आदरणीय प्रधानमंत्री जी
सादर नमस्कार
विषय : कोरोनामहामारी से संबंधित पूर्वानुमान के विषय विनम्र निवेदन
भाग्य से ज्यादा और समय से पहले किसी को न सफलता मिलती है और न ही सुख ! विवाह, विद्या ,मकान, दुकान ,व्यापार, परिवार, पद, प्रतिष्ठा,संतान आदि का सुख हर कोई अच्छा से अच्छा चाहता है किंतु मिलता उसे उतना ही है जितना उसके भाग्य में होता है और तभी मिलता है जब जो सुख मिलने का समय आता है अन्यथा कितना भी प्रयास करे सफलता नहीं मिलती है ! ऋतुएँ भी समय से ही फल देती हैं इसलिए अपने भाग्य और समय की सही जानकारी प्रत्येक व्यक्ति को रखनी चाहिए |एक बार अवश्य देखिए -http://www.drsnvajpayee.com/
Friday, 28 January 2022
विषय : कोरोनामहामारी से संबंधित पूर्वानुमान के विषय विनम्र निवेदन
Sunday, 31 October 2021
मौसम पूर्वानुमान आज से दस हजार वर्ष पहले तक का जानने की विधि !
मौसम पूर्वानुमान आज से दस हजार वर्ष पहले तक का जानने की विधि !
समयविज्ञान अत्यंत प्राचीन ऐसी वैज्ञानिकप्रक्रिया है जिसमें गणितीय सूत्रों के द्वारा लाखों वर्ष पहले का भी मौसम संबंधी पूर्वनुमान लगाया जा सकता है | बिल्कुल उसीतरह जैसे गणित के द्वारा सूर्य और चंद्र ग्रहणों के विषय में हजारों वर्ष पहले लगा लिया जाता है जो एक एक सेकेंड सही घटित होता है |
गणित के सूत्रों के द्वारा लगाए गए पूर्वानुमान की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि इसमें किसी उपग्रह या राडार की मदद नहीं ली जाती है इसीलिए जब उपग्रहों राडारों आदि आधुनिक विज्ञान का जन्म ही नहीं हुआ था तब भी समय विज्ञान के द्वारा सफलता पूर्वक मौसम पूर्वानुमान लगा लिया जाया करता था और वह सही एवं सटीक घटित होते देखा जाता था | आज भी वो पद्धति उतनी ही प्रासंगिक बनी हुई है |
प्रकृति समय के द्वारा अनुशासित है | समय जब जैसा आता है ब्रह्मांड में तब तैसी घटनाएँ घटित होने लगती हैं सूर्य चंद्र समेत समस्त ग्रहनक्षत्र उसी समय के अनुशासन से अनुशासित हैं धरती की गहराई से लेकर आकाश की उँचाई तक सब कुछ समय से ही अनुशासित है |
समय के अनुशासन का पालन प्रकृति अत्यंत दृढ़ता से किया करती है यही कारण है कि सूर्य चंद्र आदि ग्रह अपने अपने निश्चित समय से उदित या अस्त हुआ करते हैं | सर्दी गर्मी वर्षा आदि प्रमुख ऋतुएँ प्रतिवर्ष अपने अपने समय से आती और और समय से जाती रहती हैं | उसी निर्धारित समय पर सर्दी गर्मी वर्षा आदि होते देखी जाती है |
कुलमिलाकर प्रकृति पर समय का ही अनुशासन चला करता है इसीलिए सबकुछ निश्चित समय पर एक ही प्रकार से घटित होता है | अमावस्या पूर्णिमा जैसी तिथियाँ निश्चित समय पर आती जाती हैं | सूर्यचंद्र ग्रहण जैसी घटनाएँ अमावस्या और पूर्णिमा में ही घटित होती हैं | यद्यपि अमावस्या और पूर्णिमा जैसी घटनाएँ तो प्रत्येक महीने में ही घटित होती हैं किंतु सूर्यचंद्र ग्रहण जैसी घटनाएँ प्रत्येक अमावस्या पूर्णिमा में नहीं घटित होती हैं अर्थात किसी में होती हैं और किसी में नहीं होती हैं |
ऐसी जटिल घटनाओं का भी गणितीय सूत्रों के द्वारा न केवल समझने में सफलता पा ली गई अपितु ऐसी घटनाओं के विषय में हजारों वर्ष पहले लगाया गया एक एक सेकेंड सही घटित होता है |
जिस प्रकार से अमावस्या और पूर्णिमा जैसी घटनाएँ प्रत्येक महीने में घटित होने के बाद भी सूर्यचंद्र ग्रहण जैसी घटनाएँ तो प्रत्येक अमावस्या पूर्णिमा में नहीं घटित होती हैं उसी प्रकार से प्रकृति से संबंधित सभी प्रकार की घटनाओं में होते देखा जाता है | सर्दी गर्मी वर्षा आदि ऋतुएँ प्रत्येक वर्ष में आती है और अपने अपने समय तक रहकर चली जाती हैं किंतु अपनी अपनी ऋतुओं में भी इनका प्रभाव एक जैसा नहीं रहता | वर्षा ऋतु में किसी वर्ष बहुत अधिक वर्षा होती है किसी वर्ष बहुत कम होती है या सूखा पड़ जाता है | ऐसे ही वर्षा ऋतु के प्रत्येक दिन में एक जैसी वर्षा नहीं होती है किसी कम किसी दिन अधिक तो किसी दिन बिल्कुल नहीं होती है | ऐसी परिस्थिति प्रत्येक ऋतु को आधुनिक के प्रभाव में होने वाली न्यूनाधिकता के रूप में देखी जाती है |
ऐसी घटनाएँ आधुनिक वैज्ञानिकों के उपग्रहों रडारों पर नहीं दिखाई पड़तीं इसलिए इनके घटित होने का कारण जलवायु परिवर्तन बताकर इनके विषय में हाथ खड़ा कर देना उनकी मजबूरी हो सकती है किंतु गणितीय सूत्रों से यदि ग्रहण जैसी घटनाओं का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है तो ऋतुओं में देखे जाने वाले न्यूनाधिक प्रभाव के विषय नहीं लगाया जा सकता है | आखिर ग्रहण जैसी घटनाएँ भी तो प्रत्येक अमावस्या पूर्णिमा में नहीं घटित होती हैं |
गणितीय सूत्रों की एक विशेषता और है गणित के जो सूत्र प्रकृति की जिन घटनाओं में एक बार सही सटीक बैठ जाते हैं उनसे संबंधित पूर्वानुमान उन्हीं गणितीय सूत्रों से यदि सात दिन पहले का सही निकल सकता है तो सात महीने पहले का भी सही निकलेगा और सात वर्ष सकता हजार वर्ष सात लाख वर्ष आदि पहले के विषय में लगाया गया पूर्वानुमान सही निकलेगा | एक बार सूत्र सही फिट होने की बात है |
विशेष बात यह है कि हमारे द्वारा प्रत्येक महीने प्रकाशित किए जाने वाले मौसम संबंधी पूर्वानुमानों का परीक्षण आप ध्यान से किया करें और यह विश्वास रखकर चलें कि महीने का मौसम पूर्वानुमान जितने प्रतिशत सच निकलेगा | उतने ही प्रतिशत सात करोड़ और सात अरब वर्ष पहले के विषय में हमारे द्वारा लगाया गया मौसम संबंधी पूर्वानुमान भी सच निकलेगा | गणितीय सूत्रों के आधार पर लगाए गए पूर्वानुमानों की यह विशेषता है |
आधुनिक वैज्ञानिकों की दृष्टि से ऐसी कभी होने और कभी न होने वाली प्राकृतिक घटनाओं के लिए जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है | जलवायु परिवर्तन कहने का मतलब होता हैइस घटना के विषय में हमें कुछ भी पता नहीं है | इसलिए इसके विषय में हमसे कुछ मत पूछना पूछोगे तो हम कोई काल्पनिक कहानी सुना देंगे जिसका लेना देना नहीं होगा |
आधुनिक वैज्ञानिक संभवतः प्रकृति से ऐसी अपेक्षा करते हैं कि जिस प्रकार से सूर्य निश्चित समय से आता है और निश्चित समय से चला जाता है एक मिनट सेकेंड भी आगे पीछे नहीं होता उसी प्रकार से मानसून अपनी निर्धारित तारीख पर आवे और अपनी तारीख पर चला जाए | जिस प्रकार से सूर्य की रोशनी सूर्य के उदित होने के बाद क्रमशः बढ़ती और क्रमशः घटते घटते समाप्त हो जाती है | वैसे ही मानसून अपनी तारीख पर आवे इसके बाद क्रमिक रूप से बढ़ता जाए और अपने शिखर पर पहुँचाने के बाद क्रमशः कम होना शुरू हो जाए और अपनी निश्चित तारीख पर समाप्त हो जाए |
इसी प्रकार जैसे सूर्य का प्रकाश गर्मी आदि बड़े भूभाग पर एक जैसी पड़ती है उसी प्रकार से बादल सभी जगह जा जाकर एक जैसी वर्षात नाप तौल कर करें | ऐसे ही भूकंप आँधी तूफ़ान जैसी घटनाओं के लिए भी कोई दिन निश्चित होना चाहिए उस दिन आवें और अपनी निर्धारित सीमा में आकर समाप्त हो जाएँ | इनका जिस किसी भी दिन जहाँ कहीं भी चले आना बंद हो | यदि ऐसा नहीं होता है तो हम ऐसी घटनाओं के घटित होने का कारण जलवायु परिवर्तन के नाम का हुल्लड़ मचा मचा कर प्रकृति को बदनाम करते रहेंगे |
इस प्रकार से आधुनिक वैज्ञानिकों की इन शर्तों का पालन जिस दिन प्रकृति करने लगेगी उसी दिन इनके द्वारा लगाए गए मौसम संबंधी पूर्वानुमान सही निकल सकते हैं | इसके अतिरिक्त इनसे मौसम का पूर्वानुमान लगाने के लिए कोई आशा की ही नहीं जानी चाहिए | मौसम का पूर्वानुमान लगाने के लिए प्राकृतिक घटनाओं से संबंधित जब तक कोई विज्ञान विकसित ही नहीं किया जा सका है तब तक ऐसे लोगों बताएँगे भी किस आधार पर | अलनीनों लानिना जैसी मन गढ़ंत कहानियों का संबंध घटनाओं के साथ कभी देखा ही नहीं गया | इसके आधार पर बताई गई हर बात उलटी ही निकलती है |
कुल मिलाकर वैज्ञानिक अनुसंधानों के नाम पर केवल उपग्रहों रडारों पर ही सारा दारोमदार है इनके अतिरिक्त और क्या है जिसके आधार पर प्राकृतिक घटनाओं के विषय में अनुसंधान किया जाए | केवल वही उपग्रहों रडारों से जो जो प्राकृतिक घटनाएँ घटित होते दिखेंगी मौसम भविष्यवाणी के नाम पर वही बोल दी जाएँगी यही तो मौसम विज्ञान है | भूकंप और महामारी जैसी घटनाएँ उपग्रहों रडारों सेदिखाई ही नहीं पड़ती हैं इसलिए वैज्ञानिक लोग इस विषय में कुछ बता भी कैसे सकते हैं और जो तीर तुक्के लाए जाएँगे वे सही हो भी जाएँ तो उनसे लाभ क्या जब उनका कोई वैज्ञानिक आधार ही नहीं होता है |
मौसम संबंधी वातावरण बिगड़ने से महामारियाँ पैदा होती हैं यही कारण है मौसम संबंधी घटनाओं को न समझ पाने वाले आधुनिकवैज्ञानिकों को कोरोना महामारी समझ में ही नहीं आई ऐसा वे खुले तौर पर स्वीकार करते रहे !वे साफ साफ कह चुके कि जलवायु परिवर्तन को समझना हमारे बैश की बात नहीं है इसके बाद भी सरकारें उनसे ऐसे विषयों पर अनुसंधान करने की अपेक्षा रखती हैं ये सरकारों का दिखावा नहीं तो और क्या है ?
गाँवों में बूढ़े और कमजोर बैलों को बेचने के लिए किसान लोग बैल मंडी में ले जाते हैं किंतु वे बैल जोतने लायक रह नहीं जाते हैं शरीर कमजोर हो चुके होते हैं | इसलिए उनके ग्राहक नहीं होते हैं | ऐसे बैलों के ग्राहक खोजकर दलाल लोग लाते हैं | उन दलालों के हाथ में एक ऐसी छड़ होती है जिसके अगले भाग पर एक कील लगी होती है | ग्राहक बैलों को जब देख रहा होता है उस समय दलाल पीछे से वह कील बैल को चुभा देते हैं तो बैल उछल पड़ता है | इससे लगता है कि बैल अभी बूढ़ा और कमजोर नहीं हैं इसमें अभी भी करेंट है | इस प्रकार से धोखा देकर दलाल लोग बैल बेचवा देते हैं |
इसी प्रकार की भूमिका प्रकृति के विषय में वैज्ञानिक हमेंशा से निभाते रहे हैं यही कारण है कि157 वर्ष पहले कलकत्ते में आए जिस हिंसक चक्रवात को समझने के लिए 145 वर्ष पहले जिस भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना की गई थी लगभग डेढ़ सौ वर्ष बीत जाने के बाद सन 2018 के अप्रेल मई में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश आदि में भीषण हिंसक आँधी तूफ़ान आए हमारे मौसम वैज्ञानिक न उनके विषय में कोई पूर्वानुमान बता पाए और न ही उनके घटित होने का कारण बता पाए | ये विज्ञान जगत के अनुसंधानों की डेढ़ सौ वर्षों की उपलब्धि है | इसके बाद भी सरकारें ऐसे लोगों से कोरोना जैसी महामारी के विषय में खोज करने का दबाव दाल रही हैं उन्हें क्या वे मौसम की तरह ही महामारी के विषय में भी एक और कहानी गढ़कर सुना देंगे |ऐसे अनुसंधानों और अनुसंधान कर्ताओं पर जनता के द्वारा टैक्स रूप में दिया गया पैसा सरकारें खर्च किया करती हैं उनसे निकलता क्या है ये महामारी के समय में दुनियां ने देखा है | अनुसंधानों के नाम पर जनता से कितना झूठ बोलै जाता है ये महामारी के समय जनता ने सुना है अनुभव किया है | उनके द्वारा महामारी के विषय में कही गई प्रत्येक बात झूठ निकली है प्रत्येक अनुमान गलत निकला है इसके बाद भी विज्ञान ने नाम पर सरकारों के दबाव से जनता उनका और उनके परिवारों का आर्थिक बोझ अपने कंधों पर ढोने के लिए मजबूर है |
संस्कृत प्रकृति भी समय की गति इतनी अधिक
गणितीय सूत्रों की स्थिति बिजली के तारों की तरह है
नव निर्मित किसी किसी घर में बिजली की वायरिंग करवाई जाती है सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि इसका जो फार्मूला प्रकृति की जिस घटना के साथ फिट बैठ जाता है जिस सूत्र का जो संबंध जिस विषय में एक बार सही फार्मूला जिस चीज में के
भविष्य के दस हजार वर्षों तक
Tuesday, 12 October 2021
korona mahamari
24अप्रैल 2020-होमलैंड सुरक्षा सचिव के विज्ञान और तकनीकी विभाग के सलाहकार विलियम ब्रायन ने व्हाइट हाउस में पत्रकारों कहा कि सरकारी वैज्ञानिकों ने एक रिसर्च में पाया है कि सूरज की पराबैंगनी किरणें पैथोगेन यानी वायरस पर प्रभावशाली असर डालती हैं। उम्मीद है कि गर्मियों में इसका प्रसार कम होगा।सोलर लाइट सतह और हवा दोनों में इस वायरस को मारने की क्षमता रखता है।नमी में वृद्धि अर्थात अधिक ठंडक भी वायरस के लिए फायदेमंद नहीं है।बिलियन ब्रायन ने मैरीलैंड स्थित नेशनल बायोडिफेंस एनालिसिस एंड काउंटर मेजर्स सेंटर की एक रिसर्च में पाया गया कि नमी को 80 फीसदी बढ़ाए जाने के बाद आधा वायरस 6 घंटे में खत्म हो गया। जब इसी परीक्षण को सूरज की किरणों के बीच किया गया तो इसे खत्म होने में दो मिनट लगे।
11 मई 2020 भारतीय विषाणु वैज्ञानिक नगा सुरेश वीरापु का कहना है कि उच्च तापमान से कोरोना वायरस के संक्रमण में कमी आएगी लेकिन गर्मी में वायरस के पूरी तरह के खत्म होने की धारणा पूरी तरह से निराधार है.
27 मई 2020 - मेडिकल कालेज के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ.जे.एस.कुशवाहा और डॉ ब्रजेश कुमार का कहना है कि गर्मी लगने पर मस्तिष्क में तापमान नियंत्रित करने वाला सिस्टम ध्वस्त हो जाता है इसके साथ कोरोना संक्रमण और अधिक घातक हो सकता है |
3 जून 2020गर्म मौसम में कोरोना वायरस का संक्रमण थम जाएगा, इस उम्मीद में इस बार सर्दी के मौसम में ही गर्मियों को बड़ी बेसब्री से इंतजार हो रहा था। अब जबकि तेज गर्मी का एक महीना यानी मई बीत चुका है अभी तक ऐसा कुछ दिखाई नहीं पड़ा है |
14 अगस्त 2020 :वैज्ञानिकों को आशंका है कि सर्दी के मौसम में दुनिया को कोरोना वायरस की 'सेंकेंड वेव' का सामना करना पड़ सकता है, जो पहले से 'कहीं अधिक जानलेवा' होगी. ये पूर्वानुमानभले ही जटिल और बेहद अनिश्चित लगे, लेकिन कई वजहें हैं जो चिंता को बढ़ा देती हैं |
12 जून 2020-भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), मुंबई के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में दावा किया है कि गर्म और शुष्क मौसम में सतह पर कोरोना वायरस के सक्रिय रहने की गुंजाइश कम हो जाती है।
14 अगस्त 2020 :वैज्ञानिकों को आशंका है कि सर्दी के मौसम में दुनिया को कोरोना वायरस की 'सेंकेंड वेव' का सामना करना पड़ सकता है, जो पहले से 'कहीं अधिक जानलेवा' होगी. ये पूर्वानुमानभले ही जटिल और बेहद अनिश्चित लगे, लेकिन कई वजहें हैं जो चिंता को बढ़ा देती हैं |
11 अक्टूबर 2020 को एम्स निदेशक डॉ.रणदीप गुलेरिया ने कहा कि सर्दियों में सांस लेने संबंधी वायरल संक्रमण अधिक होने की उम्मीद रहती है.सर्दियों में तापमान कम रहने की वजह से वायरस के लंबे वक्त रहने का खतरा रहता है. इस वजह से बड़ी संख्या में लोग संक्रमित होते हैं |
विशेष :5 अप्रैल 2020कुछ लोगों का मानना है कि जैसे-जैसे तापमान में वृद्धि होगी कोरोना वायरस का प्रकोप ख़त्म होता जाएगा. लेकिन जानकार कहते हैं कि महामारियां, आमतौर पर मौसमी बीमारियों के वायरस जैसी नहीं होतीं.ऐसी बहुत सी बीमारियां हैं जो मौसम बदलते समय सिर उठाती हैं. जैसे ही मौसम स्थिर होता है, वो ख़त्म हो जाती हैं. मौसमी बुख़ार इसकी सबसे आम मिसाल है.इसी तरह टायफ़ाइड या ख़सरा अक्सर गर्मी के मौसम में सिर उठाती है. मैदानी इलाक़ों में ख़सरा अक्सर गर्मी के मौसम में पैर फैलाता है. जबकि, उष्णकटिबंधीय इलाक़ों में ये बीमारी सूखे मौसम में सबसे ज़्यादा फैलती हैकोविड-19 वायरस सबसे पहले चीन में दिसंबर महीने में फैलना शुरू हुआ था. और तभी से ये वायरस लगातार फैल रहा है. अमरीका और यूरोप के देशों में भी इसने क़हर बरपाया हुआ है. अभी तक देखा गया है कि ठंडे इलाक़ों में ये काफ़ी तेज़ी से फैल रहा है|
3 मई 2021,जर्नल साइंटफिक रिपोर्ट में प्रकाशित शोध पत्र में कहा गया है कि सर्दियों में ज्यादा मामले आएंगे और गर्मियों के मौसम में कम मामले देखने को मिलेंगे। भूमध्य रेखा के पास मौजूद देशों में कोरोना वायरस के कम मामले सामने आएंगे जबकि जो देश धरती के उत्तरी और दक्षिणी हिस्से में स्थित हैं, उन्हें ज्यादा कोरोना वायरस मामलों से जूझना पड़ेगा। शोधकर्ताओं ने 117 देशों के आंकड़े के आधार पर यह शोध प्रकाशित किया है। शोध में खुलासा हुआ है कि कोरोना वायरस महामारी पूरे साल कई बार चरम पर आएगी |
26 अप्रैल 2020 वायु प्रदूषण के कणों पर कोरोना वायरस का चला पता, ज्यादा प्रदूषित इलाके में देखा गया उच्च संक्रमण !पिछले अध्ययनों से पता चला है कि वायु प्रदूषण के कण रोगाणुओं को पनाह देते हैं और इसके जरिये बर्ड फ्लू, खसरा और अन्य बीमारियों के संक्रमण की संभावना रहती है।
22 अप्रैल 2020 - कोरोना, सूखा और तूफान से अमेरिका खस्ताहाल ! ट्रंप पर बड़ी आफत !अमेरिका ने हाल ही में 1200 साल का सबसे भयावह सूखा देखा है. ये सूखा 18 साल तक चला. यानी साल 2000 से 2018 तक. सूखे से सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ दक्षिण-पश्चिमी अमेरिका हुआ है
12 जुलाई 2020 - बारिश-बाढ़ और भूकंप, प्रकृति के कहर से चीन का बुरा हाल !चीन इन दिनों प्रकृति के कहर से जूझ रहा है। लगातार हो रही भारी बारिश के बाद आई बाढ़ से 52 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित हैं। जिसके बाद 4 लाख लोगों को सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया है। वहीं 12 जुलाई को उत्तर-पूर्वी शहर तंगशान आए भूकंप ने लोगों को पिछले हादसे की याद दिलाकर और डरा दिया है। रिक्टर स्केल पर इस भूकंप की तीव्रता 5.1 मापी गई। हालांकि, इस भूकंप में किसी के हताहत होने की खबर नहीं है।
जलवायु परिवर्तन का मजाक :
29 दिसंबर 2017 ट्रंप ने ग्लोबल वार्मिंग का बनाया मजाक, कहा- बर्फीली हवाओं से दिलाएगा राहत दुनिया
अमेरिका का पूर्वी क्षेत्र इन दिनों कड़ाके की सर्दी से गुजर रहा है। सर्द हवाओं ने आम जनजीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है, पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मौके का इस्तेमाल ग्लोबल वार्मिंग पर तंज कसने के लिए किया। उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा कि धरती के बढ़ते तापमान से शायद कड़ाके की सर्दी से निपटने में मदद मिल सके।
अक्टूबर 2020 -इस बात से सहमत नहीं थे कि पृथ्वी के बढ़ते तापमान के लिए मनुष्य जिम्मेदार थे।
Monday, 11 October 2021
मौसम और महामारी
इसी प्रकार से ऐसे मौसमविभागकी स्थापना हुए 144 वर्ष हो गए उस समय पश्चिम बंगाल में एक बड़ा हिंसक तूफ़ान आया था और अभी सन 2018 में पूर्वोत्तर भारत में जितने भी बड़े हिंसक तूफ़ान आए न तब पूर्वानुमान लगाया जा सका और न अब !उससे जनता तब भी अकेले जूझी होगी आज भी जनता ही जूझ रही है उसे ऐसे वैज्ञानिक अनुसंधानों से कोई मदद नहीं मिली जो पिछले एक सौ चवालीस वर्षों से चलाए जाते रहे हैं |मौसम से संबंधित संबंधित पूर्वानुमानों के अनुसंधान कितने कारगर हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है |ये हमारे मौसम संबंधी वैज्ञानिक अनुसंधानों की 144 वर्षों की उपलब्धि है |
प्राकृतिक क्षेत्र में अक्सर यह अनुभव किया गया है कि केवल कोरोना जैसी भयंकर महामारी ही नहीं अपितु भूकंप वर्षा बाढ़ सूखा आँधी तूफान च्रकवात ,बज्रपात या फिर बढ़ता वायु प्रदूषण का बढ़ता स्तर आदि जितने भी प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं ने जब जब विकराल स्वरूप धारण किया है तब तब भयभीत जनता बड़ी आशा से मदद पाने की इच्छा लेकर अपने वैज्ञानिक अनुसंधानकर्ताओं की ओर देखती है किंतु दुर्भाग्य से महामारी प्राकृतिक आपदाओं जैसे कठिन समय में जब जीवन के लिए विज्ञान की जब सबसे अधिक आवश्यकता होती है तब वही अनुसंधान धोखा दे जाते हैं |
महामारी और जलवायु परिवर्तन -
महामारी के विषय में अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों के एकवर्ग का मानना रहा है कि महामारी के घटित होने पर या महामारी से संक्रमितों की संख्या घटने बढ़ने में जलवायु परिवर्तन की बड़ी भूमिका होती है |
तापमान बढ़ने घटने का महामारी पर पड़ता है प्रभाव !
19 सितंबर 2020-जिस सितंबर में मौसम करवट लेने लगता है और जाड़े की सुगबुगाहट होने लगती है, इस बार दिल्ली वासी उमस भरी गर्मी झेलने को विवश हैं। तेज धूप की चुभन और उमस पसीना पोंछने पर मजबूर कर रही है, अभी भी बिना एसी के गुजारा नहीं हो पा रहा है। मौसम विशेषज्ञों ने इस स्थिति के पीछे जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ बादलों की बेरूखी को भी जिम्मेदार करार दिया है।
सन 2019 \2020 की सर्दियों के बिषय में मौसम विभाग की पुणे इकाई ने सामान्य से कम सर्दी का अनुमान व्यक्त किया था लेकिन सर्दी ने तो सौ साल के रिकार्ड तोड़ दिये। इस पर पत्रकारों ने मौसम विभाग की उत्तर क्षेत्रीय पूर्वानुमान इकाई के प्रमुख डॉ. कुलदीप श्रीवास्तव से पूछा कि सर्दी की दस्तक से पहले मौसम विभाग ने कहा था कि इस साल सर्दी सामान्य से कम रहेगी,लेकिन सर्दी ने तो सौ साल के रिकार्ड तोड़ दिये। पहले मानसून और अब सर्दी का पूर्वानुमान भी गलत साबित हुआ क्यों ?
इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि कड़ाके की ठंड मौसम की चरम गतिविधि का नतीजा है जिसका सटीक पूर्वानुमान लगाना संभव ही नहीं है |भारत जैसे ऊष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्र में मौसम के इस तरह के अनपेक्षित और अप्रत्याशित रुझान का सटीक पूर्वानुमान लगाने की तकनीक दुनिया में कहीं भी नहीं है।सर्दी ही नहीं, अतिवृष्टि और भीषण गर्मी जैसी मौसम की चरम गतिविधियों का दीर्घकालिक अनुमान संभव ही नहीं है।मौसम की चरम गतिविधियों के दौरान, मौसम का मिजाज तेजी से बदलने की प्रवृत्ति प्रभावी होने के कारण अल्पकालिक अनुमान भी मुश्किल से ही सटीक साबित होता है| मौसम के तेजी से बदलते मिजाज को देखते हुये चरम गतिविधियों का दौर भविष्य में और अधिक तेजी से देखने को मिल सकता है। इनकी आवृत्ति में भी तेजी देखी जा सकती है। ऐसे में बारिश के अनुकूल परिस्थिति बनने पर मूसलाधार बारिश होना या गर्मी का वातावरण तैयार होने पर अचानक तापमान में उछाल या गिरावट जैसी घटनायें भविष्य में बढ़ सकती हैं। मौसम संबंधी शोध और अनुभव से स्पष्ट है कि इस तरह की घटनाओं का समय रहते पूर्वानुमान लगाना भी मुश्किल है। ऐसे में पूर्वानुमान के गलत साबित होने की संभावना भी रहेगी।
इसके बाद एक बार फिर गलत हुई मौसम वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी !2020-21 में लानीना का प्रभाव बताकर शीतऋतु में अधिक सर्दी होने की भविष्यवाणी की गई थी किंतु अबकी बार तो जनवरी से ही तापमान बढ़ने लग गया था ऐसा होने के पीछे का कारण जब उन भविष्यवक्ताओं से पूछा गया तब उन्होंने वही जलवायु परिवर्तन एवं ग्लोबल वार्मिंग को कारण बता दिया था |
जलवायु परिवर्तन
Thursday, 7 October 2021
महामारी संबंधित पूर्वानुमानों में असफलता -
17अप्रैल 2020 -गृहमंत्रालय की ओर से किए गए एक आंतरिक सर्वेक्षण में पता चला है कि मई के
पहले सप्ताह में कोरोना के मरीजों में काफी तेजी देखने को मिलेगी. हालांकि
इसके बाद कोरोना मरीजों की संख्या धीरे-धीरे कम होने लगेगी |
20 जून 2020 को कोरोना की दूसरी लहर की चेतावनी, इंसानों में काबू के बावजूद जानवर संक्रमण फैला सकते हैं|
20-4-2020 को - नदी के पानी में कोरोना के लक्षण !पेरिस की सीन नदी और अवर्क नहर के पानी में कोरोना कोरोना वायरस का संक्रमण पाया गया है !
वैक्सीन :14 अगस्त 2020 चीन का दावा, कहा- पहले हमने बनाई कोविड-19 की वैक्सीन, अप्रैल में ही हुआ था ट्रायल
22 अप्रैल 2020 कोरोना, सूखा और तूफान से अमेरिका खस्ताहाल, ट्रंप पर बड़ी आफत
14 मई 2020- कोरोना वायरस: इस बार मई के महीने में भी गर्मी नहीं, क्या हैं कारण
क्या
ये जलवायु परिवर्तन है?सेंटर ऑफ़ साइंस ऐंड एनवायर्नमेन्ट में जलवायु
मामलों पर नज़र रखने वाले तरुण गोपालकृष्णण ने बीबीसी को बताया कि केवल
उत्तर भारत या पूर्वी भारत में ही नहीं बल्कि दक्षिण भारत में मौसम बीते
सालों की अपेक्षा इस साल अलग ही है.
बारिश-बाढ़ और भूकंप, प्रकृति के कहर से चीन का बुरा हाल ! चीन में भारी बारिश के बाद आई बाढ़ से लाखों लोग प्रभावित हैं। वहीं, रविवार को तंगशान में आए भूकंप ने लोगों को पिछले हादसे की याद दिलाकर और डरा दिया। रिक्टर स्केल पर इस भूकंप की तीव्रता 5.1 मापी गई है।