भाग्य से ज्यादा और समय से पहले किसी को न सफलता मिलती है और न ही सुख ! विवाह, विद्या ,मकान, दुकान ,व्यापार, परिवार, पद, प्रतिष्ठा,संतान आदि का सुख हर कोई अच्छा से अच्छा चाहता है किंतु मिलता उसे उतना ही है जितना उसके भाग्य में होता है और तभी मिलता है जब जो सुख मिलने का समय आता है अन्यथा कितना भी प्रयास करे सफलता नहीं मिलती है ! ऋतुएँ भी समय से ही फल देती हैं इसलिए अपने भाग्य और समय की सही जानकारी प्रत्येक व्यक्ति को रखनी चाहिए |एक बार अवश्य देखिए -http://www.drsnvajpayee.com/
Tuesday, 30 September 2014
आज देश की सबसे बड़ी आावश्यकता है सजीव समाज का निर्माण !
आज देश की सबसे बड़ी आावश्यकता है सजीव समाज का निर्माण !
मान्यवर ! ये काम हम सब लोगों को ही करना है क्या हम सबलोग मिलकर एक जीवित समाज का सृजन नहीं कर सकते ! आखिर हम सब लोगों को जीवन की छोटी छोटी बातों के लिए सरकारों की ओर ही क्यों ताकना पड़ता है क्या समाज के हम सभी लोगों का आपस में कोई आपसी सम्बन्ध नहीं है क्या हमारा कोई आपसी दायित्व भी नहीं है क्या हमारे कोई निजी अधिकार नहीं हैं जो हम आपस में एक दूसरे को दे ले सकें अरकारें और राजनेता हमारी पंचायतें नहीं कर साते जो अपने गठबंधन नहीं सँभाल पाते हैं उनसे हम लोगों को क्या आशा करनी !
मोदी जी केवल गुजराती से ही नहीं अपितु हिन्दी से भी प्रसन्न हो सकते हैं !ओबामा साहब !!!
ओबामा ने मोदी से पूछा- 'केम छो मिस्टर प्राइम मिनिस्टर'-IBN-7
मोदी जी गुजरात के गुजरात मोदी जी का , मोदी जी के भाषणों में अक्सर गुजरात ,गुजरात के नेता,गुजरात के व्यापारी , गुजराती भाषा और गुजराती महापुरुषों का जिक्र विशेष रहता है गुजरात की योजनाएँ गुजरात के कार्यक्रम आदि आदि!कहीं यही कारण तो नहीं है ओबामा के ऐसा करने का !
खैर जो भी हो मोदी जी आज हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री हैं पूरे देश का प्रतिनिधित्व आज वो करते हैं तो पूरा देश उनकी ओर देख रहा है वैसे भी देश के अंदर वो गुजराती हैं किन्तु विश्व में उनकी पहचान हिंदुस्तानी की है और हिंदुस्तानी राष्ट्र भाषा हिंदी सर्व विदित है और बोलने में भी सुगम है किन्तु मोदी जी के कुशल क्षेम पूछने में ओबामा साहब ने गुजराती चुनी हिंदी नहीं !हिंदी और हिंदुस्तानी की पहचान में पूरा देश सम्मिलित है चूँकि हिंदी राष्ट्रभाषा है इसलिए प्रमुखता उसे मिलनी ही चाहिए बाक़ी गुजराती समेत समस्त भारतीय भाषाएँ हमारे लिए उतनी ही सम्माननीय हैं । यद्यपि मोदी जी ने हिंदी में भाषण देकर हिन्दी को महान महत्त्व दिया है इसके लिए बहुत बहुत आभार । एक निवेदन अवश्य है कि अब ऐसा कुछ हो जिससे औरों को भी लगे कि मोदी जी केवल गुजराती से ही नहीं अपितु हिन्दी से भी प्रसन्न हो सकते हैं !
Thursday, 25 September 2014
नशा मुक्त हो अपना देश ,मोदी जी का यह सन्देश !
मोदी जी के मन की बात ।
नशामुक्त हो भारतमात ॥
नशा मुक्त देश बनाने सम्बन्धी मोदी जी का सन्देश टीवी पर सुना तो हृदय गदगद हो गया और एक क्षण ऐसा लगा कि देश और समाज के प्रति कोई अपनेपन से सोच रहा है अन्यथा सरकारी कामों में तो हर काम की फाइलें बनती हैं विज्ञापन दिए जाते हैं और प्रेस नोट जारी कर दिया जाता हैं आंकड़े पेश किए जाते हैं इन सभी चीजों पर आए भारी भरकम खर्च को जनता के मत्थे मढ़ दिया जाता है ।
सरकारी स्कूलों आफिसों में नैतिक स्लोगन लिखवाकर लटका दिए जाते हैं कई बार इसमें भी घोटाले होते हैं यही नहीं जिन स्कूलों में ऐसे नैतिक स्लोगन लिखकर लटकाए जाते हैं वहाँ के शिक्षकों के द्वारा ही इनकी उड़ाई जा रही होती हैं धज्जियाँ !सरकारी और निगम स्कूलों के शिक्षक स्वयं में इतने अनैतिक हैं कि सरकारी शिक्षा दिनोंदिन दम तोड़ती जा रही है मध्यान्ह भोजन में कीड़े मकोड़े आदि सब कुछ निकल रहा है जिसमें कोई अधिक सुधार होता नहीं दिख रहा है वस्तुतः शिक्षक सुधरना ही नहीं चाह रहे हैं यदि उनकी भावना में कपट न होता तो अपने बच्चों को क्यों नहीं पढ़ाते हैं सरकारी स्कूलों में !
यद्यपि नरेंद्र मोदी जैसे धर्म प्रिय नैतिकता पसंद व्यक्ति का प्रधानमंत्री होना देश के लिए गौरव की बात है किन्तु मोदी जी नशे से लेकर बलात्कार तक जितनी भी मनोविकृतियाँ हैं वो सब प्रदूषित चिंतन से प्रारम्भ हो रही हैं किन्तु ये प्रदूषण रुके कैसे इस पर विचार हो और इसका कुछ स्थाई समाधान निकाला जाए तो अच्छा होगा !
नैतिक शिक्षा देने का काम पहले शिक्षक ,प्रवचन कर्ता और साधू संत किया करते थे किंतु अब शिक्षकों में दायित्व पालन का अभाव होता जा रहा है ,प्रवचन कर्ता लोग सदशिक्षा एवं शास्त्रीय संस्कार देने की अपेक्षा मनोरंजन करते घूम रहे हैं साधू संत तो शांत हैं जबकि बाबा लोगों की व्यापारिक व्यस्तताएँ समझी जा सकती हैं बाबाओं को राजनैतिक हुल्लड़ मचाने से ही फुरसत नहीं है उन्हें संस्कार देने एवं सदाचरण सिखाने का समय ही कहाँ है !
ऐसी परिस्थिति में मोदी जी आप देशहित में बहुत कुछ करना चाह रहे हैं और बहुत कुछ कर भी रहे हैं किन्तु सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि अकेले आप क्या क्या कर लेंगे ! माना कि साधू संतों प्रवचन कर्ताओं से आप दबाव देकर अपनी बात नहीं कह सकते हैं किन्तु निवेदन तो कर ही सकते हैं कि वो समाज में संस्कार सृजन में सरकार का साथ दें किन्तु यदि इतना भी नहीं हो सकता है तो मोदी जी ईश्वर ने आज आपको जो पदात्मिका सामर्थ्य प्रदान की है उसका सदुपयोग कीजिए और जनता की गाढ़ी कमाई के धन से जिन शिक्षकों को मोटी मोटी सैलरी दी जाती है उन्हें उनके दायित्व का बोध कराइए और उन्हें लगाइए संस्कार सृजन के पवित्र कार्य में जो आपकी भावनाओं का अपने शब्दों एवं शैली में प्रचार प्रसार करें !ईश्वर ने आपको ऐसे काम करने की अपेक्षा करवाने की जिम्मेदारी अधिक दी है इसलिए आप भी अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए कम से कम शिक्षक जैसे लोगों को तो ऐसे कामों में लगाइए ही जिनकी आजीविका सरकार सँभालती है !अन्यथा सफाई भी आप करेंगे ,शिक्षा और प्रवचन भी आप ही कर लेंगे तो आखिर वो लोग क्या करेंगे जिनकी इन कामों को करने की जिम्मेदारी है । हमारे जैसे लोगों के लिए भी कोई सेवा है तो हम सादर तैयार हैं वैसे भी कर तो रहे ही हैं किन्तु हमारी बात समाज के उतने बड़े वर्ग तक नहीं पहुँच पा रही है उसका कारण प्रचार प्रसार का अभाव ही है फिर भी देश की नैतिक एवं आध्यात्मिक भूख मिटाने के लिए सरकार यदि कोई कार्यक्रम अपने स्तर पर चलाती है तो उसमें हम जैसे छोटे लोग भी अपना दायित्व निर्वाह करने को तैयार हैं यदि सरकार आवश्यकता समझे तो हम जैसे बहुसंख्य लोगों का उपयोग कर सकती है! see more... http://jyotishvigyananusandhan.blogspot.com/2014/11/blog-post_24.html
वैसे ये हम सब देश वासियों के लिए गर्व की बात है और मोदी जी की धर्म निष्ठा श्लाघनीय है, इसमें कोई संदेह नहीं है कि मोदी जी की दुर्गा उपासना से देश और समाज में बड़ा बदलाव हो सकता है ! नरेंद्र मोदी जी दुर्गा जी के ही अनन्य उपासक हैं ये बात अब तो विश्वफलक पर स्पष्ट हो ही चुकी है इसलिए उनके विषय में साईं आदि किसी और के उपासक होने की शंका नहीं होनी चाहिए, जहाँ तक बात साईं मंदिर जाने की है तो सार्वजनिक जीवन में जनता ही जनार्दन होती है किसी भी सामाजिक कार्यकर्ता या सरकार के शीर्ष स्थान पर बैठे महत्वपूर्ण व्यक्ति को जनता के प्रत्येक व्यक्ति की उचित इच्छा का यथासंभव सम्मान करना ही पड़ता है इसलिए प्रजा प्रजा में भेद किया भी नहीं जा सकता और उचित भी नहीं है ।
मोदी जी के लिए अपनी व्यस्ततम दिनचर्या में भी न केवल संपूर्ण नवरात्रों में व्रत रखना अपितु दुर्गा सप्तशती का पाठ भी नित्य करना ये बड़ी ही नहीं अपितु बहुत बड़ी बात है, एक बात की तो अब अपार खुशी है कि हमारे प्रधानमंत्री जी को धार्मिक कहलाने में शर्म नहीं लगती है ये हम सब लोगों के लिए गौरव की बात है।
फैशन के नाम पर चोटी तक कटा देने वाले हिन्दुओं को मोदी जी से बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है हमारी समाज का एक वर्ग पूजा पाठ धर्म कर्म व्रत उपवास जैसे आचरणों के लिए अंधविश्वास या पाखण्ड जैसे शब्दों का प्रयोग करने लगा था उनकी नक़ल करते करते देश का युवा वर्ग भटकने सा लगा था अर्थात अपने को हिन्दू कहने में नवरात्र व्रत करने में दुर्गा जी की सप्तशती का पाठ करने में या कोई भी पूजा पाठ करने में शर्म महसूस करने लगा था, भूत प्रेतों की मूर्तियाँ मंदिरों में रखकर उन्हें पूजने में फैशन समझने लगा था ऐसे वर्ग को यह समझना चाहिए कि जब अपनी सनातनी परम्पराओं के पालन करने में और उन्हें विश्वस्तर पर बता देने में हमारे प्रधान मंत्री को गर्व होता है तो आमआदमी फैशन के नाम पर इन्हें बताने में शर्म क्यों करता है उसे भी गर्व पूर्वक अपने धर्म का प्रकट रूप से पालन करना चाहिए ।
रही बात साईं आदि पाखंडों को पूजने की तो उस विषय में भी अब भ्रम नहीं होना चाहिए कि टेस्ट बदलने के लिए पिकनिकी भावना से कोई कहीं जाए कुछ भी करे किन्तु बात जब धर्म की आवे तब अपनी जड़ों से जुड़े रहने में ही भलाई है अपने बाप दादे पुरखे पूर्वज जिन देवी देवताओं को अभी तक पूजते आए हैं उनपर संदेह मत करो !न अपने पूर्वजों पर और न ही उन देवी देवताओं पर अन्यथा यदि एक बार भटक गए तो दूसरी बार अपने धर्म में उस प्रकार से घुल मिल पाना बड़ा कठिन हो जाता है।
इसलिए जैसे टेस्ट बदलने के लिए किसी के संग साथ में पड़कर बाहर का खाना कोई एक आध दिन खाकर काम भले चला ले किन्तु पेट तो घर के खाने से ही भरता है उसी प्रकार से किसी के संग साथ में पड़कर कभी साईं वाईं के यहाँ यदि जाना भी पड़े तो भी व्रत नवरात्रों के आस्था माता दुर्गा पर और पाठ दुर्गा सप्तशती के ही करने हैं स्थाई भाव तो यही होना चाहिए व्यस्तता कितनी भी रहे जाना कहीं भी पड़े किन्तु अपने धर्म कर्म में समझौता नहीं करना ऐसे दृढ़ निश्चयी मोदी जी को बार बार बधाई !
मोदी जी से इस मामले में उन सभी लोगों को प्रेरणा लेनी चाहिए जो स्वाभाविक रूप से ऐसा करने में प्रमाद करते हैं ,जो लोग मोदी जी की तरह से व्यस्त भी नहीं हैं स्वस्थ भी हैं मोदी जी की तरह किसी ऐसे महत्वपूर्ण मिशन पर यात्रा भी नहीं करनी है फिर भी आलस्य और प्रमादवश नवरात्र जैसे महान पर्व पर नियम संयम पूर्वक भगवती की आराधना नहीं करते हैं उन्हें मोदी जी को देखकर ही सही अब प्रारम्भ कर देनी चाहिए ।
हमें एक बात और ध्यान रखनी चाहिए कि आज समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार ,घूसखोरी ,चोरी, बलात्कार ,हत्या आदि जैसे जितने भी प्रकार के अपराध होते हैं वो सारे एकांत में ही होते हैं उसके लिए सरकार और पुलिस को पूरी तरह जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है आखिर हर आदमी को सुरक्षा कैसे दी जा सकती है! इसलिए मोदी जी से ही सही प्रेरित होकर सभी समाज धर्म अध्यात्म एवं संस्कारों के प्रति यदि समर्पित होने लगे तो समाज में दिनोंदिन बढ़ते अपराधों में विशेष कमी की जा सकती है ।
इसी विषय में पढ़ें हमारा यह लेख भी - आश्विन नवरात्र के पावन पर्व पर जगज्जननी माता दुर्गा को कोटिशः प्रणाम करते हुए हमारी ओर से आपको आपके पारिवारिक सदस्यों एवं समस्त स्वजनों को कोटि कोटि बधाई !अनंत अनंत मंगल कामनाएँ , नितनूतन मंगलमय हो ! see more... http://bharatjagrana.blogspot.in/2014/09/blog-post.html
Wednesday, 24 September 2014
फेस बुक पर जन्म दिन की बधाई देने के रीति रिवाज !
अपने से बड़ों एवं श्रेष्ठों को प्रणाम करने वाले एवं समस्त स्वजनों का अभिवादन करने वाले के पास चार गुण स्वाभाविक रूप से बढ़ते हैं आयु, विद्या, यश और बल , यहाँ तक कि सामने वाला आशीर्वाद दे न दे तो भी विनम्र अभिवादन शील व्यक्ति आशीर्वाद का अधिकारी हो ही जाता है ! किन्तु सामने वाला ऐसा न करे और आशीर्वाद देने योग्य व्यक्ति पर फोकट की शुभकामनाएँ व्यक्त करता जा रहा हो क्या लाभ ऐसे उलटे रीति रिवाजों का ?
कई लोग अपने बच्चों के जन्मदिन पर बच्चों की फोटो अपनी फेस बुक पर डाल कर और अपने फेस बुकी मित्रों के लिए लिखते हैं कि हमारे बच्चे का आज जन्म दिन है !कुछ लोग इतना भी लिख देते हैं कि आशीर्वाद दीजिएगा !
अजीब सी बात है आशीर्वाद किसी को भी कभी भीख में नहीं मिलता है उसे विनम्रता पूर्वक आशीर्वाद पाने की मुद्रा में उपस्थित होना होता है । उसकी तरफ से अभिवादन के दो शब्द लिखने चाहिए किन्तु यह ढंग ठीक नहीं है कि बेटे की फोटो तो शोफा पर जूता पहने टाँग उठाए लेटने की या अन्य प्रकार के हास परिहास की डालकर और मित्रों को आशीर्वाद देने के लिए प्रेरित करते हैं !अरे सिखाना ही है तो संतानों को अभिवादन करना सिखाइए आशीर्वाद देने वालों को अपने दायित्व का एहसास होता ही है !
Tuesday, 23 September 2014
बंधुओ ! दुर्गासप्तशती से जन जन को जोड़ने में आपका भी चाहिए सहयोग !
सरल हिंदी दोहा चौपाइयों में लिखी गई दुर्गासप्तशती को अब घर घर एवं जन जन तक पहुँचाने की पवित्र पहल में आप भी जुड़ें और करें इस कार्य के प्रचार प्रसार में सहयोग !
पंडित पुजारियों एवं हमारे जैसे हमारे और भी भाई बंधुओं समेत जब हम कुछ लोग ही यदि धर्म की सारी चौधराहट सँभाल लेंगे तो बाक़ी समाज भटकेगा ही, कहीं तो जाएगा ही, किसी को तो मानेगा ही, जो इन्हें सरल दिखेगा ये उसे मानेंगे, जो इन्हें मानेगा ये उसे मानेंगे!
इसलिए उस आम समाज को धर्म से जोड़े रखने के लिए कोई पहल की जानी चाहिए उसी दिशा में की गई यह एक छोटी सी पहल ! आप सभी बंधुओं के सहयोग की अपेक्षा -
बंधुओ !आप सबको पता है कि दुर्गा सप्तशती का पाठ नवरात्रों में करना होता है किन्तु दुर्गा सप्तशती संस्कृत भाषा में होने के कारण जो लोग संस्कृत जानते हैं वो तो कर लेते हैं संस्कृत में इसका पाठ किन्तु जो संस्कृत नहीं जानते हैं उनमें कुछ धनी वर्ग होता है वो पंडितों से अपने घर में पाठ करवा लेता है किन्तु जो लोग संस्कृत भी नहीं जानते हैं और उनके पास धन भी नहीं होता है वो आखिर कैसे पूजा करें भगवती की ?
उनके लिए कुछ लोगों ने हिंदी कविता में भी दुर्गा सप्तशती या दुर्गा स्तुति नाम से कुछ लिखने की कोशिश की है किन्तु उसमें छंद भंग दोष तो है ही साथ ही विषय वस्तु भी आधी चौथाई ही ली गई है एवं कुछ ने तो हर पृष्ठ पर अपना नाम एवं अपना चित्र दिया हुआ है जो ठीक नहीं है बीच बीच में भी ऐसा ही किया गया है यह विधा ठीक न होने पर भी लोग इसका पाठ करते हैं क्योंकि उनके पास ऐसी चीजों के अलावा और कोई विकल्प ही नहीं है कुछ लोग राम चरित मानस आदि का नवाह पाठ आदि करते देखे जाते हैं !कुछ लोग ऐसी ही परिस्थितियों को कैस करते हुए साईं देवी टाइप किसी पूजा स्तुति आदि को गाने बजाने लगते हैं और भोले भाले लोग ऐसा ही सब कुछ करने भी लगते हैं !
यही सब कुछ देख कर मुझे कई मित्रों ने रामचरित मानस की शैली में अर्थात दोहा चौपाई में लिखने के लिए प्रेरित किया और मुझे भी इसकी आवश्यकता लगी तो मैंने प्रयास पूर्वक संस्कृत दुर्गा सप्तशती की प्रामाणिकता बनाए एवं बचाए रखते हुए श्री रामचरित मानस की शैली में अर्थात दोहा चौपाइयों में श्री दुर्गा सप्तशती को लिखा है और प्रकाशित किया है इस पुस्तक को तीन रूपों में अत्यंत उत्तम कागज, छपाई आदि का प्रयोग करते हुए प्रकाशित किया गया है।
इनमें से पहली दुर्गासप्तशती नाम से प्रकाशित की गई है इसमें गीताप्रेस की दुर्गासप्तशती की पुस्तक की तरह ही अर्थ सहित प्रकाशित किया गया है इसमें अंतर केवल इतना है कि संस्कृत श्लोकों की जगह उसी का भावार्थ लेकर हिंदी दोहा चौपाइयों में उन्हीं श्लोकों के अनुवाद के रूप में किया गया है इसका मूल्य 51रूपए रखा गया है।
दूसरी दुर्गापाठ नाम से प्रकाशित की गई है इसमें पहले की तरह ही संपूर्ण दुर्गासप्तशती ही है अंतर केवल इतना है कि इसमें हिन्दी अर्थ नहीं लिखे गए हैं बाक़ी सब कुछ वैसी ही संपूर्ण है इसकी लागत कम करने के लिए ऐसा किया गया है इसका मूल्य 31 रुपए रखा गया है ।
तीसरी दुर्गास्तुति नाम से प्रकाशित है जिनके पास समय का अभाव होता है इसलिए वे वो संपूर्ण दुर्गासप्तशती का पाठ प्रतिदिन नहीं कर सकते हैं ऐसे व्यस्त लोगों के लिए दोहा चौपाइयों में ही नव देवियों के लिए नव स्तुतियाँ लिखी गई हैं जैसे नवरात्र के पहले दिन के लिए शैलपुत्री दूसरे दिन के लिए ब्रह्मचारिणी आदि की स्तुतियाँ हैं जिन्हें प्रतिदिन के हिसाब से लोग पढ़ सकते हैं ऐसा विचार करके नव स्तुतियों को दोहा चौपाइयों में ही लिखा गया है इसका मूल्य 21रूपए रखा गया है ।
लागत मूल्य पर ये पुस्तकें उपलब्ध करवाने के लिए इन तीन में से किसी भी एक पुस्तक की 100 प्रतियाँ मँगवाने पर 20 प्रतिशत डिस्काउंट काट दिया जाता है 250 या उससे अधिक प्रतियाँ मँगवाने पर 30 प्रतिशत डिस्काउंट काट दिया जाता है।
बंधुओ ! ये पुस्तकें आज देश के लगभग 200 शहरों कस्बों की दुकानों में उपलब्ध हैं किन्तु पुस्तकों की क्वालिटी अच्छी होने के कारण लागत अधिक आना स्वाभाविक है इससे दुकानदारों का उतना डिस्काउंट नहीं बन पाटा है जितना उन्हें चाहिए इसलिए वो इन्हें प्रचारित करने में रूचि नहीं लेते हैं और समाज को पता नहीं है ।
अतः आप सभी सनातन धर्मी बंधुओं से निवेदन है कि आप यदि हमारी सोच से सहमत हों एवं आपको भी उचित लगे और इन्हें प्रचारित करने में आप भी सहयोग करना चाहें तो आप इस लिंक को अपने मित्रों में शेयर कर सकते हैं या और जिस किसी भी प्रकार से सहयोग कर सकते हों उसके लिए आप सभी बंधुओं से सहयोग की अपेक्षा है ।
मैंने कुछ जगहों पर इन्हीं के सामूहिक पाठ का कार्य क्रम भी चलवाया है जिसमें सभी स्त्री पुरुष मिलजुल कर बाजे गाजे से या वैसे इसी दुर्गा सप्तशती के 100 या 1000 पाठ नवरात्रों में या वैसे भी कर लेते हैं अंतिम में हवन कर लेते हैं भंडारा कर लेते हैं इससे सभी लोगों को पाठ करने में सम्मिलित होने का सौभाग्य तो मिलता ही है और बिना किसी विशेष खर्चे के हिंदी विधा से शतचंडी या सहस्र चंडी यज्ञ का विधान करने का लाभ भी होता है इससे संस्कार सुधरते हैं साथ ही साथ समाज तरह तरह के पाखंडों में भ्रमित होने से बच जाता है । अगर कुछ मित्र इस प्रकार के आयोजन आयोजित करके भी हमारा सहयोग करना चाहें तो उनके लिए अग्रिम कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ ।
वैसे भी सनातन धर्मियों पर साईंयों ईसाइयों इस्लामियों आदि सबकी निगाहें गड़ी हैं कोई शिक्षा कोई दीक्षा कोई चिकित्सा या कोई अन्य प्रकार के सेवा आदि कार्यों के माध्यम से भोले भाले सनातन धर्मियों को बहलाने फुसलाने की कोशिश कर रहा है ऐसे में बहुत आवश्यकता ऐसे धार्मिक कार्यक्रमों को चलाने की है जिनमें जनता की सीधी भागीदारी हो जिससे किसी और की निंदा करने के बजाए सनातन धर्मियों का भटकाव रोका जा सके !
इन पुस्तकों को प्राप्त करने के लिए आप सीधे हमारे राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान से संपर्क कर सकते हैं संस्थान के प्रचार कार्यों से जुड़ सकते हैं सुझाव दे सकते हैं आप हमारे मोबाइल 9811226973 पर संपर्क कर सकते हैं ।पुस्तकें मँगवाने के लिए अपेक्षित धनराशि भेजने या हमारे अकाउंट में जमा करने के बाद 10 दिनों के अंदर कभी भी पुस्तकें यहाँ से भेज दी जाती हैं ।
अकाउंट डिटेल -
शेष नारायण वाजपेयी , SBI, खाता संख्या 10152713661
see more.... दुर्गा सप्तशती को घर घर और जन जन तक पहुँचाने की पवित्र पहल में आप भी सहभागी बनें- जो संस्कृत भाषा में दुर्गा सप्तशती नहीं पढ़ सकते हैं वो अब हिंदी भाषा दोहा चौपाई में सुन्दर काण्ड की तरह पढ़ें वही दुर्गा सप्तशती -see more...http://snvajpayee.blogspot.in/2013/10/blog-post_2.html
अब दुर्गासप्तशती आदि भी रामचरितमानस एवं सुंदरकांड की ही तरह हिंदी दोहा चौपाई में पढ़िए राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोधसंस्थान की ओर से शास्त्रीय ज्ञानविज्ञान को घर घर जन जन तक पहुँचाने की पवित्र पहल में आप भी सहयोगी बनें-
Monday, 22 September 2014
नवरात्रों में साईंधर्मी लोग सनातन परंपराओं में कर सकते हैं कोई बड़ी घुसपैठ !
नवरात्रि में साईंदेवी का पूजन कुछ इस प्रकार से किए जाने की तैयारी है सुना है कि बुड्ढे की अष्टभुजी मूर्ति को साड़ी ब्लाउज पहनाकर लाली लिपिस्टिक लगा कर बैठाया जाएगा शेर पर और इसके बाद उस साईं पत्थर के सामने खड़े होकर पढ़े जाएँगे कुछ इस प्रकार के कल्पित पँवारे और खुश किया जाएगा उस पत्थर बुढ़िया को -
साईं शैलपुत्री च साईं ब्रह्मचारिणी।
साईं चन्द्रघण्टेति साईं कूष्माण्डेति च ॥
साईं स्कंधमातेति साईं कात्यायनी तथा ।
साईं कालरात्रीति साईं महागौरिजा ॥
साईं सिद्धिदात्री च साईं दुर्गा प्रकीर्तितः ॥
आदि आदि ऐसे सभी पँवारों पाखंडों से साईँ संध्याओं कथा कीर्तनों से सनातन धर्मी समाज को सतर्क रहना होगा और अपनी सनातनी समाज को भगवती दुर्गा के पाठ के लिए प्रेरित करना हम सबका कर्तव्य है ।
बंधुओ ! धर्म के मामलों में अपनी छोटी छोटी लापरवाहियों के कारण आज सनातन धर्मी समाज को एक ऐसे साईं संकट से जूझना पड़ रहा है कि जिसका कोई रास्ता निकलता दिखाई नहीं दे रहा है अभी तक मंदिरों में बुड्ढे की मूर्तियाँ यथावत स्थापित हैं यदि सनातन धर्मी समाज के कर्णधारों ने पहले से ही थोड़ी सतर्कता वरती होती तो शायद आज ये दिन नहीं देखना पड़ता । मित्रो! कहने को हम भले ही कुछ भी कह लें या अपने विषय में बड़ी बड़ी बातें कर लें किन्तु सच्चाई हमें स्वीकार करनी ही पड़ेगी कि सनातन धर्म पर साईं नामका यह बहुत बड़ा हमला है जो सनातन मंदिरों में धनबल से घुसकर सनातन धर्मशास्त्रों के विरुद्ध किया गया है सनातन धर्म के देवी देवता अवाक् हैं उन्हें यह नहीं पता है कि उन्हें उनके किस अपराध की सजा दी गई है आखिर क्यों किया गया है उन्हें सस्पेंड ! साईं समर्थकों के द्वारा कहा जा रहा है कि बाबा मनोकामनाएँ पूरी करते हैं वो हमारी बात बहुत जल्दी सुनते हैं इसका मतलब क्या हुआ कि सनातन धर्म के देवी देवता नहीं सुनते हैं अर्थात वो बहरे हैं और वो अकर्मण्य हो गए हैं अर्थात मनोकामनाएँ पूरी नहीं करते हैं क्या इसीलिए इन टुच्चे लोगों ने सनातन धर्मी देवी देवताओं को साईँ नाम की सबक सिखाने की कोशिश की है इसीलिए उन्हें अपूज्य और साईं को पूज्य सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है इन पापियों के मन में तो इतनी कुटिलता होती है किन्तु ऊपरी मन से अपने को हिन्दू भी कहते हैं सनातन धर्मियों और हिन्दुओं के समान चन्दन लगाए घूमते हैं ताकि इन्हें भी लोग हिन्दू मानते रहें किन्तु ये नहीं सोचते हैं कि अब इनके हिंदुत्व में बचा क्या है ! जब सनातन धर्म शास्त्रों पर इनका विश्वास नहीं रहा सनातन देवी देवताओं को इन्होंने सस्पेंड ही कर दिया है उनके स्थान पर साईं की नियुक्ति कर ली गई है क्योंकि सनातन देवी देवता भिखारियों की सुनते नहीं हैं और साईं सुनते हैं !इसके बाद भी ये माथे में चन्दन चुपड़ चुपड़ कर कहते हैं कि सनातनधर्मी तो हम भी हैं श्री राम कृष्ण शिव दुर्गा आदि देवी देवताओं को तो हम भी मानते हैं !
अरे धोखेबाजो ! लानत है तुम्हारे जैसे मानने वालों को ,मानते हो या बेइज्जती करते हो सनातन धर्मियों एवं उनके देवी देवताओं की ! सनातनधर्मी देवी देवताओं का मोती जैसा पानी उत्तर दिया तुम लोगों ने, तुम उन्हें सबक सिखाने चले हो ! सनातन धर्म का जितना बुरा धर्म शत्रुओं ने नहीं किया था उससे अधिक उन लोगों ने किया है जो अपने को सनातन धर्मी कहते तो हैं किन्तु पूजते भूत प्रेतों को हैं इतनी बड़ी गद्दारी उन देवी देवताओं के साथ जिन्हें हमारे तुम्हारे पूर्वज मिलजुलकर अनंत काल से विश्वास पूर्वक पूजते रहे थे उन पर संदेह किया गया है !यह सोच सोचकर आत्मा रोती है और लज्जा आती है ऐसे लोगों को सनातन धर्मी मानने में !ऊपर से कहते हैं कि सनातन धर्म विराट है सनातन धर्म सहिष्णु है उसमें सब कुछ पचाने की क्षमता है तो साईं पूजा को क्यों नहीं पचाया जा सकता ?अरे खाना की थाल में खाने वाली चीज रखी हो वही तो खाई और पचाई जाएगी न कि खाने के साथ गोबर या पत्थर रख दिया गया हो तो क्या वो भी खा लिया जाएगा !इसी प्रकार से जो पूजा जाने लायक होगा वही न पूजा जाएगा !जिसे जानते नहीं पहचानते नहीं जिसका कोई नाम गाँव पता ठिकाना ही नहीं है उसे भी पूजने लगें ! आखिर अजीब सी जबरदस्ती है !और न पूजें तो हम धार्मिक नहीं हैं यह कैसी अंधेर !
आखिर क्यों देवी देवताओं के सामने देवी देवताओं की पूजा के लिए बनाए गए वेदमंत्रों का प्रयोग उनके लिए न करके अपितु उसके लिए किए जा रहे हैं जो इनका अधिकारी ही नहीं है उसी के मंदिर में सफाई हो रही है उसी के लिए गढ़ी गई झूठी स्तुतियों के लाउडस्पीकर बजाए जा रहे हैं और जिन देवी देवताओं की स्तुतियों से सम्पूर्ण संस्कृत एवं हिन्दी वाङ्मय भरा पड़ा है उन्हें कोई पूछ नहीं रहा है । पूजा उसकी हो रही है जो अपूज्य है जो पूजने योग्य हैं उनकी पूजा करने की जगह काम चलाया जा रहा है ! बड़े बड़े सुगंधित पुष्पों के हार उन पत्थरों को पहनाए जा रहे हैं जिनमें कुछ है ही नहीं, जिस बुड्ढे के प्राण यमराज के कब्जे में हैं उसकी प्राण प्रतिष्ठा का नाटक किया जा रहा है ।साईं समर्थक साईं के सामने खड़े होकर गिड़गिड़ाते हैं बाबा हमारी सुनो हमारी सुनो किन्तु बाबा यमराज के सामने गिड़गिड़ा रहे होंगे कि हमारी सुनो हमारी सुनो अब साईँ की अपनी जान जब वहाँ आफत में पड़ी होगी प्राण यमराज के कब्जे में होंगे तो साईं की प्राण प्रतिष्ठा के लिए प्राण कहाँ से आएँगे ?अब साईं की कौन सुने और साईं किसकी सुनें !
इसे भी देखें -
दुर्गासप्तशती से जन जन को जोड़ने के अभियान में आपसे योगदान की अपेक्षा !
सरल हिंदी दोहा चौपाइयों में लिखी गई दुर्गासप्तशती को अब घर घर एवं जन जन तक पहुँचाने की पवित्र पहल में आप भी जुड़ें और करें इस कार्य के प्रचार प्रसार में सहयोग !
पंडित पुजारियों एवं हमारे जैसे हमारे और भी भाई बंधुओं समेत जब हम कुछ लोग ही यदि धर्म की सारी चौधराहट सँभाल लेंगे तो बाक़ी समाज भटकेगा ही, कहीं तो जाएगा ही, किसी को तो मानेगा ही, जो इन्हें सरल दिखेगा ये उसे मानेंगे, जो इन्हें मानेगा ये उसे see more...http://bharatjagrana.blogspot.in/2014/09/blog-post.html
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