Wednesday, 10 February 2016

Book Writing

                                                             -: भूमिका :-
           सवर्ण क्रांति का आह्वान ! हे ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यो ! तुम अपने पवित्र पूर्वजों पर गर्व करो !
    क्षत्रिय राजालोग आपस में लड़कर मरते रहे !क्षत्रियों ने परशुराम के खानदान वालों को मारा ,परशुराम ने क्षत्रियों को मारा फिर श्री राम ने ब्राह्मणों को मारा !ऐसे घट गई सवर्णों  की संख्या !
    हे वोटबल से कमजोर सवर्णों ! तुम्हारे त्यागी तपस्वी पवित्र पूर्वजों पर लगाया जा रहा है दलितों के शोषण का आरोप ! तुम सुन रहे हो धिक्कार है तुम्हारे ज्ञान विज्ञान को ! तुम उनसे पूछ नहीं सकते कि तुम्हारे पास था क्या जिसका शोषण किया होगा हमारे पूर्वजों ने !संख्या बल में अधिक तुम्हारे पूर्वजों ने शोषण सहा क्यों ? तुम्हारे पूर्वजों ने क्यों नहीं लिखे वेदों शास्त्रों पुराणों उपनिषदों स्मृतियों जैसे पवित्र ग्रंथ ? किसने रोका थाउन्हें ?
 यदि हमारे पूर्वज तुम्हारा छुआ खाना नहीं कहते थे तो तुम हमारा छुआ खाना खाना बंद कर दो ! यदि हमारे पूर्वज अपने बेटा बेटियों का विवाह तुम्हारे यहाँ नहीं करते थे तो तुम भी हमारा बहिष्कार कर दो और मत करो हमारे यहाँ अपने बेटा बेटियों का विवाह !किंतु हमारे पवित्र पूर्वजों की निंदा मत करो !
       युद्धों से डरने वाले जो बूढ़े बूढ़े लोग हमारे छोटे छोटे बच्चों के पैर छू छू कर तारीफ कर करके  उन्हें झाड़ पर चढ़ाते  रहे उन्हें समझाते  रहे कि तुम्हारे बाप दादा जब तक रहे तब तक हमारा बाल भी बाँका नहीं हुआ अब तो 'मालिक' आपका ही सहारा है आप ही हमारी रक्षा करना ! यह सुनकर फड़क उठते रहे सवर्ण और युद्धों में शहीद होते रहे !निरंतर मारे जाने से सवर्णों की संख्या घट गई !और वो लोग मेहनत मजदूरी खेत खलिहान भले करते रहे मैले कुचैले कपड़े भले ही पहनते  रहे हों किंतु उन्होंने अपनों को मरने से बचा लिया उनकी ये चालाकी सवर्ण लोग समझ नहीं सके या अत्यंत आत्म विश्वास में मारे गए बेचारे !इस प्रकार से बड़ी संख्या में सवर्णों का संहार हुआ !आज परिस्थिति ये पैदा हो गई कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य तीनों की संख्या एक साथ मिल आए तो भी उस अकेले एक वर्ण की जन संख्या की बराबरी नहीं कर सकते !कल्पना कीजिए कि उस युग में सवर्णों का कितना बड़ा संहार हुआ होगा !कितनी विशाल संख्या में मारे गए होंगे सवर्ण !
       जिन ब्राह्मणों क्षत्रियों वैश्यों का संहार इतनी विशाल संख्या में हुआ होगा उनके पास जगह जमीनें संपत्तियाँ तो अधिक होनी ही थीं जब लोग ही नहीं बचे तो जो बचे उन्हीं में बँटती रहीं हमारे पूर्वजों की संपत्तियाँ !दूसरी और वो लोग थे जो केवल जन संख्या ही बढ़ाते रहे इसके अलावा किया क्या !कितने युद्ध लड़े उन्होंने !कहाँ दिया अपनों का बलिदान !सरे लोग फलते फूलते रहे जनसंख्या बढ़ती चली गई तो संपत्तियाँ तो कम पड़नी थीं अब सवर्णों की संपत्तियाँ देख देखकर उन्हें लालच बढ़ने लगा !कुछ सेवा करके लेते रहे कुछ  चाटुकारिता करके माँगते रहे  कुछ हैरानी परेशानी बता कर माँग लेते रहे  अब अधिकार बता कर माँग रहे हैं कहते हैं कि ये हमारा हक़ है  हिस्सा है इसलिए  हमें चाहिए आरक्षण ! अरे !आरक्षण न किसी का हक़ है और न ही किसी का हिस्सा !ये तो सरकारी भिक्षा है !भिक्षा से न किसी का सम्मान बढ़ता है और न ही स्वाभिमान न आत्म गौरव न प्रतिभा केवल पेट भरा जा सकता है !पेट तो हर जीव जंतु भर लेता है पेट भरने के लिए भिक्षा क्यों ?
    राजनीति में सिद्धांत नहीं चला करते यहाँ तो संख्या का महत्त्व होता है जिसकी संख्या अधिक वही विधायक सांसद मंत्री मुख्य मंत्री प्रधानमंत्री आदि सबकुछ !इसलिए संख्या जुटाने के लिए संख्याधिपतियों अर्थात दलितों या दूसरे संख्याबलियों सम्प्रदायावलंबियों समूहों को खुश करने के लिए वोट भिक्षुक राजनैतिक दल इनकी जातिगत आरक्षण जैसी  निराधार ऊटपटाँग बातों का न केवल समर्थन किया करते हैं अपितु आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए उन्हें जातिगत सुविधाएँ मुहैया कराया करते हैं ये उनकी मजबूरी है । 
                                                            -: इति भूमिका :-

Tuesday, 9 February 2016

एक वर्ष पूरा होने पार आपको बहुत बहुत बधाई !पुनः आपसे एक प्रश्न !



एक वर्ष पूरा होने पार आपको बहुत बहुत बधाई !पुनः आपसे एक प्रश्न !
दिल्ली सरकार को अब क्यों नहीं दिखाई पड़ते दिल्ली की जनता पर हो रहे अत्याचार !!
दिल्ली में गुंडागर्दी के बल पर एक बिल्डिंग के लोगों को इतना डराया धमकाया जा रहा हो कि लोग जीवन के जरूरी संसाधनों के बिना घुट घुट कर जी रहे हों !बिल्डिंग छोड़ छोड़ कर जाने पर मजबूर कर दिए जाएँ फिर भी सरकारें अपने स्वच्छ प्रशासन से खुश हों तो बनी रहें !
एक बिल्डिंग की टॉप फ्लोर में रहने वाले सरकारीकर्मचारियों या सोर्सफुल लोगों की गुंडागर्दी से त्रस्त लोग पिछले दो वर्ष से बूँद बूँद पानी के लिए परेशान हैं सामूहिक बिल्डिंग की छत पर रखी टंकियों में मरे चूहे कबूतर बन्दर बिल्ली कुछ भी डाल दी जाती हैं टंकियाँ फाड़ दी गईं मोटरें ख़राब कर दी गईं पाइपों में वो सब कुछ घुसा दिया गया जिससे उसमें पानी का आना जाना न हो सके बिल्डिंग बनने की 18 वर्षों बाद वो कहते हैं कि हमने छत खरीद ली है इसलिए टंकियों में पानी नहीं भरने देंगे इन टॉप फ्लोर वालों में से कोई अपने को पुलिस अफसर बताता है तो कोई शिक्षक तो कोई लोक सभा का कर्मचारी नेता या वकील !कुलमिलाकर अपने अपने कल्पित ओहदे बता बता कर इतना डरा धमका रखा है कि घरों में पिछले एक वर्ष से पानी नहीं है किंतु कोई कम्प्लेन करने को तैयार नहीं है !जिन्होंने 18वर्ष पहले फ्लेट ख़रीदे थे वे अपनी पानी की टंकियाँ लेकर अब कहाँ जाएँ पिछले एक वर्ष से टॉप फ्लोर वालों ने पानी भरना बिलकुल बंद करा दिया है टंकियां रखने के बदले रंगदारी माँगते हैं ये लोग !छत पर जाने आने के रास्ते में ताला लगा दिया है उन लोगों ने !see more....http://samayvigyan.blogspot.in/2016/02/v-i-m-p.html

सरकार और सरकारी मशीनरी कहाँ करती है कानूनों की परवाह !

      कानूनों का दुरूपयोग देश की भोली भाली जनता को डराने धमकाने और लूटने के लिए धड़ल्ले से हो रहा है !इसमें सरकारें  और सरकारी मशीनरी अक्सर अप्रत्यक्ष रूप से सम्मिलित दिखाई देती है इस सच्चाई को देश का गुंडा  माफिया अपराधी वर्ग समझ चुका है !यही कारण है कि इस अपराधी वर्ग ने सभी प्रकार के अपराधों को करने की प्राइसलिस्ट बना ली है कि किस अपराध को करने के लिए किसको क्या देकर बचा जा सकता है !और ऐसा करके उसने सरकारों एवं सरकारी मशीनरियों पर ऐसी अचूक पकड़ बना ली है कि चुनावों के समय राजनैतिक पार्टियाँ चुनावी विजय के लिए उनसे मदद माँगती है और वो करते हैं उनका सहयोग !क्योंकि कोई भी दल जब तक सत्ता में रहता है उसका रुतबा तभी तक रहता है किंतु अपराधियों का सिक्का हमेंशा चलता है दूसरा नेता जिस पार्टी में होते हैं उसकी जब सरकार बनेगी नेता तब प्रभावी रहते हैं किंतु अपराधियों की पकड़ सत्ता पर हमेंशा रहती है !किसी सरकार की जुर्रत नहीं है कि वो अपराधियों का बाल भी बाँका कर सके !
       जो नेता या राजनैतिक दल भ्रष्टाचार मिटाने के बड़े बड़े नारे लगाते हुए बीर रस की बड़ी बड़ी बहादुरी की बातें करके सत्ता शिखरों तक पहुँचते हैं वहाँ  गुंडों माफियाओं अपराधियों का इशारा पाते ही  दुम हिलाने लगते हैं वो लोग !और वो साक्षात सरकार लोग भी उन अपराधियों से सर सर करके बातें करने लगते हैं । जिन अपराधियों भ्रष्टाचारियों को देखकर उनकी चड्ढी गीली हो रही होती है तो आराम पसंद सरकारी मशीनरी की क्या बिसात कि वो उनसे पंगा ले !इसीलिए गुंडों माफियाओं अपराधियों पर लगाम कसना तो दूर कई जगह इन्हीं कानून के अपराधियों के लिए काम करते देखी जा सकती है सरकारी मशीनरी ! उसमें भी यदि ये हाल दिल्ली का हो तो देश का क्या होगा कल्पना की जा सकती है !
   भ्रष्टाचार भगाने के नाम पर विपक्ष में रहकर शेरों की तरह दहाड़ने वाले नेता लोग CM - PM बनते  ही म्याऊँ म्याऊँ करने लगते हैं !अपराधियों का लट्ठ देखते ही बड़ों बड़ों की अकल ठिकाने आ जाती है !बड़े बड़े बड़बोले नेताओं को ईमानदारी की बड़ी बड़ी बातें करते देखा गया किंतु सत्ता मिलते ही पूँछ उठाओ तो नंगे दिखाई पड़ते हैं अधिकांश नेता लोग !महीनों वर्षों तक जनता से आँखें मिलाने लायक नहीं रह जाते !जिन अपराधियों भ्रष्टाचारियों  के पहले कभी नाम गिनाया करते रहे थे उनकी सैकड़ों फाइलें दिखाया करते थे सत्ता मिलते ही उन कायरों ने कभी कोई चूहा तक नहीं पकड़ा अपराधियों और भ्रष्टाचारियों के आरोप में आपस में 


 
गुंडों माफियाओं अपराधियों पर लगाम कसने वाले कानून किस काम के जब जनता के भरोसे पर खरे नहीं उतरते !
 दिल्ली तो देश की राजधानी है यहाँ कानूनों के पालन पर की है तो बाहर क्या होता होगा ! होंगे किंतु कार्यवाही नहीं होती ! जब ये देश केजरीवाल जी ! जनता आपको अपनी बात बताए तो कैसे ! आपने गुंडागर्दी मुक्त शासन देने की बात की थी ! आपने जरूरी सुविधाएँ देने की बात क...
दिल्ली तो देश की राजधानी है यहाँ कानूनों के पालन पर की है तो बाहर क्या होता होगा ! होंगे किंतु कार्यवाही नहीं होती ! जब ये देश केजरीवाल जी ! जनता आपको अपनी बात बताए तो कैसे ! आपने गुंडागर्दी मुक्त


 भ्रष्टाचार भागना तो दूर ये नेता और ये नियत और ये राजनीति भ्रष्टाचार का बाल तक बाँका नहीं कर सकते !




न पालन करने की ठेकेदारी क्या केवल जनता


 ये दो कौड़ी के लोग !
  


 भ्रष्टाचार का विरोध करने के लिए जो चरित्र संकल्प एवं कर्मठता राजनेताओं में होनी चाहिए वो वर्तमान समय में राजनीति को सूट ही नहीं करती है !
 केजरीवाल जी देश आपकी ईमानदारी के आतंक से आहत है दिल्ली का ये हाल है !

बहुमत माँगा जनता ने दिया भी किंतु भ्रष्टाचार से लेकर गुंडागर्दी  तक कहाँ कुछ काम हुआ केजरीआल जी तुम बातों के आलावा तक लोग बन जाते हैं !



 दिल्ली तो देश की राजधानी है यहाँ कानूनों के पालन पर की है तो बाहर क्या होता होगा ! होंगे किंतु कार्यवाही नहीं होती ! जब ये देश


केजरीवाल जी ! जनता आपको अपनी बात बताए तो कैसे !
आपने गुंडागर्दी मुक्त शासन देने की बात की थी ! आपने जरूरी सुविधाएँ देने की बात की थी किंतु केजरीवाल जी ! और तो सारी  बात छोड़ दीजिए आप केवल इतना बता दीजिए कि आपके राज्य में जनता अपनी समस्याएँ बताए किसे !
  केजरीवाल जी ! दिल्ली में अब भी भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी के विरुद्ध शिकायती पत्र रख तो लिए जाते हैं किंतु कार्यवाही नहीं की जाती है कम्प्लेन शासन  प्रशासन में इतना ज्यादा भ्रष्टाचार है कि गलती
     दिल्ली जैसी जगहों पर भी

Monday, 8 February 2016

दिल्ली सरकार को अब क्यों नहीं दिखाई पड़ते दिल्ली की जनता पर हो रहे अत्याचार !!

    दिल्ली में गुंडागर्दी के बल पर एक बिल्डिंग के लोगों को इतना डराया धमकाया जा रहा हो कि लोग जीवन के जरूरी संसाधनों के बिना घुट घुट कर जी रहे हों !बिल्डिंग छोड़ छोड़ कर जाने पर मजबूर कर दिए जाएँ फिर भी सरकारें अपने स्वच्छ प्रशासन से खुश हों तो बनी रहें ! 
  एक बिल्डिंग की टॉप फ्लोर में रहने वाले सरकारीकर्मचारियों या सोर्सफुल लोगों की गुंडागर्दी से त्रस्त लोग पिछले दो वर्ष से बूँद बूँद पानी के लिए परेशान हैं सामूहिक बिल्डिंग की छत पर रखी टंकियों में मरे चूहे कबूतर बन्दर बिल्ली कुछ भी डाल दी जाती हैं टंकियाँ फाड़ दी गईं मोटरें ख़राब कर दी गईं पाइपों में वो सब कुछ घुसा दिया गया जिससे उसमें पानी का आना जाना न हो सके बिल्डिंग बनने की 18 वर्षों बाद वो कहते हैं कि हमने छत खरीद ली है इसलिए टंकियों में पानी नहीं भरने देंगे इन टॉप फ्लोर वालों में से कोई अपने को पुलिस अफसर बताता है तो कोई शिक्षक तो कोई लोक सभा का कर्मचारी नेता या वकील !कुलमिलाकर अपने अपने कल्पित ओहदे बता बता कर इतना डरा धमका रखा है कि घरों में पिछले एक वर्ष से पानी नहीं है किंतु कोई कम्प्लेन करने को तैयार नहीं है !जिन्होंने 18वर्ष पहले फ्लेट ख़रीदे थे वे अपनी पानी की टंकियाँ लेकर अब कहाँ जाएँ पिछले एक वर्ष से टॉप फ्लोर वालों ने पानी भरना बिलकुल बंद करा दिया है टंकियां रखने के बदले रंगदारी माँगते हैं ये लोग !छत पर जाने आने के रास्ते में ताला लगा दिया है उन लोगों ने !
     इनके अत्याचारों के कारण ही पिछले दो वर्षों से बेस मेंट में पानी भरा है बिल्डिंग कभी भी गिर सकती है !इसी गुंडागर्दी के कारण  बिल्डिंग के मेन  गेट का ताला पूरी रात खुला पड़ा रहता है कोई अपराधी या आतंकवादी वेसमेंट से लेकर कहीं भी कितना भी विस्फोटक रखकर चला कोई रोकने टोकने वाला नहीं होता है ईश्वर न करे कहीं कोई हादसा हो ही जाए तब सभी नेता अफसर मीडिया कर्मी परिक्रमा कर रहे होंगे इस बिल्डिंग की किंतु तब तक कोई देखने सुनने को तैयार नहीं है उचित होता कि कोई सक्षम अधिकारी एक बार जाँच कर लेता और अपने विवेक से निर्णय लेकर दोषियों पर कार्यवाही करता किंतु वो ऐसा करे क्यों जब कोई दुर्घटना घटती है जाँच कमेटियाँ तो उसके बाद ही बनाई जाती हैं और तभी शोभा भी देती हैं !खैर !!
अब बात बिस्तार से -
     k-71,छाछी बिल्डिंगचौक ,कृष्णानगर ,दिल्ली 51 की 'दुग्गल बिल्डिंग' में 16 फ्लैट हैं नीचे के बेस मेंट की तरह ही छत पर सबका समान रूप से आना जाना रहता रहा है !बेस मेंट में सबकी पानी की मोटरें लगी हुई हैं और छत पर सबकी पानी की टंकियाँ सामूहिक रूप से रखी हुई हैं कुछ लोगों ने अपनी अलग अलग भी लगवा रखी हैं । सबके अपने अपने फ्लेट हैं फ्लैटों के अलावा छत ,सीढ़ियाँ,बेसमेंट आदि का उपयोग सभी लोग समान रूप से पिछले 18 वर्षों से करते चले आ रहे थे लगभग पिछले दो वर्ष पहले छत का सामूहिक ताला बिल्डिंग के टॉप फ्लोर के लोगों ने अचानक बदल दिया और जो ताला लगाया गया उसकी चाभी केवल टॉप फ्लोर वालों के पास ही है !टॉप फ्लोर वालों ने अपनी अपनी टंकियां अलग अलग लगा रखी हैं जो अभी भी चालू हैं !
    इन्हीं टॉप फ्लोर वालों के द्वारा पानी की सामूहिक टंकियाँ अब इस स्थिति में पहुँचा दी गईं हैं कि मोटर पाइप टंकियां आदि सारा सिस्टम ही नष्ट भ्रष्ट कर दिया गया है  जबकि हम लोगों के पास छत की ताली नहीं थी हमें देखने तक नहीं जाने दिया गया !टंकियाँ रखने के बदले ये लोग रंगदारी के लिए लोगों से पैसे माँगे जाने लगे कुछ लोगों से पैसे लिए भी गए ! किंतु टंकियाँ  ठीक नहीं कराने दी गईं !लगभग एक वर्ष हो रहा है फ्लैट नं 1, 2,3,4,5,7,8,9,11,12 का पानी इन लोगों के द्वारा बंद कर दिया गया है अब तो पीने वाले पानी से ही सारा काम करना होता है जिस दिन पानी न आवे उस दिन बच्चे स्कूल तक नहीं जा पाते हैं !
    इधर बीते कुछ वर्षों से सामूहिक पानी की टंकियों में कूड़ा कचरा से लेकर मरे हुए कबूतर चूहे बन्दर के बच्चे यहाँ तक कि एक बार मरी बिल्ली पड़ी मिली दो तीन वर्ष पहले तक ऐसा नहीं होता था इससे ये उन लोगों की शरारत लगती है !जब कभी टंकियों में वो लोग गंदगी डालते थे तो कई कई दिन तक उस गंदे पानी का ही कुल्ला करने बर्तन धोने तक में उपयोग हुआ करता रहा है छत की ताली जिनके पास थी मर्जी उनकी जाने दें न जाने दें !और वो लगभग बहुत कम ही जाने देते थे लोगों को डांटकर भगा दिया करते थे कई लोग तो फ्लेट बेचकर भाग गए !
   पिछले लगभग एक वर्ष से सामूहिक मोटरें ख़राब करने से लेकर पाइपों में कंकड़ फँसाने से टंकियाँ  फाड़ने उन्हें खोलकर हटा देने तक के वो सारे उपद्रव किए गए जिससे उन टंकियों में पानी न भरा जा सके !टॉप फ्लोर में रहने वाले राजेंदर शर्मा जो न केवल अपने को 'पुलिसअफसर' कहते हैं अपितु इसी रूप में उन्होंने अपने को प्रचारित भी कर रखा है !वो साफ साफ कहते हैं कि टंकियों में अब किसी को पानी नहीं भरने दिया जाएगा !छत हमने खरीद ली है न केवल इतना उनकी पुलिसिया गाली गलौच मारपीट बड़ी बड़ी प्रशासनिक धमकियों से लोग इतना डरे हुए हैं कि उनके विरुद्ध कहीं कम्प्लेन करने से भी डरते हैं उनका मानना है कि हमारी कही सुनवाई नहीं होगी!
ऐसे ही अत्याचारों से तंग आकर लोगों ने वैध या अवैध रूप में ही सही प्लंबरों से कारर्पोरेशन वाले पानी से स्वयं ही कनेक्सन करवा लिए हैं जो मोटरें  घंटों चलानी पड़ती हैं मोटरों से पानी गिरा करता है जिससे बेसमेंट में पिछले दो वर्षों से पानी भरा है निकालने पर फिर भर जाता है !इससे बिल्डिंग दिनों दिन कमजोर होती चली जा रही है !
मोबाईल टावर से लेकर इस रिहायसी बिल्डिंग में चलने वाले व्यवसायिक कार्यों के कारण अपरिचित लोगों का बिल्डिंग में कभी भी कहीं भी आना जाना बना रहता है वो बेसमेंट से लेकर कहीं भी कुछ भी रख सकते हैं यहाँ तक कि रात में भी बिल्डिंग का मुख्य गेट खुला रहता है बिल्डिंग के बेस मेंट में कोई कहीं भी कितना भी विस्फोटक रखकर चला जाए तो कोई देखने रोकने वाला नहीं होता है !      
छत के एक कोने में लगे मोबाईल टावर से मिलने वाला बिल्डिंग मेंटिनेंस भी टॉप फ्लोर वालों के पास ही होता है वो बिल्डिंग पर खर्च नहीं होता है !या तो उससे बिल्डिंग मेंटिनेंस हो और या फिर छत से टावर हटवाया जाए तो बिल्डिंग वाले खुद अपने खर्चे से करवा लेंगे बिल्डिंग मेंटिनेंस और टावर हटने तथा व्यापारिक गतिविधियाँ घटने से  बिल्डिंग का मुख्यगेट भी बंद होने लगेगा !

दलितों के पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार हैं स्वयं दलित न कि सवर्ण ! जिसके बच्चा न हो दोषी वो या पड़ोसी ?


सवर्णों की जनसंख्या इतनी घटी कैसे इसकी जाँच कराई जाए !
     जिसकी जन संख्या घटेगी उसकी संपत्ति बढ़ेगी है और जिसकी जन संख्या बढ़ेगी उसकी संपत्ति घटेगी ही तो जिन जातियों वर्गों समुदायों में गरीबत का कारण यदि उनकी जनसंख्या की अधिकता है तो इसके लिए सवर्ण कैसे दोषी ! उनकी जनसंख्या सवर्णों ने कैसे बढ़ा दी !हाँ सवर्णों की अपनी जान संख्या घटने के कारण  जरूर हैं राजा राजा लोग आपस में लड़कर मारा करते थे ब्राह्मणों क्षत्रियों के बीच भी बड़े संग्राम हुए !परशुराम का खानदान  क्षत्रियों ने उजाड़ा तो क्षत्रियोंका संहार करके परशुराम ने बदला लिया !तो ब्राह्मण महिषासुर को देवी ने मारा ब्राह्मण वृत्रासुर को भगवान ने मारा उधर ब्राह्मण रावण को श्री राम ने मारा !इस प्रकार से सवर्ण और सवर्ण आपस में भिड़कर अपनी जन संख्या घटाते रहे जबकि लड़ने से डरपोक जिंदगी के लोभी बुड्ढे बुड्ढे लोग लोग सवर्णों के छोटे छोटे बच्चों के पैर छूते  रहे उन्हें मालिक हजूर कह कह कर झाड़ पर चढ़ाते रहे उन्हें समझाते रहे कि जब तक तुम्हारे पिता जी रहे या दादा रहे तब तक हमारा कोई बाल भी बाँका नहीं कर सका !अब तो हम तुम्हारे ही सहारे हैं वो छोटे छोटे बच्चे बेचारे उनकी रक्षा के लिए जूझ जाते रहे ! 
     हर आदमी अपने भाग्य का निर्माता होता है इसलिए दलितों के शोषण का सवर्णों पर झूठा आरोप मढ़ना बंद किया जाए !जो जैसा करेगा वो वैसा भोगेगा !जाति प्रभाव से कम नंबरों पर नौकरी मिलने लगी जिन लोगों ने पढ़ना कम कर दिया ,आरक्षण के लालच में परिश्रम करना कम कर दिया है कि नौकरी तो मिल ही जाएगी !किंतु याद रखिए स्वदेश हो या विदेश क्वालिटी हर किसी को चाहिए यदि आप क्वालिटी दे सकते हैं तो आपकी कमाई के लिए सारा विश्व आँगन की तरह है और जो लोग केवल  जातियों के बलपर तरक्की चाहते हैं उन्हें तरक्की चाहने वाला विश्व का कोई देश बोझ समझता है क्यों घुसने देगा अपने यहाँ !क्योंकि जातिजीवी लोगों के बश का नहीं है कि वे क्वालिटी दे पावें ! जबकि सवर्ण वो चुनौती स्वीकार करेंगे तो उन्हें तरक्की मिलेगी ही  !ऐसे लोग अपनी अयोग्यता क्यों बताना  चाहेंगे वो तो अपने बच्चों से कह देंगे सवर्णों ने हमारा शोषण किया था इसीलिए हम तरक्की नहीं कर पाए !इसी कल्पित शोषण के अन्धविश्वास में अपने बेटा बेटियों को धकिया कर वो तो चले जाएँगे ये सवर्णों को कोसते रह जाएँगे !
    दलितों का शोषण कभी किसी ने किया ही नहीं है इसीलिए शोषण के नहीं मिलते हैं प्रमाण !फिर आरक्षण क्यों ?जनसंख्या बल से कमजोर सवर्णो को दलितों के शोषण का झूठा आरोप लगाकर सताया जा रहा है और रची जा रही है सवर्णों के विरुद्ध आरक्षणी साजिश !   वोटबल से कमजोर सवर्णों का कोई राजनैतिक दल नहीं देना चाहता है साथ !दलितों के शोषण का दुष्प्रचार करके किया जा रहा है सवर्णों के साथ आरक्षण का अत्याचार !   
      वोटबल से कमजोर सवर्णों ने कब किया था दलितों का शोषण कैसे किया था कितना किया था और तब बहुसंख्यक दलितों ने सहा क्यों होगा ?क्यों नहीं किया उसी समय उसका प्रतिकार ? सवर्णों के साथ अब  हो रहा है आरक्षण रूपी अत्याचार !आज कोई भी राजनैतिक दल नहीं देना चाहता सवर्णों का साथ !सच्चाई जानने समझने सुनने को भी कोई तैयार ही नहीं है आखिर क्यों ?
     सवर्णों के पूर्वज जब मार डाले गए जिससे सवर्णों की संख्या घट गई इसीलिए उनकी संपत्ति बढ़ना स्वाभाविक ही था अन्यथा जब चारों वर्ण समान थे और चारो वर्णों की जनसंख्या भी तो समान रही होगी किन्तु  सवर्णों की जन संख्या इतनी कम क्यों और कैसे घट गई !इसकी चिंता किसी को क्यों नहीं है किंतु सवर्णों की संपत्ति बढ़ने पर छाती कूट रहे हैं राजनैतिक लोग आखिर क्यों ?दलितों को खुश करने के लिए दे रहे हैं सवर्णों को गालियाँ !
  महान जाति वैज्ञानिक महर्षि मनु ने दलित नाम की किसी जाति का वर्णन ही नहीं किया है आखिर तब उसका शोषण कैसे हो गया ?
   यदि दलित शब्द का अर्थ दबा, कुचला टुकड़ा,भाग,खंड आदि होता है तो किसी वर्ण को दलित कहने के पीछे मंसा आखिर क्या थी ?आखिर क्या कभी है इनमें !क्या वो लाचार हैं, अपाहिज हैं, विकलांग हैं या वो परिश्रमी वर्ग  परिश्रम पूर्वक कमाई करके अपने  बच्चे नहीं पाल सकता है  क्या  ?
  सवर्णों पर दलितों के शोषण का आरोप लगाना कहाँ तक उचित है !सवर्णों ने यदि शोषण किया होता तो उनके  होना चाहिए था धन !किंतु आज वो भी तो नौकरी मेहनत मजदूरी करते घूम रहे हैं !इससे इंकार कैसे किया जा सकता है ?
      दलितों की किस समस्या का समाधान है आरक्षण ?
  वेद न पढ़ पाने के कारण यदि ये गरीब रह गए तो वेद पढ़ाइए किंतु आरक्षण क्यों ? 
   यदि वेद न पढ़ने देने के कारण वे तथाकथित दलित रह गए तो आरक्षण क्यों ?इन्हें वेद  पढ़ने की सुविधा मुहैया करानी चाहिए आखिर वे भी कश्यप ऋषि की संताने हैं उन्हें वेद पढ़ना ही  चाहिए किन्तु आरक्षण का लोभ क्यों ?
यदि अछूत माने जाने के कारण ये लोग दलित हैं तो अब सवर्णों को अछूत घोषित करके उनके साथ बंद कर देना चाहिए रोटी बेटी के सम्बन्ध किन्तु आरक्षण क्यों ?
    अछूत माने जाने के कारण यदि वो तथाकथित दलित पीछे रह गए तो आरक्षण क्यों ?उन्हें अब  सवर्णों को अछूत घोषित करके उनसे रोटी बेटी का सम्बन्ध रोक देना चाहिए। आखिर अछूत घोषित किए जाने जैसे अपमान को  आरक्षण रूपी लालच में क्यों सह जाना ?
यदि दलित लोग पहले तपस्या नहीं कर पाए इसलिए दलित हैं तो अब करें न तपस्या !अब आखिर कौन रोक रहा हैं उन्हें !किन्तु आरक्षण क्यों ? 
   इस युग में तो वो तपस्या भी कर सकते हैं अब तो कानून का राज है।अब उन्हें कौन रोक सकता है?किन्तु आरक्षण क्यों ?
  पहले यदि इन्हें व्यापार नहीं करने दिया गया तो अब करें न व्यापार !बनियों ने व्यापार करके अपने को आगे बढ़ाया यदि कोई और भी करता तो उस पर क्या रोक लगी थी ?कुलमिलाकर अब कर लें व्यापार किंतु आरक्षण क्यों ?
  दलितों की राजनीति करने वाले नेताओं की आय के अपने स्रोत क्या हैं आखिर कहाँ से इकट्ठा हो रही है उनके पास करोड़ों अरबों की माया ?
   दलितों के समर्थन के नाम पर ही तो सवर्णों को गाली दे देकर अपनी नेतागिरी चमकाने वाले लोग  आज अरबों रूपए के घोटाले किए घूम रहे हैं जो करोड़ों में बताए जाते हैं।दलितों के नाम पर लिए गए  पैसे पर स्वयं तो ऐय्यासी करते घूमेंगे और दलितों को खुश करने के लिए सवर्णों को गाली देंगे आखिर ऐसे लोगों के अपने आय के श्रोत क्या हैं ?
     सरकार चाहे तो ऐसी नीतियाँ बनावे जिनका लाभअपने को गरीब समझने वाला हर व्यक्ति ले सके।किसी के मस्तक पर दलित या दरिद्र  लिखकर किसी का अपमान क्यों करना ?हो सकता है कोई अभी गरीब हो कुछ दिन बाद उसका काम चल निकले उसकी आर्थिक स्थिति ठीक हो जाए तो उसके मस्तक पर हमेंशा के लिए दलित या दरिद्र क्यों लिखना ?इस तथाकथित दलित वर्ग के बहुत लोगों ने आरक्षण का लाभ लिये बिना भी अपनी आर्थिक स्थिति परिश्रम पूर्वक सुधारी है वो गर्व से जीवन यापन करते हैं।उन्होंने दालित्य की खाल को उतार कर फेंक दिया है।उन्हें किसी की कृपा पर नहीं अपने परिश्रम पर भरोसा होता है। 
     आखिर गरीब सवर्ण भी अपनी मेहनत की कमाई से ही बच्चे पालते हैं ।उन बच्चों में अपने माता पिता के संघर्ष का स्वाभिमान होता है जिसके बल पर वे आगे बढ़ते हैं।सवर्णों में भी कुछ लोग ऐसे भी हैं जो संघर्ष नहीं करना चाहते वो बेशक दलित न कहे जाते हों किन्तु हालात उनके भी बहुत खराब हैं।कुछ लोग संघर्ष करके भी सफल नहीं हो पाते हैं उसमें वो भाग्य को कोसते हैं जबकि अन्य लोग सवर्णों को कोस कर सुख पाने का असफल प्रयास करते हैं।माना कि तथाकथित दलितों की अपेक्षा कुछ प्रतिशत अधिक लोग सवर्णों में सम्पन्न होगें किन्तु इसका मतलब यह भी नहीं है कि सारे सवर्ण  सम्पन्न ही हैं।ऐसा भी नहीं है कि सवर्णों का सम्पन्न वर्ग गरीब सवर्णों की कोई मासिक या अन्य प्रकार से कोई आर्थिक सहायता करता हो।     
     1947 में देश आजाद हुआ उसके पहले सैकड़ों वर्ष तक देश गुलाम रहा तो उन आक्रांताओं ने सवर्णों को कोई अतिरिक्त आर्थिक सहायता राशि नहीं दी थी जो तथाकथित दलितों को न मिली हो जिससे वे दलित हो गए।
            दलित शब्द का अर्थ क्या होता है ये जानने के लिए मैंने शब्दकोश देखा जिसमें टुकड़ा,भाग,खंड,आदि अर्थ दलित शब्द के  किए गए हैं।मूल शब्द दल से दलित शब्द बना है।मैं कह सकता हूँ कि टुकड़ा,भाग,खंड,आदि शब्दों का प्रयोग कोई किसी मनुष्य के लिए क्यों करेगा?इसके बाद दल का दूसरा अर्थ समूह भी होता है।जैसे कोई भी राजनैतिक या गैर राजनैतिक दल, इन दलों में रहने वाले लोग दलित कहे जा सकते हैं।इसी दल शब्द से ही दाल  बना है।चना, अरहर आदि दानों के दल बना दिए जाते हैं जिन्हें दाल कहा जाता है।इस प्रकार दलित शब्द के टुकड़े,भाग,खंड,आदि और कितने भी अर्थ निकाले जाएँ  किंतु दलित शब्द का अर्थ दरिद्र या गरीब नहीं हो सकता है।
  राजनैतिक साजिश के तहत यदि इस शब्द का अर्थ अशिक्षित,पीड़ित,दबा,कुचला आदि  करके ही कोई राजनैतिक लाभ लेना चाहे तो यह शब्द ही बदलना पड़ेगा,क्योंकि इस शब्द का अर्थ शोषित,पीड़ित,दबा,कुचला आदि करने पर यह ध्यान देना होगा कि इसमें जिन जिन प्रकारों का वर्णन है वो सब कोई अपने आप से भले बना हो किंतु किसी के दलित बनने में किसी और का दोष  कैसे हो सकता है?यदि किसी और ने किसी का शोषण करके उसे दलित बनाया होता तो दलित की जगह दालित होता।जब बनाने वाला कोई और होता है तो आदि अच की वृद्धि होकर जैसे चना, अरहर आदि दानों के दल बना दिए जाते हैं जिन्हें दाल कहा जाता है क्योंकि चना आदि यदि चाहें भी कि वे अपने आप से दाल बन जाएँ  तो नहीं बन सकते।जैसेः- तिल से बनने के कारण उसे तैल कहा जाता है।बाकी सारे तैलों का तो नाम रख लिया गया है तैल तो केवल तिल से ही पैदा हो सकता है।ऐसे ही वसुदेव के पुत्र होने के कारण ही तो वासुदेव कहे गए। इसी प्रकार दलित की जगह दालित होता। चूँकि शब्द दलित है इसलिए किसी और का इसमें क्या दोष ?वैसे भी किसी ने क्या सोच कर दलित कहा है यह तो वही जाने किंतु इस ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि  में कम से कम हम तो किसी को दलित नहीं कह सकते ऐसा कहना तो उस ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि का अपमान है।
    आज दलित साहित्य या साहित्यकार,दलित विधायक ,दलित संसद ,दलित मंत्री ,दलितमुख्य मंत्री,दलित प्रधान मंत्री आदि कहा जाने लगा है तो दलित शब्द का अर्थ दबा कुचला शोषित पीड़ित नहीं है क्या ?क्योंकि मुख्य मंत्री,गृहमंत्री,प्रधान मंत्री आदि यदि स्वयं दलितअर्थात  दबे  कुचले  शोषित पीड़ित आदि कहेंगे तो देश उनसे क्या आशा करे ?और क्या वे विदेशों के ही महान मंचों पर देश का पक्ष गौरवान्वित कर पाएँगे ? क्या हमेशा से हमारे प्रति उपेक्षा का भाव रखने वाला  पश्चिमी जगत मौका मिलने पर इस बात के लिए चूक जाएगा ?क्या वह  कह सकता है कि तुम तो खुद दबे  कुचले  शोषित पीड़ित हो तुमसे क्या आशा?कैसे निपटोगे आतंकवाद से?तुम तो आतंकवादियों को सजा होने पर भी कठोर दंड देने से डरते हो । 
    इस लिए  हमारा इस देश के नीति नियामकों से निवेदन है कि दलित और अल्प संख्यक जैसे मनोबल गिराने वाले शब्दों का प्रयोग करने से न केवल बचना चाहिए अपितु देश के हर नागरिक को यह विश्वास दिलाया जाना चाहिए कि सारा देश आपका है और आप सारे देश के हैं ।
  हम जाति, क्षेत्र,समुदाय,संप्रदाय ,लिंग आदि के नामपर यदि भेद भाव करते ही रहे तो स्वस्थ समाज की परिकल्पना कैसे की जा सकती है ?
    क्या तभी नियम नहीं बना दिया जाना चाहिए था कि किसी के गुण दोषों का मूल्यांकन जाति, क्षेत्र ,समुदाय,संप्रदायवाद आदि के नाम पर करना दंडनीय अपराध होगा और किसी भी प्रकार के आरक्षण या  सुविधा की पात्रता भी जाति, क्षेत्र ,समुदाय,संप्रदाय आदि के आधार पर न मानी जाए !वोट बल से कमजोर सवर्णों का पक्ष कोई राजनैतिक दल आखिर  क्यों ले ?क्यों मुद्दा उठावे कोई पत्रकार?आखिर देश के लिए समान रूप समर्पित सभी वर्गों के लिए सरकार द्वारा किसी भी प्रकार की  सुविधा या सहयोग प्रदान करते समय प्रजा प्रजा में भेद भाव नहीं किया जाना चाहिए !आज सवर्ण किसे मानें अपना प्रशासक और किससे कहें अपनी समस्याएँ आखिर उन पर यह आरोप पहले ही मढ़ दिया गया है कि उन्होंने दलितों का शोषण किया था।आखिर इस शोषण के आरोप का सच या आधार  क्या है ? 
     मैं निजी तौर पर भारत वर्ष के किसी भी नर नारी को दलित या अछूत मानने को तैयार नहीं हूँ हर देशमें गरीब और अमीर दो प्रकार का वर्गीकरण तो दिखाई पड़ता है और उचित भी यही है। इसमें यह दलित जैसा  नाम करण  कुछ उन लोगों के द्वारा किया गया जिनको बिना कुछ परिश्रम किए धरे इससे कुछ लाभ की लालषा या लालच होगा।जिसे अपनी कमाई एवं परिश्रम का भरोसा होगा वह दलित बनना ही क्यों पसंद करेगा?कोई सम्मान प्रिय व्यक्ति सारी  समाज में अपना गौरव क्यों गिराएगा।अपने हाथ पैर आदि स्वास्थ्य सुरक्षित रहते हुए अपने दुलारे प्यारे बच्चों को कोई दलित अर्थात कुचला-कुचला,खंड-खंड कहलाना कोई क्यों पसंद करेगा?कोई जो देता हो वो रख ले किन्तु ईश्वर न किसी के प्रिय बच्चों को ऐसे अशुभ शब्दों का संबोधन मिले ऐसा कम से कम मैं तो कभी नहीं चाहूँगा और न ही किसी को दलित कहूँगा न दलित मानूँगा ही अपितु वो किस मजबूरी में दलित कहलाते हैं वो मजबूरी दूर करने का प्रयास करूँगा ।ईश्वर कृपा करे तो बहुत जल्दी मैं वह करके दिखा भी दूँगा।कुछ दिन की पवित्र प्रेरणा से न केवल दालित्य समाप्त होगा अपितु मनोबल बढ़ाकर मुख्य धारा में सम्मिलित कर लूँगा मुझे विश्वास है क्योंकि मैं छोटे पैमाने पर यह  कर के देख भी चुका हूँ ।
      अधिक  से अधिक एक पीढ़ी के पंद्रह-बीस वर्षों की शिक्षा एवं सही दिशा के रोजगार में  परिश्रम करने से  हर किसी आने वाली पीढ़ियों के जन्म जन्मान्तर का दालित्य छुटा सकती है।अच्छे अच्छे लोग सम्मानित समझेंगे । इसीप्रकार आने वाली पीढियाँ सुधरती चली जाएँगी ।
    पंद्रह-बीस वर्षों के परिश्रम कहने  आशय शिक्षा काल सुधारने की बात है अगर कोई नेता खूँटा नेक नीयत से इतना प्रेरित करने या इसमें सहयोग करने को तैयार हो जाए तो गरीबत घट या मिट सकती है।यह मेरी  कोई खोज या उपलब्धि नहीं है ये सबको पता है किन्तु ये लोग सोचते हैं कि शिक्षा के लिए प्रेरित करने से ये सब आगे बढ़ जाएँगे अपना लाभ क्या होगा?
      परिश्रम इन नेताओं के बश का नहीं है और न ही देश को आगे ले जाने की  ही कोई ठोस योजना है ऐसे नेताओं की ईच्छा केवल इतनी है कि अन्य नेताओं के भ्रष्टाचार में हमें भी बराबर की भागीदारी मिले।आखिर ये भ्रष्टाचार समाप्त करने की नियत क्यों नहीं है? मैं तो कहता हूँ कि सभी जाति,क्षेत्र ,समुदाय ,संप्रदाय के नेताओं  की राजनीति में आने से पहले से अभी तक की संचित संपत्ति के आय श्रोतों की जाँच ईमानदारी पूर्वक गरीब जनता के द्वारा करवाई  जानी चाहिए या  दलित बंधुओं के द्वारा ही करा ली जाए किन्तु वे गरीब हों ताकि गरीबों की पीड़ा समझने वाले हों। जाति, क्षेत्र ,समुदाय ,संप्रदाय  का  भेदभाव  किए  बिना वे लोग चिन्हित किए जाने चाहिए ताकि उनका  सामाजिक बहिष्कार किया जा सके और ईमानदार राजनेताओं के साथ साथ हर जाति, क्षेत्र ,समुदाय ,संप्रदाय के संघर्षप्रिय ईमानदार आम आदमी की भी पहचान हो सके । किसी पद या पैसे के लोलुप औरों का हिस्सा हड़पने वाले कुछ राजनैतिक भेड़ियों  के द्वारा  खुले मंचों से जातिगत शोषण के नामपर किसी जाति विशेष के लोगों को गाली देना कितना न्यायोचित था  ?
    इनसे तत्तद जाति, क्षेत्र ,समुदाय,संप्रदाय के भले और ईमानदार कर्मनिष्ठ लोगों पर क्या बीतती है इसका एहसास मुझे है चूँकि मैंने न केवल इस पीड़ा को भोगा है अपितु चार विषय से एम.ए.एवं पी.एच.डी. करने के बाद जब ऐसी ही गालियों एवं शोषण के आरोपों से आहत होकर सरकार से आजीवन नौकरी न माँगने का व्रत लिया था और आज तक बेशक भटक रहा हूँ किन्तु किसी भी सरकारी या  निजी सेवा के प्रपत्र पर कभी हस्ताक्षर नहीं किए हैं, मैं संघर्ष पूर्वक उसी व्रत का पालन अभी भी कर रहा हूँ ।
      इसी विषय में पढ़िए हमारा ये लेख भी -
दलित भी सवर्णों की तरह ही अपने बल पर कर सकते हैं तरक्की !आखिर क्यों बदनाम किया जा रहा है उन्हें ! कि वे आरक्षण के बिना कुछ कर ही नहीं सकते !
दलितों की मदद का कारोबार करने वाले नेता आज अरबोंपति हो गए आखिर क्या हैं उनकी आय के स्रोत ?और कहाँ से इकठ्ठा की है इतनी अकूत संपत्ति ?

शिक्षकों पर भी ड्रेस कोड लागू किया जाए !

 स्कूलों में शिक्षकों का पहला कर्तव्य शिक्षा देना है क्या ये लागू करवा पाए आप !
     निगम प्रतिभा स्कूलों तक में केवल खाना पूर्ति होने लगी है शिक्षा में सुधार ! केवल इतना हुआ है कि जिस दिन आप या आपके मंत्री संत्री लोग जिस स्कूल में फोटो खिंचवाने जाते हैं वहाँ के शिक्षक सज सँवर कर हाथ बाँधकर निरीह प्राणियों की भाँति उन्हें घेर कर खड़े हो जाते हैं उनके आस पास !आपके लोग ऊंची आवाज में गरज लेते हैं और वो धीमी आवाज में उत्तर दे देते हैं ! आप और आपके लोग तो इससे खुश हैं किंतु इससे जनता का क्या लाभ हुआ ?

           
 शिक्षकों की जाँच जरूरी है किंतु करेगा कौन और हो कैसे ?
शिक्षक जो विषय पढ़ाने के लिए रखे गए हैं वो विषय उन्हें आता है क्या ?दूसरी बात पढ़े लिखे शिक्षकों को भी पढ़ाना आता है क्या ?तीसरी बात शिक्षक क्लास से कितनी देर कितने दिन अनुपस्थित रहते हैं इसका लेखा जोखा रखने वाले प्रधानाचार्यों पर इतना विशवास कैसे कर लिया जाए कि वे सच बोलते होंगे !आदतें तो उनकी भी पुरानी वाली ही पड़ी हैं वो भी विद्यार्थियों की अपेक्षा अपने जूनियर्स का साथ देते हैं ऐसी परिस्थिति में स्कूलों में बच्चों का कौन होता है ?

      शिक्षकों पर भी ड्रेस कोड  लागू किया जाए !
    स्कूल टाईम में शिक्षक घर को छोड़कर जहाँ भी रहें या जाएँ यदि स्कूल में उस दिन की छुट्टी की एप्लीकेशन नहीं लगी है तो ड्रेस में ही जाएँ !जो शिक्षक स्कूल टाइम में बहाने बना बना कर मार्केटिंग आदि करते रहते हैं या घर के अन्य जरूरी काम निपटाते रहते हैं या कुछ युवा शिक्षक शिक्षिकाएँ अपने प्रधानाचार्य को विश्वास में लेकर लव अफेयर आदि के लिए घंटे दो घंटे के लिए किसी बहाने से निकल जाते हैं पार्कों या एकांतिक स्थलों में ऐसे सभी गैर जिम्मेदार लोगों की पहचान हो सके !साथ ही समाज को इस बात के लिए जागरूक किया जाए कि वो शिक्षा में सहयोग करने के लिए ऐसे लोगों की फोटो खींच कर सरकार को भेजे और सरकार ऐसे लोगों की पहचान करके न केवल ऐसे लोगों पर कार्यवाही करे अपितु क्या कुछ हुआ इसकी सूचना बेबसाइट पर भी दे !

कक्षा में शिक्षकों की लापरवाही रोकने के लिए !बनाया जाए एक सतर्कता विभाग !
   कुछ शिक्षक आदतन कक्षाओं में लेट पहुँचते हैं और जल्दी कक्षा छोड़कर निकल आते हैं या कक्षाओं में पहुँचकर इधर उधर की बातें करके बच्चों का मनोरंजन किया करते हैं और चले  आते हैं ,कुछ तो बच्चों को कुछ सरल सा काम देकर अपने मोबाइलों में ही लगे रहते हैं कुछ शिक्षक जिम्मेदारी पूर्वक ठीक से पढ़ाते नहीं हैं या जल्दी जल्दी पढ़ाकर लग जाते हैं मोबाईल आदि के द्वारा अपने निजी कार्यों में !कुछ शिक्षक बच्चों के सामने ही कक्षाओं में  कुछ खाने लगते हैं और भी जो करते हों ऐसे सभी प्रकार के लापरवाह शिक्षकों पर सरकार चाहकर भी अपने संसाधनों से बहुत धन खर्च करके भी निगरानी नहीं कर सकती है !इसलिए यह मानकर कि ऐसे लोगों की लापरवाही का सबसे बड़ा गवाह होता है विद्यार्थी !एक मात्र वही भुक्तभोगी होता है और उसी का भविष्य दाँव पर लगा होता है इसलिए उसे काम से काम इतने अधिकार दिए जाएँ कि वो ऐसी लापरवाहियों के निजी तौर पर आडियो वीडियो आदि बनाकर  सरकारी सतर्कता विभाग को गुप्त रूप से भेज सके ताकि उसकी पहचान प्रकट न हो ! सरकार का विभाग उस पर कार्यवाही करे और उसकी सूचना शिकायती आडियो वीडिया सहित अपनी वेवसाइट पर डाले !इसमें सरकार का कोई खर्च भी नहीं लगेगा और न कोई चेकिंग आदि !

स्कूलों में या कक्षाओं इन कुछ बच्चे नशे का लेन  देन क्रय विक्रय आदि करने लगते हैं ,गाली गलौच या शोर शराबा आदि करते हैं या अपने से छोटों कमजोरों या लड़कियों को तंग करने लगते हैं या कक्षा के अलावा स्कूल में ही कोई ऐसी असमाजिक गतिविधि होने लगती है अक्सर  गंदगी आदि रहती है ऐसी सभी बुराइयों को रोकने की जिम्मेदारी सौंपी जाए छोटे बड़े सभी प्रकार के छात्रों को और उसी का भविष्य दाँव पर लगा होता है इसलिए उसे कम से कम इतने अधिकार दिए जाएँ कि वो ऐसी लापरवाहियों के निजी तौर पर आडियो वीडियो आदि बनाकर  सरकारी सतर्कता विभाग को गुप्त रूप से भेज सके ताकि उसकी पहचान प्रकट न हो ! सरकार का विभाग उस पर ईमानदारी पूर्वक कार्यवाही करे और उसकी सूचना शिकायती आडियो वीडिया सहित अपनी वेवसाइट पर डाले कि किस शिकायत पर क्या हुआ ?जिससे जनता में जागरूकता बढ़े इसमें सरकार का कोई खर्च भी नहीं लगेगा !

Tuesday, 2 February 2016

आड इवेन फार्मूले से दिल्ली के प्रदूषण का लेवल इतना अधिक घट गया था कि अचानक कूड़ा फैलवाना पड़ा !दिल्ली सरकार बहुत दयालू है!!

    "कूड़ाफेस्टिवल " भाई !बड़ा प्रभावी है आड  इवेन फार्मूला ! देखिए प्रदूषण बढ़ने पर दिल्ली सरकार ने आड  इवेन फार्मूला चलाया था और अब प्रदूषण घटते ही मनाया जा रहा है "कूड़ाफेस्टिवल "!
    विरोधी कहते हैं सरकार कुछ करती नहीं है अरे !अभी तो कूड़ा फैलाने का बजट पास कराया जायेगा फिर कूड़ा हटाने का बजट पास होगा फिर कूड़ा फैलाने और हटाने का जश्न मनाया जाएगा तभी तो किया जाता है स्याही संस्कार बारी दिल्ली सरकार !
   इस "कूड़ाफेस्टिवल " में सफाईकर्मियों ने भी  पूरी ताकत झोंक रखी है जगह जगह सजाए गए हैं कूड़े के अंबार ! 'आप' के वालेंटियरों से लेकर मंत्रियों तक  को लगाया गया है कूड़े के काम में !मीडिया तो कूड़ा कूड़ा कर रहा है ! 
    दिल्लीसरकार धूमधाम से मना रही है "कूड़ाफेस्टिवल " उधर केजरीवाल जी खाँसी सेलिब्रेट करने गए हैं बैंगलोर ! केजरीवाल जी जिस महीने ज्यादा झूठ बोल जाते हैं उसी महीने खाँसी जोर पकड़ जाती है उनकी खाँसी !
     बंधुओ ! दिल्ली का काम प्रदूषण के बिना चल ही नहीं सकता !आड  इवेन फार्मूले से प्रदूषण का लेवल इतना अधिक घट गया कि अचानक बढ़ाना आवश्यक हो गया और दिल्ली की गली गली में कूड़ा फैलवाना पड़ा !बारी  शुभ चिंतक दिल्लीसरकार !उधर दिल्ली सरकार की खाँसी अचानक जोर पकड़ गई और  सरकार  कीआत्मा को अचानक जाना पड़ा बैंगलोर !बैंगलोर जाना कोई बुरी बात नहीं है किंतु पिछली बार केजरीवाल जी जब खाँसी ठीक करवाकर आए थे बैंगलोर से तभी हुआ था "योगेंद्रकांड" अबकी किसपर बीतेगी ये बैंगलोर यात्रा भगवान ही जाने !
     इस सारी दुनियाँ दारी से दूर दिल्लीनरेश बैंगलोर  में ले रहे हैं खाँसी का आनंद ! उधर बैंगलोर में दिल्ली नरेश को नहाना धोना उठना बैठना बोलना चालना सिखाया जा रहा होगा !लोगों पर झूठे आरोप लगाने के दोष गिनाए जा रहे होंगे दिल्ली की जनता के धन का विधायकों की सैलरी और विज्ञापनों में दुरूपयोग करने को रोका जा रहा होगा !खाना पीना सोना जागना आदि सब कुछ करने के लिए संयम से लेकर सात्विकता तक के उन्हें गंभीर  पाठ पढ़ाए जा रहे होंगे !इस प्रकार से सारा आचार व्यवहार संस्कार शिष्टाचार आदि सिखाया जा रहा होगा !ऐसी ही योगिक क्रियाओं से उनकी मन वाणी आत्मा आदि का शुद्धीकरण होते ही पापों का प्रायश्चित्त हो जाता है इस प्रकार से दिल्ली नरेश जी का शरीर पापमुक्त होते ही  स्वतः भाग  जाती हैं खाँसी जैसी सारी आधियाँ ब्याधियाँ !       
    बंधुओ ! कभी आपने सोचा है कि सारे देश के लोग इलाज कराने दिल्ली आते हैं किंतु दिल्ली के मुख्यमंत्री खाँसी ठीक करवाने बैंगलोर
क्यों जाते हैं !क्या वहाँ इलाज की व्यवस्था दिल्ली से अधिक अच्छी है और यदि ये सच है तो चिकित्सा की वैसी व्यवस्था दिल्ली में क्यों नहीं की जा सकती जैसी बैंगलोर में है यही प्रश्न तब उठता था जब सोनियाँ जी इलाज कराने विदेश जाया करती थीं किंतु न जाने क्यों सत्ता और सरकार मिलने के बाद बीमारियाँ बढ़ती भी हैं !
   पिछली बार जब केजरीवाल जी खाँसी ठीक करवाकर आए थे तभी हुआ था "योगेंद्रकांड" अबकी किसपर बीतेगी ये बैंगलोर यात्रा भगवान ही जाने !