भाग्य से ज्यादा और समय से पहले किसी को न सफलता मिलती है और न ही सुख ! विवाह, विद्या ,मकान, दुकान ,व्यापार, परिवार, पद, प्रतिष्ठा,संतान आदि का सुख हर कोई अच्छा से अच्छा चाहता है किंतु मिलता उसे उतना ही है जितना उसके भाग्य में होता है और तभी मिलता है जब जो सुख मिलने का समय आता है अन्यथा कितना भी प्रयास करे सफलता नहीं मिलती है ! ऋतुएँ भी समय से ही फल देती हैं इसलिए अपने भाग्य और समय की सही जानकारी प्रत्येक व्यक्ति को रखनी चाहिए |एक बार अवश्य देखिए -http://www.drsnvajpayee.com/
Thursday, 13 February 2014
Wednesday, 5 February 2014
सपा सरकार की मौज ही मौज!पहले सैफई महोत्सव फिर भैंसों की खोज !
आखिर कब जागेगी उत्तर प्रदेश की जनता और सरकार से माँगेगी अपने धन का हिसाब एवं लेगी ऐसी सरकारों से अपने अपमान का बदला ?
क्या मुलायम सिंह को बनना चाहिए प्रधानमंत्री ? किन्तु जिन पर प्रदेश की जनता ने भरोसा किया और वे उसके नहीं हो सके तो देश उन पर भरोसा कैसे करे ?
सरकारों में बैठे लोगों को क्या जनता के प्रति इतना भी जवाबदेय नहीं होना चाहिए ! आखिर क्यों उन्हें इस बात का संकोच नहीं होना चाहिए कि वो जो कर रहे हैं उसका असर उस जनता पर क्या पड़ेगा जिसने उन्हें सत्ता सौंपी है !केवल सैफई वालों के वोट से तो वे मुख्यमंत्री बन नहीं गए! ऐसा भी नहीं है कि केवल आजम खान को खुश करना ही सरकार का केवल लक्ष्य हो !
मुलायम सिंह जी को समझना चाहिए कि अगर आप वास्तव में समाजवादी हैं तो आपका समाजवाद इतना संकीर्ण क्यों है जो आपको परिवारवादी ,जातिवादी ,सैफईवादी बना देता है और कभी कदाचित मुश्किल से आप यदि इन दीवारों से बाहर निकले भी तो आपको पार्टीवादी बना देता है।आखिर क्या कारण है कि आप प्रदेश और देशवादी नहीं बन पाए !मान्यवर !क्या यही आपका समाजवाद है क्या मुख्यमंत्री बनने की आपकी यही योग्यता है इसी के बल पर बनना चाहते हैं प्रधानमंत्री !
काँग्रेस की कमजोरी ,भाजपा की कलह,बसपा की संकीर्णता से ऊभ चुकी प्रदेश की जनता ने अपना समझ कर आपको सत्ता सौंपी थी किन्तु आप उस जनता के अपने नहीं हो सके मात्र कुछ लोगों के होकर रह गए !कितना बुरा तब लगता है जब उत्तर प्रदेश की सरकारी मशीनरी कोई काम न करके अपितु किसी परेशान व्यक्ति की मदद नहीं कर रही होती है और वह निराश हताश आदमी उस जिले के डी.एम.को लिखित अप्लिकेशन देता है महीनों बीत जाने पर भी जब कोई सुनवाई नहीं होती है तो दुबारा वो जब डी.एम. के यहाँ जाता है तो उनका पी.ए. उस प्रार्थी के कान में कहता है कि इस समय साहब किसी और का कोई काम नहीं सुन रहे हैं केवल मुलायम सिंह जी के घर और पार्टी वालों की ही बात सुनते हैं और उन्हीं का काम करते हैं बाक़ी किसी की नहीं! वो कहते है कि जब चलनी ही सपा की और उनके लोगों की है तो पंगा लेकर अपनी बेइज्जती क्यों करवाना !यह सुनकर निराश हताश प्रार्थी वहाँ से वापस लौट आता है। ये कोई कल्पना नहीं अपितु वास्तविक घटना है।
ऐसे ही अन्य प्रश्न भी हैं धन तो पूरे प्रदेश की जनता का खर्च हो किन्तु महोत्सव सैफई में हो आखिर क्यों ?क्योंकि सैफई नेता जी की है तो बाकी प्रदेश किसका है और वहाँ का मुख्यमंत्री क्या कोई दूसरा है ?
इसीप्रकार से किसी का बेटा बेटी अपहृत हो जाता या और कोई नुक्सान हो जाता तो भी प्रशासन इतना ही मुस्तैद होता क्या?जितना भैंसें खोजने में था उन भैंसों को खोजने के लिए क्या कुछ नहीं किया गया फिर भी बेचारे पुलिस वाले …!
आजम की भैंसों की तलाश के लिए पुलिस की चार टीमों का गठन किया गया.खोजी कुत्ते, क्राइम ब्रांच और पुलिसकर्मियों ने कई बूचड़खानों और मांस की दुकानों पर छापेमारी की. पड़ोस के कई जिलों में सर्च ऑपरेशन चलाया गया.और भैंसें मिल गईं ।
इससे सिद्ध भी यही होता है कि ये सरकार सपा और केवल सपा के लोगों के लिए ही है उसके अलावा सारा प्रदेश जाए जहन्नुम में !इससे एक बात और सिद्ध होती है कि यदि प्रयास पूर्वक भैंसे खोजी जा सकती हैं तो और अपराधी क्यों नहीं !इसका सीधा सा अर्थ है कि जो अपराध सपा के छोटे बड़े सभी कार्यकर्ताओं के विरुद्ध होगा वो तो अपराध माना जाएगा और उसी को रोकने का भी प्रयास होगा बाकी लोग परेशान रहें तो रहें ये सरकार तो सपाइयों की है सपाइयों की ही रहेगी, प्रदेश वा देश की जनता का इससे क्या लेना देना !
Tuesday, 4 February 2014
भ्रष्टाचार के स्रोत क्या हैं और इसे समाप्त कैसे किया जा सकता है ?
जाति देखकर जब गरीबत नहीं आती है तो जाति के आधार पर आरक्षण या अन्य सुविधाएँ क्यों दी जाती हैं ?
जब जाति क्षेत्र सम्प्रदाय आदि देखकर गरीबत या कोई विपत्ति नहीं आती है तो इनके आधार पर आरक्षण क्यों दिया जाता है ?
सरकार के हर विभाग में भ्रष्टाचार व्याप्त है उससे छोटे से बड़े तक
अधिकांश कर्मचारी लाभान्वित होते हैं इसलिए उन पर भ्रष्टाचार की जो
विभागीय जाँच होती है वहाँ क्लीन चिट मिलनी ही होती है क्योंकि यदि नहीं
मिली तो उसके तार उन तक जुड़े निकल सकते हैं जो जाँच करsee
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दलितों के लिए आरक्षण या सम्मान?दोनों किसी को नहीं मिलते !
दलित शब्द का अर्थ कहीं दरिद्र या गरीब तो नहीं है ?
समाज के एक परिश्रमी वर्ग का नाम पहले तो दलित अर्थात दबा, कुचला टुकड़ा,भाग,खंड आदि रखने की साजिश हुई। ऐसे अशुभ सूचक नाम कहीं मनुष्यों के होने चाहिए क्या? वो भी भारत वर्ष की जनसंख्या के बहुत बड़े वर्ग को दलितsee more...http://snvajpayee.blogspot.in/2013/03/blog-post_2716.html
आरक्षण बचाओ संघर्ष आखिर क्या है ? और किससे ?
4 घंटे अधिक काम करने का ड्रामा !
आरक्षणबचाओसंघर्ष या बुद्धुओं को बुद्धिमान बताने का संघर्ष आखिर क्या है ?ये संघर्ष उससे है जिसका हिस्सा हथियाने की तैयारी है।ये अत्यंत निंदनीय है !
जिसमें चार घंटे अधिक काम करने की हिम्मत होगी वो आरक्षण
माँगेगा ही क्यों ?उसे अपनी कमाई और योग्यता का भरोसा होगा किसी और की
कमाई की ओर देखना ही क्यों? आरक्षण इससे ज्यादा कुछ है भी नहीं !
चूँकि राजनैतिक दलों को पता है कि देश में आरक्षण समर्थकों के वोट अधिक हैं औरsee more...http://snvajpayee.blogspot.in/2012/12/blog-post_3571.html
यदि ऐसा है तो जाति देखकर आरक्षण क्यों दिया जाता है क्या आप गरीबों के सहयोग के लिए कोई जाति बिहीन नीति बनाएँगे ?
गरीब सवर्णों को भी आरक्षण की भीख मिलेगी ?
चूँकि किसी भी प्रकार का आरक्षण कुछ गरीबों, असहायों को दाल रोटी की व्यवस्था करने के लिए दिया जाने वाला सहयोग है इससे जिन लोगों का हक मारा जाता है वे इस आरक्षण को भीख एवं जिन्हें दिया जाता है उसे भिखारी समझते हैं।इस दृष्टि से भीख में दाल रोटी तो मिल सकती है किन्तु कोई
घी लगा लगा कर रोटी दे ऐसा उसे कैसे बाध्य किया जा सकता है।इसी प्रकार
शर्दी में ठिठुरते देखकर किसी को कुछ कपड़े तो भीख या सहयोग में मिल सकते
हैंsee more...http://snvajpayee.blogspot.in/2012/12/blog-post_3184.html
आरक्षण एक बेईमान बनाने की कोशिश !
गरीब सवर्णों को भी आरक्षण की भीख मिलेगी ?
जो परिश्रम करके अपने को जितना ऊँचे उठा लेगा वह उतने ऊँचे पहुँचे यह ईमानदारी है लेकिन जो यह स्वयं मान चुका हो कि हम अपने बल पर वहाँ तक नहीं पहुँच सकते ऐसी हिम्मत हार चुका हो । दूसरी ओर कुछ लोग सारी मुशीबत उठाकर भी ऊँचा पद पाने के लिए कठोर परिश्रम कर रहे हों ! ऐसे संघर्ष शील वर्ग को आरक्षण के माध्यम से आगे बढ़ने से रोकना न केवल अन्याय अपितु अपराध भी माना जाना चाहिए ।यदि यही छेड़खानी शिक्षा
को लेकर चलती रही तो क्यों कोई पढ़ेगा ?आखिर जो जिस लायक है उसे वो मिलना
नहीं है और जो जिसsee
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पहले नेताओं की संपत्ति जाँच तब हो आरक्षण की बात!
प्रतिभाओं के दमन का षड़यंत्र
जब गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की बात उठी तो उस समय एक मैग्जीन में मेरा लेख छपा था कि आरक्षण एक प्रकार
की भीख है जो किसी को नहीं लेनी चाहिए, तो आरक्षण समर्थक कई सवर्ण लोगों के
पत्र और फोन आए कि जब सभी जातियों को आरक्षण चाहिए तो हमें भी मिलना
चाहिए।मैंने उनका विरोध करके कहा था कि किसी को आरक्षण क्यों चाहिए।
यहsee more...http://snvajpayee.blogspot.in/2012/12/blog-post_6099.html
आरक्षण समर्थक नेताओं की संपत्ति की जाँच होनी चाहिए !
गरीब सवर्णों को भी आरक्षण की भीख मिलेगी ?
प्रतिभाओं के दमन का षड़यंत्र
जब गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की बात उठी तो उस समय एक मैग्जीन में मेरा लेख छपा था कि आरक्षण एक प्रकार
की भीख है किसी को नहीं लेनी चाहिए, तो आरक्षण समर्थक कई सवर्ण लोगों के
पत्र और फोन आए कि जब सभी जातियों को आरक्षण चाहिए तो हमें भी मिलना
चाहिए।मैंने उनका विरोध करके कहा था कि किसी को आरक्षण क्यों चाहिए।
यह बात सच है कि अमीर गरीब आदि सभीप्रकार के लोग हर वर्ग
में होते हैं।दुनियाँ में वैसे सभी काम सभी के लिए कठिन होते हैं
किंतु पढ़ाई उनमें सबसे कठिन काम है।जो लोग ईमानदारी से पढ़ाई करते हैं। मन
को सारे विकारों से दूर रखकर शिक्षा की ओर ले जाना कोई हँसी खेल नहीं है।और
काम तो विकारों के साथ भी कुछsee more...http://snvajpayee.blogspot.in/2012/12/blog-post_4640.html
Monday, 3 February 2014
ईमानदारी का आतंक फैलाकर क्या संदेश देना चाहती है आम आदमी पार्टी ?
क्या आम आदमी की हिम्मत है कि वो इतने बड़े बड़े लोगों को 'बेईमान' बोल जाए !
केजरीवाल और उनसे जुड़े लोग नेता हैं या अभिनेता ? या कुछ और !कैसे बनी आम आदमी पार्टी और और कैसे ठगा गया आम आदमी का आम आदमीपन ?
इस लेख का मूल उद्देश्य यह देखना है कि केजरीवाल आम आदमियों के नेता हैं या आम आदमीयत्व के अभिनेता ! तीसरा सबसे प्रमुख विन्दु इस लेख के माध्यम से इस बात की खोज करना है कि केजरीवाल जी या उनके साथियों को आम आदमी बनने की प्रेरणा कब और कहाँ से मिली? कैसे बने ये आम आदमी और क्यों बने ये आम आदमी ?या ये पहले भी आम आदमी ही थे !पहले कभी क्या आम आदमियों की बस्तियों में कुमार विश्वास को कविताएँ सुनाने जाते आपने देखा सुना है या प्रशांत भूषण जी आम आदमियों की शुल्कमुक्त सहायता करते देखे गए हैं या आम आदमियों का मनोबल बढ़ाने के लिए अरविन्द जी या उनके अन्य साथी किसी क्षेत्र में कोई प्रभावी भूमिका निभाने में सफल हो सके हैं यदि हाँ तो कहाँ और यदि नहीं तो क्यों !ये जितने लोग आज आम आदमियों की टोपी पहने घूम रहे हैं या इनमें से किसी को पहले कभी आपने देखा है ग़रीबों को गले से लगाते ! क्या सत्ता के बिना आम आदमी की मदद नहीं की जा सकती है तो गरीबों को गले भी नहीं लगाया जा सकता था ? लोग कह रहे हैं कि केजरीवाल जी ने पहले ही एक अच्छा बँगला रहने के लिए माँगा था ऐसे आम आदमीयत्व के विसर्जन के और भी कई प्रकरण चर्चा में रहे किन्तु बड़ी बात यह है कि फिल्मी अभिनेताओं की तरह इन आम आदमियों में भी आम आदमीपन ढुलमुल ही होता रहा !बार बार व्यवहार बदलने से लगने लगा कि ये इनकी मूल भावना नहीं थी ये तो आम आदमी का अभिनय मात्र कर रहे थे वस्तुतः इसकी स्क्रिप्ट तो किसी और ने लिखी थी जिसने लिखी होगी उसमें होगी आम आदमी की मूल भावना, वह है आखिर कौन यह भी पता लगेगा इसी लेख के लिंक से !
केजरीवाल जी और उनके साथी आम आदमी होने का यदि अभिनय नहीं वास्तविक आचरण कर रहे होते तो यह तथाकथित आम आदमियत्व बचपन से ही इनके स्वभावों में होता और सत्ता का कितना भी लालच दिया जाता ये उधर जाते ही नहीं ये जन सेवा ही करते !जैसे भुने हुए दाने में अंकुर नहीं निकलता है जैसे विरक्त संत में बासना नहीं जगती है उसी प्रकार से आम आदमी बनकर रहना भी आसान नहीं होता ये भी बहुत बड़ी साधना है वहाँ भी सत्ता की बासना नहीं होती है वहाँ सबको साथ लेकर चलना , सबके सम्मान एवं सबके हित के लिए निःस्वार्थ रूप से कर्तव्य पालन करना होता है सबको चोर बेईमान कहने से बात नहीं बनती है यहाँ अपने आचरण सुधारने पर विशेष जोर होता है ऐसे संस्कार बचपन से ही स्वभाव एवं व्यवहार में देखे जाते हैं और ऐसे आचरणों से प्रभावित होकर लोग धीरे धीरे ऐसे लोगों का अनुगमन करने लगते हैं जो जुड़ते हैं उनमें भी बचपन से ही ये स्वाभाविक सहजता के संस्कार दिखाई देने लगते हैं ऐसे जन नेता महापुरुष पहले भी अनंत बार अवतार लेकर भटकते हुए समाज को सँवारते रहे हैं किन्तु उन्होंने कभी किसी और के लिए अपशब्द या कटुशब्दों के प्रयोग नहीं किए होंगे क्योंकि उनका उद्देश्य समाज को सुधारना होता है और समाज के सुधरते ही राजनीति आदि सारे विभाग स्वयं शुद्ध हो जाते हैं!समाज के सुधरते ही अपराध स्वयं घटने लगते हैं अन्यथा सरकारों में ईमानदार लोग आ भी जाएँ तो वो कितने अपराधियों को कितना कठोर दंड देकर ठीक कर लेंगे !बनाया तो गया है महिलाओं की सुरक्षा के लिए कठोर कानून और बड़े बड़े लोग जेल भी भेजे गए हैं किन्तु अपराधों की संख्या घटी है क्या ?इसलिए आचरणात्मक परिवर्तन सबसे अधिक जरूरी है !अभिनय से काम नहीं चलेगा केजरीवाल जी !
किसी पार्टी का टिकट न मिलने या अपनी नौकरी आदि किसी कार्यक्षेत्र में अपनी उपेक्षा के कारण या अपनी राजनैतिक महत्वाकाँक्षा के कारण जो लोग अपनी पार्टियाँ या नौकरियाँ छोड़ छोड़ कर आपकी पार्टी में सम्मिलित हो रहे हैं वे भी किसी न किसी महत्वाकाँक्षा की पूर्ति के लिए ही आ रहे हैं जिसके लिए वे किसी भी श्रेणी तक गिरने में संकोच नहीं करेंगे आपके टोपी पहना देने से वो आम आदमी नहीं हो जाएँगे क्योंकि स्वभाव तो वही रहेगा। इसलिए ऐसे काया कल्पित आपके सारे आम आदमी अपनी अपनी महत्वाकाँक्षा की आग को आदमियत्व की रुई में लपेट कर दूसरों को दिखाने के लिए कुछ समय के लिए ढक भले लें किन्तु वो और विशाल रूप लेकर जब प्रकट होगी तब सँभाली नहीं जा सकेगी जैसे आज आपके कुछ बनावटी आम आदमी धधक रहे हैं बहुत और लोग भी धधकने की तैयारी में होंगे जो अभी अपनी अपनी आत्माएँ आशा और आश्वासनों में दबाए बैठे हुए हैं !
अब देखना ये है कि केजरीवाल जी या उनके सत्ता सहभोगी या भोगेच्छु लोग क्या पहले भी आम आदमी की तरह से सादगी पूर्ण ढंग से ही रहते रहे हैं या संयोगवश अचानक आम आदमी हो गए हैं! यदि देखा जाए तो इन आम आदमियों में उन आम आदमियों की अपेक्षा बहुत बड़ा अंतर है जिनके ये मसीहा बनने का अभिनय करते हैं ये लोग ठहरे शाही आम आदमी !
इनके पास अच्छे मकान भी है गाड़ियाँ भी हैं बच्चे भी अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं शादी कामकाम काज भी बड़े लोगों में ही करते हैं इलाज भी महँगे प्राइवेट नर्सिंग होम में ही कराते हैं इस प्रकार से बिलासिता के सारे संसाधन भोगते रहते हैं फिर भी इन्होंने अपने नाम आम आदमी ही रख रखे हैं ये इनकी अभूत्पूर्व सादगी है फिर वो न जाने क्या हैं जो ऐसे समस्त संसाधनों से विहीन हैं !खैर, पहले किसी को क्यों नहीं आई आम आदमी की याद ?
सरकार में आने के बाद लालबत्ती छोड़कर धीरे धीरे सब कुछ अन्य सरकारों की तरह ही हो गया है !कहाँ खो गया वो आम आदमियत्व जिसके सपने दिखाए गए थे ? मुख्य मंत्री या मंत्री पद आप ने गरीबों में तो नहीं बाँट दिए हैं जिन्हें कुर्सी पर बैठाकर उनसे आज्ञा ले लेकर आप लोग काम कर रहे हों! रहने को आवास अन्य लोग लेते रहे हैं वो ये भी ले रहे हैं गाड़ी से आप भी चलते हैं सुरक्षा आपने भी भले ली न हो किन्तु दी तो गई है! जैसी सब सरकारें या उनमें बैठे लोग अपने को पाक साफ एवं दूसरों को गन्दा कहते रहे हैं वैसा ही आप भी कर रहे हैं बल्कि आप तो उनसे अधिक कर रहे हैं यदि आप आम आदमी के प्रतिनिधित्व का दावा करते हैं तो आप ही बताइए कि क्या आम आदमी की हिम्मत है कि वो इतने बड़े बड़े लोगों को 'बेईमान' बोल जाए !वो तो बहुत छोटे छोटे लोगों को भी बाबू जी कहकर अपना जीवन काटा करते हैं क्योंकि उनके जीवन में जो अभाव होता है वही उन्हें दीन बना देता है और आपकी सम्पन्नता आदि आपके सारे संचित संसाधनों का उत्साह और ओज आपकी वाणी एवं भाल पर साफ साफ दमक रहा होता है जब आप बड़े बड़े लोगों को 'बेईमान' कह रहे होते हैं !
आप एवं आपके लोगों के इन्हीं सारे संदेहास्पद आम आदमियत्व पर मैंने जब गम्भीर चिंतन किया तो देखा कि आम आदमी और आधुनिक राजनेताओं के रहन सहन के अंतर को दर्शाने के लिए जो स्क्रिप्ट 31 October 2012 को स्वयं मैंने अपने ब्लॉग पर लिखी थी उसी का अभिनय सा करते हुए उसके ठीक 26 दिन बाद 26 नवम्बर 2012 को इन लोगों ने "आम आदमी पार्टी " को न केवल जन्म दिया अपितु उसके वो सारे प्रभावी विचार और नारे लेकर अपने और अपनी पार्टी के नाम से समाज में उछालने शुरू कर दिए और टोपियाँ लगा लगाकर आप लोग तो जुट गए अपने को आम आदमियों का मसीहा सिद्ध करने में किन्तु एक लेखक होने के नाते मैं आप से ही जानना चाहता हूँ कि वास्तव में जब आप हमारी लिखित स्क्रिप्ट सामग्री का राजनैतिक उपयोग करने ही लगे थे तो हमसे पूछना तो दूर क्या हमें बताया जाना भी जरूरी नहीं था ! आखिर हमारे ब्लॉग पर हमारा लेख प्रकाशित होने से पूर्व कहाँ था आपका यह तथाकथित आम आदमियत्व ?यहाँ तक कि अन्ना आंदोलन में भी आपके रहन सहन या बोली भाषा पर आम आदमियत्व हावी नहीं था जैसा कि हमारा लेख प्रकाशित होने के बाद दिखा ! आम आदमी की चर्चा से भरा पूरा हमारा वह लेख है हमारे उस आम आदमी का !उस आम आदमी में ही आपने पार्टी शब्द जोड़ दिया है बस बन गई "आम आदमी पार्टी" !
"आप" एवं आपके आम आदमियों ने हमारी स्क्रिप्ट का कितना राजनैतिक उपयोग किया है इस बात का निर्णय तो हमारा वह लेख पढ़कर स्वयं समाज का आम आदमी ही करेगा मैं समाज के सभी वर्गों समुदायों के सामने अपने उस लेख का लिंक भेज रहा हूँ जिसमें लिखने के बाद कभी कोई एडिटिंग नहीं की गई है जिसे पता लगाने के लिए यदि कोई जाँच होती हो तो मैं विनम्रता पूर्वक उसके लिए भी तैयार हूँ इसलिए इस सच्चाई पर विश्वास करते हुए हमारे पाठक परिवार के जो लोग भी पढ़ें कृपा पूर्वक अपनी राय से हमें अवगत अवश्य करावें - यह लेख पढ़कर समाज को आम आदमी पार्टी के अभिनेता नेताओं का अंदाजा आसानी से लग जाएगा कि केजरीवाल जी की सादगी उनकी मूल विचारधारा बिलकुल नहीं है यदि ऐसा होता तो इतनी जल्दी इस पार्टी में इतनी भगदड़ न मची होती जो पार्टी आम आदमी के नाम पर सादगी के लिए बनी हो उसमें कुछ तो त्याग भावना होती!
मैं विश्वास से कह सकता हूँ कि यह आम आदमीपन का केवल एक अभिनय मात्र था जो वास्तविक जीवन में उतार पाना कठिन होता जा रहा है अपने किए हुए वायदे बोझ बनते जा रहे हैं । यदि इन नेताओं के अतीत के रहन सहन की शैली को खंगाला जाए तो इस सच्चाई की पोल भी स्वयं ही खुल जाएगी ! आप सभी बंधुओं से प्रार्थना है कि आप लोग मेरा निम्न लिखित लेख अवश्य पढ़ें कि कैसे बनी आम आदमी पार्टी ?
Wednesday, 31 October 2012
ऐ मेरे देश के शासको! अब तो विश्वास भी टूट रहा है!
आम आदमी और नेताओं में इतनी दूरी आश्चर्य !
इस देश का आम आदमी कहॉं जाए अपनी पीड़ा किसे सुनावे ?जो न हिंदू और न ही मुशलमान है न हरिजन और न ही सवर्ण है।न स्त्री न ही पुरुष है। न बच्चा न बूढ़ा है।वो केवल इंसान है। अब तो उसका भी जीना मुश्किल है।गरीब हो या अमीर, भूखप्यास, सुख दुख, बीमारी आरामी, शिक्षा दीक्षा आदि सभी प्रकार की सुख सुविधाएँ तो सबको चाहिए किंतु ये आज भारतवर्ष की सच्चाई नहीं है seemore....http://snvajpayee.blogspot.in/2012/10/blog-post_4683.html
Friday, 31 January 2014
संन्यास से सत्यानाश के पथ पर ...! कलियुगी वैराग्य !
साम्राज्य ! क्या यही वैराग्य है क्या इसीलिए घर द्वार छोड़ने का नाटक किया गया था !
यह संन्यास से सत्यानाश की यात्रा तीन चरणों में प्रारम्भ होती है
काले मन - वैराग्य को धोने के लिए लोग महात्मा बनते हैं किन्तु पूर्व जन्म के पाप की अधिकता से भजन में मन नहीं लगता है!अब घर गृहस्थी में वापस जा नहीं सकते अब क्या करना चाहिए !
इसके
लिए वैराग्य परमावश्यक होता है रामदेव भी पहले महात्मा बने वो अभी बन भी
नहीं पाए थे कि काले तन अर्थात अस्वस्थ शरीरों को मुद्दा बना लिया। यदि वो
महात्मा नहीं बन पाए थे तो संतोष कि चलो बेशक प्राच्यविद्याओं के विद्वान न हों किंतु योग आदि का नाम तो प्रचारित हो ही रहा है।
अब
बात काले धन की, अरबों रूपयों की कमाई ईमानदारी पूर्वक इतनी जल्दी वो भी
बिना किसी व्यापार के नहीं की जा सकती। यदि किसी ने कमाए हैं वो भी महात्मा
होकर फिर भी वो अपने को ईमानदार कहे ये तो बहुत बड़ा झूठ है। संविधान कहे न
कहे किंतु शास्त्रीय संविधान तो सन्यासी के धनसंग्रह को पाप मानता
है,शास्त्र तो इस धन संग्रह को कालाधन ही मानेगा।अब आप स्वयं सोचिए अरबों
रूपयों की भूख रखने वाला व्यक्ति यदि अपने को वैरागी कहता हो तो ये उसी तरह
है जैसे कोई पण्यबधू अर्थात वेश्या अपने को पतिव्रता कहे एवं बहुत बच्चों
का बाप अपने को ब्रह्मचारी बतावे। यह कितना विश्वसनीय होगा? सोचने की
आवश्यकता है।
इसी प्रकार बाबा जी योग के नाम पर केवल आसन सिखाते
रहे और योग शिविरों एवं टी.वी. चैनलों आदि पर बड़े-बड़े भयंकर रोगों की लंबी
लंबी लिस्टें न केवल पढ़ते रहे अपितु उन्हें ठीक करने का दावा भी ठोंकते
रहे। उनके दावे कितने सच हैं? सरकार ने कभी यह जानने के लिए मेरी जानकारी
में तो कोई ऐसा चिकित्सकीय जाँच दल गठित नहीं किया जिससे जनता के सामने
सारी सच्चाई आती। यदि बाबा जी के दावों में दम थी तो उन्हें और अधिक
प्रोत्साहित किया जाना चाहिए था और यदि ये वास्तव में पाखंडी थे तो उचित
कार्यवाही करके जनता को बचाने का दायित्व भी तो सरकार का ही था। कालेधन से
धनी बाबा ने भविष्य में अपने धन की सुरक्षा के लिए काले धन
को ही मुद्दा बना लिया।संभवतः सोचा होगा कुछ तक सांसद यदि अपने बन गए तो
किसी प्रतिकूल कार्यवाही के समय संसद में शोर मचाने के काम आएँगे।
फिर
भी यदि बाबा रामदेव या उनके लोग गलत थे तो उनकी निष्पक्ष जॉंच पहले ही
क्यों नहीं की गयी? उनसे दूरी बनाकर क्यों नहीं रहा गया? उन्हें मनाने के
लिए मंत्री क्यों भेजे गए ? क्या मिलजुल कर देश को लूटने का समझौता करने
का बिचार था ? आखिर इस सरकारी घबड़ाहट का इशारा किस ओर है ? स्वतंत्र भारत
में सर्वाधिक समय तक सत्ता में रहने वाला दल भ्रष्टाचार में कहीं स्वयं को
ही तो सबसे अधिक संलिप्त नहीं मान रहा है?
Tuesday, 28 January 2014
काँग्रेस का चमत्कार ! आठ विधायकों से चली महीने भर दिल्ली की सरकार !
दिल्ली की सरकार का एक महीना पूरा होने पर बधाई ! किन्तु किसको ?
दिल्ली सरकार को ! किन्तु दिल्ली वासियों को तो लग ही नहीं रहा है कि यहाँ कोई सरकार भी है कोई नौसिखिया सीख रहा है यह बात और है !
फिर बधाई चुप रहकर सब कुछ सहने वाली दिल्ली की जनता को दें क्या ?किन्तु उसके पास और विकल्प ही क्या है!
फिर बधाई भाजपा को दें क्या ?किन्तु भाजपा करे भी तो क्या !वो आपस में ही कुछ वैसी है दिल्ली में सरकार बनाने के लिए जैसी नहीं होनी चाहिए यदि वो इस लायक ही होती तो क्यों इस तरह बनती दिल्ली की सरकार? फिर तो उसी तरह बन सकती थी जैसी जरूरी थी !
फिर तो पक्का है कि बधाई काँग्रेस की ही बनती है जानिए क्यों ?
अपने आठ विधायकों के बल पर काँग्रेस ने दिल्ली में जब सरकार चलानी प्रारम्भ की तो अबकी बार उसे एक नए प्रकार की समस्या का सामना करना पड़ रहा है उसे एक मुख्यमंत्री भी खोजना पड़ा !खैर !!
काँग्रेस के लिए तो केजरीवाल जी दिल्ली के लिए छोटे से मन मोहन सिंह जैसे ही हैं जैसे वो शांत हैं वैसे ये भी शांत हो गए हैं आज केजरी वाल जी काँग्रेस के सारे दोष भूल गए से लगते हैं किसी के भ्रष्टाचार की अभी तक कोई फाइल खुली ही नहीं या तो केजरी वाल ने उन पर झूठे आरोप लगाए होंगे या फिर जाँच कराने में डर रहे होंगे !और डरना भी चाहिए क्योंकि केजरीवाल जी आज सरकार में हैं जहाँ ईमानदारी से काम कर पाना काफी कठिन होता है और यदि थोडा भी ऐसा वैसा हुआ तो जाँच की बड़ी एजेंसियाँ उन्हीं के हाथ में हैं क्या पता कब क्या हो जाए !बड़े बड़े लोगों को निर्भीकता पूर्वक ललकारने वाली सपा और बसपा जैसी पार्टियाँ एवं लालू जी जैसे शूरमा आज भी अपने समर्थन से जिनकी आरती उतारा करते हैं आखिर केजरीवाल जी भी पढ़े लिखे तो हैं ही अफ्सर रह चुके हैं समझदारी से काम ले रहे हैं आखिर अपने से बड़े बूढ़े विद्वान प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह जी से सीख लेने में बुराई भी क्या है कि काँग्रेस में केवल एक परिवार ही बोलता है बाकी सब सुनते हैं ,उनके इशारे पर देश की राजनीति करवट बदलती है!
उनसे बिना पूछे तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई पुलिस से जबान लड़ाने की! तुम्हारे मंत्री की ताकत क्या है दिल्ली के दरोगाओं पर अंगुली उठाने की! तुम्हारे प्रदर्शन का मतलब क्या है यहाँ बात पुलिस की है ही नहीं !यह केस तो सीधा सा एक परिवार के अनुशासन की अवलेहना का बनता है ,इसलिए दिल्ली पुलिस के विरोध में बैठने जैसी अपनी धृष्टता का एहसास करते हुए अपना अनशन छोड़कर भाग जाओ अन्यथा काँग्रेस के लट्ठ में इतनी ताकत है कि बड़े बड़े बाबाओं के अनशन तुड़ा देती है! अनशन करने वाले लोग इतना घबड़ा जाते हैं कि बस मोदी! मोदी! करने लगते हैं उसके अलावा काँग्रेस के कोप से और बचा भी कौन सकता है?खैर! अच्छा हुआ अनशन छोड़ दिया यह कहते हुए छोड़ा कि दिल्ली की जनता की विजय हुई है लोगों ने भी राहत की साँस ली है किसी भी प्रदेश के मुख्य मंत्री के सम्मान से जनता का भी स्वाभिमान जुड़ा होता है चलो बात नहीं मानी गई तो नहीं सही सम्मान तो बचा लिया ,ठीक भी रहा -"जान बची लाखों पाए ,लौट के …!"
खैर,काँग्रेस की दृष्टि से भी ठीक ही रहा अब तक का 'आप'का कार्यकाल ! काँग्रेस अच्छा एवं प्रभावी 'आप'को कुछ करने नहीं देगी और यदि कुछ 'आप' कर भी पाए तो उसका श्रेय या तो काँग्रेस स्वयं लेगी आखिर सरकार उसने अपने लिए बनवाई है अन्यथा वो काम होने नहीं देगी।पुलिस वालों को सस्पेंड छोड़िए ट्रांसफर भी नहीं करा पाए आप !आखिर इससे क्या नुक्सान हो जाता केवल यही न कि 'आप'का सम्मान बन जाता इसलिए ऐसा क्यों करे काँग्रेस !
केजरी वाल जी !यदि आप अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए त्यागपत्र दे देते तो वो कहते कि आप कुछ कर नहीं पाए इसलिए सरकार छोड़कर भाग गए !जब आपने त्यागपत्र नहीं दिया तो भाजपा आप को पद लोलुप कहे जा रही है !खैर आपकी सरकार बनने से एक फायदा भाजपा को हुआ है कि चिरंतन मौन रहने वाले भाजपा के कृत्रिम मुख्यमंत्री भी अब चीघने चिल्लाने लगे हैं किसी की नमस्ते का जवाब न देने वाले लोग भी अब सुधरना चाह रहे हैं किन्तु केजरी वाल की नक़ल करने का आरोप न लग जाए ये संकोच भी है फिर भी नए लोगों से मिलने पर ऐसे लोग भी हँसने मुसुकुराने का अभ्यास करते दिखने लगे हैं चलो सुधार तो हो रहा है उम्र में अपने से छोटों से भी गुण लेने में बुराई क्या है !खैर जो भी हो हम तो सामान्य नागरिक हैं हमें किसी के विषय में क्या कहना !
मुख्य विषय तो यह है कि केजरीवाल जी को भी काँग्रेस केवल आँकड़े ही देने देगी मनमोहन सिंह जी की तरह जो आम जनता के शिर के ऊपर से निकल जाएँगे जिससे जनता को प्रत्यक्ष लाभ कुछ मिलना नहीं है और उसका रुष्ट होना स्वाभाविक भी है!
काँग्रेस दूसरी ओर केजरीवाल को इस लिए भी फँसाकर रखना चाहती है कि अनशन धरना प्रदर्शन आदि के आदी केजरीवाल जी यदि खाली रहेंगे तो पूरे देश में घूम घूम कर भ्रष्टाचार का शोर मचाएँगे इससे सत्तासीन पार्टी काँग्रेस की ही जड़ें काटेंगे ऐसे मुख्यमंत्री नाम के पद पिंजरे में बंद करके इन्हें यदि दिल्ली में ही कैद करके रख लेंगें तो पूरे देश में छीछालेदर होने से बचाव हो जाएगा !धन्य है काँग्रेस !जो हो सो हमारी ओर से दिल्ली की सरकार का एक महीना पूरा होने पर बधाई !
आखिर क्या मिला केजरीवाल को ?कष्ट और पश्चात्ताप!!!काँग्रेस की भंवर में फँसी है "आप"
जस जस सुरसा बदन बढ़ावा । तासु दून कपि रूप दिखावा ॥
शत जोजन तेहि आनन कीन्हा।अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥
काँग्रेस और केजरी वालकाँग्रेस के समर्थन का मतलब ही होता है दुम हिलाना और गाली खाना! जहाँ तक सरकार चलाने की बात हैकाँग्रेस का समर्थन लेकर आज तक कोई सरकार चला पाया हो तो केजरीवाल भी चला लेंगे !काँग्रेस से समर्थन लेने वाले केजरीवाल नए तो हैं नहीं !ऐसे तो पहले भी लोग प्रधानमंत्री आदि बन चुके हैं जिनके शिर पर मुकुट दुबारा नहीं लग पाया अब केजरी वाल रगड़े जा रहे हैं आखिर यों ही कोई मुख्यमंत्री धरने के नाम पर रोड़ों पर नहीं तड़पता है !जिन केजरीवाल का सब कुछ दाँव पर लगा है वो धरना न दें क्या बाँसुरी बजावें? काँग्रेस ये तो स्वप्न में भी नहीं होने देगी कि केजरीवाल कुछ कर पाएँ या करते हुए दिखें!जहाँ तक जनता से किए गए वायदे पूरे करने की बात है तो अपना वायदा पूरा करते हुए तो काँग्रेस के लोग ही अच्छे लगते हैं !ये क्या वायदे पूरे करेगी बेचारी आम आदमी पार्टी कहीं की !खैर, देखना अब यह है कि आम आदमी पार्टी अब काँग्रेस का ग्रास बनती है कि बचती है ?अर्थात केजरी वाल को काँग्रेस अपने चंगुल में फँसा पाएगी या नहीं !क्योंकि श्री चौधरी चरण सिंह जी,श्री चन्द्र शेखर जी, श्री देवगौड़ा जी ,श्री इंद्र कुमार गुजराल जी काँग्रेस के समर्थन से ही प्रधान मंत्री बने थे । श्री देवगौड़ा जी की जगह श्री इंद्र कुमार गुजराल जी को कैसे बनाया गया था प्रधान मंत्री सबने देखा है ?जब संयुक्त मोर्चा की सरकार का केवल सिर बदला गया था !कैसे भूलेगा देश काँग्रेस के समर्थन देने की शैली को ? |
काँग्रेस जिसे समर्थन देती है वह चाहे अनचाहे उसका ग्रास बन ही जाता है काँग्रेस किसी दल के साथ कितना भी बुरा बर्ताव क्यों न करे किन्तु जब वह धर्म निरपेक्षता की मौहर बजाने लगती है तब बड़े बड़े मणियारे बिषैले राजनैतिक दल फन फैला फैला कर नाचते नजर आते हैं!
सम्भवतः इसीलिए आम आदमी पार्टी को काँग्रेस जैसे जैसे समर्थन, सुविधाएँ एवं समाधान देती जा रही है वैसे वैसे केजरी वाल न केवल अपनी शर्तें एवं शंकाएँ बढ़ाते जा रहे हैं अपितु पैर एवं दायरा भी फैलाते जा रहे हैं।
रामायण में एक प्रसंग आता है कि जब हनुमान जी लंका की ओर बढ़ रहे थे उसी समय सर्पों की माता सुरसा आती है और हनुमान जी को अपने मुख में रखना चाहती है हनुमान जी जैसे जैसे अपना शरीर बढ़ाते हैं वैसे वैसे सुरसा अपना मुख बढ़ाते जाती है ।वही हालात आज दिल्ली की राजनीति में पैदा हो गए हैं काँग्रेस जैसे जैसे केजरीवाल का साथ देने और शर्तें मानने की घोषणा करती चली जा रही है अरविन्द केजरीवाल जी वैसे वैसे अपनी शर्तों का पिटारा खोलते चले जा रहे हैं।
आखिर ऐसा करें भी क्यों न केजरीवाल जी? वे तो शर्तों के साक्षात समुद्र हैं वे तो कभी भी कोई भी कहीं भी कैसी भी नई से नई शर्त का नया पिटारा खोल सकते हैं!अब केजरी वाल सरकार बना सकते हैं
केजरीवाल का इंकार काँग्रेस का फिर भी समर्थन !इतनी उदार !!!
देखो बन रही है "आप" की सरकार
सुना है कि आम आदमी पार्टी के लोग कहते हैं कि यदि उनकी सर कार बनी तो "भाजपा और काँग्रेस वाले जेल जाएँगे!"
अरविन्द केजरीवाल का यह कहना कितना न्यायोचित है कि भाजपा और काँग्रेस वाले जेल जाएँगे ! इन दलों में जो ईमानदार लोग हैं क्या ये उनका अपमान नहीं है?यदि आप पार्टी सरकार में आती तो जाँच कराती उसमें जिसके साथ जो होना होता सो होता किन्तु बिना जाँच के सबको जेल भेजने की बात करना कौन सी बुद्धि मानी है इसे आप की बकवास क्यों न मानी जाए ?
सुना है कि आम आदमी पार्टी काँग्रेस को विश्वासघाती मानती है -
आम आदमी पार्टी का काँग्रेस को विश्वासघाती कहना कितना उचित है जिस दाल पर बैठना है उसी को काटना यह कौन सी बुद्धि मानी है जबकि वो काँग्रेस ही मुख्यमंत्री पद तक पहुँचाने का जोर शोर से समर्थन कर रही है !आम आदमी पार्टी के इन वर्त्तमान कालिदासों की यह राजनैतिक अपरिपक्वता नहीं तो इसे और क्या कहा जाएगा ?
सुना है कि आम आदमी पार्टी के नेता जी काँग्रेस को दोमुँहा साँप मानते हैं -
यदि काँग्रेस दोमुँहा साँप है तो काँग्रेस का एक मुख तो उसका अपना है जबकि उसका दूसरा मुख तो आम आदमी पार्टी ही है संभवतः इसी लिए विरोधी लोग आम आदमी पार्टी को काँग्रेस की बी पार्टी मानते हैं !
सुना है आम आदमी पार्टी की सरकार बनने पर बधाई काँग्रेस को ही दी जाएगी !
बधाई उसकी ही बनती भी है क्योंकि इसमें वास्तविक तरक्की तो काँग्रेस की ही होगी इसलिए आम आदमी पार्टी की सरकार बनने पर बधाई तो काँग्रेस को ही देनी होगी क्योंकि पहले उसका मुख्यमंत्री था अब काँग्रेस होगी मुख्यमंत्री की बॉस !
सुना है आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल जी ने सुरक्षा लेने से लिए मना कर दिया है
मेरी समझ में यह कदम उन्होंने अच्छा उठाया है क्योंकि काँग्रेस के लोग न जाने कब समर्थन वापस लेकर इनका उपहास उड़ाने लगें !और जब सरकार चलती दिखाई पड़ेगी तब किसी बहाने से ले ली जाएगी सुरक्षा, वो तो अपने हाथ की बात होगी ,यदि सरकार नहीं चलती है तो सौ कैरेट शुद्ध आम आदमी बने रहेंगे अरविन्द केजरीवाल जी इसमें क्या संदेह है ! उनका यह आम आदमियत्व दूसरे चुनावों में भी खूब फूले फलेगा !
सुना है कि केजरी वाल की सरकार से काँग्रेस का कोई लेना देना नहीं होगा यह सरकार केवल आम आदमी पार्टी की होगी -
यह आम आदमी पार्टी की सरकार बनेगी या नहीं बनेगी, चलेगी या नहीं चलेगी, चलेगी तो कब तक चलेगी आदि इन सब प्रश्नों पर तो आम आदमी पार्टी की सरकार काँग्रेस के ही आधीन रहेगी बात अलग है कि इस बात को वो मानें या न मानें ! यदि काँग्रेस के समर्थन से आम आदमी पार्टी की सरकार बनती है तो बधाई आम आदमी पार्टी को कैसे दी जा सकती है बधाई तो काँग्रेस की ही बनती है ? क्योंकि अभी तक तो काँग्रेस पार्टी की मुख्य मंत्री ही थीं अब तो मुख्य मंत्री आम आदमी पार्टी का होगा किन्तु उसका बॉस तो काँग्रेस का ही होगा जिसकी कृपा पर यह सरकार टिकी होगी इस लिए आम आदमी पार्टी की सरकार बनने पर वास्तविक पदोन्नति तो काँग्रेस की ही हुई तब मुख्य मंत्री तो अब मुख्य मंत्री की बॉस !बधाई हो काँग्रेस को बधाई !!!
सुना है कि 'आप' का मानना है कि काँग्रेस और भाजपा के नेता ईमानदार नहीं हैं किसी भी पार्टी के नेता की ईमानदारी का निर्णय अब केवल आम आदमी पार्टी के लोग ही करेंगे !
श्री अन्ना हजारे जी ने अपनी जिस पूर्व टीम पर संदेह किया हो वो विश्वसनीय कैसे हैं ? ईमानदारी और राष्ट्र निष्ठा के प्रति जीवन समर्पित करने वाले समाज सुधारक श्री अन्ना हजारे जी जिन आप नेताओं के आचरण पर अंगुली उठा चुके हों उन्हें ईमानदार कैसे माना जाए जब तक वे अच्छा कुछ करके दिखाते नहीं हैं यदि वो अच्छा करने में सफल हों तो सौ सौ बधाइयाँ किन्तु बिना कुछ किए ही सबको बेईमान कहने लगना उन लोगों के शैक्षणिक जीवन के गौरव के भी अनुकूल नहीं है।
सुना है आम आदमी पार्टी काँग्रेस और भाजपा नेताओं को भ्रष्ट मानती है -
काँग्रेस और भाजपा के नेताओं को बेईमान कहने वाले आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं में हिम्मत है तो अटल अडवाणी जोशी जी जैसे महान नेताओं के जीवन पर भ्रष्टाचार का कोई दाग दिखा दें इन नेताओं का क्या व्यक्तित्व है क्या जीवन दर्शन है क्या आदर्श है ! ये ईमानदार मूर्ति हैं इस भ्रष्टाचार के युग में भी ऐसे अच्छे नेता अन्यदलों में भी हैं जिनके जीवन के कुछ सिद्धांत हैं जिनसे वे समझौता नहीं कर सकते । ऐसे सभी दलों के लोग ,मीडिया के लोग व अन्य भी देश विदेश के लोग ईमानदारी के विषय में जिनके उदाहरण देते हों उन्हें ईमानदार न मानने वाला कोई व्यक्ति कैसे ईमानदार हो सकता है इसका मतलब ईमानदारी के विषय में उसकी अपनी अलग मनगढंत परिभाषा है जिसे मानना हर किसी के लिए जरूरी नहीं है वो अपनी कल्पना में कुछ भी हो जाए !
ईमानदार सरकार अटल जी की थी
अटल जी की सरकार एक वोट से गिरी थी तब भी ख़रीदे जा सकते थे वोट ?
अरविन्द केजरी वाल जैसी बातें ... ! कोई राजनेता कैसे कर सकता है ?
अभी अभी आगामी चुनावों की कन्वेसिंग जैसी करते
हुए अरविन्द केजरीवाल को देखा गया इससे अच्छा अवसर अपनी ईमानदारी और
दूसरों को बेईमान प्रचारित करने का और कौन हो सकता है? सभी पार्टियों को
इसी बहाने बिना कहे बेईमान सिद्ध कर दिया गया ये गलत बात है सारे विश्व ने
अटल जी की अल्पमत सरकार को देखा था जब एक वोट से सरकार गिरी थी उस समय भी
मंडी में माल बहुत था किन्तु भाजपा चाहती तो एक सीट खरीदकर अपना प्रधान
मंत्री बचा सकती थी किन्तु ऐसा नहीं किया गया इससे अधिक ज्वलंत उदाहरण और
क्या हो सकता है ?अरविंद की भाषा में एक बहुत बड़ा दोष यह है कि वो दूसरे को
बेईमान सिद्ध करके अपने को ईमानदार बताते हैं जबकि अपनी और अपने दल कि
अच्छाइयां बताना जैसे आपका अधिकार है उसी प्रकार अन्य दलों के भी अपने अपने
अधिकार हैं
इसीप्रकार कोई दल किसी और के एजेंडे को सम्पूर्ण
रूप से कैसे स्वीकार कर ले आखिर उसे इतना कमजोर सिद्ध करने का प्रयास क्यों
किया जा रहा है ?दुबारा सम्भवित चुनावी खर्च के बोझ से दिल्ली की जनता को
बचाने के लिए बड़ी पार्टियों ने जो उदारता दिखाई है उसका दुरूपयोग कर रहे
है अरविन्द !
"अरविन्द केजरीवाल की अन्नाहजारे से नहीं बनी तो अरविन्द सिंह लवली से कैसे बनेगी ? - ज्योतिष"
अ अक्षर के कारण बिगड़े अन्ना और अरविन्द के आपसी सम्बन्ध फिर मिला वही अ
अक्षर अरविन्द सिंह लवली कब तक चल पाएगा यह सरकार बनाने का जुगाड़ ?
अन्नाहजारे-अरविंदकेजरीवाल-असीम त्रिवेदी- अग्निवेष- अरूण जेटली - अभिषेकमनुसिंघवीमें
जब अरविन्द केजरीवाल की अन्ना हजारे, अग्निवेश, अमित त्रिवेदी आदि किसी अ
अक्षर से प्रारम्भ नाम वाले की पटरी नहीं खा सकी तो अरविन्द सिंह लवली से
कब तक सम्बन्ध चल पाएँगे कहा ही नहीं जा see more...http://snvajpayee.blogspot.in/2013/12/blog-post_1451.html
अ अक्षर के कारण बिगड़े अन्ना और अरविन्द के आपसी सम्बन्ध फिर मिला वही अ अक्षर अरविन्द सिंह लवली कब तक चल पाएगा यह सरकार बनाने का जुगाड़ ?
अन्नाहजारे-अरविंदकेजरीवाल-असीम त्रिवेदी- अग्निवेष- अरूण जेटली - अभिषेकमनुसिंघवीमें
जब अरविन्द केजरीवाल की अन्ना हजारे, अग्निवेश, अमित त्रिवेदी आदि किसी अ अक्षर से प्रारम्भ नाम वाले की पटरी नहीं खा सकी तो अरविन्द सिंह लवली से कब तक सम्बन्ध चल पाएँगे कहा ही नहीं जा see more...http://snvajpayee.blogspot.in/2013/12/blog-post_1451.html
"काँग्रेस का समर्थन केजरीवाल का इनकार !ऐसे कैसे बनेगी सरकार ?"
काँग्रेस
के समर्थन से चली सरकारों का अनुभव कभी अच्छा नहीं रहा! see more
...http://bharatjagrana.blogspot.in/2013/12/blog-post_19.htmlअब केजरी वाल सरकार बना सकते हैं -धन्यवाद
Saturday, 25 January 2014
नमस्ते चोर नेताओं को खतरा है केजरीवाल से ....! इसलिए अब भाजपा के सुधरने का समय !
आम लोगों से बात करने में तौहीन समझने वाले भाजपाई अब आम लोगों से किस मुख से करें बात एवं कैसे माँगें वोट ?
केजरीवाल की चर्चा तो बहुत है
मीडिया ने इस ईमानदार विभूति की बात विदेशों तक फैला भी खूब रखी है किन्तु
उन्होंने किया आखिर क्या है ऐसी कौन सी हमदर्दी की है दिल्ली की जनता के
साथ?
इतना सब कुछ होने के बाद भी
केजरीवाल जी का बर्चस्व जैसा कुछ भी समाज में बिलकुल नहीं है और इसलिए लोक
सभा चुनावों में भी केजरीवाल जी कोई करिश्मा करने नहीं जा रहे हैं। बात
साफ है कि दिल्ली से लेकर सारे देश में लुटी पिटी काँग्रेस ने अन्य
प्रदेशों की तरह ही दिल्ली में भी आम आदमी पार्टी के रूप में अपनी एक फीडर
पार्टी तैयार करना प्रारंभ कर दिया है जैसे -बिहार में लालू प्रसाद जी की
पार्टी ,यू.पी.में सपा बसपा के मुलायम और मायावती जी जैसे लोग जो चुनावों
के समय काँग्रेस की आलोचना एवं जनता का पक्ष ले करके पहले औने पौने में
जनता से वोट हासिल कर लेते हैं फिर अपनी अपनी शर्तों पर काँग्रेस की शरण
में पहुँच जाते हैं
दिल्ली भाजपा के आपसी कलह के कारण कई जगह से ऐसे प्रत्याशी बनाए गए जो चुनाव जीतने लायक थे ही नहीं वो कागजी शेर पराजित होने ही थे सो हुए परिणाम सवरूप भाजपा को बहुमत से दूर रहना था सो रही। जो मतदाता काँग्रेस से तो दुखी था ही और भाजपा के न जीतने योग्य कार्यकर्त्ता को वोट देना उसने ठीक नहीं समझा अब वो अपना वोट कुँए में डालना चाह रहा था तो आम आदमी पार्टी को दे दिया । इससे आम आदमी के साथ वो भाजपा को मिलने वाली सीटें भी जुड़ गईं तो उनकी सीटें बढ़नी ही थीं सो बढ़ गईं । इसमें केजरीवाल का कमाल क्या है जो उनकी प्रशंसा में कसीदे पढ़े जा रहे हैं। भाजपा ने उत्तर प्रदेश में पहली बार मायावती को प्रत्यक्ष समर्थन देकर वहाँ से अपना पत्ता काट लिया दूसरी बार आपस में ही एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए न चाहते हुए भी अप्रत्यक्ष रूप से केजरीवाल जैसे नेताओं को फायदा पहुँचाया है कुछ भी हो केजरीवाल के नाम के साथ मुख्यमंत्री तो लगवा ही दिया ! इसका श्रेय भाजपा को ही जाता है अब मायावती की तरह ही दिल्ली में भाजपा को ही चोट पहुँचाएँगे केजरीवाल!अभी भी भाजपा यदि अटल अडवाणी जी के स्वभाव और शैली से प्रेरणा लेकर आगे बढे तो भाजपा का कुछ नहीं बिगाड़ पाएँगे केजरीवाल! केजरीवाल का अभी तक न कहीं विस्तार है और न कहीं चमत्कारिक विस्तार होगा ।दिल्ली
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