली भाजपा क्या करेगी !
भाजपा का दिल्ली में अपना ऐसा वजूद क्यों नहीं है कि वो अपने बल पर चुनाव जीतने का साहस कर सके ! इतने लम्बे समय तक दिल्ली की सत्ता काँग्रेस के पास रही उसके बाद भी भाजपा उनसे सत्ता छीनने का साहस नहीं कर सकी जबकि साल दो साल पुरानी आमआदमीपार्टी सत्ता के समीप तक पहुँच गई !
भाजपा पुरानी पार्टी है उसके पास एक से एक बड़े नेता हैं उसके पास देश की सत्ता है उसका अतीत निष्कलंक एवं गौरवपूर्ण है स्वच्छ छवि का बेदाग़ नेतृत्व पाना भाजपा का हमेंशा से सौभाग्य रहा है संघ एवं उसके तमाम आनुषंगिक संगठनों के तपस्वियों का वरदहस्त जिसके शिर पर हो उस दिल्ली भाजपा के डग निहत्थे (सत्तारहित) केजरीवाल का सामना करने में डगमगा क्यों रहे हैं ! केजरीवाल को तो दिल्ली भाजपा जैसी सुविधाएँ नहीं प्राप्त हैं फिर भी केजरीवाल अकेले ललकार रहे हैं ये उनका साहस है जबकि उनके बहुत साथी उन्हें छोड़कर जा चुके हैं फिर भी केजरीवाल के उत्साह में कोई कमी नहीं है किन्तु भाजपा में बड़े से बड़े लोग केजरीवाल पर निशाना साधते दिख रहे हैं, दिल्ली में अभी हाल ही में हुई भाजपाई रैली में लोगों की उपस्थिति अपेक्षा से कम क्या रही भाजपा ने प्रसिद्ध पुरुषों के लिए न केवल अपने दरवाजे खोल दिए अपितु ऐसे लोगों की भर्ती धड़ाधड़ चालू कर रखी है ! कुछ लोग तो कलतक भाजपा को कोसते रहे किन्तु प्रसिद्ध हैं इसलिए उनकी भी भाजपा को आज जरूरत है !
दशकों से समर्पित भाजपा के अपने पुराने कार्यकर्ता लोकरंजन के अभाव में जंगजर्जरित होने के कारण चमक छोड़ते जा रहे हैं ! न वो भाजपा को छोड़ रहे हैं और न उन्हें भाजपा छोड़ रही है या यूँ कह लें कि वो भाजपा को ढो रहे हैं और भाजपा उन्हें ढो रही है ! उन्होंने भाजपा में घुसने वालों के लिए रास्ता जरूर रोक रखा है अर्थात किसी भले और योग्य आदमी को भाजपा में अब घुसने नहीं देंगे और किसी प्रकार से कोई यदि घुसने में सफल हो भी गया तो उसको कोई ऐसा काम देंगे जिससे उसकी पहचान न बन सके इसी आदत के कारण भाजपा के पास आज योग्य कार्यकर्ताओं का टोटा पड़ा है यही कारण है कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को भी इस बात का ज्ञान हो गया है यदि पता लग ही गया है कि अपने कार्यकर्ताओं के बल पर दिल्ली के चुनाव जीते नहीं जा सकते और न ही इनके बलपर केजरीवाल का सामना ही किया जा सकता है ! ऐसी परिस्थिति में ऐन चुनावों के समय विभिन्न क्षेत्रों के प्रसिद्ध लोगों को इम्पोर्ट करने से अच्छा है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व अपनी कार्यकर्ता मैन्यूफैक्चरिंग पालसी में ऐसा सुधार करे जिससे जनसेवाव्रती सोर्स सिफारिस विहीन धनहीन कार्यकर्ताओं को भी अपनी प्रतिभा प्रदर्शन का उचित अवसर एवं मंच मिले और पार्टी को जनसेवा समर्पित कार्यकर्ता मिल सकें जो हर परिस्थिति से जूझने को तैयार रहें समाज भी उनको अपना संपूर्ण समर्थन दे !अन्यथा इसप्रकार से इम्पोर्ट किए गए लोग जन सेवा के उद्देश्य से न कभी आते हैं और न ही करते हैं केवल शीर्ष नेतृत्व की विरुदावली बाँचते रहते हैं किन्तु कुछ कर पाना उनके बश का नहीं होता है।
आज लोगों में आज आम राय है कि ऐसी बातों के लिए दिल्ली भाजपा के लोगों का विश्वास नहीं है क्या ! वो लोग आखिर कर क्या रहे हैं जो जनता का विश्वास जीतने में सफल ही नहीं हुए और अपनी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को भी विश्वास में नहीं ले पाए ! आज प्रान्त में पार्टी की पूरी टीम के मौजूद रहते हुए भी इसी राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टी के अध्यक्ष को केजरीवाल जैसे राजनैतिक विश्वसनीयता विहीन व्यक्ति का सामना करने के लिए स्वयं आगे आना पड़े ! इससे दिल्ली भाजपा का महत्व बढ़ता नहीं अपितु घटता है उचित तो ये है कि ऐसी बातों का सामना दिल्ली भाजपा को स्वयं करना चाहिए न कि केंद्रीय नेतृत्व को !
भाजपा की दिल्ली विजय पर भारी 4 विजयsee more...http://snvajpayee.blogspot.in/2012/10/4_25.html
Friday, 16 January 2015
बाबाओं को भजने वाले लोग धार्मिक होते हैं क्या ?क्योंकि बाबा लोग उन्हें अपनी माया में ही भरमाए रहते हैं भगवान की ओर तो फटकने भी नहीं देते हैं !
आज बाबाओं से करोड़ों लोग प्रभावित हैं किंतु बाबाओं के अनुयायियों की बढ़ती संख्या का कारण उनके द्वारा किए जा रहे पुण्य हैं या पाप ! इसका मूल्यांकन कैसे हो !
जो शास्त्रों के अनुशार चलें वे संत और जो शास्त्रों को अपने अनुशार चलावें वे बाबा !संत तो अभी भी समाज को दिशा देने लगे हुए हैं किन्तु बाबाओं ने नरक फैला रखा है ।देखो निर्मल बाबा टाइप के लोगों को भाग्य बदलने की फ्रेंचायजी लिए घूम रहे हैं !
आज किसी धन हीन आदमी का मन फ़िल्म बनाने का है तो बाया बाबा वो फ़िल्म बना सकता है अर्थात पहले कुछ वर्ष तक धन इकठ्ठा करने के लिए उसे बबई करनी अर्थात बाबा बनना पड़ेगा !और इसप्रकार से धन संग्रह हो जाने के बाद वो फिल्में बना सकता है बेच सकता है दवा बेच सकता है ज्योतिष वास्तु योग आदि कुछ भी बेच सकता है और कितना भी धन जुटा सकता है उसके बाद कितने भी सुख साधन बना सकता है गाड़ी घोड़ा ट्रेन जहाज तक सब कुछ !वो टीवी चैनलों पर कुछ भी बक या बया सकता है ऐसे लोग एक नहीं हजार विवाह कर लें किन्तु कोई क्या कर लेगा इनका !पैसा हो तब विवाह तो बुढ़ापे में भी हो जाता है और जैसा चाहो वैसा हो जाता है ।बाबा बनने के बाद किए गए व्यापार में सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि इसमें घाटा होने पर किसी का कुछ देना नहीं होता है फिर नया शुरू किया जा सकता है जबकि कोई ईमानदार गृहस्थ व्यापारी यहीं पर टूट जाता है क्योंकि उसे मूल भी देना होता है और ब्याज भी !
समाज की स्थिति यह है कि अभ्यास न होने के कारण जप तप व्रत उपवास आदि के शास्त्रीय कठिन विधानों से भयभीत लोग चाहते हैं कि उन्हें कुछ छूट मिले किंतु छूट मिले कहाँ से शास्त्र लिखने वाले तो लिखकर चले गए अब छूट दे कौन !जबकि सनातन हिन्दू धर्म का मूल तो शास्त्र ही है जो वेद शास्त्र आदि में नहीं है वो धर्म कैसा !इसलिए यहाँ तो शास्त्रीय विधानों का पालन ही होता है इसलिए धार्मिक दृष्टि से आलसी लोग अपनी पुजास शांत करने के लिए अपना आचरण बदलने की अपेक्षा अपना भगवान बदल लेते हैं - ऐसे आलसी लोग तो श्री राम के स्थान पर साईंराम, आशाराम, कांशीराम, रामरहीम, रामदेव ,राम विलास आदि किसी को भी अपनी अपनी श्रद्धा विश्वास के अनुशार भगवान मानने लग जाते हैं ।
यदि उनके पुण्य का प्रभाव होता तो समाज में भी उसका असर दिखाई देना चाहिए अर्थात अपराधों का ग्राफ घटना चाहिए था समाज में सात्विकता का विस्तार होना चाहिए था किंतु रोज रोज हो रहे बलात्कार जैसे और भी अनेकों अपराध धर्म के नाम पर किए जा रहे कलियुगी बाबाओं के हाईटेक आचरण के ही साइडइफेक्ट हैं !माना कि चीटियाँ मिठाई में अधिक होती हैं किन्तु हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि मिठाई से अधिक चीटियाँ गंदगी में भी होती हैं इस बात को झुठलाया कैसे जा सकता है !इसलिए जैसे सुगंध और दुर्गन्ध के द्वारा हम अच्छाई बुराई का ज्ञान कर लेते हैं उसी प्रकार से समाज में बढ़ती अच्छाइयों से भीड़ को अच्छी एवं बुराइयों से बाबाओं की भीडों को बुराई के लिए इकठ्ठा हुआ जन समूह समझना चाहिए !
जो चीज जितनी ज्यादा घटिया मिलावटी सस्ती सरल सहज ग्राह्य होगी विस्तार उसी का उतना अधिक होगा ! जबकि हितकारी औषधि कड़वी होती है उसे लेने वालों की भीड़ कहाँ देखी जाती है भीड़ें तो जनरल कोच में होती हैं रिजर्वेशन में नहीं !रही बात धार्मिक लोगों के विदेशों तक प्रचारित होने की तो जहाँ लोग हिंदी भी न बोल पाते हों वहां योग जैसे शास्त्रीय विज्ञान को समझेगा कौन !वहां तो जो बक आओ वह शास्त्र ही है !
देव मंदिरों में लोग जाते हैं तो उन्हें पाप छोड़कर जाने की सीख दी जाती है इसपर साईं वालों ने नारा दिया कि कैसे भी कर्म करो साईं सब माफ कर देते हैं क्योंकि बाबा बड़े दयालू हैं !इससे पाप न छोड़कर धर्म करने की इच्छा रखने वाले लोगों के लिए धार्मिक डालडा के रूप में साईं की छत्रछाया मिल गई या यूँ कह लें कि पाप करते हुए धर्मात्मा कहलाने का लाइसेंस मिल गया !
Thursday, 15 January 2015
साईं वाले
साईं वाले भी साईं पर भरोसा नहीं करते हैं !
इसलिए वो न केवल श्री राम से भी चिपके रहना चाहते हैं अपितु साईं को भी श्री राम से चिपका कर रखना चाहते हैं इसीलए तो साईं के नाम में भी श्री राम के नामको बिल्डिंग करा रखा है ! ये साईं वाले धार्मिक मनोरंजन तो साईं के साथ करना चाहते हैं किन्तु भरोसा श्री राम पर ही करते हैं ।
साईं वाले जिसको पूजते हैं उस पर विश्वास नहीं करते और जिस पर विश्वास करते उसे पूजते नहीं !
साईं वालों की अजीब दुविधा है जिसकी पूजा करते हैं उस पर भरोसा नहीं करते और जिन पर भरोसा करते हैं उन्हें पूजने से मन ऊभ गया है ।
साईं वालों की ऐसी मजबूरी क्या थी कि वे देवी देवताओं के रहते किसी बुड्ढे आदमी को पूजने लगे !
क्योंकि वे देवी देवता कहते हैं कि चोरी छिनारा हत्या बलात्कार आदि पाप छोड़ कर हमारी पूजा करो तो लाभ मिलेगा तो साईं वालों ने कहा सब कुछ करते रहे और बाबा के पास आते रहो क्योंकि बाबा बहुत दयालू हैं यह सुनते ही पाप की कमाई से कालाधन नीलाधन हराधन गुलाबीधन आदि रखने वाले पापप्रिय लोग सारे अपराधों में संलिप्त रहते हुए भी साईं पत्थरों पर चढाने लगे सोने चंडी के मुकुट हार पादुकाएं आदि आदि और भी बहुत कुछ !ऊपर से यहाँ तो चढ़ावा बहुत आता है किन्तु ऐसा आता है यह नहीं बताते देने वालों की संपत्ति स्रोतों की एक बार यदि ईमानदारी पूर्वक जाँच हो जाए तो न केवल सारे दाँत बाहर आ जाएँ अपितु काला, नीला, हरा और गुलाबी आदि सभी प्रकार का धन मिनटों में खटाखट गिरने लगेगा !और सबको पता लग जाएगा कि बाबा कितने बड़े दयालू हैं !
साईं वाले कहते हैं कि 'बाबा बड़े दयालू हैं !' यदि ऐसा है तो वो देवी देवताओं को क्या मानते हैं !और यदि देवी देवताओं की दया पर भरोसा नहीं है तो क्या झख मारने जाते हैं देव मंदिरों में !
बंधुओ ! ये भटके हुए लोग बुड्ढे की प्रशंसा और प्रचार प्रसार में
ऐसे ऐसे तर्क देते हैं जो किसी जी भी जीवित व्यक्ति के गले नहीं उतरते हैं
,आप स्वयं सोचिए बाबा बड़े दयालू हैं तो कृपासिंधु श्री राम,श्री कृष्ण,श्री
शिव जी एवं श्री दुर्गा आदि देवी देवता क्या दयालू नहीं हैं ! साईं वाले
ये निरक्षर भट्टाचार्य लोग वेद शास्त्रअभी सम्मत एवं वेद मन्त्रों के
द्वारा पीढ़ियों से पुजते चले आ रहे श्री राम,श्री कृष्ण,श्री शिव जी एवं श्री दुर्गा आदि देवी देवताओं को सस्पेंड करना चाह रहे हैं और वहाँ
साईं पत्थरों को फिट करना चाह रहे हैं !ऐसे टुच्चे लोगों की ऐसी वेद
शास्त्र निन्दित घिनौनी हरकतों को क्या सह जाएगा सनातन धर्मी हिन्दू समाज !
साईं वालों को यह नहीं सोचना चाहिए कि कलियुग के कारण भगवान को भूल जाएँगे लोग !
साईं वालों को यह नहीं सोचना चाहिए कि कलियुग के कारण भगवान को भूल जाएँगे लोग !
साईं व्यापारियों को इस धोखे में नहीं रहना चाहिए कि कलियुग के प्रभाव के
कारण लोग श्री राम कृष्ण आदि देवी देवताओं को भूल जाएँगे और साईं जैसे भूत
प्रेतों को पूजने लगेंगे ! अपने देवी देवताओं के प्रति सनातन धर्मी
हिन्दुओं का समर्पण इतना अधिक है कि जब जब उनके सम्मान स्वाभिमान पर आँच
आती है तब तब हिंदू बेचैन हो उठता है अाखिर अभी अयोध्या आंदोलन को बहुत
वर्ष नहीं बीते हैं सरकारों के छक्के छुड़ा दिए थे राम भक्तों ने ,सारा
भारतवर्ष रोड़ों पर उमड़ पड़ा था विश्व के विराट फलक पर असंख्य बार प्रमाणित
हो चुका है कि किसी भी कीमत में अपने देवी देवताओं की प्रतिष्ठा से समझौता
सनातन धर्मी हिन्दू नहीं कर सकते ! जैसे अगर कोई अपना बाप बदल ले तो उसका
खानदान अपने आप ही बदल जाता है वो अलग से बदलना नहीं पड़ता !ठीक इसी प्रकार
से जो अपना ईश्वर बदल ले उसे अपना धर्म बदलना नहीं पड़ता है वो अपने आप ही
बदल जाता है ! इसलिए जो श्री राम को छोड़ कर साईंराम का हो गया वो हिंदू किस बात का !
साईं नाम से शिरडी संस्थान में केवल दो ही काम होते हैं!
पहला काम केवल लड्डू बनाए और बेचे जाते हैं दूसरा काम चन्दा इकठ्ठा किया जाता है वहाँ धर्म जैसा आडम्बर करके धर्म का धंधा जरूर किया जाता है किन्तु धर्म नाम की कोई चीज नहीं है !साईं के यहाँ धर्म को न किसी ने पढ़ा है और न समझा है केवल धन इकठ्ठा करने किए बिना शिर पैर वाले साईं जैसे काल्पनिक पात्रों की मूर्तियाँ बनवाकर मंदिरों में देवी देवताओं की तरह पुजने पुजाने का ड्रामा करना ही साईं संस्थान का काम है जो ठीक नहीं है !
साईं नाम से शिरडी संस्थान में केवल दो ही काम होते हैं!
पहला काम केवल लड्डू बनाए और बेचे जाते हैं दूसरा काम चन्दा इकठ्ठा किया जाता है वहाँ धर्म जैसा आडम्बर करके धर्म का धंधा जरूर किया जाता है किन्तु धर्म नाम की कोई चीज नहीं है !साईं के यहाँ धर्म को न किसी ने पढ़ा है और न समझा है केवल धन इकठ्ठा करने किए बिना शिर पैर वाले साईं जैसे काल्पनिक पात्रों की मूर्तियाँ बनवाकर मंदिरों में देवी देवताओं की तरह पुजने पुजाने का ड्रामा करना ही साईं संस्थान का काम है जो ठीक नहीं है !
Wednesday, 14 January 2015
हिंदुओ सावधान ! भारतीय तिथि त्योहारों पर तारीखों का आक्रमण !!!
मकरसंक्रांति के नाम पर मनाई गई 14 जनवरी को धनुसंक्रांति !
मकर संक्रांति लग रही है 14 और 15 जनवरी 2015 की रात12 बजे के बाद उसके बाद अगली सुबह अर्थात 15 जनवरी को उदित होगा मकर संक्रांति का पुण्यकाल तब मनाई जानी चाहिए 15 तारीख़ को मकर संक्रांति!किन्तु मकर संक्रांति की जगह 14 जनवरी मनाने वाले लोग मकर संक्रांति के नाम पर नदियों तालाबों में धोते घूम रहे हैं शरीर !काश वे भी समझ पाते मकर संक्रांति की शास्त्रीय अवधारणा एवं उसके पुण्यकाल की महिमा !
आधुनिकता की चपेट में भारतीय संस्कृति फँस गई है इसको बचाने के लिए भी आगे आना होगा, संगठित होना होगा एवं धार्मिकता से सम्बंधित हर निर्णय धर्म शास्त्रीय विद्वानों से ही लेना उचित होगा और उसी को निष्ठा पूर्वक मानना उचित होगा अन्यथा आज हिंदुओं का हर त्यौहार दो दिन मनाया जाने लगा है जो उचित नहीं है अपितु ये तो त्योहारों की पवित्र परंपरा का उपहास है ।
हमारे यहाँ निर्णय सिंधु और धर्म सिंधु जैसे महान ग्रंथों में संगृहीत विभिन्न वेदों पुराणों स्मृतियों और ऋषियों के महान मंतव्यों के आधार पर तिथि त्योहारों व्रतों एवं विधि निषेधों की परिकल्पना की गई है जो अनंत काल से चली आ रही है ।
आज संस्कृत भाषा कठिनाई एवं इसकी सामाजिक उपेक्षा के कारण लोग संस्कृत भाषा के अध्ययन से विमुख होने लगे इससे संस्कृत ग्रंथों में छिपा ज्ञान विज्ञान तर्क संगत परंपराएँ लुप्त होने लगी हैं ।
हिंदुओं के तिथि त्योहारों व्रतों एवं षोडश संस्कारों की सच्चाई को भ्रमित करने के लिए विधर्मियों ने इतने अधिक कुचाल चला रखे हैं कि हिन्दू लोग आधुनिकता के नाम पर भूल जाएँ अपना गौरवशाली इतिहास और विधर्मियों के कल्पित तिथि त्यौहार व्रत संस्कार मंदिर और वैसे ही देवता बना कर अपने द्वारा रचित षडयंत्रों में फँसाते जा रहे हैं हिन्दुओं को ! ऐसे ही पापियों ने साईं बुड्ढे को न केवल देवता बता दिया अपितु मंदिरों में घुसा दिया !पूज रहा है बुड्ढा !ये सनातन धर्म का उपहास नहीं तो और क्या है ?
हर त्यौहार दो मनाए जाने लगे,जन्मदिन में केक काटने और अपनी संतानों से दीप जलने के अवसर पर दीप बुझवाने लगे ऐसे हमारे संस्कारों को रूढ़िवादिता कहकर उनकी निंदा करके अपने कल्पित कुसंस्कार हम पर थोपने लगे। मित्रता जैसे पवित्र शब्द का प्रयोग मूत्रता के लिए करने लगे अर्थात जिससे सेक्स किया जा सकता है वहीं मित्रता हो सकती है उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि माता पिता के अनुशासन से त्रस्त अवारा कुत्तों की तरह बेशर्म जोड़े पार्क आदि सार्वजनिक स्थलों पर बुझा रहे होते हैं अपनी सेक्स प्यास !जब तक सेक्स तब तक सम्बन्ध अन्यथा दुश्मनी वो कितनी भी बढ़ जाए ! ऐसे क्षणभंगुर संबंधों के लालची लोगों ने सतत सम्माननीया नारी जाति का प्रयोग सेक्स पौशालाओं की तरह 'यूज एंड थ्रो' करना सिखा दिया है !ऊपर से कहते हैं पवित्र प्रेम परमात्मा का स्वरूप होता है !आधुनिकता के नाम पर कितनी गंध घोल रहे हैं ये लोग !
दीवाली के पटाखों में घातक बारूद एवं होली के रंगों में कीचड़ कालिख कैमिकल जैसे घातक प्रयोगों के द्वारा त्योहारों से घृणा पैदा करना सिखा रहे हैं ये लोग !त्योहारों की मस्ती के नाम पर नशा करना सिखा रहे हैं ये लोग !इस प्रकार से समाज की सनातन धर्मी शास्त्रीय मान्य मान्यताओं को मिटाकर विदेशी ज्ञान विज्ञान को थोपा जा रहा है !आज हर ज्ञान विज्ञान के खोजकर्ता के रूप में किसी विदेशी का नाम रटाया जा रहा है सबसे पहले जगदीश चंद बसु ने बेतार के तार अर्थात रेडियो की खोज की थी किन्तु मार्कोनी पढ़ाया जा रहा है !
अगर हिन्दू यों ही ढीला होता चला गया तो विधर्मी लोग तुम्हारे पास कुछ नहीं रहने देंगे सब कुछ छीन कर तुम्हें अपने आधीन कर लेंगे और जैसे नचाएंगे वैसे नाचेंगे हिन्दू !
आज धर्म के नाम पर आम पंडितों पुजारियों के पास विवाह पद्धति ,सत्य नारायण व्रत कथा ,गरुड़ पुराण और पञ्चांग जैसी केवल ये चार चीजें होती हैं इसी बल पर वो चारों वेदों पुराणों के विषय के बड़े बड़े निर्णय दे देते हैं यही स्थिति बाबा समाज की है जिस सुख भोग के महँगे महँगे संसाधन जुटाने के लिए भारी भरकम परिश्रम करना पड़ता फिर भी सुलभ होते या न होते किन्तु केवल वेष और बेशर्मी के आधार पर सैकड़ों के बाबा चूरन चटनी बेचकर करोड़ों अरबों के हो गए !ऐसे लोगों के अशास्त्रीय कर्मों से शास्त्रीय संत समाज शर्मिंदा है किन्तु करे क्या ?
ज्योतिष वास्तु के नाम पर कितनी धोखा धड़ी चल रही है भागवत कथाओं के नाम पर नाच गाना हो रहा है। रजस्वला अवस्था जैसी स्थिति में भी वो भागवत की पोथी पढ़ने का ड्रामा करती फिर रही हैं जिन्हें छूना भी शास्त्र ने निषेध किया है जिन्हें स्वतः शास्त्रीय बचनों पर भरोसा नहीं है वे किस मुख से औरों को समझा रहे या रही हैं भागवत !
Tuesday, 13 January 2015
काँग्रेस न रेस में न देश में बेकार पसोपेश में !
दिल्ली के चुनावी स्वयंबर में घूँघट हटा कर सीधे सामने आने में शर्मा क्यों रही है काँग्रेस ?
काँग्रेस न रेस में न देश में बेकार पसोपेश में !
उम्र बीत जाने एवं शरीर में झुर्रियाँ पड़ जाने के बाद भी स्वयंबर में भाग लेने के लिए उतावली कन्या की भाँति अकारण शर्माने जैसा है दिल्ली चुनावों में लजाते हुए धीरे धीरे काँग्रेस बढ़ना !
काँग्रेस न रेस में न देश में बेकार पसोपेश में !
उम्र बीत जाने एवं शरीर में झुर्रियाँ पड़ जाने के बाद भी स्वयंबर में भाग लेने के लिए उतावली कन्या की भाँति अकारण शर्माने जैसा है दिल्ली चुनावों में लजाते हुए धीरे धीरे काँग्रेस बढ़ना !
कहाँ दिखता है अब ' पुलिस में पराक्रम '
सरकारी कर्मचारियों पर प्राइवेट वाले भारी पड़ते हैं आखिर क्यों ?
सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं सरकारी अस्पतालों में दवाई नहीं, डाककर्मियों में सुनवाई नहीं ,सरकारी फोन या इंटरनेट की स्थिति डामाडोल है ! सरकारी अधिकारी एवं कर्मचारियों में काम करने के प्रति न तो निष्ठा होती है और न ही उत्साह ! न ही वो जनता की समस्याएँ सुनते हैं और यदि सुन लेते हैं तो बस सुन ही लेते हैं उस पर कार्यवाही भगवान भरोसे ही होती है !ऐसे लोग बस केवल जिए जा रहे हैं और जीने के कारण आफिस चले आ रहे हैं घर चले जा रहे हैं आफिस वाले कोई काम करवा पाते हैं तो करवा लेते हैं और न करवा पावें तो न सही आखिर उनका कोई कर क्या लेगा ! सरकारी नौकरी का मतलब एक जिंदगी के लिए सरकार के मत्थे मढ़ जाना !
सरकारी वालों का काम तो सैलरी लेना होता है !काम से उनका कोई ख़ास मतलब नहीं होता है इसलिए उनका नाम भी उतना नहीं होता है जितना प्राइवेट का होता है ,प्राइवेट स्कूल, अस्पताल आदि सेवाओं से अपना विश्वास जनता में जागते हैं अगर विश्वास टूटने लगता है तो जी जान लगा देते हैं पर विश्वास बचाकर रखते हैं किन्तु सरकारी वालों को इस बात का संकोच ही कहाँ होता है अपितु सरकारी शिक्षक भी अपने बच्चों को पढ़ने के लिए प्राइवेट स्कूलों में ही भेजने लगते हैं इतने स्वाभिमान विहीन होते हैं ये लोग !ये किस मुख से देंगे औरों को शिक्षा और जिसको देंगे उसके जीवन में क्या भर पाएँगे ईमानदारी के बहुमूल्य संस्कार !
यही स्थिति सरकार के अन्य विभागों की है !
पुलिस वाले सरकारी होते हैं और अपराधी प्राइवेट , नाम तो प्राइवेट का ही होता है !क्योंकि काम तो प्राइवेट वाले ही करते हैं ! नाम भी उन्हीं का होता है अपराध की खबरों से अखवार भरे पड़े होते हैं जबकि पुलिस का पराक्रम कहीं झलक जाता है किन्तु जिस दिन पुलिस का पराक्रम खबरों में छा जाएगा उसदिन अपराधों पर नकेल लग जाएगी !
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