Tuesday, 18 November 2014

भाजपा ने अपने बाबा जी को दी सुरक्षा किंतु बाकी देशवासियों की सुरक्षा किसके भरोसे !

किसी बाबा जी के लिए अलग से सिक्योरिटी क्यों ? क्या आम जनता इस योग्य नहीं है ,या उसे जरूरत नहीं है ! अाखिर आमजनता भी तो सरकार के ही भरोसे है ?    यदि बाबा जी को जान का खतरा समझ कर सिक्योरिटी दी गई है तो आम जनता सुरक्षित है इसकी क्या गारंटी ?क्या ऐसी कोई जाँच हुई है जिससे पता लगा हो कि सरकार के द्वारा आम जनता को प्रदान की गई सुरक्षा व्यवस्था में जनता तो सुरक्षित है किन्तु बाबा जी सुरक्षित नहीं हैं ?आखिर ऐसा पक्षपात क्यों क्या आम जनता के पेट स्टील के बने हुए हैं और बाबा जी बहुत नाजुक हैं !हमारे कहने का मतलब कि सरकार के  सुरक्षाप्रबंधों से यदि बाबा सुरक्षित नहीं हैं तो उनसे आम जनता सुरक्षित है ऐसा कैसे मान लिया जाए ?

  • UPA सरकार में जो बाबा जी आम जनता को मिली सुरक्षा में सुरक्षित थे  उन्हें NDA के शासन में अलग से सिक्योरिटी की आवश्यकता क्यों पड़ी ?

  • आज तक जो अपने को योगी कहते रहे हों वो आज मरने के डर से सिक्योरिटी के घेरे में चल रहे हैं आखिर क्यों ?योगी कहीं मरने को डरता है क्या ?

  • सारी दुनियाँ के मन से मृत्यु भय मिटाने वाले साधू संत यदि स्वयं ही मृत्यु से भयभीत रहने लगें तो कैसा संन्यास ?

  • चरित्रवान साधू संत तो जंगलों में भी अपनी तपस्या के बल पर सुरक्षित रहते थे उन्हें आज आम समाज में रहने के लिए भी सिक्योरिटी चाहिए !बारे कलियुग !!

  • पहले राजा महाराजा लोग तपस्वी महात्माओं के चरणों में मत्था टेक करके अपनी सुरक्षा के लिए आशीर्वाद माँगने उनके आश्रमों जाया करते थे अब महात्मा लोग स्वयं सुरक्षा के घेरे में रहते हैं ।  

  • पहले महात्माओं को जंगलों में सिंह आदि भयानक जीवों से भी भय नहीं लगता था आज सिक्योरिटी चाहिए !     

     कुछ समय पहले जिन  बाबा जी को भारत सरकार के सम्मानित चार चार मंत्री एयरपोर्ट पर मनाने पहुँचे हों उन्हें उसी सरकार की पुलिस ने ऐसी पिटाई की कि सलवार कुर्ता पहन कर भागते हुए समाज ने देखा इसके दो एक दिन बाद फिर वो और उनके सहयोगी दोनों ही मीडिया के सामने रोते बिलखते हुए प्रकट हुए ! जिनके इस प्रकार के भव्य दर्शन मीडिया के माध्यम से सारे देश ने किए ! 

     आज प्रातः पार्क में कुछ लोग आपस में चर्चा कर रहे थे "कई दौर की बात करने के बाद भी जब उस समय की सरकार ने बाबा जी को जब सिक्योरिटी नहीं दी होगी उससे हैरान परेशान होकर वो सारे देश में सरकार की निंदा करते घूमते रहे फिर विरोधी पार्टी से ऐसी कुछ बात हुई होगी कि तुम हमें जिताओ हम तुम्हें सिक्योरिटी देंगे इसीलिए  उनके पक्ष में  भाषण भूषण तो कम ही देते रहे किन्तु उस पार्टी की निंदा अधिक करते रहे जिसने उन्हें सिक्योरिटी नहीं दी थी ! इसके बाद सत्ता परिवर्तन हुआ और सरकार ने उन्हें उनकी अभिलाषा के अनुशार सुरक्षा देकर पीछा छोड़ाया होगा तब जाके बाबा जी कहीं शांत हुए अन्यथा न जाने कब देने लगते इन्हें भी गाली !खैर उनकी आत्मा को शांति मिली देश भी खुश और समाज भी खुश उनके अनुयायी भी खुश और वो तो खुश हैं ही ताम झाम जो बन गया है !ठीक भी है मेहनत का फल तो मिलना ही चाहिए !वैसे भी जिसके पास  इतनी संपत्ति होती है उससे ईर्ष्या करने वाले लोग भी होते ही हैं और इस अकूत संपत्ति के संग्रह में हो सकता है कि कुछ भले पुरुषों के साथ अन्याय भी हुआ हो! अगर मन के किसी कोने में बाबा जी को उन गुप्त शत्रुओं का भय भी रहा हो तो समाज को क्या पता !किन्तु ऐसे किसी भी उद्योगपति की सुरक्षा का खर्च देश क्यों  बहन करे वो भी तब जबकि उन्हें जनता ने बहुत सारा धन स्वयं ही दे रखा है उसी से करवानी चाहिए अपनी सुरक्षा ! "

     बाबाजी जैसी सरकार चाह रहे थे जब वैसी ही सरकार बन गई !ऐसा सुन्दर रामराज्य आ जाने के बाद तो सामान्य सुरक्षा में ही सभी लोग सुरक्षित हो जाएँगे फिर बाबा जी की सुरक्षा की अलग से आवश्यकता क्यों है ?उस सहज सुरक्षा पर बाबा जी को भरोसा क्यों नहीं है जिसके सहारे सारे देशवासी जी रहे हैं बाबा जी की जान की कीमत आम लोगों से अधिक क्यों है मोदी जी केवल बाबा जी के वोट से ही तो प्रधान मंत्री नहीं बने हैं वोट तो सभी लोगों ने दिया है फिर चिंता केवल बाबा  जी के प्राणों की क्यों ! अरे !देशवासियों तुम्हारे भाग्य में यही लिखा है सरकार चाहें कांग्रेस की आवे या भाजपा की किन्तु तुम इसी उपेक्षात्मिका दृष्टि से देखे जाओगे !

    केवल अपनी  एवं अपनों की सिक्योरिटी बाकी सब देशवासियों को सरकार  किसके भरोसे छोड़ रही है ?  काँग्रेस सरकार दमाददेव की सुख सुविधाओं के लिए चिंतित थी भाजपा सरकार बाबा …देव की सुख सुविधाओं के लिए है !खैर !!

    आज सुबह सुबह पार्क में लोगों की चर्चा का प्रिय विषय बाबा जी की सिक्योरिटी का  ही रहा उन्हीं विभिन्न लोगों के विभिन्न मत मतांतरों का संग्रह इस लेख में हैं लोगों के अपने अपने विचार  हैं -

       देश  वासियों को तो आतंकवादी अक्सर धमकी  दिया करते हैं  कभी स्टेशन उड़ाने की तो कभी ट्रेन उड़ाने की और कभी बाजारों में बम फोड़ने की तो क्या आम जनता को सिक्योरिटी मुहैया करा दी जाती है या उसकी  सरकार की निगाह में उसकी जान की कोई कीमत ही नहीं होती है या सरकार के लोग ऐसा मानते हैं कि उनकी सरकार बनवाने में केवल बाबा जी की ही मुख्य भूमिका रही है बाक़ी देशवासियों का कोई योगदान ही नहीं रहा है ! या फिर बाबा जी  विरोधी पार्टी के नेताओं को जो अपशब्द कहते रहे हैं उसके लिए इस रूप में उनका उत्साहबर्धन किया जा रहा है ताकि भविष्य में भी अपनी वाणी सरस्वती का सदुपयोग वो इसी प्रकार से सरकार के सहयोग में एक पालतू जीव की तरह करते रहें अथवा बाबा  जी का सरकारी लोगों पर दबाव बनाए हुए थे कि काँग्रेस को कोसा तो  हमने भी था सरकार  को उसी तरह खरी खोटी सुनाई थीं जैसे आप लोगों ने सुनाई थीं बल्कि नाम ले लेकर खरी खोटी सुनाने में हम तो कई जगह आप लोगों से दो चार कदम आगे ही रहे फिर सारा ताम झाम केवल आपके पास ही क्यों कुछ हमारे लिए भी करो अन्यथा वो खरी खोटी अभी भी मैं भूला नहीं हूँ और मुद्दा भी अभी जीवित है वही काले धन का जो  अभी तक ला  नहीं पाए हैं आप और न ही निकट भविष्य में ऐसी कोई आशा  ही है जब तक नाम सामने आएँगे तब तक कहाँ बचेगा उन एकाउंटों में पैसा !  इसलिए UPA सरकार वाली भूल से बचती हुई सरकार ने सिक्योरिटी प्रदान करके बाबा जी का मुह बंद कर दिया है अब काला  आवे बाबा जी की बला से !

      लोगों के तर्क ये भी है कि मारने को तो किसी को भी कोई भी मार सकता है जो जितना बड़ा व्यक्ति होता है उसका उतना बड़ा दुश्मन होता है बाबा जी बड़े  व्यापारी हैं तो  उनके दुश्मन भी  ही होंगें  स्वाभाविक है गरीबों की दुश्मनी छोटे लोगों से होती है किन्तु दुश्मन कभी छोटा बड़ा नहीं होता और किसी के साथ कभी भी किसी के भी द्वारा कोई अप्रिय वारदात की जा सकती है !महत्त्व गरीब का भी उतना ही होना चाहिए उसकी जान की कीमत सरकार  दृष्टि में  कम  क्यों है ?वैसे भी बाबा जी को किसी को मारना होता तो चुनावों के पहले मारता क्योंकि तब सरकार के ऊपर संकट था किन्तु अब क्या है अब तो सब संकट टल गया बाबा जी के मन मुताबिक अब तो राम राज्य आ ही गया है अब संकट और सिक्योरिटी किस बात की ?अब तो सब लोगों को सुरक्षित किया जाना चाहिए फिर केवल बाबा जी की सुरक्षा ही क्यों इतनी जरूरी है ?

     जहाँ तक काले धन का मुद्दा उठाने की बात है वो अक्सर विभिन्न लोगों के द्वारा अलग अलग समयों में उठाया जा रहा था ,इतना अवश्य है कि व्यापारी होने के नाते बाबा अपने  प्रोडक्ट बेचने के लिए औरों के  उत्पादों   की  निंदा करते   रहे   इस निंदा से जनता का क्या लाभ हुआ इससे तो उन्हीं  का अपना व्यापार बढ़ता रहा इससे यदि दुश्मनी बढ़ी हो तो उनकी सुरक्षा का बोझ देश क्यों उठावे !

      आम लोगों की आज ये स्थिति है कि उन्हें सुबह अपने घरवालों से राम राम करके निकालना पड़ता है बड़ी बेसब्री से उनका इंतजार करते हैं उनके परिजन ,किन्तु उनकी सिक्योरिटी के लिए किसको चिंता है और जो घर गृहस्थी जैसे माया मोह से दूर रहने की बातें करते हैं वो मरने को इतना डरते हैं सारा ताम झाम अपने ही चारों तरफ  लगाकर रखना चाहते हैं जबकि आम आदमी बिना सिक्यॉरिटी के भी  जी ही रहा है इसी दुनियाँ  में हर किसी को भगवान के भरोसे ही जीना पड़ता है किन्तु जिसे भगवान का भरोसा ही न हो उसे   चाहिए सिक्योरिटी फिर बाबा जी को भगवान का भरोसा न हो ऐसा हो कैसे सकता है !

         खैर कोई बात नहीं है मिलजुलकर सरकार की सुविधाएँ भोगने में बुराई भी क्या है ?और खतरा तो सब पर है और हर समय है किन्तु सरकार और सरकार के चहेते लोगों की सुरक्षा सबसे अधिक जरूरी है बेचारों ने उस समय की सरकार को बहुत ऊटपटाँग शब्द बोले हैं बदले में कुछ तो मिलना ही चाहिए उस दृष्टि से सिक्योरिटी जैसी सुविधा कौन बड़ी बात नहीं  है !रही बात जनता की तो वो पहले भी भगवान भरोसे थी आज भी है और आगे भी उसका बेडा भगवान भरोसे ही पार होना है !

    आम लोग कहीं न जाएँ तो अपने बच्चों का पेट आखिर कैसे पालें !

Thursday, 13 November 2014

बिहार के मुख्य मंत्री माँझी को सरकार चलाना नहीं आ रहा है !इसीलिए ऊटपटाँग बयान दे रहे हैं !

मांझी जैसे लोग बिना आरक्षण के जब घर नहीं चला सकते तो सरकार क्या चला लेंगे !बस ऐसे ही ऊटपटाँग बयान दे देकर अपना समय पास भले कर लें !

   बंधुओ ! सवर्णों के विषय में मांझी ने हाल ही में  कहा था कि "आरक्षण के कारण ही भुइयां का बेटा मुख्यमंत्री पद पर है नहीं तो किसी के खेत में हल जोतता रहता । वह सीएम हैं, इसलिए तो उंची जाति के लोग भी साष्टांग करते हैं, वरना कौन पूछता।"

     आप सोचिए ये किसी प्रशासक का बयान  हो सकता है क्या ?जो जातिवाद के जहर से इतना प्रभावित हो वहां के सवर्ण सुरक्षित हैं इसका भरोसा कैसे किया जाए !  जहाँ मुख्यमंत्री ही जातिवादी आग लगाने पर इसप्रकार से आमादा हो वहाँ की गरीबत के लिए आम जनता का क्या दोष !

हाल

हाल बिहार के मुख्य मंत्री माँझी में सरकार चलाने की सामर्थ्य नहीं है इसीलिए ऊटपटाँग बयान  देकर जनता का ध्यान भटका रहे हैं !वैसे भी जो लोग आरक्षण के बिना अपने परिश्रम के बल पर अपना घर नहीं चला सकते वो कोई सरकार कैसे चला  लेंगे !

    बंधुओ! सवर्ण यदि विदेशी थे तो भारत वर्ष की आजादी के आंदोलन में सबसे अधिक बलिदान और योगदान सवर्णों ने दिया है जिसका स्पष्ट वर्णन भारत सरकार के द्वारा प्रकाशित " भारत के गौरव " नामक नव खण्डीय ग्रन्थ में जिन लोगों को भारत का गौरव बताया गया है उनमें सर्वाधिक लोग सवर्ण थे, मांझी जैसे लोगों का उसमें कहीं अता पता ही  नहीं है क्योंकि आरक्षण के बदौलत और कुछ भी मिल सकता है किन्तु  गौरव नहीं मिल सकता !

       बिहार के मुख्यमंत्री  मांझी   के विवादित बयानों में सबसे अधिक जातिवाद एवं अज्ञान झलकता है लगता है कि जनतादल यू को बरबाद करने का महान काम करने में विरोधियों के लिए माँझी कुछ छोड़ना ही नहीं चाहते हैं वो अकेले अपने  ही बयानों के बल पर ही बर्बाद कर देना चाहते हैं अपनी संपूर्ण पार्टी !किसी और का एहसान नहीं लेना चाहते हैं !बारे स्वाभिमान !!!

      अन्यथा किसी प्रशासक के मुख से ऐसे बेहूदे बयान शोभा देते हैं क्या? सबको मिलकर चलना शासक की जिम्मेदारी होती है किन्तु जहाँ मुख्यमंत्री ही जातिवादी आग लगाने पर आमादा हो वहाँ की गरीबत के लिए आम जनता का क्या दोष !

      बिहार के मुख्यमंत्री  मांझी ने कुछ समय पहले कहा था कि वो जिस मंदिर में गए थे वो धोया गया था !

   अरे  मुख्यमंत्री जी !यदि ऐसा हुआ भी होगा तो आप की जाति के कारण नहीं अपितु उसमें कारण आपकी अकल ,शकल और ऊट पटांग अशुद्ध बयान  बाजी रही होगी !

 


अमर उजाला (कम्पैक्ट )12 \ 11 \ 2014 में प्रकाशित मेरा लेख -

   

Sunday, 9 November 2014

राजनैतिक वेश्यावृत्ति छीन रही है देश और समाज से जीवन मूल्य एवं मर्यादाएँ !

    ईमानदारी, चरित्र और सिद्धांतों के क्षरण को रोका आखिर कैसे जाए !झूठे आरोपों प्रत्यारोपों की कल्पित बरसात से लहलहाने वाली सत्ता सफलता की फसलों के भरोसे कैसे छोड़ दिया जाए वर्तमान लोकतंत्र !

   जो लोग जिन बात व्यवहारों के लिए कलतक जिन नेताओं  की निंदा करते रहे थे वे उन्हीं की कृपा से आज मंत्री पद की शपथ ले रहे हैं ! ऐसे अविश्वनीय नेताओं ,उनके  बातों ,व्यवहारों एवं आश्वासनों पर बन रहे एवं बनाए जा रहे मंत्रियों की बातों और व्यवहारों पर विश्वास आखिर कैसे किया जाए ! 

      मैं पिछले कुछ वर्षों में राजनीति में पवित्र एवं ईमानदार माने जाने वाली पार्टियों से अक्सर संपर्क करता रहता हूँ कि कोई मुझे भी मेरी योग्यता के अनुरूप अपनी पार्टी में कोई काम दे दे और मैं उस पार्टी का हिस्सा बनकर देश एवं समाज के लिए प्रभावी रूप से कुछ काम करूँ !यद्यपि कर तो आज भी रहा हूँ किन्तु उनमें उतनी गति नहीं दे पा रहा हूँ जितनी राजनेता लोग दे सकते हैं इसी लोभ से नेताओं की चरित्रवती बातों पर भरोसा करके मानव मूल्यों की रक्षा के लिए इसी सप्ताह एक पवित्र पार्टी के प्रतिष्ठित नेता जी से मिलने गया और उन्हें अपने शैक्षणिक योग्यता के प्रमाण पत्रों की एक एक कापी दी एवं अपनी लिखी हुई कई पुस्तकें भेंट कीं जिसमें मेरे द्वारा लिखी गई दोहा चौपाई में दुर्गा सप्तशती भी थी । उन्होंने हमारी पुस्तकें लौटाईं पौटाईं और योग्यता प्रमाण पत्र देखे फिर हमसे बोले क्या करोगे राजनीति में हमने कहा शिक्षा एवं सदाचरण पर कुछ सामाजिक वातावरण तैयार करने की इच्छा से कुछ काम कर रहा हूँ उन्हीं विषयों को आगे बढ़ाना चाहता हूँ बाकी जो पार्टी का आदेश होगा उसे तो पालन करना ही होगा ! उन्होंने हमारी किताबें एवं प्रमाण पत्र साइड में रखते हुए कहा -आचार्य जी एक बात कहूँ बुरा तो नहीं लगेगा हमने कहा लगेगा तो लगने दो जो बात आपके  मुख तक आई है वो सुनना मैं भी चाहता हूँ यदि मुझमें कोई कमी होगी तो सुधार करूँगा तो उन्होंने कहा कि -"राजनीति चंडी पाठ से नहीं अपितु रंडी पाठ से चलती है "कर पाओगे तुम !मैंने कहा समझा नहीं ,तो  उन्होंने कहा राजनीति में अपनी की हुई वोमीटिंग यह कहते हुए जीभ से चाटनी पड़ती है कि यह तो बहुत स्वादिष्ट है मैंने कहा यह कैसे ?तो उन्होंने कहा कि जिन पार्टियों नेताओं सिद्धांतों बातों एवं व्यवहारों  को कभी देश द्रोही या देश एवं समाज के लिए घातक बताया गया हो चुका होता है पार्टी बदलते या गठबंधन बनाते समय उन्हीं आचरणों की यह कहते हुए प्रशंसा करनी पड़ती है कि मैं पहले इन्हें समझ नहीं पाया था इसलिए वहाँ या उस पार्टी में या गठबंधन में था अब समझ में आ गया है इसलिए इस पार्टी में आ गया हूँ इसके बाद कभी किसी स्वार्थ के चलते पुनः पुरानी पार्टी में लौटना हो तो यही कहते हुए लौट जाया जाता है !इसलिए आपके इन प्रमाणपत्रों एवं आपकी लिखी हुई किताबों का मैं क्या करूँ ? यह सब सुनकर मैं वापस अपने घर चला आया ! आप भी देख लीजिए -http://jyotishvigyananusandhan.blogspot.in/p/blog-page_7811.html   

   और भी कुछ विंदु हैं इन्हें भी आप  लोग देखिए इनकी ऐसी बातों पर भी विश्वास  आखिर कैसे किया जाए -

    आरक्षण नीति में  सवर्णों का बहिष्कार क्यों ? सवर्णों को देश की सरकारें अपना क्यों नहीं समझती हैं यह कैसा लोकतंत्र जहाँ इतने बड़े सवर्ण वर्ग की इस गैरजिम्मेदारी से उपेक्षा की जा रही हो !

    आरक्षण का अधिकार सवर्णों को क्यों नही ! क्या सवर्णों को भूख नहीं लगती है या सवर्ण जातियों में सभी लोग संपन्न हैं ! यदि ये मान भी लिया जाए कि सवर्ण जातियों में कुछ लोगों के पास धन अधिक होगा किन्तु जिनके पास नहीं हैं उन्हें इन लोकतांत्रिक सरकारों ने किसके भरोसे आरक्षण से बाहर रख छोड़ा है आखिर उनका सहयोग कौन करेगा कहीं सरकार ऐसा तो नहीं मानती है कि सवर्णों में जो धनी लोग हैं वो खाना खाएँगे तो गरीब सवर्णों की भूख भी शांत हो जाएगी ! या इन गरीब सवर्णों को पडोसी देशों के सहारे छोड़ दिया गया है ,या इन्हें देश के अलगाववादी तत्वों के साथ तालमेल बिठाकर चलने के लिए छोड़ा गया !

    ये राजनेता लोग अपनी चोरी छिपाने के लिए ये किसी को आरक्षण देते हैं ,किसी को महँगाई भत्ता या त्योहारों का बोनस या पेंशन बाँटते हैं ,कहीं दाल चावल बाँट रहे हैं कहीं भोजन सुरक्षा  की बात करते हैं किसी को मोटी  मोटी  सैलरी देकर ऊपर से मस्ती मारने की छूट देते हैं शिक्षक, चिकित्सक, डाककर्मियों से लेकर और बहुत सारे विभागों के कर्मचारी अक्सर काम न करने के लिए प्रसिद्ध हैं फिर भी इससे जनता प्रभावित होती है न कि  सरकारें या ऐसे कर्मचारी !आखिर इन्हें तो सैलरी समय से मिला ही करती है । 
     आखिर नेताओं के पास धन आता कहाँ से है ये करते क्या हैं इनके इतने हाई फाई खर्चे होने के बाद भी इनकी का धनसंपत्ति बढ़ते कैसे चली जाती है ये जब राजनीति में आए थे तब भी इनके पास इतनी ही संपत्ति थी क्या ? यदि नहीं तो बाद में आखिर कहाँ से आ गई ?
     किसी को किसी भी प्रकार का आरक्षण क्यों किसी को भी पेंशन क्यों ?फ्री में किसी को कुछ भी क्यों दिया जाए और बाकी  लोगों को क्यों नहीं !
   सत्तालोभी नेताओं ने देशवासियों को आत्म निर्भर बनाने की जगह सरकार निर्भर बना डाला ! ये नेता रसोई तक घुस गए दाल चावल बाँट रहे हैं फूड सिक्योरिटी बिल का मतलब क्या है ?क्या कोई स्वस्थ व्यक्ति अब अपने लिए भोजन नहीं कमा सकता यदि ऐसा ही है तो फूड सिक्योरिटी बिल नहीं अपितु आजादी के बाद आज तक का हिसाब चाहिए कि नेता लोग जनता के नाम पर अपना घर क्यों भरते रहे उनकी संपत्ति एवं आय स्रोतों की जाँच होनी चाहिए!
     किसी भी राजनैतिक दल के चुनावी घोषणापत्र में आरक्षण नहीं होना चाहिए ?अब लूट बंद होनी चाहिए वो चाहें सरकार एवं सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार की हो या जाति संप्रदाय  के आधार पर आरक्षण की !

       देश पर सबसे अधिक वर्षों तक शासन करने वाली वाली पार्टी को  आजादी के साठ वर्षों बाद देश की जनता के भोजन की याद आई!ये बहुत बड़ा आश्चर्य है ! 

     सभी प्रकार का आरक्षण  भ्रष्टाचार का दूसरा स्वरूप और सामाजिक बुराई एवं अन्याय है इसे समाप्त करने का संकल्प करो !आरक्षण सामाजिक न्याय कभी नहीं हो सकता ,आरक्षण की व्यवस्था केवल उनके लिए होनी चाहिए जो काम करने लायक न हों अपाहिज हों,अनाथ हों,अनाश्रित हों,असाध्यरोगी हों,पागल हों अत्यंत  परेशान हों ,अत्यंत पीड़ित हों ,अत्यंत गरीब होने के बाद भी शारीरिक लाचारी के कारण बेचारे कमाने लायक न रह गए हों! ऐसे लोगों के विषय में जाति,क्षेत्र,समुदाय,संप्रदाय,स्त्री-पुरुष आदि भेद भावनाओं से ऊपर उठकर उदार भावना एवं अपनेपन से मदद की जानी चाहिए जिससे उन अपाहिजों को लेते भी अच्छा लगे और देने वाले को भी देने में प्रसन्नता हो उन्हें भी लगे कि हमारा हक़ छीन कर वास्तव में उन्हें दिया गया है जिनके प्रति हमारा दायित्व बनता है इसलिए ऐसे लोगों का सहयोग किया जाना चाहिए ऐसे लोग जो कुछ भी करने लायक हों वे पद ऐसे लोगों के लिए आरक्षित कर दिए जाने चाहिए जैसे किसी के पैर कट गए हों किन्तु वह शिक्षित होने के कारण शिक्षा से जुड़े कार्य कर सकता हो पढ़ा सकता हो तो ऐसे कामों में इनका सौ प्रतिशत  आरक्षण इन्हें दिया  जाना  चाहिए ताकि ये भी उत्साह एवं स्वाभिमान पूर्वक जीवन जी सकें !जो स्वस्थ हैं वो तो कुछ भी कर के कमा खा लेंगे। 

     इसलिए आरक्षण की व्यवस्था हमेंशा उन लोगों के लिए की जानी चाहिए जो लोग कुछ करने लायक न रह गए हों अपाहिज हों किन्तु जो करने लायक हों और कुछ करना चाहते हों सरकार उन्हें शिक्षित करने में सहायता करे उन्हें उनके लायक रोजगार उपलब्ध करावे,कम ब्याज पर बाधा मुक्त ऋण देने की  व्यवस्था करे इनमें सरकार को चाहिए कि पक्षपात विहीन होकर सभी के साथ समान दृष्टि से न्याय करे किसी को ऐसा नहीं लगना चाहिए कि उसके साथ अन्याय हो रहा है क्योंकि प्रजा प्रजा में भेद करना अन्याय भी है अत्याचार भी है अपराध भी है और सबसे बड़ा पाप भी !

      कोई भी पूरी जाति,पूरा क्षेत्र और सम्पूर्ण सम्प्रदाय कभी अपाहिज, असाध्य या अक्षम नहीं हो सकता यदि यह सच है तो किसी पूरी जाति,पूरे क्षेत्र और सम्पूर्ण सम्प्रदाय को सरकार आरक्षण जैसा विशेष दर्जा क्यों दे ?उसके लिए तो अन्य लोगों की तरह ही सारे देश के सभी स्कूल पढ़ने के लिए खुले हैं और प्राइवेट या सरकारी नौकरियों के लिए सभी संस्थान समानरूप से अवसर दे रहे हैं व्यापार के लिए सारा मार्केट खुला हुआ है फिर भी जो लोग पिछड़े हैं उसमें समाज का दोष क्या है आखिर समाज क्यों ऐसे लोगों का बोझ ढोता  फिरे !

      लाख टके का सवाल यह है कि स्वस्थ होने पर भी आरक्षण पाने की इच्छा रखने वाले लोगों से शपथ पूर्वक पूछा जाना चाहिए कि यदि सवर्ण वर्ग के गरीब लोग परिश्रम पूर्वक काम करके बिना आरक्षण के अपनी तरक्की कर सकते हैं तो आप में ऐसी कमजोरी क्या है आप क्यों हिम्मत हार रहे हैं आखिर आपको क्यों लगता है कि अपने परिश्रम के बल पर हम तरक्की नहीं कर सकते ! आखिर आप में ऐसी कमजोरी क्या है?और यदि वास्तव में आप अपने को कमजोर मान ही बैठे हैं तो अपने को ठीक करा लीजिए जाँच कराइए इलाज कराइए इसमें सरकार का सहयोग लीजिए और फिर परिश्रम पूर्वक काम करके अपनी तरक्की  आप स्वयं भी कर सकते हैं इससे आपका उत्साह बढ़ेगा जिससे आप सवर्णों से केवल बराबरी ही नहीं कर सकते हैं अपितु उन्हें पछाड़ भी सकते हैं न केवल इतना अपितु परिश्रम पूर्वक काम करके अपनी तरक्की करने से जिस उत्साह एवं स्वाभिमान का प्राकट्य होगा उससे पीढ़ियों की पीढ़ियाँ पवित्र हो जाएँगी हर कोई आपको अपना आदर्श मानेगा और आदर करेगा !किन्तु आरक्षण के द्वारा ये सब चीजें नहीं मिल पाएँगी केवल पेट भरने का साधन बनता रहेगा वो भी आरक्षण से ! पेट तो पशु भी भर लेते हैं वह भी बिना किसी आरक्षण के इसलिए केवल पेट भरने के लिए ही सारी कवायद क्यों?सच्चाई के साथ आत्मबल एवं मनोबल बढ़ाने के लिए कुछ कीजिए-

      जो लोग कहते हैं कि  पहले सवर्णों ने हमारा शोषण किया था इसलिए हम पिछड़ गए हैं किन्तु यह कई कारणों से सच नहीं है पहला कारण तो यह है कि कब शोषण हुआ था! किसने किया था! कितना किया था !किस प्रकार से किया था! दूसरा सहने वालों ने सहा क्यों  था उन्होंने विरोध क्यों नहीं किया था ! क्योंकि सहने वालों की संख्या बहुत अधिक थी इसलिए ये भी नहीं कहा जा सकता है कि भयवश इन लोगों ने अपना शोषण सह लिया होगा, इसलिए सच्चाई तो यही  है कि पहले भी किसी ने किसी का शोषण किया ही नहीं होगा! और यदि शोषण की बात को सच मान भी लिया जाए तो पिछले लगभग 60 वर्षों से तो आरक्षण ले रहे हैं वो लोग! आखिर क्यों नहीं कर ली तरक्की?60वर्ष भी थोड़े तो नहीं होते हैं। 

    इसलिए  यदि अपने पीछे रह जाने  के प्रकरण में आत्म मंथन करके यदि अपनी कमजोरी नहीं खोज पाए और उनका सुधार नहीं किया तो कैसे  हो पाएगा विकास ?ऐसे तो सवर्णों के शोषण का रोना धोना लेकर बैठे रहेंगे 60 क्या 600 वर्षों में भी अपना उत्थान कर पाना असम्भव होगा ! आरक्षण तो किसी की कृपा से प्राप्त अवसर है याद रखिए कि किसी की कृपा पूर्वक प्रदान की गई आजीविका कभी आत्मबल या मनोबल नहीं बढ़ने देगी। 

    कुल मिलाकर आरक्षण नाम का इतना बड़ा भ्रष्टाचार जब सरकारी नीतियों में सम्मिलित किया जा सकता है तब  भ्रष्टाचार समाप्त करने का ड्रामा भले ही कोई सरकार करे किन्तु इसे समाप्त कर पाना कठिन ही नहीं असम्भव भी होगा ! 

        आज कुछ सरकारी कर्मचारियों ने अपने को देश वासियों से बिलकुल अलग कर रखा है भ्रष्टाचार का कोई भी  मौका मिलते ही उन्हें डसने में देर नहीं करते हैं इसके बाद भी उन्हें महँगाई ,भत्ता और भी जाने क्या क्या दिया करती हैं सरकारें !उनका बेतन आम जनता की आमदनी की अपेक्षा इतना अधिक होता है फिर और भी बढ़ाया करती हैं सरकारें! न  जाने उनके किस आचरण पर फिदा रहती हैं भारतीय  सरकारें ? ये सरकारों के दुलारे लोग ऐसे धन से चौड़े हो रहे हैं विभागों में कुछ काम धाम तो  करते नहीं हैं वहाँ कोई देखने सुनने वाला ही नहीं होता है हो भी तो कोई कहे ही क्यों उसका अपना कोई नुकसान तो हो नहीं रहा है भुगतना जनता को पड़ता है ! जहाँ इतनी ऐशो आराम हो फिर भी काम न करना पड़े तो वो लोग कुछ तो करेंगे ही!

   कभी  यूनिअन बनाएँगे धरना प्रदर्शन करके अपनी ऊल जुलूल माँगे मनवाएँगें!सरकार मानती भी है इससे उनका हौसला और बढ़ता है । 

        यदि सरकार वास्तव में भ्रष्टाचार ख़त्म करना ही चाहती है तो सरकारी कर्मचारियों के ऐसे सभी संगठनों को प्रतिबंधित कर देना चाहिए न केवल इतना ही अपितु गैर कानूनी घोषित कर देना चाहिए आखिर वो लोग  सैलरी यूनियन बनाने ,धरना प्रदर्शन करने की लेते हैं या काम करने की !और उन्हें सीधे तौर पर बता दिया जाना चाहिए कि सरकारी व्यवस्था जो आपको दी जा रही है वो समझ में आवे तो काम करो अन्यथा घर बैठो !

            इस प्रकार से उन्हें हटाकर नई नियुक्तियाँ  कर देनी चाहिए जिससे बेरोजगारी घटेगी नए जरूरतवान्  लोगों को काम मिलेगा वो उसकी कदर भी करेंगे मन लगाकर कामभी करेंगे इससे समाज का भी लाभ  होगा काम की गुणवत्ता में सुधार होगा  साथ ही छुट्टी करके गए पुराने कर्मचारियों का  भी भला होगा उनके पास पैसा तो होता ही है उस पैसे से  वो कोई धंधा व्यापार कर लेंगे काम करने के कारण वे भी शुगर आदि बीमारियों से बचेंगे भ्रष्टाचार में कमी आएगी समाज में एक दूसरे के प्रति सामंजस्य  बढ़ेगा आदि आदि । 

     किसी को पेंशन क्यों दी जाए ?

     गरीब किसान मजदूर या गैर सरकारी लोग जो दो हजार रूपए महीने भी कठिनाई से कमा  पाते हैं वो भी दो दो  पैसे बचा कर अपने एवं अपने बच्चों के पालन पोषण से लेकर उनकी   दवा आदि की सारी व्यवस्था करते ही हैं उनके काम काज भी करते हैं और ईमानदारी पूर्ण जीवन भी जी लेते हैं ।

    दूसरी और सरकारी कर्मचारियों की पचासों हजार की सैलरी ऊपर से प्रमोशन उसके ऊपर महँगाई भत्ता आदि आदि और उसके बाद बुढ़ापा बिताने के लिए बीसों हजार की पेंसन दी जा रही है इतने सबके बाबजूद सरकारी कर्मचारियों के एक वर्ग का पेट नहीं भरता है तो वो काम करने के बदले घूँस भी लेते हैं इतना सब होने के बाद भी सरकारी प्राथमिक स्कूलों में शिक्षक पढ़ाते  नहीं हैं अस्पतालों में डाक्टर सेवाएँ  नहीं देते हैं डाक विभाग कोरिअर से पराजित है दूर संचार विभाग मोबाईल आदि प्राइवेट विभागों से पराजित है जबकि प्राइवेट क्षेत्रों में सरकारी की अपेक्षा सैलरी बहुत कम है फिर भी वे सरकारी विभागों की अपेक्षा बहुत अच्छी सेवाएँ देते हैं। 

    आखिर क्या कारण है कि देश की आम जनता की परवाह किए बिना सरकार के मुखिया,सरकार में सम्मिलित लोग एवं सरकारी कर्मचारी आखिर क्यों भोगने में लगे हैं गैर सरकारी लोगों के खून पसीने की कमाई !देश के लोग कब तक और क्यों उठावें ऐसी सरकारों एवं सरकारी कर्मचारियों का बोझ ?

    जब गरीब आदमी अपनी छोटी सी कमाई में ही बचत करके कर लेता है अपने बुढ़ापे का इंतजाम तो पचासों हजार रूपए महीने कमाने वाले सरकारी कर्मचारियों को क्यों दी जाती है बुढ़ापे में पेंसन ? आखिर ये अंधेर कब तक चलेगी और कब तक चलेगा प्रजा प्रजा में भेद भाव का या तांडव ?और कब तक लूटी जाएगी आम जनता ?  
     क्या देश की आजादी पर केवल सरकार और सरकारी कर्मचारियों  का ही अधिकार है बाकी गैर सरकारी लोगों के पूर्वजों का कोई योगदान ही नहीं है !
      अब सरकार से भ्रष्टाचार  मुक्त उत्तम प्रशासन चाहिए इसके आलावा कृपापूर्ण गैस सिलेंडर ,भोजन बिल, पेंसन, आरक्षण,नरेगा ,मरेगा,मनरेगा आदि कुछ भी नहीं चाहिए !अन्यथा गैर सरकारी कहलाने वाली आम जनता अब दलित-सवर्ण, हिन्दू-मुश्लिम, स्त्री-पुरुष आदि भेद भाव के  रूप में दिए गए किसी भी प्रकार के लालच को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है और न ही आपस में लड़ने को ही तैयार है अब वो सारी  चाल समझ चुकी है । अब तो सरकार एवं सरकारी कर्मचारियों को सुधारना ही होगा अन्यथा अब सरकार एवं सरकारी कर्मचारियों   के  शोषण विरुद्ध के विरुद्ध लड़ेगी आम जनता अपने अधिकारों के लिए आंदोलनात्मक अंतिम युद्ध !

 

     इस विषय में हमारे निम्न लिखित लेख भी पढ़े जा सकते हैं -

    भ्रष्टाचार के स्रोत क्या हैं और इसे समाप्त कैसे किया जा सकता है ?

     सरकार के  हर विभाग में  भ्रष्टाचार व्याप्त है उससे छोटे से बड़े तक अधिकांश कर्मचारी लाभान्वित होते हैं इसलिए उन पर  भ्रष्टाचार की जो विभागीय जाँच होती है वहाँ क्लीन चिट  मिलनी ही होती है क्योंकि यदि नहीं मिली तो उसके तार उन तक जुड़े निकल सकते हैं  जो जाँच करsee  more...http://bharatjagrana.blogspot.in/2014/01/blog-post_19.html

दलित शब्द का अर्थ कहीं दरिद्र या गरीब तो नहीं है ?

   समाज के एक परिश्रमी वर्ग का नाम पहले तो दलित अर्थात दबा, कुचला टुकड़ा,भाग,खंड आदि रखने की साजिश हुई। ऐसे अशुभ सूचक नाम कहीं मनुष्यों के होने चाहिए क्या?  वो भी भारत वर्ष की जनसंख्या के बहुत बड़े वर्ग को दलितsee more...http://snvajpayee.blogspot.in/2013/03/blog-post_2716.html

आरक्षण बचाओ संघर्ष आखिर क्या है ? और किससे ?

     आरक्षणबचाओसंघर्ष या बुद्धुओं को बुद्धिमान बताने का संघर्ष आखिर क्या है ?ये संघर्ष उससे है जिसका हिस्सा हथियाने की तैयारी है।ये अत्यंत निंदनीय है !  जिसमें  चार घंटे अधिक काम करने की हिम्मत होगी वो आरक्षण माँगेगा ही क्यों ?उसे अsee more...http://snvajpayee.blogspot.in/2012/12/blog-post_3571.html

गरीब सवर्णों को भी आरक्षण की भीख  मिलेगी ? 
     चूँकि किसी भी प्रकार का आरक्षण कुछ गरीबों, असहायों को दाल रोटी की व्यवस्था करने के लिए दिया जाने वाला सहयोग है इससे जिन लोगों का हक मारा जाता है वे इस आरक्षण को भीख एवं जिन्हें दिया जाता है उसे भिखारी समझते हैंsee  more...http://snvajpayee.blogspot.in/2012/12/blog-post_3184.html
आरक्षण एक बेईमान बनाने की कोशिश !
जो परिश्रम करके अपने को जितना ऊँचे उठा लेगा वह उतने ऊँचे पहुँचे यह  ईमानदारी है लेकिन जो यह स्वयं मान चुका हो कि हम अपने बल पर वहाँ तक नहीं पहुँच सकते ऐसी हिम्मत हार चुका हो ।see  more...http://snvajpayee.blogspot.in/2012/12/blog-post_8242.html
पहले आरक्षण समर्थक नेताओं की संपत्ति की हो जाँच तब आरक्षण की बात!              
 प्रतिभाओं के दमन का षड़यंत्र

     जब गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की बात उठी तो उस समय एक मैग्जीन में मेरा लेख छपा था   कि  आरक्षण एक प्रकार की भीख है जो किसी को नहीं लेनी चाहिए, तो आरक्षण समर्थक कई सवर्ण लोगों के पत्र और फोन आए कि जब सभी जातियों को आरक्षण चाहिए तो हमें भी मिलना चाहिए।मैंने उनका विरोध करके कहा था कि किसी को आरक्षण क्यों चाहिए।   यहsee more...http://snvajpayee.blogspot.in/2012/12/blog-post_6099.html


Friday, 7 November 2014

तंत्र ,मंत्र ,यंत्र और टोटके कोरे अंध विश्वास तो नहीं हैं !

तंत्र ,मंत्र और यंत्र जैसी गुप्त विद्याओं के क्षेत्र में ईमानदार ,चरित्रवान एवं विश्वसनीय लोगों की घटती संख्या ने इन्हें अन्धविश्वास बना दिया ।

     हिंदू धर्म में हजारों तरह की साधनाओं का वर्णन मिलता है। साधना से सिद्धियाँ  प्राप्त होती हैं। व्यक्ति सिद्धियां इसलिए प्राप्त करना चाहता है, क्योंकि या तो वह उससे सांसारिक लाभ प्राप्त करना चाहता है या फिर आध्यात्मिक लाभ। तांत्रिक सिद्धियों के लिए दो प्रकार की साधना   होती है- एक वाम मार्गी तथा दूसरी दक्षिण मार्गी। वाम मार्गी साधना बेहद कठिन है। वाम मार्गी साधना में 6 प्रकार के कर्म बताए गए हैं जिन्हें षट् कर्म कहते हैं।मारण, मोहनं, स्तम्भनं, विद्वेषण, उच्चाटन, वशीकरण, आकर्षण हैं।

साधना भी कई प्रकार की होती है। मं‍त्र से किसी देवी या देवता को सिद्ध किया जाता है और मंत्र से किसी भूत या पिशाच को भी सिद्ध किया जाता है।‘मंत्र साधना’ में   भौतिक बाधाओं का आध्यात्मिक उपचार करने की व्यवस्था है ।

मंत्र मुख्यत: 3 प्रकार के होते हैं- 1. वैदिक मंत्र, 2. तांत्रिक मंत्र और 3. शाबर मंत्र

मंत्र जप के तीन भेद होते हैं - 1. वाचिक जप, 2. मानस जप और 3. उपाशु जप।

    वाचिक जप में ऊंचे स्वर में स्पष्ट शब्दों में मंत्र का उच्चारण किया जाता है। मानस जप का अर्थ मन ही मन जप करना। उपांशु जप का अर्थ जिसमें जप करने वाले की जीभ या ओष्ठ हिलते हुए दिखाई देते हैं लेकिन आवाज नहीं सुनाई देती। बिलकुल धीमी गति में जप करना ही उपांशु जप है।मंत्र-साधना में विशेष ध्यान देने वाली बात है- मंत्र का सही उच्चारण, दूसरी बात  मंत्र सिद्धि के लिए आवश्यक है कि मंत्र को गुप्त रखा जाए ! 

साधना सबसे सरल है। बस यंत्र लाकर या लिखकर उसे सिद्ध करके घर में रखने से ही कार्य अपने आप सफल होने लगते हैं ।  श्रीयंत्र आदि अनेक यंत्र ऐसे भी हैं जिनकी रचना में मंत्रों का भी प्रयोग होता है और ये बनाने में अति क्लिष्ट होते हैं।यंत्र साधना के अंतर्गत कागज अथवा भोजपत्र या धातु पत्र पर विशिष्ट स्याही से या किसी अन्यान्य साधनों के द्वारा आकृति, चित्र या संख्याएं बनाई जाती हैं। इस आकृति की पूजा की जाती है अथवा एक निश्चित संख्या तक उसे बार-बार बनाया जाता है। इन्हें बनाने के लिए विशिष्ट विधि, मुहूर्त और अतिरिक्त दक्षता की आवश्यकता होती है।यंत्र या कवच भी सभी तरह की मनोकामना पूर्ति के लिए बनाए जाते हैं जैसे वशीकरण, सम्मोहन या आकर्षण, धन अर्जन, सफलता, शत्रु निवारण, भूत बाधा निवारण, होनी-अनहोनी से बचाव आदि के लिए यंत्र  बनाए जाते हैं।

     इसके  अलावा कुछ टोटके भी होते हैं इनसे कितना लाभ होता है कह  पाना कठिन है यद्यपि ये शास्त्र प्रमाणित नहीं होते हैं किन्तु लोक  प्रमाणित अवश्य  होते हैं  अर्थात समाज के प्रचलन में ये युगों से चले आ रहे हैं इसलिए इन्हें संपूर्ण रूप से नकारा नहीं जा सकता हाँ इन पर विश्वास कितना किया जाए ये और विषय हो सकता है किन्तु मुशीबत के समय मनोबल बढ़ाने में ये बहुत अधिक सहायक होते हैं विशेष कर गरीब लोग तो ऐसे उपायों के सहारे अपना संपूर्ण जीवन ही पार कर लेते हैं । मनोरोगियों का बुरा समय पार करने के लिए ये टोटके वरदान जैसे सिद्ध होते हैं और इन्हीं के सहारे सामान्य मनोरोगी आत्महत्या जैसी मनोदशा पर विजय पा  लेते हैं !

उदाहरण स्वरूप कुछ टोटके -

- एकाक्षी नारियल को लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी में रखें।

- सफेद पलाश के फूल, चांदी की गणेश प्रतिमा, व चांदी में मड़ा हुए एकाक्षी नारियल को अभिमंत्रिमत कर तिजोरी में रखें।

- घर के मुख्य दरवाजे पर कुमकुम से स्वास्तिक बनाएं और बासमती चावल की ढेरी पर एक सुपारी में कलावा बांध कर रख दें। धन का आगमन होने लगेगा।

- सुबह शुभ मुहूर्त में एकाक्षी नारियल का कामिया सिन्दूर कुमकुम व चावल से पूजन करें धन लाभ होने लगेगा।

-- रूके हुए कार्यों की सिद्धि के लिए यह प्रयोग बहुत ही लाभदायक है। गणेश चतुर्थी को गणेश जी का ऐसा चित्र घर या दुकान पर लगाएं, जिसमें उनकी सूंड दायीं ओर मुड़ी हुई हो। इसकी आराधना करें। इसके आगे लौंग तथा सुपारी रखें। जब भी कहीं काम पर जाना हो, तो एक लौंग तथा सुपारी को साथ ले कर जाएं, तो काम सिद्ध होगा। लौंग को चूसें तथा सुपारी को वापस ला कर गणेश जी के आगे रख दें तथा जाते हुए कहें श्री गणेश काटो कलेशं।


- सरकारी या निजी रोजगार क्षेत्र में परिश्रम के उपरांत भी सफलता नहीं मिल रही हो, तो नियमपूर्वक किये गये विष्णु यज्ञ की विभूति ले कर, अपने पितरों की क्वकुशां की मूर्ति बना कर, गंगाजल से स्नान करायें तथा यज्ञ विभूति लगा कर, कुछ भोग लगा दें और उनसे कार्य की सफलता हेतु कृपा करने की प्रार्थना करें। किसी धार्मिक ग्रंथ का एक अध्याय पढ़ कर, उस कुशा की मूर्ति को पवित्र नदी या सरोवर में प्रवाहित कर दें। सफलता अवश्य मिलेगी। सफलता के बाद किसी शुभ कार्य में दान दें। -व्यापार केलिए सरसों के तैल में सिके गेहूँ के आटे व पुराने गुड़ से तैयार सात पूये, सात आक के पुष्प, सिंदूर, आटे से तैयार सरसों के तैल का रूई की बत्ती से जलता दीपक, पत्तल या अरण्डी के पत्ते पर रखकर शनिवार की रात्रि में किसी चौराहे पर रखें और कहें हे मेरे दुर्भाग्य तुझे यहीं छोड़े जा रहा हूँ कृपा करके मेरा पीछा ना करना।

     वैसे तो अपना काम बनाने के लिए सीधे तौर पर भगवान से स्वयं प्रार्थना करनी चाहिए।

 


केवल साड़ी उद्योग का ही विकास क्यों ? पहले तो साड़ी संस्कृति को ही बचाया जाना चाहिए !

साड़ी उद्योग को बचाने से पहले उस संस्कृति को बचाया जाना चाहिए जिसमें साड़ी पहनने की परंपरा है !    

आज साड़ी पहनने वाली संस्कृति मिटती जा रही है  जिन्हें साड़ी पहननी है वो तो छोड़ती जा रही हैं फिर यदि साड़ी  उद्योग चला भी लिया जाए तो साड़ी पहनने वाले लाए कहाँ से जाएँगे !  

आज विदेशी संस्कृति का बर्चस्व इतना अधिक बढ़ता जा रहा है कि नई लड़कियों में साड़ियों के प्रति रुझान धीरे धीरे घटता जा रहा है लड़कियाँ  साड़ी  पहनना छोड़ती जा रही हैं इसलिए वो साड़ी परिधान को ही भूलती भी जा रही हैं । अब तो शरीर से चिपके हुए कपड़ों को पहनने का फैशन सा बनता जा रहा है कई जगह वो भी आधे अधूरे पहने जा रहे हैं ,ऐसे में साड़ी  फिट कहाँ बैठ रही  है !

विगत कुछ दशकों में समाज के सभी वर्गों में तथा विशेषकर  युवा पीढ़ी में भारत वर्ष की प्राचीन संस्कृति से इतनी घृणा भरी गई है कि केक काटकर जन्म दिन मनाने की आदत सबमें पड़ती जा रही है ,लोग दीपक जलाने की जगह दीपक बुझाने में विश्वास करने लगे हैं । बड़े बड़े हिन्दू संगठनों के मसीहा लोगों समेत आम हिन्दुओं में भी चोटी कटाने की परंपरा जोर पकड़ती जा रही है इसलिए यदि संस्कृति बचेगी तो सब कुछ बचेगा इसलिए केवल बनारसी साड़ी ही बनारस की पहचान नहीं है अपितु बनारस की साड़ी ,संस्कृत ,संस्कृति ,शिक्षा  आदि सभी क्षेत्रों को मिलाजुलाकर बनती है काशी की संस्कृति और उसकी पहचान ! इसलिए इन सभी बातों का भी उत्थान समान रूप से किया जाना बहुत जरूरी है।

आज मोदी जी की गोद में तो पूरा देश ही है फिर किसी एक गाँव को गोद लेने का सन्देश क्या है ?बंधुओ ! जब आज पूरा देश ही मोदी जी की ओर देख रहा है फिर उसमें से केवल बनारस को ही विकास के लिए चुना जाना उसमें भी जयापुर नामक किसी एक गाँव को कृपाभाजन मानना  कहीं ऐसा तो नहीं है कल उस जयापुर नामक गाँव के किसी एक परिवार को गोद लेकर फिर उस परिवार के किसी एक सदस्य को ही गॉड ले लिया जाए और उसे ही एक दिन किसी मंच पर बुलाकर एक सालओढ़ा कर भेज दिया जाए !

आज काशी की पंचांग परंपरा मरती  जा रही है उसे जीवित करने की बहुत बड़ी आवश्यकता है, भारत की प्राचीन विद्याओं में प्रोक्त मौसम विज्ञान पर काम होना चाहिए, आज संस्कृत के शिक्षण संस्थानों में घूस के बल पर अयोग्य लोग अध्यापक बन रहे हैं वो पढ़ाएँगे क्या और योग्य लोग बेरोजगारी की समस्या से मारे फिर रहे हैं उनकी विद्या निष्फल होती जा रही है कई संस्कृतविद्यालयों की स्थिति तो यह है कि जिन कक्षाओं को पढ़ाने के लिए जो अध्यापक रखे गए हैं उन्हीं कक्षाओं की परीक्षाओं में उन शिक्षकों को बैठा दिया जाए तो उनका पास होना किसी भी कीमत पर संभव ही नहीं है क्या उनके बलपर बचेगी भारत वर्ष की प्राचीन सांस्कृतिक शैक्षणिक विरासत !

इसलिए ये सब कुछ बचाया जाना बहुत जरूरी है और इसकी शुरुआत यदि साड़ी उद्योग से  की गई है तो बहुत बहुत बधाई !

Saturday, 1 November 2014

साईं नाम से शिरडी संस्थान में केवल दो ही काम होते हैं
पहला काम केवल लड्डू बनाए और बेचे जाते हैं और चन्दा इकठ्ठा किया जाता है वहाँ धर्म नाम की कोई चीज है ही नहीं और हो भी कैसे !साईं के यहाँ धर्म को न किसी ने पढ़ा है और न समझा है केवल धन इकठ्ठा करने किए बिना शिर पैर वाले साईं जैसे काल्पनिक पात्रों की मूर्तियाँ बनवाकर मंदिरों में देवी देवताओं की तरह पुजने  पुजाने का ड्रामा करना ही साईं संस्थान का काम है जो ठीक नहीं है !