Saturday, 11 April 2015

यदि महिलाएँ मासिक अशुद्धि काल में पूजा पाठ नहीं करती हैं तो वो भागवत कैसे कह सकती हैं ?

    समाज से चंदा माँगने का बर्तमान समय में सर्वोत्तम साधन है भागवत नाम की भगदड़ !जिसे ठीक लगे सो करा ले अपने यहाँ भागवती हुल्लड़ !
     जिस भागवत को वक्ता लोग भी न जानते हैं और न ही मानते हैं उसे पैसे इकट्ठे करने के लालच में औरों को मनाते घूम रहे हैं कितना बड़ा आश्चर्य है ये ?जो महिलाएँ मासिक अशुद्धि होने की बात स्वयं ही नहीं मानती हैं उनकी बताई हुई भागवत कोई क्यों माने ?भागवत कथाओं के नाम पर भोगवत का बोलबाला इसी से मिट रहे हैं संस्कार और बढ़ रहे हैं बलात्कार !     
     भागवत कथाओं के नाम पर भगदड़ मचा रखी है नचैयों गवैयों ने ! लवलहे लड़के लड़कियाँ कूद रहे हैं भागवत के धंधे में !सत्संग के कारोबार में सेक्साचार की सुविधाओं से टूट रहे हैं परिवार ! अब जिसके पास जितना अधिक धन वो उतना बड़ा धार्मिक !इस लिए धन के पीछे पागल होता जा रहा है धार्मिक जगत !शास्त्र विरुद्ध आचरण ही क्यों न करना पड़े किंतु पैसा आना चाहिए वैसे धार्मिक लोगों से तो यथा संभव शास्त्रीय आचरण की अपेक्षा की ही जा सकती है ।
   महिलाएँ  हर महीने के अशुद्धि के दिनों में पूजा पाठ नहीं करती,मूर्तियाँ नहीं छूतीं हैं और धर्म ग्रंथों का स्पर्श भी नहीं करती हैं मंदिर नहीं जाती हैं ये धर्म शास्त्रों में तो लिखा है ही वैसे भी अनंत काल से हमारी परंपराओं के पालन में सम्मिलित है ऐसे दिनों में चार दिनों के लिए सभी धर्मकर्म बंद कर दिए जाते हैं । भागवत के कार्यक्रम महीनों   वर्षों पहले बुक हो जाते हैं ऐसी परिस्थिति में अशुद्धि काल का इतने पहले अनुमान लगा पाना तो संभव नहीं होता है और पूर्व निर्धारित भागवत का कार्यक्रम कैंसिल किया नहीं जा सकता है ऐसी परिस्थिति में संभव है कि आधुनिकता की होड़ में वो लोग ये शुद्धि अशुद्धि संबंधी शास्त्रीय बातें मानती ही न हों किंतु यदि ऐसा है तो जिन शास्त्रीय बातों को वो स्वयं नहीं मानती हैं उनका उपदेश वो कैसे कर सकती हैं और समाज उनकी बताई हुई शास्त्रीय बातों पर भरोसा कैसे करे !
        भागवत कथाओं या सत्संगों के आज बड़े आयोजन हो रहे हैं धर्म के नाम पर बड़ा धन खर्च हो रहा है कथा सत्संगों के नाम पर पैसे और भोजन देकर कराई  जा रही हैं बड़ी  बड़ी रैलियाँ किंतु उसके दुष्परिणाम स्वरूप  समाज में बढ़ रहे हैं बलात्कार अपराध हत्याएँ लूटपाट आखिर क्यों ? और यदि होना ही यही सबकुछ है तो भागवत कथाओं और सत्संगों की आवश्यकता ही क्या है फिर भागवत के नाम को बदनाम क्यों करना !
    क्या इन सारी  सामाजिक बुराइयों को ही वर्तमान में प्रचलित सत्संगों का फल मान लिया जाए !माना कि पहले धार्मिक आयोजन इतनी अधिक संख्या में नहीं होते थे और न ही धर्म के नाम पर आयोजित की जाती थीं इतनी बड़ी बड़ी रैलियाँ किन्तु उनका इतना प्रभाव तो था ही कि समाज की इतनी दुर्दशा नहीं थी उसका कारण उन धार्मिक लोगों का अपना जीवन संयमित एवं शास्त्र सम्मत था उनका ध्यान चरित्र निर्माण पर था जिसका प्रभाव समाज पर भी पड़ना स्वाभाविक ही था !किंतु आज भागवत वक्ताओं की अयोग्यता एवं अर्थ व्याकुलता ने समाज को निराश किया है । छोटे छोटे बच्चे बच्चियों को लीप पोत कर बैठा दिया जाता है कथा मंचों पर !कुछ किस्से कहानियॉं वो सुना देते हैं बाकी सँभाल लेते हैं संगीत वाले!पूछो तो कह देंगे कि शुकदेव जी भी तो 16 वर्ष के थे !किंतु क्या इतना आसान है शुकदेव जी की बराबरी कर लेना!
     आज ईमानदार भागवत कथा विद्वानों ने भी इस भागवती भगदड़ से तंग आकर या तो संगीत ले लिया है और या फिर कथा बाचन से अपने को मुक्त कर लिया है ऐसी स्थिति पैदा हो गई है !आखिर उदर पोषण के लिए उनके पास और विकल्प भी क्या था जो सारे जीवन साधना ही श्री मद्भागवत की ही करते रहे हैं !   
 "बंधुओ!एक बड़ा प्रश्न है कि भागवत या भोगवत ! केवल धन जुटाने के लिए भागवत कथाओं के नाम पर नाचने गाने के उत्सव करना कराना कहाँ तक ठीक है ! -
    आज भागवत कथाएँ कहने वाली महिलाएँ हों या पुरुष वे स्वयं शास्त्रों की बातें मानते हैं क्या ? या केवल धनसंग्रह की भावना से कूद पड़े हैं भागवत के धंधे में तरह तरह के लंबे लंबे बालों वाले रँगे पोते लाल पीले लोग ! जानिए आप भी क्या हैं भागवत वक्ता के शास्त्रीय नियम धर्म !आखिर क्यों नहीं किया जाना चाहिए उस शास्त्रीय नियम संयम का पालन ?और यदि हम्हीं नहीं मानेंगे शास्त्रीय बचनों को तो दूसरों को उन पर चलाने के लिए किस मुख से प्रेरित कर सकेंगे हम !
    पुराने जवाने में महिलाएँ हर महीने होने वाली अशुद्धि के चार दिनों तक अशुद्धि मनाती थीं इसमें वे पूजा पाठ नहीं करती थीं धार्मिक ग्रन्थ नहीं छूती थीं कई परिवारों की महिलाएँ तो भोजन भी नहीं बनाती थीं जिसकी जैसी परंपरा किन्तु शास्त्र की मान्यता चार दिन के अशुद्धि मानने की तो है इस विषय में शास्त्रों का ऐसा ही स्पष्ट उद्घोष है किन्तु आज जो महिलाएँ भागवत आदि कथाएँ करती हैं उनके कार्यक्रम महीनों वर्षों पहले निश्चित कर दिए जाते हैं ऐसी परिस्थिति में वे अशुद्धि काल में शास्त्रीय मर्यादाओं का निर्वहन कैसे कर पा रही होंगी या फिर नहीं कर रही होंगी और जब  अशुद्धि काल सम्बन्धी शास्त्रों की बातों  का पालन वे स्वयं नहीं कर पा रही होंगी तो और किसी दूसरे को शास्त्रों का उपदेश किस आशा से करना ! जिन शास्त्र बचनों पर आपकी अपनी निष्ठा हो उन्हें ही आप उपदेश भी कर सकते हो अन्यथा नहीं ।
     भागवत कथाओं की दुर्दशा देख कर  नारद जी, व्यास जी ,शुकदेव जी, सूत जी,सूर्य भगवान और गोकर्ण पर क्या बीतती ये भगदड़ देखकर यदि वो लोग आज जीवित होते !ठीक रहा वो लोग समय से दुनियाँ छोड़कर चले गए वास्तव में वे धन्य थे-
              धन्या मृताः ते नराः !
  वैसे भी जहाँ नचैयों गवैयों के द्वारा ऐसी भागवतें होंगी वहाँ क्यों नहीं होंगे बसों में बलात्कार !हर समाज को अपने धार्मिक लोगों से ही सहारा होता है कि वो समाज को संयम सिखाएगा किन्तु जब वो ही बासना बह्नि से विदग्ध होकर बहने लगेंगे संगीत के रूप में तो फिर परमहंसी संहिता के अभिप्राय को समाज में  समझाएगा आखिर कौन ?
      आज धार्मिक मंडियों के बड़े बड़े  व्यापारी अपने धन की रक्षा तथा मन की भूख शांत करने एवं अपनी सुरक्षा हेतु राजनैतिक गंगा में लगाना  चाह रहे हैं गोते !
आज नए नए लवलहे लड़के लड़कियाँ कूद रहे हैं भागवत के धंधे में आखिर  क्यों क्या उन्हें अचानक कोई ज्ञान प्राप्त हो गया है या वैराग्य हो गयाहै या उन्होंने श्री मदभागवतजी के लिए कोई गम्भीरतपस्या कर ली है !
     ऐसा कुछ नहीं होते हुए भी भागवत वक्ता के नाम पर समाज से मिलता सम्मान काटता किसे है !श्रोताओं में बैठे कुछ लड़के लड़कियों की कटीली चितवनें एवं दीर्घदीर्घायित दृग्कोरों से निहारती नेत्रस्वामिनियाँ  अच्छे अच्छों को नाचने गाने मुख मटकाने और कमर हिलाने के लिए मजबूर कर देती हैं इसी दृष्टिघात से घायल भागवती शेर व्यास गद्दी रूपी प्लेटफार्म पर  बैठकर जैसे दहाड़ते हैं भगदड़ उठाते हैं क्या ऐसे होती हैं  भागवतें ! क्या भागवत कथाएँ कहने के यही नियम शास्त्रों में बताए गए हैं !क्या नारद जी, व्यास जी ,शुकदेव जी, सूत जी,सूर्य भगवान और गोकर्ण जी ने भी अपने अपने ज़माने में ऐसे ही की थीं भागवत कथाएँ !या इन भागवती गन्धर्व किन्नरों को कहीं ये गलत फहमी तो नहीं है वो लोग नाच गा नहीं पाते रहे होंगे अन्यथा सात दिन अवशेष आयु रह गई थी जिनकी ऐसे मोह ग्रस्त परिक्षित जी को शुकदेव जी क्या तबला ढोलक लेकर नाच गाकर सुनाते भागवत !बंधुओ ! आध्यात्मिक उपदेशों के माध्यम से मन के आपरेशन किए जाते हैं ताकि मन पर चढ़ी काम क्रोध लोभ मोह की परत साफ की जा सके !वैसे भी आपरेशन कहीं गीत संगीत से होते हैं क्या ?किन्तु कलियुग है किसे क्या कहा जाए !
    खैर, शिक्षा और तपस्या न करने का दोष तो इन लवलहे लोकगायक बेचारों को ही क्यों दिया जाए ये तो जब ये भी नहीं जानते थे कि भागवत कहते किसे हैं तभी इन्हें भागवत वक्ता घोषित कर दिया गया था -ये वही भागवत है जिसके विषय में कहावत है -
             'विद्यावतां भागवते परीक्षा'
      अर्थात विद्वानों की परीक्षा भागवत में होती है ! किन्तु आजकल तो बिलकुल ऐसा नहीं है अब तो भागवत केवल दिखाने के लिए चाहिए होती है गद्दी पर रखनी होती है उससे शोभा बनती है और बाकी वास्तविक भागवत न हो तो भी भागवत जैसा चमकीले कपड़े में लिपेटकर कुछ गद्दी पर रखना होता है वह चाहें लकड़ी का पाटा ही क्यों न हो कपड़ा लिपेट देने के बाद कहाँ पता लगता है कि पोथी है या लकड़ी का पाटा !उसे तो शोभा यात्रा में शिर पर रखकर घूमना होता है या फिर पोथी पूजन होता है तीसरी बात उसे रखकर आरती करनी होती है ।
    बाकी सारी कथा तो डायरी भागवत से ही करनी होती है जिसमें लिखी लोक कथाओं को सात  दिनों तक नंदी गण गा बजा रहे होते हैं जबकि इन सभी गणों का नेतृत्व करने वाले भोगवत वक्ता कर कर के बालों में डाई और मार मार के दाढ़ी मूछों का एक एक बाल लगा लगा के महँगी महँगी क्रीमें ,पहनकर लड़कियों की पसंद के कलर वाले कुर्ते और बस डाल के उन्हीं के दुपट्टे ,और थोड़ा सा नाक के बल पर बोलते हुए कथा के नाम पर इन्हें जान छोड़कर नाचना गाना मुख मटकाना और खुद भी मटकना होता है बीच खूच में जब होश आता है तो बोल देते हैं आज कृष्ण जन्म या रुक्मिणी विवाह होगा बस लोक कथाओं और लोक गीतों एवं कान फोड़ संगीतों के बीच हो जाती है श्री कृष्ण जन्म की घोषणा तबले की थाप पर नाचना गाना बजाना होता रहता है !इसके बाद शर्म छोड़कर माँगनी होती है बधाई या रुक्मिणी विवाह के नाम पर भीख !ऐसी भागवतों में केवल छोटे छोटे लड़के लड़कियाँ ही सम्मिलित नहीं होते बल्कि बड़े बड़े जिगोलो रेड़ मार रहे होते हैं भागवत भावना की !
       बंधुओ !ऐसे लोग केवल कुछ उस तरह के लोगों को पसंद आने लगे हैं जिन्हें भागवत की जगह भोगवत पसंद है तो बस वो उनके तथा उनके नाच गाने को देखकर खुश हो जाते हैं ! धर्म का क्षेत्र आज इतनी बड़ी व्यापार मंडी  है कि आप धार्मिक चोला ओढ़कर धार्मिक बातें करने लगें भजन गाने लगें तो कथा बाचक ! लोगों की समस्याएँ जो रट ले अर्थात लोग किस किस बात के लिए परेशान हो सकते  हैं या होते हैं यदि आपको ये याद हो जाए तो आप ज्योतिषी हो गए !इसीप्रकार से यदि बीमारियों के प्रकार याद हो गए तो आप योगी हो गए !आपने कुछ दिन पहले तक जिन्हें बीमारियों की लिस्ट रटकर टी. वी. पर सुनाते हुए सुना था आज वो अर्थशास्त्र और राजनीति के आँकड़े सुनाते घूम रहे हैं !
       भागवत  कथा का शास्त्रों में बहुत बड़ा महत्व है    इससे न केवल प्रेतांशिक दोष छूट जाते हैं अपितु संतान सुखयोग बनता है।भगवान की भक्ति मिलती है मुक्ति तो मिलती ही है।ये सब भागवत  सुनने पढ़ने एवं भक्तिभाव से चिंतन करने से होता है।इसे कहने सुनने के भी इसके कुछ शास्त्रीय नियम होते हैं।
कथा कहने वाले के नियमः- 
 विरक्तो वैष्णवो  विप्रो वेदशास्त्रविशुद्धिकृत ।
दृष्टटान्तकुशलोधीरोवक्ताकार्योतिनिःस्पृहः।। भागवते

अर्थः-वेद शास्त्र की स्पष्ट  व्याख्या करने वाला,अच्छे उदाहरणदेकर भागवत समझाने वाला, विवेकवान, निस्पृह, विरक्त, एवं विष्णुभक्त ब्राह्मण को बक्ता बनावे।
कथा वक्ता के दाढ़ी आदि के बाल बना लेने के नियमः-     
  वक्त्राक्षौरं प्रकर्तव्यं दिनादर्वाग्व्रताप्तये । भागवते
  अर्थः- कथा प्रारंभ करने के एक दिन पहले वक्ता को दाढ़ी आदि के बाल बना लेने चाहिए क्योंकि कथा प्रारंभ के बाद फिर सात दिन तक क्षौर नहीं करना होता है।  ऐसे कथा कहने वाले से कथा न सुनेः-

  अनेकधर्म        भ्रान्ताः   स्त्रैणाः  पाखंडवादिनः। 
शुकशास्त्र कथोच्चारेत्याज्यास्ते यदि पंडिताः।। भागवते
   अनेकधर्म को मानने वाले ,एवं स्त्रियों को रिझाने के लिए तरह तरह की वेषभूषा  धारण करनेवाले,नाचने गाने वाले पाखंडी वक्ता से कथा न सुने।

 कथा कहने वाला धन का लोभी न होः-
   लोक वित्त धनागार पुत्र चिंतां व्युदस्य च।। भागवते
अर्थः-संसार संपत्ति धन घर पुत्रादि की चिंता छोड़कर केवल कथा में ध्यान दे।
कथा का समयः-
                             आसूर्योदयमारभ्य   सार्धत्रिप्रहरान्तकम्।
                             वाचनीया कथा सम्यग्धीरकंठं सुधीमता।।

   सूर्योदय से कथा आरंभ करके साढ़े तीन प्रहर अर्थात साढ़ेदस घंटे तक मध्यम स्वर से अच्छी तरह कथा बॉंचे।दोपहर में दो घटी अर्थात 48मिनट कथा बंद रखे उस समय लोगों को कथा के अनुशार ही संकीर्तन करना चाहिए।
   इसका अर्थ यह हुआ कि प्रतिदिन 9घंटे42मिनट कथा बॉंचने पर सात दिन में विद्वान वक्ता कथा पूरी कर सकता है किंतु आजकल तो न इतने घंटे कथा होती है और न ही कथा बॉंची जाती है आजकल तो कथा कहने का रिवाज है। यहॉं ध्यान देने की बात है कि कथा कहने में जो मन आएगा वो बोला जाएगा किंतु कथा बॉंचने में तो जो लिखा है उसी की सीमा में रह कर बोलना होता है।उदाहरण भी उसी सीमा में रहकर देने होते हैं यहॉंतक कि दोपहर का संकीर्तन भी कथा के अनुरूप ही करना होता है ताकि अवकाश  के उस समय में भी कोई इधरउधर की चर्चा न करे अर्थात कथा परिषर में व्यर्थ का संगीत नाचना,गाना,या अभागवत चर्चा न हो।
    आज कल पहली बात तो यह है कि लोग भागवत कथा बॉंचते ही नहीं हैं।सब जो मन आता है सो कहते हैं उसका भागवत की पोथी से कोई लेनादेना ही नहीं होता है। दूसरा प्रतिदिन 9घंटे42मिनट जैसा कोई नियम नहीं होता है।तीसरा सारा समय नाचने गाने में ही चला जाता है कथा कब होती है पता नहीं सारी कथाएँ  रगड़ कर केवल उन्हीं में समय दिया जाता है जिनमें झॉंकियॉं बना सजा कर समाज के सामने भीख मॉगने के लिए रोना धोना कर सकें।सब के सब कथा गायक एक ही झूठ बोलते हैं कि पाठशाला के नाम पर दे दो।कन्याओं के विवाह के नाम पर दे दो।चिकित्सालय के नाम पर दे दो।वृद्धाश्रम के नाम पर दे दो।रूक्मिणी विवाह के नाम पर दे दो।सुदामा की भीख के नाम पर दे दो। अरे भाई! भागवत कथा में इन भिखारियों का क्या काम?यहॉं नाचने गाने का क्या काम?पहले तो कभी भागवत कथाओं में संगीत का सहारा लिया नहीं गया।कहीं ये बिना पढ़े लिखे लोग ऐसा तो नहीं समझते हैं कि व्यास जी और शुकदेव जी के बश  का संगीत था ही नहीं। धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज,अखंडानंदजी महाराज,डोंगरेजी महाराज जैसे महापुरूषों  के द्वारा निभाई गईं प्राचीन परंपराओं का पालन भी हम नहीं कर सके हमें धिक्कार है।
   जिनके पैदा होने पर ख़रीदे गए सोठौरे का ऋण अभी देना बाकी है जिन्हें अपने माँ बाप नाते रिशतेदारों के नाम ठीक से नहीं याद हैं वो अपने को भागवत व्यास कहते हैं
" विद्यावतां भागवते परीक्षा " कोई हँसी खेल है भागवत जैसी परमहंसी संहिता के मर्म को समझना और फिर किसी को समझाना तब उसका समाज पर असर पड़ेगा अन्यथा चोरी छिनारा बलात्कार सब कुछ बढ़ता ही रहेगा आखिर समाज की आध्यात्मिक खुराक कौन पूरी करेगा क्या ये धार्मिक लोगों के लिए शर्म की बात नहीं होनी चाहिए कि विश्वगुरु भारत के युवा बलात्कार के आरोपों में फाँसी की सजा भोगें किसने दिए हैं उन्हें ये कुसंस्कार ये धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में बढ़ते भ्रष्टाचार के साइड इफेक्ट्स हैं!   किसी फैक्टरी में चोरी हो जाती तो चौकीदार पकड़ लिए जाते किन्तु हमारे धार्मिक आध्यात्मिक प्रहरियों से क्यों नहीं पूछा  जाता है कि आप अपने काले धन की भूख में राजनैतिक क्षुधा पूर्ति में लगे हैं किन्तु तुम्हारे उस दायित्व का क्या होगा उसे कौन पूरा करेगा जिसके लिए दाढ़ा झोटा रखाया था !जब मजनूँ बने फिरते नचैया गवैया जिगोले टाईप के भागवत वक्ताओं ने  इस परमहंसी संहिता को भिखारियों की भीख मॉंगने वाली किताब बना दिया।इस आत्म रंजन की संहिता को मनोरंजन तक सीमित कर दिया।कैसे कर सकेगी यह लोगों का कल्यान?कैसे ज्ञान वैराग्य बढ़ेगा? कैसे घटेगा देश  का भ्रष्टचार?
    नचैया गवैया इन भागवती भिखारियों ने न केवल सनातनी संस्कृति की अपूरणीय क्षति की है अपितु चरित्रवान भागवत विद्वानों को खड़े होने लायक नहीं रखा है इतनी फिसलन पैदा की है।
राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 
   यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु  ज्योतिष वास्तु धर्मशास्त्र आदि समस्त भारतीय  प्राचीन विद्याओं सहित  शास्त्र के किसी भी नीतिगत  पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी  लेना चाह रहे हों।शास्त्रीय विषय में यदि किसी प्रकार के सामाजिक भ्रम के शिकार हों तो हमारा संस्थान आपके प्रश्नों का स्वागत करता है ।
     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या राजनैतिक जगत से धार्मिक अंध विश्वास हटाना चाहते हों तथा धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 
       सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान  है।

योग व्यायाम और परिश्रम पूर्ण कृषि कार्यों में किसान सार्थक योगी है उसके परिश्रम से लोगों के पेट भी भरते हैं !

     आधुनिकयोग हो या व्यायाम ये पेटसाफ करते हैं किंतु पेट में जब कुछ पड़ेगा तभी तो साफ करेंगे!फिर पेट भरने वाले कर्मयोगी किसानों की उपेक्षा क्यों ?
  योग(आधुनिक), व्यायाम और कर्मयोग में क्या अंतर है ? 
  योग(आधुनिक) :- इसमें नौकरों के आधीन जिंदगी जीने वाले निराश लोगों को स्वास्थ्य सपने दिखाने होते हैं और हाथ पैर हिलाने होते हैं इससे स्वस्थ होने की हिम्मत आती है और पेट साफ होता है । 
व्यायाम:-इसमें किसी प्रकार से सपनों का व्यापार नहीं करना होता है इसमें शारीरिकश्रम न करने वालों को हाथपैर उठाना रखना पड़ता है इससे पेट साफ होता है ! 
कर्मयोग :-इसमें ऐसा सार्थक  परिश्रम करना होता है जो अपने और दूसरों के भी काम आता है इसमें बेकार में हाथ पैर नहीं हिलाने होते हैं इसमें सभी प्रकार से मेहनत मजदूरी करने वाले लोग हैं जिनके परिश्रम से कुछ बनता या बढ़ता भी है जैसे :-किसान भयंकर परिश्रम यदि परिश्रम पूर्ण कृषि आदि सार्थक कार्यों से 
योग(आधुनिक):- यदि आपको बड़े बड़े रोगों की लंबी लंबी लिस्टें याद हैं और आप बेझिझक होकर उन सबको ठीक करने की गारंटी लेते हुए आप जो भी व्यायाम करते हैं वो सब 'आधुनिकयोग' है ये सब करके आप सरकार के चहेते बन सकते हैं और इससे आपको सुरक्षा से लेकर सभी प्रकार की अन्य सुविधाएँ भी सरकार देने लगती है !और धन सेठ साहूकार लोग देने लगते हैं ! सकते हैं ठीक हों न हों ये और बात है इसके बाद
व्यायाम -यदि आपको इतना सारा आडंबर करना नहीं आता है झूठ बोलने में भी डर  लगता है और आप खाली बैठे बैठे केवल व्यायाम करते रहते हैं तथा किसी प्रकार की कोई गारंटी लेना आपके बश की बात नहीं है तो आप केवल एक्सरसाईज एक्सपर्ट माने जाएँगे और सरकार आपको बेरोजगारी भत्ता आदि कुछ थोड़ा बहुत कृपा पूर्वक दे देगी और सेठ साहूकार लोग आपको कोई छोटी मोटी नौकरी दे देंगे !

 
परिश्रम पूर्ण सार्थक कार्य -यदि आप मेहनत मजदूरी खेती किसानी आदि के भयंकर परिश्रम पूर्ण कार्य करके देश वासियों की भूख मिटाते हैं इसप्रकार से अपने एवं अपनों की इच्छाओं का दमन करते हुए राष्ट्र रचना में महान भूमिका अदा करते हैं ऐसे लोग यदि प्राकृतिक आपदाओं से आहत होकर आत्म हत्या करने लगते हैं तो मक्कार सरकारें चंद रुपयों के चेक लेकर पहुँचती हैं और मीडिया क्रिकेट की खबरों में और राहुल जी की खोज में या मोदी जी के 29 रूपए के लंच में उलझा रहा सेठ साहूकार लोग अपने अपने मनोरंजन में लगे रहे ! 
     तपस्वी प्रणम्य देश के कर्मयोगी किसान आत्म हत्या तो करने लगे किंतु उस समय भी उन्हें इन मक्कार नेताओं की याद नहीं आई जो देश की आजादी को अकेले भोग रहे हैं और देश के लोकतंत्र का वास्तविक प्रहरी किसान जो सारी मुसीबतें सहकर भी आजादी पर गर्व करता है मर जाता है किन्तु इनके सामने मुख नहीं खोलता है कि इनके आस्वसनों   नें मौत का वर्ण   आधुनिक योग(व्यायाम)  हो  या शरीर से परिश्रम पूर्वक किया जाने वाला खेती आदि कार्यों के लिए किया जाने वाला परिश्रम 
 
 

आखिर क्यों रो रोकर सहते रहे केजरीवाल ?सत्ता इतनी जरूरी थी क्या ?

   बात बात में त्याग की तलवारें चमकाने वाले लोग यदि राजनीति के लिए इतना तनाव क्यों सहते रहे किनारा करने का विकल्प तो इनके पास भी था !
 अब की बार 5 साल तक इस्तीफा नहीं दूंगा: केजरीवाल.
    किन्तु योगेंद्र और प्रशांत जी जैसे और भी पूर्व आपी लोग भी कुछ कर रहे हैं याद ये भी रखना चाहिए अन्यथा जिन्हें आपकी सरकार और पार्टी दोनों में कोई पद प्रतिष्ठा नहीं दी गई है उनके घर वाले और नाते रिश्तेदार  पूछते तो उनसे भी होंगे कि आप कुछ क्यों नहीं बनाए गए क्या आपके ऊपर 'आप'के प्रमुख देवता भरोसा नहीं करते हैं तो इतना झूठ वो कहाँ तक बोलेगे कि अगले महीने बना देंगे किंतु ऐसे विधायकों के पास यदि कभी कोई सुन्दर सा ऑफर मंत्री बनने का आया तो फिर मुख्यमंत्री कोई बने मंत्री तो वो भी बनना ही चाहेंगे और इसमें गलत भी क्या है जिसके पास दो विधायक होंगे वो मंत्री बना दिया जाएगा ऐसा श्लोगन वैकल्पिक सरकार बनाने में प्रभावी हो सकता है और जब आप मुख्यमंत्री बनने की इच्छा नहीं छोड़ सके आज पार्टी छोड़ छोड़कर जा रहे हैं लोग तो वो विधायक मंत्री बनने की इच्छा क्यों छोड़ देंगे ये राजनीति है यहाँ सत्ता के लिए एक से एक भले लोग पागल हो उठते हैं और देने लगते हैं गालियाँ !तो वो विधायक भी यदि अंदर अंदर मंत्री बनने के लिए हाथ पैर मार ही रहे हों तो क्या पता !साथ ही उन्हें ये भी पता है कि आमआदमी पार्टी में अभी तक तो केवल आपकी चल रही थी किंतु अब उनकी चलेगी जो आप के अपने लोग हैं जिन्होंने आप को आप  प्रमुख  बनाने में झूठ साँच बोलकर या आपकी दी हुई गालियों तक को पवित्र बताकर आपका समर्थन किया है आज वो लोग क्या उठा धरेंगे अपने को महत्वपूर्ण सिद्ध करने में !आखिर उन्हें भी तो अपनों के बीच अपना वजूद सिद्ध करना है और वो तभी संभव है जब वो महीने पंद्रह दिन मेहनत करके पार्टी के अंदर के अपने अपने विरोधियों के स्टिंग करें फिर उसे बाहर निकलवा दें और विरोधी तो सबके होते हैं और बुराई भी हर कोई हर किसी की एकांत में अपने अपने स्वभावानुसार करता ही है यदि उसका स्टिंग मान्य हुआ तो पार्टी में बचेगा कौन एक दिन सब बहार होंगे केवल मंत्री और मुख्यमंत्री ही विराजेंगे पार्टी और पार्टी के पदों पर !

tippaniyan

 दो.  काँग्रेस इस देश में भूल चुकी है रेस ।
 शोर मचाती फिर रही लूट लिया जब देश ॥

 दो. घोटाले जिसने किए अब तक अपरम्पार ।
       महँगाई  का  मूल  है  मनमोहन सरकार ॥
   

दो. काँग्रेस ने खुब करी दस वर्षों तक ऐश।
     खाली कर गई कोष सब भोग रहा है देश ॥

   दो. रेल हुई महँगी अब महँगा होगा तेल ।
        देश  समझ नहिं पा रहा महँगाई का खेल ॥


दो. घोटाले जिसने किए अब तक अपरम्पार । 

महँगाई का मूल है मनमोहन सरकार ॥
दो. काँग्रेस इस देश में भूल चुकी है रेस ।

शोर मचाती फिर रही लूट लिया जब देश ॥
दो. लोग पचा नहिं पा रहे हिंदी सम्मान ।

अंग्रेजों की आत्मा खड़ा किए तूफान ॥
दो. महँगाई से मुक्ति कूँ यह मोदी सरकार । 

रेल किराया क्यों बढ़ा चहुँ दिशि हाहाकार ॥
दो. कंप्यूटर विद्याधन देने से इनकार । 

सहसा क्यों करने लगी आज सपा सरकार ॥

     
       दो. रेल तेल वा  खेल में हुए घोटाले  घोर ।
     कुछ तो पहुँचे जेल तक बच गए  कोयला चोर ॥

   दो.   दस वर्षों तक जो करी काँग्रेस ने ऐश ।
          आज भाजपा क्या करे महँगी होगी गैस ॥

      पीएम बनते ही मोदी ने बुरे दिनों की शुरुआत कर दी: मायावती -पंजाब केशरी
   जरूर देवी ! बुरे दिन तो आ गए हैं किन्तु किसके जिनके चेहरे की झाइयाँ देखकर तो यही लग रहा है कि आजकल रात रात भर  नीद नहीं आ रही है  कि न जाने कब किसके कितने नंबर वाले घोटाले की फाइल खुल जाए! क्या जाने कब सी.बी.आई.की क्लीनचिटें   कैंसिल हो जाएँ ! अब अल्पमत की सरकार भी नहीं है जो समर्थन देने के बदले में क्लीन चिट माँगे ही मिल जाए वैसे भी अबकी बार तो जनता ने आपको कुछ देने लायक भी नहीं रखा है । चार दिन की आम आदमी पार्टी का फिर भी जनता ने विश्वास किया किन्तु बेचारी बसपा तो साफ ही हो गई.… !देवी ! ये भी मनुवाद के कारण ही हुआ है क्या ?


                                     संन्यासियों का धन काला धन है या नहीं !
    यदि सब कुछ छोड़कर विरक्त जीवन जीना ही संन्यास है तो संन्यास लेने के बाद दवा दारू आदि बेचना या अन्य किसी भी प्रकार का व्यापार करने वाले किसी तथाकथित संन्यासी को क्यों न कहा जाए भ्रष्ट ! और  संन्यास लेने के बाद जितना भी धन इकठ्ठा किया है उसे  क्यों न माना  जाए कालाधन ?और  इस काले धन को देश हित में जब्त किया जाना चाहिए क्या ?
     यदि संन्यास का अर्थ होता है सब कुछ छोड़कर विरक्त जीवन जीना तो जिन लोगों ने संन्यास लेने के बाद जितना भी धन इकठ्ठा किया है उसे  क्यों न माना  जाए कालाधन ?



  अब की बार 5 साल तक इस्तीफा नहीं दूंगा: केजरीवाल.
किन्तु योगेंद्र और प्रशांत जी जैसे और भी पूर्व आपी लोग भी कुछ कर रहे हैं याद ये भी रखना चाहिए अन्यथा जिन्हें आपकी सरकार और पार्टी दोनों में कोई पद प्रतिष्ठा नहीं दी गई है उनके घर वाले और नाते रिश्तेदार  पूछते तो उनसे भी होंगे कि आप कुछ क्यों नहीं बनाए गए क्या आपके ऊपर 'आप'के प्रमुख देवता भरोसा नहीं करते हैं तो इतना झूठ वो कहाँ तक बोलेगे कि अगले महीने बना देंगे किंतु ऐसे विधायकों के पास यदि कभी कोई सुन्दर सा ऑफर मंत्री बनने का आया तो फिर मुख्यमंत्री कोई बने मंत्री तो वो भी बनना ही चाहेंगे और इसमें गलत भी क्या है जिसके पास दो विधायक होंगे वो मंत्री बना दिया जाएगा ऐसा श्लोगन वैकल्पिक सरकार बनाने में प्रभावी हो सकता है और जब आप मुख्यमंत्री बनने की इच्छा नहीं छोड़ सके आज पार्टी छोड़ छोड़कर जा रहे हैं लोग तो वो विधायक मंत्री बनने की इच्छा क्यों छोड़ देंगे ये राजनीति है यहाँ सत्ता के लिए एक से एक भले लोग पागल हो उठते हैं और देने लगते हैं गालियाँ !तो वो विधायक भी यदि अंदर अंदर मंत्री बनने के लिए हाथ पैर मार ही रहे हों तो क्या पता !साथ ही उन्हें ये भी पता है कि आमआदमी पार्टी में अभी तक तो केवल आपकी चल रही थी किंतु अब उनकी चलेगी जो आप के अपने लोग हैं जिन्होंने आप को आप  प्रमुख  बनाने में झूठ साँच बोलकर या आपकी दी हुई गालियों तक को पवित्र बताकर आपका समर्थन किया है आज वो लोग क्या उठा धरेंगे अपने को महत्वपूर्ण सिद्ध करने में !आखिर उन्हें भी तो अपनों के बीच अपना वजूद सिद्ध करना है और वो तभी संभव है जब वो महीने पंद्रह दिन मेहनत करके पार्टी के अंदर के अपने अपने विरोधियों के स्टिंग करें फिर उसे बाहर निकलवा दें और विरोधी तो सबके होते हैं और बुराई भी हर कोई हर किसी की एकांत में अपने अपने स्वभावानुसार करता ही है यदि उसका स्टिंग मान्य हुआ तो पार्टी में बचेगा कौन एक दिन सब बहार होंगे केवल मंत्री और मुख्यमंत्री ही विराजेंगे पार्टी और पार्टी के पदों पर !

यदि अच्छे दिन आ जाएँ तो मोदी सरकार अन्यथा जैसे 10 वर्ष काँग्रेस के सहे वैसे ही 5 वर्ष और मान लेना !
                               आखिर क्यों बढ़ाना  पड़ा रेल का किराया ?
                        काँग्रेस और भाजपा सरकार । महँगाई से हाहाकार ॥
        एक बार एक व्यक्ति ने अपना मकान बेचा किन्तु जब जाने लगा तब नल टूँटी पंखा बल्व मोटर आदि सब कुछ खोलकर अपने साथ ले  गया ! जब मकान का नया मालिक घर आया तो देखा कि यहाँ के तो पंखा बल्ब तक सब गायब हैं जब वो पंखा आदि खरीद कर बाजार से लाने लगवाने लगा तो लोग कहने लगे कि इसमें पैसे बेकार क्यों खर्च कर रहे हो जैसे वो लोग अभी तक रह रहे थे वैसे ही हम लोग भी रह लेंगे ,किन्तु उन्हें क्या पता था कि ये काँग्रेसी जाते समय पंखा बल्ब तक खोल ले गए हैं जिसे फिर से लाइन पर लाने  के लिए बढ़ाना पड़ा रेल का किराया !अब जनता को क्या पता कि मोदी जी क्या फेस कर रहे हैं !
         रही बात काँग्रेस के मित्रों की तो वो लोग अंदर तो कोष को ऐसा करके निकले हैं कि नई सरकार की कम से कम साल छै महीने पिटे भद्द अर्थात ये किसी प्रकार का विकास  कर ही न पाए और सरकार से बाहर आकर महँगाई के विरुद्ध धरना प्रदर्शन कर रहे हैं उन्हें पता है कि जब हमने वहाँ कुछ रखा ही नहीं है तो देखते हैं कैसे अच्छे दिन आने वाले हैं !किन्तु जनता को ये चुनौती भी स्वीकार करनी चाहिए और परखे एक बार मोदी जी को भी और करे उनका उत्साह बर्धन ! क्या पता आ ही जाएँ अच्छे दिन !

Thursday, 9 April 2015

ब्राह्मणों के आचार व्यवहार बिगड़ने से बिगड़ा है धर्म का स्वरूप ! ब्रह्मज्ञानी कहलाने का अजीब नशा सवार है लोगों में !

 ब्रह्मगुरु ब्रह्मांडगुरु आदि अपने को अपने मुख से कहते घूम रहे हैं लोग !
   ग्रहगुरु,ज्योतिषगुरु उपायगुरु साढ़ेसातीगुरू राशिफलगुरु ,नगगुरु,  नगीनेगुरु आदि कितने प्रकार के प्रोडक्ट बिक रहे हैं आज मार्केट में !सचपूछो तो आज की तारीख़ में जिनका कोई खरीददार ही नहीं है ऐसे लोग टीवी चैनलों के माध्यम से घुस आते हैं घरों में और दिन भर जो मुख में आता है सो सब कुछ बकते हैं ज्योतिष एवं उपायों के नाम पर !ऐसे गुरुओं की बड़ी बरायटियाँ आज मार्केट में छाई हुई हैं यही तो कलियुग का प्रभाव कहा जाएगा कि झूठबल से फल फूल रहे हैं लोग !
             दो. ब्रह्मज्ञान बिनु नारि नर करहिं न दूसरि  बात । 
                 कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर बात ॥  
      अर्थात धर्म के नाम पर कलियुगी लोग ब्रह्मज्ञान के बिना दूसरी बात ही नहीं करते हैं और एक एक पैसे के लिए किसी की हत्या , बलात्कार जैसा पाप कर देने में भी नहीं हिचकते हैं !
     अब  गुरु बनने और बनाने का तो 'रा' मैटेरियल तक मार्किट में मिलने लगा है आप एक दिन दो दिन दस दिन महीना या जीवन भर के लिए गुरु बन सकते हैं गुरु बनाने वाले इंजीनियर उपलब्ध हैं गुरु बनने के लिए आपको कैसे बैठना उठना बोलना चालना आदि है वो सब कुछ गाइड कर देते हैं यदि आपको तत्काल गुरु बनना है और आप कुछ भी नहीं बोल पाते हैं तो आप विज्ञापन के लिए किसी टीवी चैनल का समय पैसे देकर खरीद लें वो आपको मिनटों में न केवल गुरु बना देंगे अपितु सिद्ध भी कर देंगे कि आप वास्तव में गुरु हैं समाज को मानना पड़ेगा जब आप को लीप पोत कर लालपीला हरा गुलाबी आदि रँग कर बहुत बनाकर बैठालेंगे अपने सामने और वो झुट्ठे झुट्ठी झूठ मूठ का आपको न केवल महाराज जी! महाराज जी! कहेंगे अपितु आपका लाइव कार्यक्रम आपसे ही पूछेंगे अच्छा महाराज जी !ये बताओ आज के तीस वर्ष पहले जब आप हिमालय में तपस्या कर रहे थे तब मैंने सुना है कि आपने कई साल तक श्वास ही नहीं ली थी तब वहाँ हा हा कार मच गया था आपकी   की बर्फ पिघलकर अचानक सैलाव आ गया फिर आपने श्वाँस लेनी शुरू की आदि आदिऐसे प्रकरणों में आपका मन आवे आप कुछ बोल दो न मन आवे तो आप केवल शिर ही हिलाते रहो बाक़ी सारा काम वे लोग स्वयं ही कर लेते हैं और इसीप्रकार से कुछ दिन टीवी वालों से यदि आप गाइडेंस लेते रहे तो ये व्यायाम करने वालों को योग गुरु सिद्ध कर देते हैं व्यायाम और योग में अब केवल इतना अंतर रह गया है कि व्यायाम आपको केवल करना होता है जबकि यदि आपको व्यायाम करते हुए रोगों की लिस्ट पढनी भी आ गई और उन्हें ठीक करने का दावा भी ठोक सके तो आप हो गए पक्के योगगुरु कुल मिलाकर इसके बाद आप कितना भी कहो कि हम गुरु नहीं हैं किन्तु समाज आपको पूज पूज कर पैसे दे दे कर पक्का गुरू बना देगा !
      कुछ चेला लोग अपने अपने बाबाओं को शौक शौक में आज  ब्रह्मज्ञानी कहने लगे हैं आखिर क्यों ?क्या ये झूठ मूठ का ब्रह्मज्ञानी बनने के पाप  का प्रायश्चित्त तो करना ही पड़ता है !
     कुछ आडंबरी  बाबाओं ने अपने को ब्रह्मज्ञानी कह कहकर न केवल ब्रह्मज्ञानियों की भद्द पिटवाई है अपितु समस्त चरित्रवान विरक्त संतों को भी समाज की निगाहों में कटघरे में खड़ा कर दिया है ये ढंग ठीक नहीं हैं जिसके पास तपो शक्ति न हो तो उसका आडम्बर भी नहीं करना चाहिए अन्यथा इसका असर समूचे धार्मिक जगत पर पड़ता है और सबको अपमानित होना पड़ता है अपने धर्म कर्म पर भी अंगुलियाँ उठाने लगती हैं जो सबसे बड़ा नुक्सान है । जो बाबा अपने को कहते तो ब्रह्मज्ञानी हैं किंतु होता कोरा पाखंड है इसीलिए वो औरों की साजिशों के या अपने अमर्यादित कृत्यों के शिकार बड़ी आसानी से हो जाते हैं क्योंकि उनके पास न तो शास्त्र दृष्टि होती है और न ही तपोशक्ति !इसीलिए उनके द्वारा झूठ मूठ का बनाया गया बालू का किला जरा से धक्का लगते ही भरभरा कर बैठ जाता है ! अन्यथा ब्रह्मज्ञानी तो  स्वयं में सम्राट होता है बड़े बड़े राजा महाराजा उसकी कृपा पर सुरक्षित होते हैं मजाल क्या कि उसकी इच्छा के बिना एक पत्ता भी हिल जाए ' ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति ' अर्थात ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म ही होता है !


Wednesday, 8 April 2015

आम आदमी पार्टी में बवाल क्यों ?आप प्रमुख पर सवाल क्यों ?

धिक्कार है ऐसी सत्ता को जो इंसान को इंसान नहीं रहने देती ! जिसकी शब्दावली ऐसी हो उसके शिक्षित होने का समाज को क्या लाभ ! 
  आम आदमी पार्टी प्रमुख की लात उनके तो लगी या नहीं लगी जिन्हें लात मारकर बाहर निकालने के लिए बोला गया था किन्तु उस जनता के जरूर लगी है जिस जनता ने उन्हें  सीधा साधा शालीन सज्जन मृदुभाषी विनम्र आदि समझकर दिल्ली का ताज सौंपा है !क्या ये सारे सद्गुण अभिनय मात्र हैं और हकीकत वह है जो टेप में सुनाई पड़ी ? आम आदमी पार्टी से इतना गिर जाने की उम्मीद तो किसी को नहीं थी !सत्ता बहुत कुछ हो सकती है किंतु सबकुछ नहीं !
   गोस्वामी तुलसी दास जी ने लिखा है कि रावण ने एक से एक बड़े पाप किए किंतु इससे उसके उतने पुण्य समाप्त नहीं हुए थे कि उसका बध  किया जा सकता इसीलिए सीता हरण जैसा बड़ा अपराध करने के बाद भी श्री राम ने उसका बध नहीं किया था किंतु विभीषण को लात मारते ही रावण के पुण्य समाप्त हुए और पुण्य समाप्त होते ही श्री राम ने उसका बध कर दिया ।    " तौ लौं न दापु दल्यौ दसकंधर जौ लौं विभीषण लात न मारो ।"             पुराने लोग संभवतः इसीलिए किसी के धोखे में भी लात लगने पर पैर छूते या हाथ लगाते थे ! वैसे भी विभीषण को लात मार कर रावण कितने दिन सुरक्षित रह सका था और अब आम आदमी पार्टी लातमारने की बात करके कब तक चला पाएगी सरकार और बचा पाएगी अपना जन विश्वास !ऐसी गर्वोक्ति  ठीक नहीं है । 
    आम आदमी पार्टी के पास सरकार गिराने के हजार फार्मूले हो सकते हैं किंतु सरकार चलाने के लिए अभी तक ठोस कुछ सामने नहीं लाया जा सका है !वैसे भी वो दूसरों की सरकारें क्यों चलने देंगे ?जो अकारण अपनी सरकार स्वयं गिरा देने में न हिचकते रहे हों और अपनी चलाने में तो  मन ही नहीं लगेगा !क्रांति पसंद लोग शांति से कहाँ बैठ सकते हैं !
     वैसे भी प्रशांत जी  और योगेंद्र जी जैसे लोग यदि पार्टी को हराने के लिए काम कर रहे होते तो पार्टी इतने बड़े बहुमत से कभी न जीत पाती क्योंकि उनका वजूद भी इतना कम तो नहीं ही था कि 'आप' प्रमुख काँग्रेस और भाजपा वालों से तो लड़ते ही रहे साथ ही पार्टी के अंदर भी  प्रशांत जी  और योगेंद्र जी जैसे लोगों के विरोध का सामना भी करते रहे फिर भी इतने बड़े बहुमत से पार्टी जीती !क्या केवल 'आप' प्रमुख के चेहरे पर प्रभावित थे दिल्ली वाले !और यदि हाँ तो ऐसा किया या था उन्होंने दिल्ली वालों के लिए ? केवल कुछ सपने ही तो समाज को दिखाए थे उसमें पार्टी के सारे लोग साथ साथ सम्मिलित थे आखिर अंदर क्या चलता रहा आम लोगों को नहीं पता है और प्रेस में या खुली तौर पर प्रशांत  और योगेंद्र जी जैसे लोगों ने पार्टी विरोधी कोई वक्तव्य दिया नहीं यहाँ तक कि समाज में वो जब आए तब तो पार्टी एवं पार्टी पदाधिकारियों के विषय में शालीन बातचीत ही करते रहे आज तक उनकी तरफ से कोई अमर्यादित बयान  नहीं आया किन्तु गालियाँ देते तो इनकी आवाज सुनी गई फिर दोषी प्रशांत  और योगेंद्र जी जैसे लोग कैसे हो गए !
     दिल्ली की जनता ने जनादेश इसलिए किसी एक व्यक्ति को नहीं दिया है कि वो जैसा चाहे वैसा करे अपितु यह जनादेश भ्रष्टाचार विरोधी सभ्य शालीन जनहितकारी विचारधारा को सामूहिक रूप से आगे बढ़ाने के लिए मिला है फिर इसका मसीहा कोई एक व्यक्ति या उसके कुछ चाटुकार लोग ही कैसे हो गये !दूसरी  बात  कि थोड़ी थोड़ी बात में सामूहिक रूप से आम जनता की राय शुमारी के शौकीन लोगों नें प्रशांत  और योगेंद्र जी जैसे लोगों को बाहर करते समय आम जनता का मत लेना जरूरी आखिर क्यों नहीं समझा यदि मनमें कोई पाप नहीं था तो ?
    मैं विश्वास पूर्वक कह सकता हूँ कि यदि किसी को इस बात की गलत फहमी है कि यह जनादेश एक विचार धारा  को नहीं अपितु केवल एक व्यक्ति को मिला है तो प्रशांत  और योगेंद्र जी जैसे अन्य भी सम्मानित लोगों को बाहर करने के बाद आज भी पार्टी चुनाव कराकर देख ले यदि बहुमत मिलने में लाले न पड़  जाएँ !
    आखिर भाजपा और काँग्रेस जैसी पार्टियों को जनता ने नाकारा तो इसीलिए था कि उनमें आपसी कलह बहुत थी और आम आदमी पार्टी मर्यादित लग रही थी किंतु आज इस पार्टी में जो कुछ हुआ है वो उनसे अधिक है जिनसे जनता ऊभ चुकी थी इसलिए अब किया जाए दोबारा चुनाव तो सच्चाई सामने आ जाएगी !
    जहाँ तक बात सांसदों और विधायकों के समर्थन की तो अधिकांश लोग चुनाव जीतने के बाद सत्ता के साथ ही चिपके रहेंगे हर जगह यही होता है इसलिए अपनी आत्मा की आवाज को दबाते जाना उनकी मजबूरी होती  है किंतु सत्ता यदि थोड़ी भी हिलती दिखाई दी तो ईंटे रोड़े नहीं अपितु पूरे के पूरे पहाड़ खिसकेंगे तब क्या करेंगे ईमानदार पार्टी के स्वयंभू मसीहा लोग !कैसे सिद्ध करेंगे कि ईमानदार केवल वही हैं । 
   वैसे भी जब उन्हें लगता था कि सत्ता हमारे पास है और बहुमत हमारे पास है तो बड़प्पन दिखाते हुए उन्हें भी साथ लेकर चलना ही चाहिए था जो असंतुष्ट थे जनता तो यही चाहती थी !
      विवाह के पहले जो लोग बासना (सेक्स)पीड़ा से परेशान होकर विवाह होने तक का समय पास करने के लिए किसी लड़के या लड़की के साथ प्रेम प्यार का नाटक करके अपना समय पास कर लेते हैं इसी बीच कुटिल लोग ऊपर से तो लिपटे चिपटे रहते हैं अंदर से एक दूसरे का स्टिंग करते रहते हैं और जब जिसका विवाह हो जाता है तब वो सामने वाले को गलत सिद्ध करने के लिए स्टिंग दिखाने लगता है कि देखो वो कितना गलत था या थी किंतु जिसका विवाह हो चुका होता है उसका अब कोई क्या बिगाड़ सकता है !बदनामी से भय तो सामने वाले को होगा !जो सत्ता और संगठन दोनों से मुक्त होता है। जनता को आखिर वो भरोसा कैसे दे कि वो भी ठीक था । 
   बंधुओ ! क्या आम आदमी पार्टी में इस समय जो कुछ चल रहा है वह ऐसे धोखा धड़ी पूर्ण प्रेम प्रसंग की तरह ही नहीं है !यदि ऐसा न होता तो जब वो गलती कर रहे थे तभी उन्हें निकाल बाहर क्यों नहीं किया गया किंतु तब उनकी जरूरत समझी गई इसका मतलब कि वो पार्टी का हिट साधन कर रहे थे !अन्यथा इन ईमानदारों के लिए सत्ता इतनी जरूरी क्यों थी यदि हाँ तो उसी समय बहार करना था क्या सत्ता के बिना जी नहीं सकते थे अन्ना हजारे जी की ईमानदारी के संवाहक शालीन सिपाही !आज हालात ये हैं कि ऐसी मजबूत सत्ता मिली है जो कभी भी हिलाई जा सकती है आखिर विभीषण को विरोधियों से मिलने के लिए मजबूर करने वाला रावण कब तक सुरक्षित रह सका !  
    वैसे भी  जिसे नकारात्मक राजनीति फली हो और उसे उसी का अभ्यास रहा हो जिसमें औरों को अपमानित करने का दुष्प्रचार किया गया हो उनकी सकारात्मक राजनीति में रूचि कहाँ और कैसे हो सकती है ! दूसरों को चोर भ्रष्टाचारी आदि कहते रहना वी आई पी कल्चर की निंदा करते रहना विनम्रता की बड़ी बड़ी भावनाएँ प्रदर्शित करना और परदे के पीछे विरोधियों को इतनी गन्दी गालियाँ देना ,लातें मार कर बाहर निकाल देने की बात करना ये किसी भी सभ्य शालीन गंभीर एवं चरित्र शील नेता को शोभा नहीं देता है।
    अगर आप सुशिक्षित हैं बड़े बड़े पदों पर रह चुके हैं त्याग बलिदान सदाचरण ईमानदारी सात्विकता शालीनता की बातें अन्ना जी के आंदोलन के समय आप मंच से करते रहे हैं जनता आपके उसी आचार व्यवहार पर प्रभावित थी गाली देने और लात मारने पर नहीं ! आखिर क्या अंतर रह गया अन्य लोगों और आपमें !माना कि कुछ लोग पार्टी के साथ अनुकूल व्यवहार नहीं कर रहे थे किंतु उसके लिए वो तब दोषी माने जा सकते थे जब आप केवल उन्हीं से रूठे होते किंतु आपसे रूठकर जाने वालों की तो बड़ी लम्बी लिस्ट है और उन सभी लोगों को गलत सिद्ध करके आपके मुट्ठी भर लोग सही सिद्ध हो ही नहीं सकते !वैसे भी आपने आज तक जो बातें बोलीं या आरोप लगाए या निंदा करते रहे उसी दिशा  में आप स्वयं चलते देखे जा रहे हैं । अपने विरोधियों को लात मारने की बात करना बड़ी गलती है । 
   सरकारों को गिराने में काँग्रेस तो बदनाम थी ही किंतु सरकार गिरवाने में आम आदमी पार्टी भी पीछे नहीं है  पिछली बार काँग्रेस का साथ लेकर इन्होंने सरकार बनाई और जब सरकार चलाने की कला समझ में नहीं आई तो घबड़ा गए और काँग्रेस का नाम ले लेकर इन्होंने स्वयं अपनी ही 49 दिनों की सरकार अपने आप ही गिरा दी ।
           जस जस सुरसा बदन बढ़ावा । 
            तासु  दून कपि रूप दिखावा ॥ 
            शत जोजन तेहि आनन कीन्हा।
           अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥ 
    सम्भवतः इसीलिए आम आदमी पार्टी को उस काँग्रेस जैसे जैसे समर्थन, सुविधाएँ एवं समाधान देती जा रही थी वैसे वैसे ही 'आप' प्रमुख  न केवल अपनी शर्तें एवं शंकाएँ बढ़ाते जा रहे थे अपितु पैर एवं दायरा भी फैलाते जा रहे थे ।
      रामायण में एक प्रसंग आता है कि जब हनुमान जी लंका की ओर बढ़ रहे थे  उसी समय सर्पों की माता सुरसा आती है और हनुमान जी को अपने मुख में रखना चाहती है हनुमान जी जैसे जैसे अपना शरीर बढ़ाते हैं वैसे वैसे सुरसा अपना मुख बढ़ाते जाती है ।
   वही हालात दिल्ली की राजनीति में पहले काँग्रेस का बहाना लेकर किए गए थे और आज पार्टी की अपने कार्यकर्ताओं का बहाना लेकर अति आत्मविश्वास के कारण किए जा रहे हैं आखिर ये तो कल्पना भी नहीं की जानी चाहिए कि विरोधी चुप बैठेंगे किंतु यदि वो कुछ कर सके तो दोष उन्हीं पर मढ़ा जाएगा जबकि शुरुआत इधर से हुई है !उस समय जैसे जैसे केजरीवाल का साथ देने और शर्तें मानने की घोषणा काँग्रेस करती चली जा रही थी  अरविन्द  केजरीवाल जी वैसे वैसे अपनी शर्तों का पिटारा खोलते  चले जा रहे थे वही अब हुआ ।जिन बातों का खंडन सार्वजनिक रूप से विरोधियों की ओर से किया जा रहा था उन्हीं बातों को उनके मस्तक पर चिपका कर उन्हें बाहर कर दिया गया !आखिर क्यों ?
     अरे आम आदमी पार्टी के कर्णधारों आप तो शर्तों और स्टिंगों के साक्षात समुद्र हैं इसलिए आप तो कभी भी कोई भी कहीं भी कैसी भी नई से नई शर्त और स्टिंग का नया पिटारा खोल सकते हैं किन्तु सामने वाले अभी तक सत्ता और संगठन दोनों ही दृष्टियों से खाली हाथ हैं वो पार्टी के विरुद्ध कोई साजिश आखिर क्यों करेंगे और क्या जनता इस पर विश्वास कर पाएगी !क्या जनता इसे ठीक मानेगी कि सत्ता के लोभ में जब तक सत्ता नहीं मिली तक तक तो उनसे चिपके रहे और सत्ता मिलते ही पहले लात मार कर बाहर करने की बात कही और बाद में कुछ वैसा ही कर भी दिया !क्या इसे दिल्ली की जनता पचा पाएगी !       

   


Tuesday, 7 April 2015

महाबली नेताओं के बयानों पर बवाल क्यों ,उनके चरित्र पर सवाल क्यों ?

         नेतागिरी के प्रारंभिक काल में तो नेताओं को भी कानून के अनुशार ही चलना होता है किंतु जैसे जैसे उनकी पद प्रतिष्ठा बढ़ने लगती है लोग जुड़ने लगते हैं वैसे वैसे वो नेता शक्तिशाली होने लगते हैं इसप्रकार से नेताओं की शक्ति जैसे जैसे आगे बढ़ने लगती है कानून वैसे वैसे पीछे छूटने लगता है धीरे धीरे एक समय आता है जब कानून बहुत पीछे छूट जाता है और नेता तेजी से आगे निकल जाता है । यहाँ पहुँचकर उसे या तो कोई राजनैतिक पड़ाव मिल जाता है या फिर मजबूत मंजिल ही मिल जाती है जहाँ उसकी अपनी पहचान ऐसी हो जाती है कि जिसे अपने गुणों का सम्मान तो मिलता ही है दुर्गुणों का सम्मान भी मिलने लगता है जिसकी एक आवाज पर उसके समर्थन में लाखों लोग निकल पड़ते हैं ऐसी परिस्थिति में महाबली नेता अपने को कानून से ऊपर समझने लगता है लोग भी उसके विषय में ऐसा ही समझने लगते हैं ऐसी अवस्था में बड़े बड़े आरोपों में आरोपी नेता जिन्हें वर्षों की सजा सुनाई जा चुकी होती है वो बड़े धूम धाम से महोत्सव पूर्वक जेल जाते हैं जब तक मन आता है तब तक वहाँ अपने हिसाब से रहते हैं इसके बाद बाहर आकर संपूर्ण राजनीति करते हैं मंत्री मुख्यमंत्री आदि सबकुछ अपनी सुविधानुशार बन जाते हैं इस प्रकार से संविधान को ठेंगा दिखा दिया जाता है । ऐसे नेता जेल से बाहर  निकलते हैं तो चहरे चमक रहे होते हैं कपड़े दमक रहे होते हैं बड़ी भीड़भाड़ आदि जुलूसों के साथ निकलते हैं जेल से नारे लगाते हुए लोग दौड़ रहे होते हैं । मीडिया वाले नेता जी से मिलने को बेताब होते हैं नेता जी को देखते ही घेर लेते हैं सबसे पहले नेता जी देश की कानून व्यवस्था पर प्रश्न उठाते हैं कि हमको गलत फँसाया गया था मेरे साथ षड्यंत्र हुआ था मुझे विश्वास था कि सत्य की विजय होगी सो हुई और मैं छूट गया !
      आम आदमी जेल से निकलता है तो महीन लग जाते हैं रूटीन में आने में लोगों से आँखें मिलाने की हिम्मत नहीं कर पाता  है ! चेहरा उदास शर्म के मारे पानी पानी होता है जनता उसे देखती है और नेता जी को देखती तो समझ जाती है कि ये सब ड्रामा है सजा कितने भी वर्ष की क्यों न हुई हो किंतु ये नेता लोग हैं अभी छूट आएँगे और जनता अनुमान लगभग ठीक होता है नेता जी छूट भी आते हैं ।ये नेताओं का महाबली अवतार होता है जब इन्हें सब डरने लगते हैं ये किसी को कुछ भी बोल सकते हैं किसी को गाली गलौच कर सकते हैं मारपीट भी कर सकते हैं कुछ भी करें वो  सर्वसक्षम कैटेगरी में आ जाते हैं ! बिहार है तो मेरा समय क्यों बर्बाद कर रहे हैं आप 
 इन्हें किंतु जब नेता तब उस महाबली को इस बात की चिंता ही नहीं रहती है कि वो किसी से कैसे बात व्यवहार करे या उसकी कमाई लीगल है या अनलीगल इसके बाद तो वो किसी को कुछ भी बोले और किसी के साथ कैसा भी गंदा व्यवहार करे कैसे भी धन संग्रह करे किंतु उसके बातों और व्यवहारों को सही एवं संविधान सम्मत सिद्ध करने के लिए भाड़े के सलाह कार,वकीलादि लगे होते हैं जिन्हें फीस ही एक बात की मिल रही होती है कि नेता जी के हर गैरकानूनी काम को ,व्यवहार को ,बयान  को कानून सम्मत सिद्ध करना है ने सही ही कहा है को कुछ भी समझावे जो करे उसके पास  भ में