Monday, 22 February 2016

संत रविदास जी जैसे महापुरुषों के सम्मान का कारण उनका आदर्श है आरक्षण नहीं !

       पवित्र आचरण करने वाला व्यक्ति किसी भी जाति सम्प्रदाय में जन्म ले उसे सम्मान मिलता ही है और अपने आचरण ही अच्छे न हों  तो कितनी भी बड़ी आरक्षण जैसी सुविधाएँ किसी का सम्मान उत्साह और अनुभव नहीं बढ़ा सकतीं !
   कहने को तो रैदास जी का जन्म काशी में चर्मकार (चमार) कुल में हुआ था और काम भी कोई प्रतिष्ठित नहीं था जूते बनाने का काम उनका पैतृक व्यवसाय था अपने काम को पूरी लगन तथा परिश्रम पूर्वक समय से  पूरा करने पर वे बहुत ध्यान देते थे।वे मधुर व्यवहार के धनी थे !इसीलिए उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी उनसे बहुत प्रसन्न रहते थे।वे परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था।
      ऐसे महापुरुषों को अपना आदर्श बताने वाले लोग 'दलितउद्योग' चला रहे हैं आरक्षण माँग रहे हैं संत रविदास तो देना सीखे थे माँगना तो उनके स्वभाव में ही नहीं था !वैसे भी माँगने वालों से लोग घृणा करते हैं जबकि देने वालों का सम्मान होता ही है।संत रविदास आज भी अपने गुणों के कारण ही सम्मानित हैं न कि आरक्षण के कारण !उनसे वर्तमान समाज को भी प्रेरणा लेनी चाहिए !
       'दलितउद्योग'चलाने वाले नेता और नेत्रियाँ संत रविदास का नाम लेकर वोट तो माँगना चाहते हैं किंतु उनके आदर्शों का पालन नहीं करना चाहते  !संत रविदास ने अपनी जाति कभी नहीं छिपाई और न ही कभी अपने काम को हीन  भावना से देखा !जातियों को कैस करने की बात तो उन्होंने कभी स्वप्न में भी नहीं सोची होगी । उन्होंने अपनी पहचान अपाहिजों बीमारों जैसी कभी नहीं बनने दी जैसे आजकल होता है कि हमें आरक्षण नहीं मिला तो हम आगे नहीं बढ़ सकते !जबकि वे तो  अपने परिश्रम एवं त्याग पर भरोसा करते थे ! 
    उनकी प्रेरणा से इतना स्वाभिमान तो सबके अंदर होना चाहिए कि अपना विकास एवं अपने बच्चों का पालन पोषण हम आरक्षण जैसी सरकार की किसी की कृपा से नहीं अपितु अपनी कमाई और अपने  बलपर करेंगे !जो लोग ऐसा करते हैं उनके बेटा बेटियों के मन में भी उनकी इज्जत हमेंशा बनी रहती है उनके बच्चे भी अपने माता पिता के आदर्श जीवन पर हमेंशा गर्व करते  हैं किन्तु जब माता पिता ही भूतपूर्व आरक्षण  भोगी रह चुके होते हैं तो बच्चे भी सोचते हैं कि किसी लायक ही होते तो क्यों समाज पर बोझ बनते और क्यों हमें बनाते !सवर्णों की  तरह तरक्की करने का विकल्प तो उनके पास भी खुला हुआ था वो बीमार अपाहिज तो थे नहीं कि आरक्षण के बिना आगे नहीं बढ़ सकते थे । वो चाहते तो सवर्णों की निंदा करने के बजाए अपनी टर्की भी तो कर सकते थे  और समाज को दिखा सकते थे कि हम बिना आरक्षण के बल पर भी अपनी तरक्की कर सकते हैं !     केवल  'दलित का बेटा' और 'दलित की बेटी' बनकर जो लोग विधायक सांसद मंत्री मुख्यमंत्री जैसे बड़े पद हथिया  लेना चाहते हैं इसके बाद घपले घोटाले करके अरबों खरबोंपति बनकर अरबों खरबों की संपत्ति इकट्ठी करलेते हैं ऐसे लोग जिसके लिए प्रत्यक्ष तौर पर कहीं कोई व्यापार करते नहीं देखे जाते और न ही इसके लिए उनके पास समय ही होता है कुल मिलाकर सत्ता मिलते ही अरबों रूपए इकट्ठे कर लेने वाले दलित नेताओं नेत्रियों को चाहिए कि संत रविदास जैसे महापुरुषों से वे भी कुछ सीखें !
संत रविदास जी जातियाँ समाप्त करने की बातें तो करते रहे किंतु जातियों के नाम पर आरक्षण जैसे हथियारों से सवर्णों का हक़ हड़पने की भावना उनमें दूर दूर तक नहीं थी यथा - 
दो. जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।
    "वो कहते हैं कि जब तक जातियाँ रहेंगी तब तक मनुष्य आपस में जुड़ नहीं पाएँगे !"
    उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा अरे भिखमंगो !भगवान को छोड़कर किसी और से माँगने वालो तो और कुछ मिले न मिले तुम यमराज के लोक जरूर आओगे -
दो. हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आस।
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास।।
     किंतु संत रविदास जी के पवित्र आदर्शों एवं संदेशों पर भरोसा न करने वाले लोग आज आरक्षण माँगने के लिए या अन्य तमाम प्रकार की अन्य सरकारी सुविधाएँ लेने के लिए जातियों को जीवित रखना चाहते हैं । नेता  नेत्रियों को परवाह ही नहीं है संत रविदास जी के पवित्र आदर्शों की !अन्यथा वो भी सवर्णों की तरह ही अपना एवं अपने बच्चों के भरण पोषण को बोझ स्वयं उठाते अपने परिश्रम से कमाए हुए भोजन से आधेपेट भी रह लेते तो उस कमाई में स्वाभिमान तो होता आत्म सम्मान की भावना बनती बच्चों को भी ऐसे आदर्श जीवन से प्रेरणा मिलती बच्चे अपने माता पिता पर गर्व करते !किंतु आरक्षण की सुविधा लेकर लोग कितने भी ऊँचे पदों पर क्यों न पहुँच जाएँ फिर भी उनके मन से हीन  भावना नहीं जाती !
   जो सवर्ण बालक शिक्षा में वास्तव में अच्छे रहे होते हैं किंतु ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य आदि वर्ग के होने के कारण योग्य होने पर भी वो अवसर उनसे छीनकर उन लोगों को दे दिया जाता है जो उस योग्य नहीं थे !अयोग्य लोगों को योग्य स्थान पर बैठाने से काम तो होता ही नहीं है अपितु उस पद का सम्मान भी घट जाता है इसलिए योग्यता में जूनियर लोगों को आरक्षण के बलपर सीनियर बना देने से कोई सीनियर हो जाएगा क्या !
    यदि घोड़े की खाल गधों को ओढ़ाकर उन्हें घोड़े नहीं बनाया जा सकता तो आरक्षण भी तो एक ऐसी खाल की तरह ही है आरक्षण की आड़ में कम मेहनत करके केवल पेट भरा जा सकता है तरक्की नहीं की जा सकती !क्योंकि तरक्की की इच्छा रखने वाले किसी भी व्यक्ति को अपना बलिदान देना होता है संघर्ष स्वयं करना होता है !
  • कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।
    वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।
  • कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
    तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।
  • रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।
    तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।
  • हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा।
    दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।।
मन चंगा तो कठौती में गंगा।

  • वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की।
सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की।।

     उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे। कुछ समय बाद उन्होंने रैदास तथा उनकी पत्नी को अपने घर से अलग कर दिया। रैदास पड़ोस में ही अपने लिए एक अलग झोपड़ी बनाकर तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करते थे और शेष समय ईश्वर-भजन तथा साधु-सन्तों के सत्संग में व्यतीत करते थे।
    एक बार एक पर्व के अवसर पर पड़ोस के लोग गंगा-स्नान के लिए जा रहे थे। रैदास के शिष्यों में से एक ने उनसे भी चलने का आग्रह किया तो वे बोले, गंगा-स्नान के लिए मैं अवश्य चलता किन्तु एक व्यक्ति को जूते बनाकर आज ही देने का मैंने वचन दे रखा है। यदि मैं उसे आज जूते नहीं दे सका तो वचन भंग होगा। गंगा स्नान के लिए जाने पर मन यहाँ लगा रहेगा तो पुण्य कैसे प्राप्त होगा ? मन जो काम करने के लिए अन्त:करण से तैयार हो वही काम करना उचित है। मन सही है तो इसे कठौते के जल में ही गंगास्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है। कहा जाता है कि इस प्रकार के व्यवहार के बाद से ही कहावत प्रचलित हो गयी कि - मन चंगा तो कठौती में गंगा। रैदास ने ऊँच-नीच की भावना तथा ईश्वर-भक्ति के नाम पर किये जाने वाले विवाद को सारहीन तथा निरर्थक बताया और सबको परस्पर मिलजुल कर प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया।
वे स्वयं मधुर तथा भक्तिपूर्ण भजनों की रचना करते थे और उन्हें भाव-विभोर होकर सुनाते थे। उनका विश्वास था कि राम, कृष्ण, करीम, राघव आदि सब एक ही परमेश्वर के विविध नाम हैं। वेद, कुरान, पुराण आदि ग्रन्थों में एक ही परमेश्वर का गुणगान किया गया है।
कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा। वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।
उनका विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परहित-भावना तथा सद्व्यवहार का पालन करना अत्यावश्यक है। अभिमान त्याग कर दूसरों के साथ व्यवहार करने और विनम्रता तथा शिष्टता के गुणों का विकास करने पर उन्होंने बहुत बल दिया।
कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।
उनके विचारों का आशय यही है कि ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है। अभिमान शून्य रहकर काम करने वाला व्यक्ति जीवन में सफल रहता है जैसे कि विशालकाय हाथी शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है जबकि लघु शरीर की पिपीलिका (चींटी) इन कणों को सरलतापूर्वक चुन लेती है। इसी प्रकार अभिमान तथा बड़प्पन का भाव त्याग कर विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर का भक्त हो सकता है।

Saturday, 20 February 2016

आरक्षण की आग लगाकर राजनीति करना बंद किया जाए !
किसी को आरक्षण नहीं मिलेगा तो कोई नहीं माँगेगा !
गरीबत और मुशीबत  जातियाँ देखकर नहीं आते
 तो मदद और सुविधाएँ जातियाँ देखकर क्यों दी जाती हैं !




सवर्णों के पूर्वजों ने कभी किसी का शोषण नहीं किया !
 सवर्णों के आपसी युद्धों में सवर्ण लोग मारे गए ! परशुराम जी के पूर्वजों को क्षत्रियों ने मारा !
क्षत्रियों को परशुराम जी ने मारा ! क्षत्रिय श्री राम ने ब्राह्मणों (रावण )को मारा ! ऐसे युद्धों से सवर्णों की संख्या घट गई तो संपत्ति बढ़ गई !दूसरी ओर दलितों ने केवल अपनी जनसंख्या बढ़ाई तो संपत्ति घटनी ही थी इसमें सवर्णों का क्या दोष !सवर्णों ने दलितों का शोषण किया भी क्यों होगा दलितों के पास था क्या ?

बुरे लोगों ने राजनीति की राह इतनी रपटीली कर दी है कि भले लोगों का राजनीति में घुस पाना दिनोंदिन कठिन होता जा रहा है !


Friday, 19 February 2016

राजनीति अपराधियों का आँगन है जहाँ फूलते फलते हैं सभी प्रकार के अपराध !

  राजनीति वो वेश्या है जिसे शिक्षा, सद्गुण एवं सच बोलना पसंद ही नहीं है सारे अपराधी जन्म लेते हैं ऐसी ही राजनीति की कोख से  ! 

   जो नेता लोग खुद तो गंदी गंदी गंभीर गालियाँ दे जाते हैं और कोई दूसरा उन्हें 'तू' भी कह दे तो सिक्योरिटी माँगने लगते हैं और सिक्योरिटी उन्हें मिल भी जाती है फिर तो स्वतंत्र रूप से निर्भीक होकर देने लगते हैं गालियाँ !

    गालियाँ देने से उन्हें सिक्योरिटी मिल जाती है मीडिया में कवरेज मिलती है राजनैतिक कद बढ़ता है और धन तो बढ़ता ही है तो वो गाली क्यों न दें !यदि  गाली देने मात्र से एक साथ इतने लाभ हो रहे हों तो कोई क्यों न दे गालियाँ?राष्ट्रगान हो या राष्ट्र  के प्रतीकचिन्ह या अपने महापुरुषों या महान ऋषियों की निंदा करने वालों का क्यों नहीं किया जाता है बहिष्कार ? 

    नेताओं की सोर्स सिपारिस का सहारा लेकर ही अपराधी करते हैं अपराध !अन्यथा अपराधियों में इतनी हिम्मत कहाँ होती है कि वो रिस्क लेकर किसी वारदात  को अंजाम दें  !जिन भैंसों में प्रायः कोई पहचान नहीं होती है वो अपना एवं अपने मालिक का नाम तक नहीं बता सकतीं वो भी यदि नेताओं की हैं तो खोज ली जाती हैं किंतु जनता का बच्चा भी अगर खो जाता है तो मिलना कठिन हो जाता है !ये अपराध और राजनीति की आपसी साँठ गाँठ के प्रत्यक्ष उदाहरण  हैं । 

     बंधुओं ! जेल जाने से तो अपराधी भी डरते हैं बीबी बच्चों से उन्हें भी लगाव होता है अपराधी भी अच्छा खाना पहनना एवं अपने परिवार के साथ रहना चाहते हैं किंतु कम परिश्रम में अच्छी कमाई करने के लालच में वे करते हैं अपराध !किंतु यदि नेता लोग सिक्योरिटी छोड़ दें तो  नेताओं को भी अपराधियों का भय होगा तब उन्हें भी सभी प्रकार के अपराधियों के विरुद्ध जनता के साथ ईमानदारी पूर्वक खड़ा होना होगा !उन्हें भी बलात्कारियों का विरोध राजनैतिक नहीं अपितु वास्तविक रूप से करना पड़ेगा आखिर उनकी भी बहू बेटियाँ तो निकलेंगी रोडों पर तब उन्हें कौन बचाएगा !

  अत्याधुनिक शार्टकटी  नेताओं ने पाल रखे हैं अपराधी और बड़े बड़े हाईटेक अपराधियों ने पाल रखे हैं नेता ! दोनों अपनी अपनी सुविधानुशार करते करवाते हैं अपराध ! और दिखाने के लिए अपराधों के विरोध में निकालते हैं धूमधाम से रैलियाँ !

  वैसे भी नेताओं को सिक्योरिटी क्यों ? नेता लोग अपने एवं अपनों के लिए तो ले लेते हैं सिक्योरिटी और जनता को छोड़ देते हैं मरने के लिए !

    इन नेताओं ने देश की जनता को अपनापन  देने की जगह इन कपटी देश सेवकों ने जनता को शर्मिन्दा किया है !क्या इन नेताओं के भरोसे छोड़ देना चाहिए देश !जो जनता के प्रति इतनी गंदी सोच रखते हों ! 

   जनता के साथ जीने मरने की कसमें खाने वाले  ये कपटी देश सेवक जनता के साथ मर क्यों नहीं सकते ?मरने का खतरा जब सबको है तो सिक्योरिटी केवल अपने एवं अपने लिए क्यों ?ऐसे नेताओं पर भरोसा करने का मतलब अपने साथ धोखा करना है !एक एक नेता की सिक्योरिटीमें बीसों लोग लगा दिए जाते हैं जबकि एक मोहल्ले की जनता की सुरक्षा  के लिए बीस पुलिस वाले नहीं होते !ये नेता   मरने को इतना डरते हैं  तो राजनीति करते क्यों हैं !घर बैठें !क्या डाक्टर ने बताया है कि राजनीति ही करो ! मेहनत करके बच्चे पालो ! 

  सिक्योरिटी गरीबों ,किसानों और मजदूरों को  क्यों नहीं चाहिए ? क्या उन्हें मृत्यु भय नहीं होता है या वो घर से इफरात होते हैं क्या ?आखिर नेताओं का जीवन इतना बहुमूल्य क्यों होता है उनमें ऐसी खूबी क्या है अथवा देश हित में उन्होंने ऐसा किया क्या है ?की नियत पर संदेह क्यों न किया जाए !

      जनता के साथ जीने मरने की कसमें खाने वाले हमारे देश के प्रिय नेताओ !तुम जनता के साथ जी सकते हो तो जनता के साथ मर क्यों नहीं सकते !और यदि तुम्हारे मन में कोई कपट और धोखा देने का भाव नहीं है तो खुद सिक्योरिटी लिए क्यों फिरते हो जैसे जनता रहती है वैसे रहने में आप क्यों डरते हैं ? 

    अरे नेताओ ! सिक्योरिटी के बल पर नहीं अपितु अपने अच्छे कर्मों के बल पर जियो वही सत्कर्म मुसीबत में तुम्हारी भी रक्षा करेंगे! ब्यर्थ में  सिक्योरिटी वाले लोगों को क्यों परेशान करना ! और यदि परेशान ही करना है तो उन्हें देश और देशवासियों की सुरक्षा में लगाओ !जब सब सुरक्षित होंगे तो आपकी भी सुरक्षा होगी ही और यदि सब मार ही दिए गए तो अकेले आप ज़िंदा रहकर भी क्या करोगे !

     जब चारों ओर हाहाकार मचा होगा घायल लोग तड़प रहे होंगे चारों ओर लाशों के अम्बार लगे होंगे जन सुविधाओं का कोई बन्दोंबस्त  नहीं होगा, हे नेता जी !उस समय घायलों का करुण क्रंदन क्या सहा जा पाएगा तुमसे ?इन सबके बीच क्या तुम सो पाओगे चैन की नींद ?क्या तुम्हारे गले से निगले जा पाएँगे भोजन के निवाले ?और यदि नहीं तो सिक्योरिटी का आडम्बर केवल अपने लिए क्यों ?तुम अपने को आम आदमी कहते हो और जनता के साथ जीवन जीते हो  क्या जनता के साथ मर नहीं सकते !

  अरे नेता बंधुओ !जिनके पास पाप का पैसा नहीं होता वे गरीब ,किसान,मजदूर अपने चरित्र और पुण्यों के बल पर जिंदा रहते हैं एकांत में अथवा कोई दुर्घटना घटने पर जब आपका साथ देने वाला वहाँ कोई आस पास नहीं होता है तब भी आपके किए हुए आपके अच्छे कर्म कवच बनकर आपको न केवल घेर लेते हैं अपितु आपकी रक्षा भी कर लेते हैं किंतु जिस दिन पुण्य आपका साथ छोड़ देंगे उस दिन सिक्योरिटी की सारी  श्रेणियाँ निष्फल सिद्ध होंगी !  

   एक बार जो नेता सरकार में पहुँच जाता है उसके भाग्य में पीढ़ियों तक धन्नासेठ बन कर ऐश की जिंदगी जीना लिख ही जाता है वो भी बिना कोई व्यापार कामकाज आदि किए भी !एक बार सरकार में चले जाने वाले लोग आम आदमी कहाँ रह जाते हैं । 

   सरकारों में रहकर लोग अपना एवं अपनी संतानों की ऐशो आराम के लिए संपत्ति जुटाने के लिए उन्होंने कम से कम इतने पाप तो कर ही लिए होते हैं कि उनकी आत्मा उन्हें मरने से हमेंशा डराया करती है कि बिना सिक्योरिटी मत रहना अन्यथा तुम्हारे पाप तुम्हें अकेला पाकर अपनी चपेट में ले लेंगे !इसीलिए कई नेता सरकारों में पहुँचने से पहले अपनी सिक्योरिटी की परवाह नहीं करते थे और घूमते थे अकेले बिलकुल आम लोगों की तरह किंतु सरकार में पहुँचने के बाद ये बात उन्हें भी समझ में आ गई कि सिक्योरिटी की जरूरत पड़ती क्यों है !बंधुओ !पाप का पैसा हमेंशा भय पैदा करता है !

   देखो किसानों मजदूरों को खेतों में काम करने जाते हैं बरसते पानी की अँधेरी रातों में बड़ी बड़ी घासों पर साँप बिच्छुओं का भय किए बिना अपने पुण्यों के भरोसे चले जाते हैं अन्यथा कभी कोई बिषैला जीव जंतु काट भी सकता है कोई हिंसक जानवर हमला कर सकता है कोई शत्रु हमला कर सकता है किंतु वो अपने पुण्य बल के भरोसे घर छोड़कर निकल पड़ता है  अँधेरी रातों में और करने लगता है खेतों में काम किंतु पापी लोग बड़ी बड़ी साफ सुथरी जगहों पर बड़ी बड़ी कोठियों में रहने के बाद भी दिन रात सिक्योरिटी सिक्योरिटी चिल्लाते रहते हैं !अंधेर तो देखो - जो बाबा जी लोग हिंसक और बिषैले जीव जंतुओं से भरे बियाबान जंगलों में रहने के लिए ही जाने जाते थे किंतु पाप से आज वे भी अछूते नहीं रहे वो भी आश्रम नाम की बड़ी बड़ी बिल्डिंगों में रहते हुए भी माँगते हैं सिक्योरिटी !आश्चर्य !!



Tuesday, 16 February 2016

JNU हो या दादरी या फिर हैदराबाद विपक्ष की प्रमुख भूमिका में दिखने के लिए करवाए जाते हैं सारे विवाद !

      केजरीवाल जी और काँग्रेस में मुख्य विपक्षी दिखने के लिए चल रहा है कठिन कंपटीशन ! जिसका लाभ लेने के लिए बनाई जाती हैं JNU ,दादरी और  हैदराबाद जैसी परिस्थितियाँ !
      JNU हो या दादरी या फिर हैदराबाद वहाँ वो गए तो वो भी चले गए उन्होंने जाकर मोदी जी की निंदा की तो उन्होंने भी वहीँ पहुँच कर मोदी जी की निंदा की !वस्तुतः ये लोग JNU जाएँ या दादरी या फिर हैदराबाद इन्हें वहाँ घटी घटनाओं या पीड़ित लोगों की संवेदनाओं से कोई लेना देना नहीं होता है और न ही उन घटनाओं के विषय में कोई होमवर्क ही किया होता है बस वहाँ पहुँचते हैं मोदी जी की निंदा करते हैं चले आते हैं काँग्रेस हों या केजरीवाल ये दोनों आपस में एक दूसरे की निंदा नहीं करते क्योंकि राजनीति में निंदा उसकी की जाती है जिसका कोई वजूद हो और जिसका वजूद ही न हो उससे टकराने से मिलेगा क्या ?इसका सीधा सा अर्थ है कि इन दोनों के मन में एक दूसरे का कोई वजूद ही नहीं है वजूद मोदी जी का है तो उन्हीं के पीछे पड़े रहते हैं दोनों !एक सतर्क शिकारी की तरह मुद्दे लूट लेने की बेचैनी इन दोनों के बयानों से साफ झलकती है उसमें समाजहित  कहीं दूर दूर तक नहीं झलकता है !काँग्रेस हों या केजरीवाल ये दोनों बुराई मोदी जी की भले करें किंतु नुक्सान एक दूसरे का ही करते हैं !क्योंकि देश की सरकार 2019 तक के लिए स्थिर है किंतु मुख्य विपक्ष बनने के लिए दोनों कर रहे हैं मारा मारी !    
                काँग्रेस और केजरी वाल
   काँग्रेस ने जब जब जिसे जिसे समर्थन दिया उसे पक्ष विपक्ष दोनों ही भूमिकाओं से हमेंशा हमेंशा के लिए मुक्त कर दिया वो उसके बाद किसी लायक नहीं रहा - श्री चौधरी चरण सिंह जी,श्री चन्द्र शेखर जी, श्री देवगौड़ा जी ,श्री इंद्र कुमार गुजराल जी काँग्रेस के समर्थन से ही प्रधान मंत्री बने थे । श्री देवगौड़ा जी की जगह श्री इंद्र कुमार गुजराल जी को कैसे बनाया गया था प्रधान मंत्री सबने देखा है ?जब संयुक्त मोर्चा की सरकार का केवल सिर बदला गया था !उसी काँग्रेस की कृपा से पहली बार मुख्यमंत्री बने थे  केजरीवाल !
    काँग्रेस जिसे  समर्थन देती है वह चाहे अनचाहे उसका ग्रास बन ही जाता है काँग्रेस किसी दल के साथ कितना भी बुरा बर्ताव क्यों न करे किन्तु जब वह धर्म निरपेक्षता की मौहर बजाने लगती है तब बड़े बड़े मणियारे  बिषैले राजनैतिक दल फन फैला फैला कर नाचते नजर आते हैं!        
       सम्भवतः इसीलिए आम आदमी पार्टी को काँग्रेस जैसे जैसे समर्थन, सुविधाएँ एवं समाधान देती जा रही थी वैसे वैसे केजरी वाल न केवल अपनी शर्तें एवं शंकाएँ बढ़ाते जा रहे थे अपितु पैर एवं दायरा भी फैलाते जा रहे थे ।
      रामायण में एक प्रसंग आता है कि जब हनुमान जी लंका की ओर बढ़ रहे थे  उसी समय सर्पों की माता सुरसा आती है और हनुमान जी को अपने मुख में रखना चाहती है हनुमान जी जैसे जैसे अपना शरीर बढ़ाते हैं वैसे वैसे सुरसा अपना मुख बढ़ाते जाती है ।वही हालात आज दिल्ली की राजनीति में पैदा हो गए हैं काँग्रेस जैसे जैसे केजरीवाल का साथ देने और शर्तें मानने की घोषणा करती चली जा रही थी अरविन्द  केजरीवाल जी वैसे वैसे अपनी शर्तों का पिटारा खोलते  चले जा रहे थे ।
      वैसे मेरा व्यक्तिगत अनुमान है कि जब तक मोदी जी की सरकार केंद्र में रहेगी तब तक काँग्रेस और केजरीवाल जी ऐसे मुद्दे तैयार करते ही रहेंगे जिससे एक दूसरे को अपने से पीछे कर के अपने को फ्रंट पर दिखाया  सके !वैसे दिल्ली में काँग्रेस हार भले गई  हो किंतु केजरीवाल जी की उछलकूद कितने दिन चलने देगी वो !                                                                                                                                                                   जस जस सुरसा बदन बढ़ावा । 
            तासु  दून कपि रूप दिखावा ॥ 
            शत जोजन तेहि आनन कीन्हा।
           अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥  

Thursday, 11 February 2016

महर्षि मनु की दिव्य दृष्टि !

        महान जाति वैज्ञानिक महर्षि ने  लाखों वर्ष पहले लोगों के चेहरे देखकर पहचान लिया था कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यों  के  स्वाभिमान को कोई राजा आरक्षण जैसा लोभ  देकर गिरवी नहीं कर सकता ! इनकी संतानों में भी अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने की भावना होगी इन  स्वाभिमानी लोगों की संतानें त्याग तपस्या पूर्वक अपना लक्ष्य हासिल करने  पर भरोसा करेंगी !आरक्षण जैसा कोई लोभ देकर इन्हें इनके सिद्धांतों से बिचलित नहीं किया जा सकता !
   यद्यपि  कलियुग के प्रभाव से कुछ सैद्धांतिक शिथिलता सवर्णों में भी आई है उनका प्रतिशत बहुत कम है आज भी सवर्ण शिक्षा और परिश्रम के बल पर तरक्की करने पर भरोसा करते हैं सवर्ण लोग आज भी अपने परिवारों के भरण पोषण के लिए सरकारों की ओर ताकते ! अपने परिवारों के भरण पोषण की जिम्मेदारियाँ सवर्ण लोग स्वयं उठाते हैं ऐसा कभी नहीं करते कि शादी खुद करें एवं बच्चे खुद पैदा करें और उनके पालन पोषण की जिम्मेदारी सरकारों पर छोड़ दें उनकी तरक्की के लिए आरक्षण माँगने लगें या  दूसरों को जिम्मेदार ठहराने लगें जैसे आजकल सवर्णों पर शोषण के आरोप लगाए जा  रहे हैं किंतु सवर्ण ऐसा कभी नहीं कर सकते 
कि अपने परिवार के भरण पोषण के लिए सत्ता के मठाधीशों के सामने जाकर  गिड़गिडाएँ कि तुम आरक्षण नहीं दोगे तो हम और हमारे बच्चे तरक्की नहीं कर सकते !
         सवर्ण आरक्षण न मांगकर अपनी योग्यता बढ़ाते हैं अपनी कार्यक्षमता बढ़ाते हैं अधिक परिश्रम कर्ट हैं जिसके बलपर वो विशाल विश्व में कहीं भी जाकर अपने तरक्की की सम्भावनाएँ खोज सकते हैं किंतु यदि सवर्ण भी आरक्षण की भीख के भरोसे जीन चाहते तो उनके और उनके परिवारों के बोझ को केवल भारत सरकार ही मजबूरी में धो सकती थी क्योंकि उसे वोट लेना था बाकि अन्य देश भारत के बीमारों को क्यों देते आरक्षण !

हे भगवान !एक साल में दिल्ली का जो किया सो किया पंजाब को तो बचा ही लीजिए इन शिकारियों से !

   ऑड इवन नंबर से प्रदूषण घटाया कूड़ाफैलाकर प्रदूषण घटाया बीत गया साल !ऐसी उपलब्धियों का रहा पहला साल !बारे केजरीवाल !! केजरीवाल जी के पास न कोई मंत्रालय है और न ही कोई काम !सबको करते रहते हैं बदनाम !आखिर उनके एक वर्ष के काम काज का मूल्यांकन कैसे किया जाए !ऊपर से आम आदमी पार्टी के शिकारियों ने अब पंजाब की ओर रुख किया है !हे भगवान !पंजाब को तो बचा ही लीजिए !
"क्या आप केजरीवाल के एक साल के काम से संतुष्ट हैं ?-एक खबर "
     किंतु केजरीवाल जी ने एकवर्ष में किया ही क्या है जिसका मूल्यांकन किया जाए उन्होंने किए पहला 524 करोड़ विज्ञापनके लिए निकाला और सैलरीकाण्ड कर के अपना एवं अपनों का घर भरा इसके परिणाम स्वरूप आम जनता पर डेंगू का कहर ऐसा टूटा कि 19 वर्षों का रिकार्ड तोडा है डेंगू ने डेंगू फंड तो विज्ञापन पर सैलरी पर खर्च हो गया तो डेंगू रोकने के लिए कौन हाथ पाँव लगा देते !
दूसरा काम ऑड इवन नंबर की गाड़ियाँ चलवाई थीं प्रदूषण कम करने के लिए किंतु वो इतना अधिक कम हो गया अनुभव था नहीं तो आना फान में पूरी दिल्ली में प्रदूषण रिकवर करने के लिए कूड़ा फैलवाना बड़ा बेचारे निगम कर्मियों ने बड़ी मदद की कूड़ा फैलाने में अन्यथा क्या होता दिल्ली का हाल !अब सुना है फिर ऑड इवन नंबर वाला गेम खेला जाएगा फिर कूड़ा फैलाया जाएगा !
केजरीवाल के पास न कोई मंत्रालय है और न कोई काम !वो तो गाली देकर सत्ता में आए थे गाली देने के लिए सत्ता में हैं गाली दे कर सत्ता में बने रहेंगे !इसी प्रकार से पैसे कमाने के लिए राजनीति में आए थे पैसे कमा रहे हैं पैसे कमाते रहेंगे !
524 करोड़ विज्ञापन वाला तथा सैलरी की भारी भरकम धन राशि कमा कर अपने घर वालों को दी होगी इसलिए ये तो केजरीवाल जी के घर वालों से पूछा जाए कि उनकी घर की केजरीकमाई की दृष्टि से ये वर्ष कैसा रहा ! इसका जवाब वही बेहतर दे ढंग से सकते हैं बाक़ी आम जनता के हाथ तो वो डेंगू लगा जिन पर केजरीकुशासन का कहर ऐसा टूटा कि 19 वर्षों का रिकार्ड तोडा है डेंगू ने ! डेंगू की रोकथाम में लगने वाले पैसे को विज्ञापन पर खर्च किया इससे डेंगू अनियंत्रित हो गया और कई मौतें हुईं उसे सरकार के काम काज से जोड़कर देखा जा सकता है !आम आदमी पार्टी के शिकारियों ने अब पंजाब की ओर किया है रुख !हे भगवान ! दिल्ली का जो किया सो किया पंजाब को बचा लीजिए !
     जब से केजरीवाल आए तब से बीसों पत्र इस विषय में मैंने लिखे !फोन किए फोन पर मिलते नहीं हैं पत्र  का जवाब वो देते नहीं हैं काम करना उनके बश का नहीं है बकवास वो बंद करते नहीं हैं कैसे आकें उनका एकवर्ष का काम काज !आप भी पढ़िए इससे बुरी दशा और क्या हो सकती है दिल्ली की !
seemore.... http://samayvigyan.blogspot.in/2016/02/v-i-m-p.html